19 अक्टूबर 2026 1:15 पूर्वाह्न

करोड़ों का विकास, फिर भी कीचड़ में जिंदगी! गंदगी और बजबजाती नालियों ने खोली सरकारी दावों की पोल

कीचड़युक्त रास्ते और बदहाल स्वच्छता व्यवस्था के बीच संजय सिंह राणा की ग्राउंड रिपोर्ट, साथ में ग्राम पंचायत भवन और ठोस अपशिष्ट प्रबंधन केंद्र की तस्वीर

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संजय सिंह राणा की ग्राउंड रिपोर्ट

विकास के दावों के बीच बदहाल रास्तों की हकीकत

CHITRAKOOT. सरकारी योजनाओं के जरिए गांवों की तस्वीर बदलने के दावे लगातार किए जाते हैं। विकास के लिए करोड़ों रुपये की धनराशि स्वीकृत होती है, स्वच्छता अभियान चलाए जाते हैं और ग्रामीण क्षेत्रों को बेहतर सुविधाएं देने की योजनाएं बनाई जाती हैं। लेकिन जमीनी हकीकत कई बार इन दावों से बिल्कुल अलग नजर आती है। संबंधित गांव में मुख्य मार्ग से लेकर अंदरूनी रास्तों तक की स्थिति ग्रामीण विकास की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करती दिखाई देती है। जगह-जगह कीचड़, जलभराव, गंदगी और नालियों की बदहाल स्थिति के कारण ग्रामीणों को रोजाना परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।

मुख्य रास्ते से ही शुरू हो जाती है परेशानी

गांव के मुख्य मार्ग पर पहुंचते ही सबसे पहले कीचड़ और गंदगी से भरी सड़क ग्रामीण व्यवस्था की तस्वीर सामने रख देती है। रास्ते के दोनों ओर बनी नालियों में कूड़ा-कचरा जमा दिखाई देता है। कई स्थानों पर नालियों का गंदा पानी सड़क पर बहता नजर आता है, जिससे आवागमन मुश्किल हो जाता है। बरसात के दिनों में यह समस्या और गंभीर हो जाती है। कीचड़ और जलभराव के कारण पैदल चलने वालों के साथ-साथ दोपहिया वाहन चालकों को भी काफी परेशानी होती है।

सबसे चिंता की बात यह है कि जिस रास्ते से ग्रामीणों का प्रतिदिन आना-जाना होता है, उसी रास्ते पर यदि जलनिकासी की व्यवस्था ठीक नहीं है तो इसका सीधा असर ग्रामीणों के स्वास्थ्य और जीवन की गुणवत्ता पर पड़ता है। स्कूली बच्चों, महिलाओं, बुजुर्गों और कामकाजी लोगों को भी इन्हीं रास्तों से गुजरना पड़ता है।

बजबजाती नालियां बनीं बीमारी के खतरे का कारण

गांव की बदहाल नालियां केवल गंदगी का दृश्य नहीं हैं, बल्कि संभावित स्वास्थ्य संकट का कारण भी बन सकती हैं। नालियों में कचरा जमा होने से पानी का प्रवाह बाधित होता है और गंदा पानी सड़क पर फैल जाता है। लंबे समय तक जमा रहने वाला पानी मच्छरों और अन्य कीटों के पनपने का कारण बन सकता है।

एक तरफ संचारी रोगों की रोकथाम के लिए अभियान चलाए जाते हैं, दूसरी तरफ यदि गांव की नालियों की नियमित सफाई नहीं हो और जलभराव बना रहे तो इन अभियानों की प्रभावशीलता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। स्वच्छता अभियान केवल जागरूकता कार्यक्रमों तक सीमित न रहकर नियमित सफाई और प्रभावी जलनिकासी व्यवस्था में दिखाई देना चाहिए।

कागजों पर विकास, जमीन पर सवाल

ग्रामीण विकास के लिए विभिन्न योजनाओं के माध्यम से बड़ी धनराशि उपलब्ध कराई जाती है। सड़क, नाली, स्वच्छता, पेयजल और अन्य बुनियादी सुविधाओं के विकास पर खर्च किया जाता है। इसके बावजूद यदि गांव में मुख्य रास्ता ही कीचड़ और गंदगी से जूझ रहा हो तो यह जानना जरूरी हो जाता है कि विकास कार्यों की प्राथमिकताएं क्या रहीं और उनका वास्तविक परिणाम क्या निकला।

यहां किसी व्यक्ति या संस्था पर सीधे आरोप लगाना उचित नहीं होगा, लेकिन मौके की स्थिति निश्चित रूप से निष्पक्ष जांच की मांग करती है। विकास कार्यों से संबंधित स्वीकृति, भुगतान, कार्य की गुणवत्ता, माप पुस्तिका और पूर्णता संबंधी अभिलेखों का भौतिक सत्यापन कराया जाए तो यह स्पष्ट हो सकता है कि सरकारी धन का इस्तेमाल निर्धारित उद्देश्य के अनुरूप हुआ या नहीं।

स्वच्छता अभियान के बीच गंदगी का अंबार

स्वच्छ भारत मिशन और अन्य स्वच्छता अभियानों का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में साफ-सफाई की स्थायी व्यवस्था तैयार करना है। शौचालय निर्माण से लेकर कचरा प्रबंधन और जलनिकासी तक विभिन्न स्तरों पर योजनाएं संचालित की जाती हैं। लेकिन जमीनी स्तर पर यदि गंदगी और कूड़े का ढेर दिखाई दे, नालियां जाम हों और रास्तों पर दूषित पानी बह रहा हो तो व्यवस्था की निगरानी पर सवाल खड़े होते हैं।

स्वच्छता किसी एक दिन का अभियान नहीं है। इसके लिए नियमित सफाई, कचरा संग्रहण, नालियों की देखरेख और ग्रामीणों की भागीदारी जरूरी होती है। यदि इनमें से किसी एक कड़ी की भी अनदेखी होती है तो पूरी व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।

शौचालय निर्माण पर भी उठते रहे सवाल

ग्रामीण क्षेत्र में स्वच्छता व्यवस्था मजबूत करने के लिए बड़ी संख्या में शौचालयों का निर्माण कराया गया। संबंधित गांव में भी स्वच्छ भारत मिशन के तहत शौचालय निर्माण से जुड़ी योजनाएं लागू की गईं। हालांकि इन कार्यों को लेकर वित्तीय अनियमितता और धन के दुरुपयोग जैसे सवाल उठाए जा रहे हैं, लेकिन इन आरोपों की पुष्टि केवल सक्षम प्रशासनिक जांच और अभिलेखों के सत्यापन के बाद ही संभव है।

जरूरत इस बात की है कि शौचालय निर्माण से संबंधित लाभार्थियों की सूची, स्वीकृत धनराशि, भुगतान विवरण और मौके पर बने शौचालयों की स्थिति का सत्यापन कराया जाए। इससे यह पता चल सकेगा कि योजना का लाभ वास्तविक पात्र परिवारों तक पहुंचा या नहीं और निर्माण कार्य निर्धारित मानकों के अनुसार हुआ अथवा नहीं।

कूड़ा प्रबंधन के लिए बना केंद्र खुद बदहाली का शिकार

गांव में कूड़ा-कचरा प्रबंधन के लिए आरआरसी सेंटर स्थापित किया गया है। ऐसे केंद्रों का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में निकलने वाले ठोस कचरे को एकत्र करना, उसका पृथक्करण और उचित प्रबंधन करना होता है। लेकिन यदि कूड़ा प्रबंधन के लिए बनाए गए केंद्र की स्थिति ही खराब हो जाए तो व्यवस्था की उपयोगिता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

आरआरसी सेंटर का नियमित संचालन, कूड़ा संग्रहण, कर्मचारियों की उपलब्धता और कचरे के निस्तारण की व्यवस्था कितनी प्रभावी है, इसकी जांच जरूरी है। केवल भवन का निर्माण कर देना पर्याप्त नहीं है। जब तक सेंटर नियमित रूप से संचालित नहीं होगा, तब तक ग्रामीण स्वच्छता का उद्देश्य पूरा नहीं हो सकता।

सरकारी योजनाएं पहुंचीं, लेकिन असर अधूरा क्यों?

ग्रामीण क्षेत्रों में जनकल्याणकारी योजनाओं का विस्तार लगातार हुआ है। सड़क, आवास, शौचालय, पेयजल, स्वच्छता और कचरा प्रबंधन से जुड़ी योजनाएं गांवों तक पहुंची हैं। संबंधित गांव में भी योजनाओं की मौजूदगी दिखाई देती है, लेकिन सवाल उनके प्रभावी संचालन और रखरखाव का है।

किसी योजना का वास्तविक मूल्यांकन इस आधार पर होना चाहिए कि उससे ग्रामीणों की जिंदगी कितनी बदली। यदि योजना के बावजूद रास्ते में कीचड़ है, नालियों में गंदगी है, कचरा खुले में पड़ा है और जलनिकासी की समस्या बरकरार है तो निश्चित रूप से व्यवस्था के क्रियान्वयन की समीक्षा जरूरी है।

जिम्मेदारी तय होगी या सवाल फिर दब जाएंगे?

ग्राम पंचायत स्तर पर विकास कार्यों की निगरानी के साथ-साथ संबंधित विभागों और प्रशासन की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। यदि किसी क्षेत्र में लंबे समय से जलनिकासी, सफाई और सड़क जैसी मूलभूत समस्याएं बनी हुई हैं तो नियमित निरीक्षण और शिकायतों के निस्तारण की व्यवस्था पर भी ध्यान देना होगा।

किसी भी कथित अनियमितता की निष्पक्ष जांच के लिए मौके का निरीक्षण, पंचायत अभिलेखों की जांच और कराए गए कार्यों का तकनीकी सत्यापन आवश्यक है। जांच में यदि कोई अनियमितता सामने आती है तो नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए। वहीं यदि कार्य तकनीकी रूप से सही पाए जाते हैं लेकिन रखरखाव की कमी के कारण स्थिति खराब हुई है, तो उसके लिए भी जिम्मेदारी निर्धारित की जानी चाहिए।

25 अगस्त को सामने आई जमीनी तस्वीर

‘चलो गांव की ओर’ जागरूकता अभियान के संस्थापक अध्यक्ष संजय सिंह राणा ने 25 अगस्त 2026 को गांव पहुंचकर जमीनी स्थिति का जायजा लिया। इस दौरान रास्तों, नालियों, स्वच्छता व्यवस्था, आरआरसी सेंटर और ग्रामीण सुविधाओं की स्थिति को करीब से देखा गया। मौके पर दिखाई दे रही अव्यवस्थाओं ने यह सवाल खड़ा किया कि योजनाओं और अभियानों के बावजूद बुनियादी सुविधाओं में अपेक्षित सुधार क्यों नहीं दिखाई दे रहा है।

संजय सिंह राणा का कहना है कि ग्रामीण विकास का वास्तविक मूल्यांकन कागजों में दर्ज प्रगति से नहीं बल्कि गांव की जमीन पर दिखाई देने वाले बदलाव से होना चाहिए। ग्रामीणों को ऐसी व्यवस्था मिलनी चाहिए जिसमें उन्हें रोजाना कीचड़, गंदगी और जलभराव से जूझना न पड़े।

अब प्रशासन के सामने सबसे बड़ा सवाल

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या संबंधित प्रशासन गांव की बदहाल स्थिति का संज्ञान लेकर निष्पक्ष जांच कराएगा? क्या पूर्व में कराए गए विकास और स्वच्छता कार्यों का भौतिक सत्यापन होगा? क्या नालियों की सफाई, जलनिकासी, सड़क सुधार और आरआरसी सेंटर के संचालन को लेकर ठोस कार्रवाई की जाएगी? और यदि जांच में किसी स्तर पर वित्तीय, तकनीकी या प्रशासनिक अनियमितता सामने आती है तो क्या जिम्मेदारी तय होगी?

ग्रामीणों को अब आश्वासन से अधिक स्थायी समाधान की जरूरत है। उन्हें साफ रास्ते, व्यवस्थित नालियां, प्रभावी कूड़ा प्रबंधन, सुरक्षित पेयजल और गुणवत्तापूर्ण विकास कार्य चाहिए। सरकारी योजनाओं का उद्देश्य तभी पूरा माना जाएगा जब उनका असर ग्रामीणों के जीवन में दिखाई दे।

करोड़ों की योजनाओं का असली इम्तिहान जमीन पर

यह मामला केवल गंदे रास्तों और नालियों तक सीमित नहीं है। यह ग्रामीण विकास की पूरी व्यवस्था की जमीनी परीक्षा है। योजनाओं के लिए धन स्वीकृत होना और कागजों पर कार्य पूरा होना एक पहलू है, लेकिन उस धन से वास्तव में ग्रामीणों को क्या मिला, यह सबसे महत्वपूर्ण सवाल है।

यदि विकास के नाम पर धन खर्च होने के बाद भी ग्रामीण कीचड़युक्त रास्तों और बजबजाती नालियों के बीच जीवन जीने को मजबूर हैं, तो व्यवस्था को अपनी कार्यप्रणाली पर गंभीरता से विचार करना होगा। अब जरूरत है कि संबंधित अधिकारी मौके पर पहुंचें, वास्तविक स्थिति देखें, अभिलेखों और कार्यों का मिलान करें और कमियों को दूर करने के लिए समयबद्ध कार्रवाई करें।

ग्राउंड रिपोर्ट का सवाल सीधा है—सरकारी विकास और स्वच्छता योजनाओं का असर आखिर जमीन पर कब दिखाई देगा? ग्रामीण कब तक कीचड़, जलभराव और गंदगी के बीच जीवन जीने को मजबूर रहेंगे? अब निगाह प्रशासन की कार्रवाई पर है।

रिपोर्ट: संजय सिंह राणा

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