कमलेश कुमार चौधरी
झांसी। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI तकनीक ने तस्वीरों और वीडियो को नया रूप देने की दुनिया को जितना आसान बनाया है, उतना ही इसके दुरुपयोग ने साइबर अपराध की चुनौतियों को भी गंभीर कर दिया है। किसी व्यक्ति की वास्तविक तस्वीर को बदलकर उसे आपत्तिजनक या अश्लील स्वरूप देना अब तकनीकी रूप से बहुत मुश्किल काम नहीं रह गया है। यही तकनीक जब ब्लैकमेलिंग, धमकी और कथित अवैध वसूली के लिए इस्तेमाल होने लगे तो मामला केवल साइबर अपराध तक सीमित नहीं रहता, बल्कि किसी व्यक्ति और उसके पूरे परिवार की सामाजिक प्रतिष्ठा, मानसिक सुरक्षा और निजी जीवन पर गंभीर असर डाल सकता है।
झांसी में सामने आया एक ऐसा ही मामला इन दिनों चर्चा में है। पुलिस के अनुसार, झांसी में तैनात रेलवे के एक वरिष्ठ अधिकारी को कथित तौर पर AI की मदद से तैयार की गई आपत्तिजनक तस्वीर के जरिए ब्लैकमेल करने और रकम मांगने के मामले में कर्नाटक के हुबली की रहने वाली 27 वर्षीय मरीना लाजरस उर्फ मरीना जेस्सी को गिरफ्तार किया गया है। पुलिस का दावा है कि आरोपी महिला को प्रयागराज से गिरफ्तार किया गया और उसके कब्जे से दो मोबाइल फोन तथा एक लैपटॉप बरामद किए गए।
मामले की शिकायत रेलवे अधिकारी की पत्नी ने झांसी के नवाबाद थाने में की थी। शिकायत में आरोप लगाया गया कि महिला लंबे समय से रेलवे अधिकारी और उनके परिवार को कथित तौर पर धमका रही थी तथा अलग-अलग मौकों पर रुपये ले चुकी थी। इसके बाद 31 जुलाई 2026 को कथित तौर पर AI से तैयार की गई रेलवे अधिकारी की आपत्तिजनक तस्वीर भेजकर फिर रकम की मांग की गई।
पुलिस के मुताबिक, आरोपी महिला ने परिवार की अन्य अविवाहित महिलाओं की तस्वीरें भी वायरल करने की धमकी दी। यही नहीं, शिकायत में जान से मारने की धमकी दिए जाने का भी आरोप लगाया गया है। पुलिस ने शिकायत के आधार पर मामला दर्ज कर जांच शुरू की और तकनीकी तथा अन्य सुरागों के आधार पर आरोपी महिला तक पहुंचने का दावा किया।
एक तस्वीर और शुरू हो गया ब्लैकमेलिंग का खेल
इस पूरे मामले का सबसे गंभीर पहलू AI तकनीक के कथित इस्तेमाल से जुड़ा है। सामान्य तौर पर किसी व्यक्ति की वास्तविक तस्वीर को डिजिटल तरीके से बदलना या किसी दूसरी तस्वीर के साथ जोड़ना पहले भी संभव था, लेकिन आधुनिक AI टूल्स ने इस प्रक्रिया को कहीं अधिक आसान और तेज बना दिया है। ऐसे में किसी व्यक्ति की वास्तविक तस्वीर लेकर उसका ऐसा डिजिटल रूप तैयार किया जा सकता है, जो देखने वाले को पहली नजर में वास्तविक प्रतीत हो।
झांसी पुलिस के अनुसार, इसी तरह की तकनीक का कथित इस्तेमाल रेलवे अधिकारी को निशाना बनाने के लिए किया गया। आरोप है कि आरोपी महिला ने AI की मदद से रेलवे अधिकारी की आपत्तिजनक तस्वीर तैयार की और उसे भेजकर ब्लैकमेलिंग शुरू की।
यहां से कहानी सिर्फ एक फोटो तक सीमित नहीं रही। पुलिस को दी गई शिकायत के अनुसार, परिवार को यह धमकी भी दी गई कि यदि पैसे नहीं दिए गए तो परिवार की अन्य महिलाओं की तस्वीरें भी वायरल कर दी जाएंगी। इस तरह कथित ब्लैकमेलिंग का दायरा एक व्यक्ति से बढ़कर पूरे परिवार तक पहुंच गया।
यही वजह है कि इस मामले में AI से फोटो एडिटिंग के साथ-साथ कथित ब्लैकमेलिंग और अवैध वसूली का पहलू भी महत्वपूर्ण हो जाता है।
13 जनवरी 2026 से कथित तौर पर शुरू हुआ सिलसिला
शिकायत में रेलवे अधिकारी की पत्नी ने पुलिस को बताया कि आरोपी महिला 13 जनवरी 2026 से अलग-अलग तारीखों पर परिवार से रुपये ले चुकी थी। यानी पुलिस के सामने आया यह मामला कथित तौर पर किसी एक दिन की घटना नहीं बल्कि कई महीनों तक चले घटनाक्रम से जुड़ा हुआ है।
शिकायत के अनुसार, महिला लगातार रेलवे अधिकारी और उनके परिवार पर दबाव बनाती रही और उनसे रुपये की मांग करती रही। परिवार का आरोप है कि धमकी और ब्लैकमेलिंग का सिलसिला समय के साथ गंभीर होता गया।
मामले में 31 जुलाई 2026 की घटना को विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। पुलिस के अनुसार, इसी दिन रेलवे अधिकारी की AI से तैयार की गई आपत्तिजनक तस्वीर भेजकर फिर से पैसे की मांग की गई।
शिकायतकर्ता के अनुसार, आरोपी महिला ने यह भी धमकी दी कि उसके पास परिवार की अन्य अविवाहित महिलाओं की तस्वीरें हैं और उन्हें वायरल करके परिवार की सामाजिक छवि खराब की जा सकती है।
यदि जांच में ये आरोप प्रमाणित होते हैं तो मामला डिजिटल तस्वीर के दुरुपयोग से आगे बढ़कर सुनियोजित साइबर ब्लैकमेलिंग का रूप ले सकता है।
15 लाख रुपये की कथित मांग ने बढ़ाई गंभीरता
पुलिस के अनुसार, रेलवे अधिकारी को कथित तौर पर ब्लैकमेल करते हुए 15 लाख रुपये की मांग की जा रही थी। इतनी बड़ी रकम की मांग ने मामले को और गंभीर बना दिया।
ब्लैकमेलिंग के मामलों में अक्सर आरोपी पीड़ित की किसी निजी जानकारी, तस्वीर, वीडियो या व्यक्तिगत कमजोरी का इस्तेमाल करके उस पर आर्थिक दबाव बनाने की कोशिश करते हैं। डिजिटल युग में AI ने इस खतरे का एक नया रास्ता खोल दिया है। अब किसी वास्तविक घटना या वास्तविक तस्वीर के मौजूद न होने पर भी उसके जैसा दिखने वाला फर्जी डिजिटल कंटेंट तैयार करके पीड़ित को डराने की कोशिश की जा सकती है।
ऐसे मामलों में सबसे बड़ी समस्या यह होती है कि पीड़ित व्यक्ति सामाजिक बदनामी के डर से पुलिस या परिवार तक बात पहुंचाने से भी बच सकता है। परिणाम यह होता है कि ब्लैकमेलर का दबाव लगातार बढ़ता जाता है।
झांसी के इस मामले में रेलवे अधिकारी की पत्नी द्वारा पुलिस से शिकायत किए जाने के बाद कथित ब्लैकमेलिंग का मामला जांच एजेंसियों के सामने आया।
शिकायत के बाद नवाबाद पुलिस ने शुरू की जांच
मामले की शिकायत मिलने के बाद नवाबाद थाना पुलिस ने आरोपों के आधार पर मुकदमा दर्ज कर जांच शुरू की। पुलिस के सामने चुनौती केवल आरोपी तक पहुंचना नहीं थी, बल्कि कथित डिजिटल अपराध के तकनीकी पहलुओं को समझना भी था।
किस मोबाइल नंबर से संपर्क किया गया? किस माध्यम से तस्वीर भेजी गई? तस्वीर वास्तव में AI से तैयार हुई या किसी अन्य डिजिटल तकनीक से बदली गई? रकम की मांग किस तरीके से की गई? पहले किन तारीखों पर रुपये लिए गए? पैसों का लेनदेन किस माध्यम से हुआ? आरोपी और शिकायतकर्ता के बीच पहले से क्या संपर्क था? ऐसे कई सवाल जांच का हिस्सा हो सकते हैं।
पुलिस के अनुसार, जांच के दौरान आरोपी महिला के प्रयागराज में होने की जानकारी मिली। इसके बाद उसे वहां से गिरफ्तार कर लिया गया।
गिरफ्तारी के बाद महिला को झांसी लाया गया और नवाबाद थाने में पूछताछ की गई। पुलिस के मुताबिक, उसके कब्जे से दो मोबाइल फोन और एक लैपटॉप बरामद हुए हैं।
अब इन डिजिटल उपकरणों की फोरेंसिक जांच इस मामले में महत्वपूर्ण हो सकती है। मोबाइल और लैपटॉप में मौजूद डेटा, चैट, तस्वीरें, फाइलें, ब्राउजर हिस्ट्री और अन्य डिजिटल साक्ष्य जांच को आगे बढ़ाने में मदद कर सकते हैं, हालांकि किसी उपकरण से बरामद सामग्री का अंतिम कानूनी महत्व जांच और न्यायिक प्रक्रिया में ही तय होगा।
प्रयागराज से गिरफ्तारी, फिर झांसी लाई गई आरोपी
पुलिस की कार्रवाई का अगला महत्वपूर्ण पड़ाव प्रयागराज रहा। पुलिस के अनुसार, जांच टीम ने आरोपी महिला को प्रयागराज से गिरफ्तार किया।
गिरफ्तारी के बाद उसे झांसी के नवाबाद थाने लाया गया। यहां पुलिस ने उससे पूछताछ की और कथित डिजिटल अपराध से संबंधित उपकरणों को अपने कब्जे में लिया।
पुलिस के अनुसार, बरामद दो मोबाइल फोन और लैपटॉप को जांच में शामिल किया गया है। इन उपकरणों की डिजिटल फोरेंसिक जांच से यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि कथित आपत्तिजनक तस्वीर कैसे तैयार की गई, किस डिवाइस से भेजी गई और क्या इसके पीछे कोई अन्य व्यक्ति भी शामिल था।
यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि AI आधारित साइबर अपराध कई बार अकेले व्यक्ति की गतिविधि नहीं होते। किसी मामले में डिजिटल सामग्री तैयार करने वाला व्यक्ति अलग हो सकता है, संपर्क करने वाला अलग और पैसे की व्यवस्था या वसूली में शामिल व्यक्ति अलग। हालांकि इस मामले में किसी अन्य व्यक्ति की भूमिका है या नहीं, यह जांच के बाद ही स्पष्ट होगा।
पुलिस ने क्या कहा?
झांसी पुलिस के अनुसार, वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देशन में नवाबाद थाना पुलिस ने AI से फोटो एडिट करने, ब्लैकमेलिंग करने और कथित अवैध रुपयों की वसूली के मामले में महिला आरोपी को गिरफ्तार किया है।
पुलिस के अनुसार, आरोपी की पहचान मरीना लाजरस उर्फ मरीना जेस्सी, निवासी हुबली, कर्नाटक के रूप में हुई है। उसे प्रयागराज से गिरफ्तार किया गया और उसके पास से दो मोबाइल फोन तथा एक लैपटॉप बरामद किया गया।
पुलिस का कहना है कि आरोपी के खिलाफ संबंधित धाराओं के तहत कार्रवाई की गई और उसे न्यायालय में पेश किया गया। न्यायालय ने आरोपी को जेल भेज दिया है।
यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि गिरफ्तारी और पुलिस के आरोप अपने आप में दोष सिद्धि नहीं हैं। आरोपी के खिलाफ लगाए गए आरोपों की अंतिम पुष्टि साक्ष्यों और न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर होगी।
AI बना साइबर अपराधियों का नया हथियार?
झांसी की घटना ने एक बड़े सवाल को सामने ला दिया है—क्या AI आने वाले समय में ब्लैकमेलिंग का नया हथियार बन सकता है?
इसका जवाब चिंता पैदा करने वाला है। AI आधारित फोटो और वीडियो एडिटिंग तकनीक ने रचनात्मक कामों को आसान बनाया है, लेकिन इसके दुरुपयोग की संभावना भी बढ़ी है। किसी व्यक्ति की उपलब्ध तस्वीर को लेकर उसका नकली चेहरा, बदली हुई पोशाक, बदला हुआ बैकग्राउंड या आपत्तिजनक डिजिटल दृश्य तैयार करना अब पहले की तुलना में आसान हो गया है।
ऐसे कंटेंट को अक्सर वास्तविक बताकर पीड़ित को डराया जाता है। कई बार आरोपी की असली ताकत तस्वीर नहीं बल्कि पीड़ित की बदनामी का डर होता है।
ब्लैकमेलर जानता है कि पीड़ित सामाजिक प्रतिष्ठा के कारण पुलिस के पास जाने से डर सकता है। इसी डर का फायदा उठाकर वह बार-बार पैसे मांग सकता है। झांसी का मामला इसी व्यापक साइबर अपराध चुनौती की ओर संकेत करता है।
असली और AI तस्वीर में फर्क करना क्यों मुश्किल?
पहले किसी फर्जी तस्वीर में एडिटिंग की गलतियां आसानी से दिखाई दे जाती थीं। लेकिन AI तकनीक ने डिजिटल तस्वीरों को अधिक वास्तविक रूप देने की क्षमता बढ़ा दी है।
चेहरे की बनावट, रोशनी, त्वचा की बनावट और बैकग्राउंड जैसे कई तत्वों को AI के जरिए बदला जा सकता है। इससे किसी आम व्यक्ति के लिए यह समझना कठिन हो सकता है कि तस्वीर असली है या डिजिटल रूप से बनाई गई है।
लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि AI से बनी हर तस्वीर वास्तविक मानी जानी चाहिए। किसी तस्वीर को देखकर ही उसके वास्तविक या नकली होने का अंतिम निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है। आवश्यकता पड़ने पर डिजिटल फोरेंसिक विशेषज्ञ उसके स्रोत, मेटाडेटा, फाइल संरचना और अन्य तकनीकी संकेतों की जांच कर सकते हैं।
परिवार को निशाना बनाने की धमकी ने बढ़ाई चिंता
इस मामले में सबसे संवेदनशील पहलू परिवार की अन्य महिलाओं की तस्वीरों को कथित तौर पर वायरल करने की धमकी है।
ब्लैकमेलिंग में परिवार को निशाना बनाना पीड़ित पर अतिरिक्त मानसिक दबाव डालने की रणनीति हो सकती है। खासकर तब जब आरोपी पीड़ित की सामाजिक प्रतिष्ठा और पारिवारिक संबंधों को लेकर डर पैदा करे।
यदि कोई व्यक्ति इस प्रकार की धमकी का सामना करता है तो डरकर आरोपी की हर मांग पूरी करना समस्या को खत्म करने के बजाय और बढ़ा सकता है। विशेषज्ञों की सामान्य सलाह यही रहती है कि ऐसे मामलों में सबूत सुरक्षित रखे जाएं और तुरंत कानून प्रवर्तन एजेंसी से संपर्क किया जाए।
डिजिटल सबूत बन सकते हैं केस की रीढ़
इस मामले की आगे की जांच में डिजिटल साक्ष्य सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। मोबाइल फोन और लैपटॉप से बरामद सामग्री के अलावा कथित बातचीत, कॉल रिकॉर्ड, डिजिटल भुगतान का विवरण, ईमेल, सोशल मीडिया अकाउंट, फोटो की मूल और बदली हुई फाइलें तथा अन्य इलेक्ट्रॉनिक डेटा जांच का हिस्सा बन सकते हैं।
यदि पुलिस यह स्थापित कर पाती है कि किसी विशेष डिवाइस से तस्वीर तैयार की गई और फिर उसे शिकायतकर्ता तक भेजकर रकम की मांग की गई, तो डिजिटल साक्ष्य मामले को मजबूत कर सकते हैं।
हालांकि किसी भी डिजिटल डेटा की कानूनी स्वीकार्यता और प्रमाणिकता निर्धारित करने के लिए उचित जांच, संरक्षण और फोरेंसिक प्रक्रिया जरूरी होती है।
क्या AI के जरिए किसी की प्रतिष्ठा खत्म की जा सकती है?
यह सवाल आज केवल झांसी का नहीं है। सोशल मीडिया ने किसी भी तस्वीर या वीडियो को कुछ ही मिनटों में हजारों लोगों तक पहुंचाने की क्षमता दे दी है। ऐसे माहौल में किसी व्यक्ति की फर्जी आपत्तिजनक तस्वीर तैयार करके उसे वायरल करने की धमकी गंभीर मानसिक और सामाजिक दबाव पैदा कर सकती है।
यही कारण है कि AI से बने नकली कंटेंट को बिना सत्यापन साझा करना भी खतरनाक है। किसी तस्वीर को देखकर तुरंत यह मान लेना कि उसमें दिख रहा व्यक्ति वास्तव में वही है, डिजिटल युग में गंभीर गलती हो सकती है।
किसी भी संदिग्ध सामग्री को आगे भेजने के बजाय उसकी सूचना संबंधित प्लेटफॉर्म और कानून प्रवर्तन एजेंसी को देना अधिक उचित है।
रेलवे अधिकारी की पत्नी की शिकायत क्यों बनी अहम कड़ी?
इस मामले में शिकायतकर्ता के रूप में रेलवे अधिकारी की पत्नी का सामने आना भी महत्वपूर्ण है। यदि परिवार ब्लैकमेलिंग के डर से चुप रहता तो कथित आरोपी का दबाव जारी रह सकता था।
शिकायत के बाद पुलिस को घटनाओं का क्रम, रकम की मांग और कथित धमकियों से जुड़े डिजिटल साक्ष्य जुटाने का अवसर मिला।
किसी भी साइबर ब्लैकमेलिंग मामले में समय पर शिकायत करना इसलिए जरूरी है क्योंकि डिजिटल डेटा तेजी से बदल सकता है और आरोपी सामग्री को डिलीट या स्थानांतरित करने की कोशिश कर सकता है।
जेल पहुंची 27 वर्षीय आरोपी, लेकिन कहानी अभी खत्म नहीं
मरीना लाजरस उर्फ मरीना जेस्सी की गिरफ्तारी और न्यायालय द्वारा जेल भेजे जाने के बाद पुलिस की कार्रवाई का पहला चरण पूरा हुआ है, लेकिन जांच का वास्तविक महत्व अब सामने आ सकता है।
क्या AI से तैयार की गई तस्वीर वास्तव में उसी लैपटॉप या मोबाइल से बनाई गई थी? क्या आरोपी ने अकेले इस कथित अपराध को अंजाम दिया? क्या इससे पहले भी किसी अन्य व्यक्ति को इसी तरह निशाना बनाया गया? कथित तौर पर लिए गए रुपयों का पूरा रिकॉर्ड क्या है? 15 लाख रुपये की मांग का आधार क्या था? परिवार के अन्य सदस्यों की तस्वीरें आरोपी तक कैसे पहुंचीं? इन सवालों के जवाब जांच से ही सामने आएंगे।
यदि डिजिटल फोरेंसिक जांच में आरोपों से जुड़े ठोस साक्ष्य मिलते हैं तो यह मामला AI आधारित साइबर ब्लैकमेलिंग के उदाहरण के तौर पर महत्वपूर्ण हो सकता है।
AI के दौर में सावधानी ही सबसे बड़ा बचाव
झांसी का यह मामला आम लोगों के लिए भी एक चेतावनी है। सोशल मीडिया पर सार्वजनिक रूप से उपलब्ध तस्वीरें भी किसी के लिए दुरुपयोग का माध्यम बन सकती हैं। इसलिए व्यक्तिगत तस्वीरों और निजी जानकारी की ऑनलाइन सुरक्षा को हल्के में नहीं लिया जा सकता।
यदि किसी व्यक्ति को उसकी फोटो या वीडियो के आधार पर ब्लैकमेल किया जा रहा है तो उसे घबराकर तुरंत पैसे देने के बजाय उपलब्ध डिजिटल साक्ष्य सुरक्षित रखने चाहिए। स्क्रीनशॉट, चैट, फोन नंबर, ईमेल, भुगतान विवरण और धमकी से जुड़े संदेश जांच में महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
किसी आपत्तिजनक तस्वीर को आगे साझा करने से भी बचना चाहिए। पीड़ित को शर्मिंदा करने के बजाय उसकी सहायता करना जरूरी है।
इस केस से उठते पांच बड़े सवाल
पहला सवाल: AI से तैयार की गई कथित आपत्तिजनक तस्वीर किस तकनीक या टूल से बनाई गई?
दूसरा सवाल: क्या बरामद मोबाइल और लैपटॉप में इस तस्वीर के निर्माण या प्रसारण से जुड़े डिजिटल साक्ष्य मिले हैं?
तीसरा सवाल: 13 जनवरी 2026 से कथित तौर पर हुए रकम के लेनदेन का पूरा रिकॉर्ड पुलिस के पास है या नहीं?
चौथा सवाल: 15 लाख रुपये की कथित मांग के पीछे आरोपी का उद्देश्य क्या था और रकम किस माध्यम से मांगी गई?
पांचवां सवाल: क्या इस मामले में आरोपी महिला के अलावा किसी अन्य व्यक्ति की भूमिका भी सामने आती है?
इन सवालों के जवाब जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होंगे।
साइबर अपराध का चेहरा बदल रहा है
झांसी की घटना को केवल एक ब्लैकमेलिंग केस के रूप में देखना शायद पर्याप्त नहीं होगा। यह उस बदलती साइबर दुनिया की तस्वीर भी है जहां अपराधी तकनीक के नए साधनों को अपने तरीके से इस्तेमाल करने की कोशिश कर रहे हैं।
AI ने पत्रकारिता, शिक्षा, चिकित्सा, डिजाइन, मनोरंजन और कारोबार जैसे क्षेत्रों में नए अवसर पैदा किए हैं। लेकिन उसी तकनीक का गलत इस्तेमाल किसी की प्रतिष्ठा, निजी जिंदगी और मानसिक सुरक्षा के लिए खतरा बन सकता है।
इसलिए चुनौती केवल AI को समझने की नहीं, बल्कि उसके जिम्मेदार इस्तेमाल और दुरुपयोग से बचाव की भी है।
झांसी पुलिस द्वारा की गई गिरफ्तारी इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कार्रवाई मानी जा सकती है। हालांकि मामले में लगाए गए आरोपों की अंतिम सच्चाई न्यायिक प्रक्रिया और वैज्ञानिक साक्ष्यों से ही तय होगी।
फिलहाल 27 वर्षीय मरीना लाजरस उर्फ मरीना जेस्सी जेल पहुंच चुकी है और पुलिस के कब्जे में बताए गए दो मोबाइल फोन तथा लैपटॉप इस पूरी कहानी के डिजिटल राज खोलने वाली अहम कड़ियां हो सकते हैं।
असल सवाल अब यह है कि AI से तैयार की गई उस कथित तस्वीर के पीछे केवल एक आरोपी का दिमाग था या इसके पीछे कोई बड़ा डिजिटल नेटवर्क भी काम कर रहा था? इसका जवाब पुलिस की आगे की जांच और डिजिटल फोरेंसिक रिपोर्ट से सामने आएगा।
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🔎 इस मामले से जुड़े अहम सवाल-जवाब
❓ आखिर मामला क्या है?
❓ पुलिस ने किसे गिरफ्तार किया?
❓ ब्लैकमेलिंग में AI का इस्तेमाल कैसे हुआ?
❓ कितनी रकम की मांग किए जाने का आरोप है?
❓ आरोपी के पास से क्या बरामद हुआ?
❓ परिवार को लेकर क्या धमकी दी गई थी?
❓ आरोपी को अब कहां भेजा गया?
⚠️ महत्वपूर्ण: मामले में लगाए गए आरोप पुलिस की शिकायत और जांच पर आधारित हैं। आरोपी के दोषी होने का अंतिम निर्णय न्यायालय द्वारा साक्ष्यों और न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर किया जाएगा।
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