रिपोर्ट: संजय सिंह राणा
जनगणदूत विशेष तहकीकी रिपोर्ट
चित्रकूट में सरकारी पेंशन भुगतान व्यवस्था से जुड़ा मामला अब केवल कुछ पेंशन खातों में हुई वित्तीय अनियमितता तक सीमित नहीं रह गया है. उपलब्ध जांच रिपोर्टों, न्यायालयी कार्यवाही, प्रशासनिक कार्रवाइयों और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध सोशल मीडिया सामग्री की पड़ताल से यह स्पष्ट होता है कि मामला सरकारी धन के बड़े पैमाने पर संदिग्ध हस्तांतरण, मृत पेंशनरों की फाइलों के दोबारा सक्रिय होने, बैंक खातों के इस्तेमाल, कथित बिचौलियों की भूमिका, कोषागार के डिजिटल भुगतान तंत्र और अधिकारियों-कर्मचारियों की निगरानी व्यवस्था तक पहुंच चुका है.
सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि 2018 से 2025 के बीच 93 पेंशनरों के खातों में लगभग 43.13 करोड़ रुपये के अनियमित भुगतान की बात जांच में सामने आई. इस मामले में चार कोषागार कर्मचारियों सहित 93 पेंशनरों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज हुई और बाद की विवेचना में बिचौलियों की भूमिका भी सामने आई. जनवरी 2026 में एसआईटी ने 35 आरोपितों के खिलाफ करीब छह हजार पन्नों की चार्जशीट अदालत में दाखिल की थी, जबकि अगस्त 2026 की एक न्यायालयी रिपोर्ट के अनुसार 92 आरोपितों के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किए जा चुके थे.
यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि आरोप, जांच में सामने आए तथ्य और अदालत में सिद्ध अपराध तीन अलग-अलग स्तर हैं. इसलिए इस रिपोर्ट में किसी व्यक्ति को दोषी घोषित नहीं किया जा रहा है. जिन लोगों के नाम मुकदमे या जांच में आए हैं, उनके संबंध में अंतिम निष्कर्ष सक्षम अदालत के निर्णय से ही निकलेगा.
43.13 करोड़ की रकम आखिर गई कहां?
प्रारंभिक जांच का सबसे बड़ा सवाल यही है कि पेंशन और एरियर के नाम पर सरकारी कोष से निकली रकम किस प्रक्रिया के तहत निजी बैंक खातों में पहुंची और वहां से उसका क्या हुआ.
उपलब्ध जांच विवरण के अनुसार 30 अगस्त 2018 से सितंबर 2025 के बीच 93 पेंशनरों के खातों में 43.13 करोड़ रुपये के अनियमित भुगतान का मामला सामने आया. जांच में यह आरोप भी सामने आया कि पेंशनरों के खातों में रकम पहुंचने के बाद बिचौलियों के माध्यम से उसे निकलवाया गया और कथित रूप से हिस्सा बांटा गया. कुछ रिपोर्टों में पेंशनरों को लगभग 10 प्रतिशत कमीशन देने का उल्लेख है.
यहां जांच का एक महत्वपूर्ण पहलू बैंकिंग ट्रेल है. एसआईटी की पड़ताल में करीब 250 बैंक खातों में रकम के लेनदेन से संबंधित साक्ष्य मिलने की रिपोर्ट सामने आई थी. यदि यह तथ्य अंतिम जांच में भी पुष्ट होता है तो यह मामला केवल एक कोषागार कर्मचारी द्वारा किए गए भुगतान से कहीं आगे जाकर बहुस्तरीय वित्तीय नेटवर्क की ओर संकेत करेगा.
यानी असली जांच केवल यह नहीं होनी चाहिए कि पैसा किस खाते में गया. उससे आगे यह पता लगाना भी जरूरी है कि पैसा वहां से किस खाते में गया, किसने निकाला, किसने नकद लिया, किसने संपत्ति खरीदी और किन लोगों के बीच उसका अंतिम बंटवारा हुआ.
मृत पेंशनरों के खाते बने जांच का सबसे गंभीर बिंदु
इस प्रकरण की सबसे गंभीर कड़ी उन पेंशनरों से जुड़ी है जिनकी मृत्यु पहले ही हो चुकी थी.
जांच संबंधी प्रकाशित विवरणों में चार ऐसे पेंशनरों का उल्लेख है जिनकी 2018 में मृत्यु हो चुकी थी, लेकिन उनकी बंद फाइलें कथित रूप से दोबारा सक्रिय की गईं और उनके खातों में कुल 13.20 करोड़ रुपये भेजे गए. रिपोर्टों के अनुसार शिव प्रसाद के खाते में 3.97 करोड़, रामखिलावन के खाते में 3.59 करोड़, राजेंद्र कुमार के खाते में 3.45 करोड़ और गिरिजेश कुमारी के खाते में 2.20 करोड़ रुपये भेजे गए.
अगर जांच में यह पूरा घटनाक्रम प्रमाणित होता है तो यह केवल भुगतान की गलती नहीं होगी. यह सवाल उठेगा कि मृत्यु प्रमाणपत्र, पेंशन रिकॉर्ड, बैंक खाता, जीवन प्रमाणपत्र और भुगतान आदेश जैसी अलग-अलग सूचनाओं के बावजूद सिस्टम ने इन खातों को दोबारा भुगतान योग्य कैसे माना.
और यही वह बिंदु है जहां प्रशासनिक जिम्मेदारी का प्रश्न सामने आता है.
सबसे बड़ा सवाल : निगरानी तंत्र सात साल तक क्यों नहीं जागा?
सरकारी कोषागार में पेंशन भुगतान कोई अनौपचारिक व्यवस्था नहीं है. इसके लिए पेंशन स्वीकृति, पेंशन भुगतान आदेश, बैंक खाता, जीवन प्रमाणपत्र, पारिवारिक पेंशन और एरियर भुगतान जैसी कई प्रक्रियाएं होती हैं.
फिर 43.13 करोड़ रुपये की कथित अनियमितता एक दिन में नहीं हुई. उपलब्ध रिकॉर्ड में यह अवधि लगभग सात वर्ष की है.
और जांच को गंभीर बनाने वाला एक दूसरा तथ्य भी सामने आया. प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार विशेष ऑडिट से कुछ समय पहले निदेशक कोषागार ने कोषागारों से फर्जी पेंशन की स्थिति के संबंध में प्रमाणपत्र मांगा था. चित्रकूट के मुख्य कोषाधिकारी की ओर से 26 सितंबर 2025 को भेजे गए प्रमाणपत्र में पेंशन संबंधी रिकॉर्ड को अद्यतन और फर्जी पेंशन से मुक्त बताया गया था. इसके कुछ ही समय बाद विशेष ऑडिट में कथित गड़बड़ी सामने आ गई.
यहीं से जांच का दायरा केवल उन लोगों तक सीमित नहीं रहना चाहिए जिनके खातों में पैसा पहुंचा.
यह भी पूछा जाना चाहिए कि:
- पेंशन रिकॉर्ड का सत्यापन किस स्तर पर हुआ?
- मृत पेंशनरों की फाइलों का मिलान किसने किया?
- बैंक खाते बदलने या पुनः सक्रिय करने की अनुमति किस अधिकारी के स्तर पर थी?
- भुगतान आदेशों को किसने सत्यापित किया?
- डिजिटल सिस्टम में एंट्री किसने की?
- आंतरिक ऑडिट के बावजूद अनियमितता क्यों नहीं पकड़ी गई?
- यदि रिकॉर्ड में कोई पेंशनर मृत था तो भुगतान प्रक्रिया ने उसे रोक क्यों नहीं दिया?
ये सवाल किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ आरोप नहीं हैं. ये उस प्रशासनिक प्रणाली के सवाल हैं जिसके माध्यम से सरकारी धन का भुगतान होता है.
चेक ट्रंकेशन सिस्टम की भूमिका भी जांच के केंद्र में
जनवरी 2026 में सामने आए जांच विवरण ने मामले को तकनीकी स्तर पर भी गंभीर बना दिया.
अदालती जांच से जुड़ी प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार कथित तौर पर चेक ट्रंकेशन सिस्टम (CTS) में गलत कागजात या डेटा का इस्तेमाल कर भुगतान प्रक्रिया को प्रभावित किया गया. कुछ मामलों में खाता नंबर बदलकर भुगतान दूसरे खातों में दर्शाए जाने की बात भी सामने आई. एसआईटी की चार्जशीट में बिचौलियों और कोषागार कर्मियों के बीच संपर्क तथा भुगतान के लिए डिजिटल सिस्टम के इस्तेमाल का उल्लेख किया गया.
यदि यह आरोप अदालत में प्रमाणित होते हैं तो जांच का एक अहम पहलू यह होगा कि डिजिटल सिस्टम में किस यूजर आईडी से एंट्री हुई, किस समय हुई, किस कंप्यूटर या सिस्टम से हुई और किस स्तर पर उसका अनुमोदन किया गया. आज के डिजिटल प्रशासन में लॉग डेटा स्वयं एक महत्वपूर्ण साक्ष्य हो सकता है.
इसलिए जांच एजेंसियों को केवल कागजी फाइलों की जांच नहीं बल्कि सर्वर लॉग, यूजर आईडी, डिजिटल भुगतान रिकॉर्ड, बैंक संदेश, ई-मेल, सिस्टम एक्सेस हिस्ट्री और संबंधित अवधि के इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड को भी सुरक्षित करना चाहिए.
97 नामजद, फिर 92 के खिलाफ आरोपपत्र : जांच की मौजूदा स्थिति क्या है?
प्रकरण सामने आने के बाद चार कोषागार कर्मचारियों और 93 पेंशनरों सहित 97 लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किए जाने की जानकारी सामने आई थी. बाद में विवेचना में बिचौलियों की भूमिका भी सामने आई.
जनवरी 2026 में एसआईटी ने जेल में बंद 35 आरोपितों के खिलाफ करीब छह हजार पन्नों की चार्जशीट सीजेएम अदालत में दाखिल की. इसमें भारतीय न्याय संहिता की धारा 238 भी जोड़ी गई थी.
इसके बाद जांच का दायरा बढ़ता गया. 11 अगस्त 2026 की प्रकाशित न्यायालयी रिपोर्ट के अनुसार 92 आरोपितों के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किए जा चुके थे. उसी रिपोर्ट में तीन आरोपितों की अग्रिम जमानत खारिज होने की जानकारी दी गई.
27 अगस्त 2026 की एक अन्य न्यायालयी रिपोर्ट में दो आरोपितों की अग्रिम जमानत खारिज होने की जानकारी सामने आई. रिपोर्ट के अनुसार एक खाते में 3.63 लाख रुपये और दूसरे में लगभग 13.71 लाख रुपये की अनियमित रकम पहुंचने का आरोप था.
इससे एक बात स्पष्ट है—मामला अभी न्यायिक प्रक्रिया में है और जांच समाप्त नहीं हुई है.
अदालत से लगातार मिल रही राहत और झटके, दोनों महत्वपूर्ण हैं
इस प्रकरण में अदालतों से आरोपितों को एक जैसा परिणाम नहीं मिला है. कुछ मामलों में अग्रिम जमानत खारिज हुई है तो कुछ मामलों में विशेष धाराओं के तहत जमानत भी मिली है.
जुलाई 2026 में बिचौलिये गौरेंद्र शिवहरे को भारतीय न्याय संहिता की धारा 238 के तहत जमानत मिलने की रिपोर्ट सामने आई. प्रकाशित विवरण के अनुसार उन्हें गंभीर धाराओं में पहले से जमानत मिली हुई थी और अतिरिक्त धारा को जमानती अपराध मानते हुए सत्र अदालत ने उस आधार पर राहत दी.
दूसरी ओर अगस्त 2026 में राधेश्याम पांडेय, ललिता देवी सहित अन्य आरोपितों की अग्रिम जमानत याचिकाएं खारिज होने की खबरें आईं.
इससे यह संदेश भी मिलता है कि मामले को केवल “गिरफ्तारी हुई या नहीं” के पैमाने से देखना उचित नहीं होगा. असली कसौटी यह है कि जांच एजेंसी कितने आरोपों को दस्तावेजी और वित्तीय साक्ष्यों से अदालत में साबित कर पाती है.
ईडी की एंट्री ने मामले को और गंभीर बना दिया
मामले में प्रवर्तन निदेशालय की गतिविधि जांच का एक महत्वपूर्ण नया चरण है. प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार ईडी ने 93 पेंशनरों से संबंधित रिकॉर्ड, भुगतान विवरण, बैंक खातों की जानकारी, विशेष ऑडिट रिपोर्ट, विभागीय जांच रिपोर्ट और डिजिटल रिकॉर्ड मांगे. इसके साथ ही एसआईटी से अब तक की जांच रिपोर्ट भी मांगी गई.
दिसंबर 2025 की रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि ईडी ने वर्ष 1999 से अब तक चित्रकूट कोषागार में तैनात रहे अधिकारियों और कर्मचारियों की संपत्ति संबंधी जानकारी खंगालनी शुरू की. रिपोर्ट में सात अधिकारियों और 27 कर्मचारियों के संपत्ति विवरण का उल्लेख है. लेकिन यहां भी सावधानी जरूरी है.
किसी अधिकारी या कर्मचारी की संपत्ति की जांच होना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि वह घोटाले का दोषी है. ईडी की जांच का उद्देश्य यह पता लगाना हो सकता है कि संदिग्ध धन का कोई संबंध संपत्ति निर्माण या अन्य वित्तीय गतिविधियों से है या नहीं.
इसलिए “संपत्ति की जांच” और “अवैध संपत्ति सिद्ध” को एक ही बात मानना पत्रकारिता की दृष्टि से गलत होगा.
क्या सीबीआई जांच हो रही है?
यह सवाल सार्वजनिक चर्चा में लगातार उठता रहा है. दिसंबर 2025 में चित्रकूट के सदर विधायक अनिल प्रधान ने विधानसभा में मामले की जांच को लेकर सवाल उठाते हुए सीबीआई जांच की मांग की थी. उन्होंने 2017 से 2025 तक तैनात अधिकारियों-कर्मचारियों की भूमिका की जांच की मांग भी उठाई थी.
लेकिन उपलब्ध विश्वसनीय सार्वजनिक सूचनाओं की हमारी पड़ताल में ऐसा प्रमाण नहीं मिला कि सीबीआई ने इस मामले की जांच अपने हाथ में लेकर नियमित विवेचना शुरू कर दी है.
इसलिए इस रिपोर्ट में सीबीआई जांच को तथ्य के रूप में नहीं बल्कि पूर्व में उठी मांग के रूप में ही देखा जाना चाहिए. यह अंतर बहुत महत्वपूर्ण है.
सोशल मीडिया ने रकम को 100 और 120 करोड़ तक पहुंचा दिया, लेकिन आधिकारिक जांच में 43.13 करोड़
सोशल मीडिया और वीडियो प्लेटफॉर्म पर इस मामले को लेकर अलग-अलग आंकड़े सामने आए हैं. कुछ सामग्री में रकम को 100 करोड़ से अधिक और कुछ वीडियो में 120 करोड़ रुपये तक बताया गया.
लेकिन उपलब्ध जांच और अदालत से जुड़ी विश्वसनीय रिपोर्टों में मुख्य स्थापित आंकड़ा 43.13 करोड़ रुपये है. इंडिया टुडे की रिपोर्ट ने भी 43.13 करोड़ रुपये के फर्जी भुगतान का उल्लेख करते हुए बाद की जांचों में 100 करोड़ रुपये से अधिक होने की आशंका संबंधी बात लिखी थी, लेकिन वह बढ़ी हुई राशि अंतिम प्रमाणित आंकड़ा नहीं है. इसलिए तहकीकी पत्रकारिता का निष्कर्ष फिलहाल यही होना चाहिए:
43.13 करोड़ रुपये वह रकम है जिसके संबंध में जांच और मुकदमे की ठोस सामग्री सार्वजनिक हुई है. इससे अधिक रकम की संभावना की चर्चा हुई है, लेकिन उसे अंतिम घोटाला राशि के रूप में लिखना अभी जल्दबाजी होगी.
रिकवरी की तस्वीर भी उतनी ही महत्वपूर्ण है
सरकारी धन की हेराफेरी के किसी भी मामले में गिरफ्तारी से ज्यादा महत्वपूर्ण सवाल होता है—पैसा वापस कितना आया?
अक्टूबर 2025 में शुरुआती स्तर पर करीब 21 लाख रुपये की रिकवरी की सूचना थी. बाद में 75.88 लाख रुपये से अधिक की रिकवरी की जानकारी सामने आई. दिसंबर 2025 की रिपोर्टों में रिकवरी तीन करोड़ रुपये से अधिक पहुंचने की बात आई और मई 2026 की रिपोर्ट में करीब चार करोड़ रुपये की रिकवरी का उल्लेख हुआ.
यहां भी आंकड़ों की तारीख अलग-अलग होने के कारण किसी एक पुराने आंकड़े को वर्तमान अंतिम रिकवरी मानना उचित नहीं होगा.
लेकिन एक बात साफ है—43.13 करोड़ रुपये की कथित अनियमितता के मुकाबले सार्वजनिक रूप से सामने आई रिकवरी काफी कम रही है. इसलिए जांच की अगली बड़ी कसौटी यही होनी चाहिए कि शेष रकम का वित्तीय ट्रेल कहां तक जाता है.
यूपी सरकार ने सिस्टम बदला, लेकिन सवाल यह है कि क्या बदलाव पर्याप्त हैं?
इस मामले के बाद उत्तर प्रदेश वित्त विभाग ने पेंशन खातों में बदलाव की प्रक्रिया को कड़ा करने के लिए नई एसओपी लागू की.
मई 2026 में प्रकाशित जानकारी के अनुसार अब पेंशनर के बैंक खाते में बदलाव केवल मुख्य या वरिष्ठ कोषाधिकारी की प्रक्रिया से नहीं हो सकेगा. मंडलीय अपर निदेशक की अंतिम मंजूरी आवश्यक होगी. नए और पुराने बैंक खाते की स्वप्रमाणित प्रतियां तथा बैंक शाखा परिवर्तन की स्थिति में पुरानी शाखा का अनापत्ति प्रमाणपत्र भी जरूरी किया गया है.
यह बदलाव महत्वपूर्ण है क्योंकि जिस व्यवस्था में बैंक खाते का परिवर्तन अपेक्षाकृत सीमित स्तर पर हो सकता था, उसमें अब अतिरिक्त स्तर का सत्यापन जोड़ा गया है.
लेकिन सवाल फिर वही है—क्या केवल नई एसओपी से पुरानी जवाबदेही समाप्त हो जाएगी? नहीं.
सिस्टम सुधार भविष्य की गड़बड़ी रोक सकते हैं, लेकिन पुराने मामले में यह तय करना भी जरूरी है कि उस समय उपलब्ध नियमों और नियंत्रणों के बावजूद कथित अनियमितता कैसे चलती रही.
इस मामले की सबसे बड़ी जांच अभी बाकी है
पूरे घटनाक्रम को जोड़कर देखें तो जांच के सामने कम से कम सात बड़े सवाल अब भी खड़े हैं.
पहला, 43.13 करोड़ रुपये की पूरी बैंकिंग ट्रेल कहां तक जाती है?
दूसरा, 93 खातों में रकम डालने के लिए किस स्तर पर भुगतान आदेश तैयार और स्वीकृत हुए?
तीसरा, मृत पेंशनरों की फाइलें दोबारा सक्रिय कैसे हुईं?
चौथा, कथित बिचौलियों की भूमिका कितनी बड़ी थी और उन्हें अंदर की जानकारी कौन देता था?
पांचवां, करीब 250 बैंक खातों से जुड़े कथित लेनदेन में अंतिम लाभार्थी कौन थे?
छठा, जांच में जिन संपत्तियों का उल्लेख हुआ है, उनमें से किनका धन के स्रोत से संबंध साबित होता है?
सातवां, क्या 43.13 करोड़ रुपये ही अंतिम वित्तीय नुकसान है या जांच के दौरान और रकम सामने आएगी?
इन सवालों के जवाब ही इस मामले को वास्तविक अर्थों में तहकीकी जांच का स्वरूप देंगे.
संजय सिंह राणा की मांग : जांच व्यक्ति नहीं, पूरे सिस्टम की हो
चित्रकूट जैसे धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व वाले जिले में सरकारी धन की कथित हेराफेरी केवल वित्तीय नुकसान नहीं है. यह उस भरोसे को भी प्रभावित करती है जो आम नागरिक सरकारी संस्थाओं से रखता है.
पेंशनर कोई सामान्य लाभार्थी नहीं होता. वह वर्षों तक सरकारी सेवा करने के बाद अपने जीवन के अंतिम चरण में पेंशन व्यवस्था पर निर्भर रहता है. ऐसे में पेंशन के नाम पर होने वाली कथित अनियमितता का प्रभाव आर्थिक होने के साथ-साथ सामाजिक और मानवीय भी है.
इसलिए संजय सिंह राणा की ओर से यह मांग उठना स्वाभाविक है कि जांच केवल उन लोगों तक सीमित न रहे जिनके खाते में रकम पहुंची. जांच को उस पूरे तंत्र तक जाना चाहिए जिसने भुगतान को संभव बनाया.
यदि किसी पेंशनर ने जानबूझकर सरकारी धन लिया है तो कानून अपना काम करे. यदि किसी पेंशनर को बिचौलिये ने इस्तेमाल किया है तो उसकी भूमिका अलग तरीके से जांची जाए. लेकिन यदि किसी सरकारी अधिकारी या कर्मचारी ने अपने पद, डिजिटल एक्सेस या प्रशासनिक अधिकार का दुरुपयोग किया है तो उसकी जिम्मेदारी भी उसी गंभीरता से तय होनी चाहिए.
चित्रकूट को सिर्फ गिरफ्तारी नहीं, पूरी सच्चाई चाहिए
चित्रकूट का यह प्रकरण अब केवल 43.13 करोड़ रुपये का सवाल नहीं है. यह सरकारी वित्तीय व्यवस्था की विश्वसनीयता की परीक्षा है.
जांच में मृत पेंशनरों की फाइलों के दोबारा सक्रिय होने, संदिग्ध भुगतान, बिचौलियों की भूमिका, डिजिटल भुगतान प्रणाली के कथित दुरुपयोग और बैंक खातों के बड़े नेटवर्क जैसे बिंदु सामने आए हैं. एसआईटी ने बड़ी संख्या में आरोपितों के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया है. कई आरोपित जेल जा चुके हैं और कई मामलों में अदालतें जमानत याचिकाओं पर फैसला कर रही हैं. ईडी ने भी दस्तावेज और संपत्ति संबंधी जानकारी जुटाने की दिशा में कदम बढ़ाया है.
दूसरी तरफ, सरकार ने पेंशन खातों में बदलाव की प्रक्रिया को बहुस्तरीय मंजूरी से जोड़कर व्यवस्था सुधारने की कोशिश की है.
लेकिन किसी भी घोटाले का वास्तविक अंत तब माना जाएगा जब तीन सवालों का जवाब मिलेगा—कितना पैसा गया, पैसा किसके पास गया और कितना पैसा वापस आया? और चौथा सवाल इससे भी बड़ा है—क्या उस व्यवस्था की जिम्मेदारी तय हुई, जिसने यह सब होने दिया?
जब तक इन सवालों के जवाब दस्तावेजों, बैंकिंग रिकॉर्ड, डिजिटल लॉग, संपत्ति की जांच और अदालत में पेश साक्ष्यों से सामने नहीं आते, तब तक 43.13 करोड़ रुपये का यह मामला अधूरा ही माना जाएगा.
चित्रकूट को केवल कार्रवाई की घोषणा नहीं, कार्रवाई का प्रमाण चाहिए. जनता को केवल आरोपी नहीं, पूरे वित्तीय तंत्र की जवाबदेही चाहिए.
और सबसे बढ़कर, सरकारी खजाने को यह भरोसा चाहिए कि पेंशन जैसे संवेदनशील भुगतान में कोई भी व्यक्ति, पद या डिजिटल व्यवस्था कानून से ऊपर नहीं है.

























