कठुआ : सीमा, संस्कृति और संघर्ष के बीच बदलता जम्मू-कश्मीर का सीमांत जिला

कठुआ जिले की रिपोर्ट में रजनी वर्मा के साथ बसोहली चित्रकला और हिमालयी पहाड़ी चित्र

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रजनी वर्मा की रिपोर्ट

जम्मू-कश्मीर का कठुआ जिला केवल जम्मू संभाग का एक प्रशासनिक हिस्सा नहीं है। यह ऐसा सीमांत भूभाग है जहां एक तरफ हिमालय की तलहटी, दूसरी तरफ पंजाब की मैदानी संस्कृति, तीसरी तरफ पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय सीमा और चौथी तरफ बदलती अर्थव्यवस्था दिखाई देती है। कठुआ को समझना दरअसल उस भारत को समझना है जो सीमा पर रहते हुए भी खेत जोतता है, बच्चों को स्कूल भेजता है, बाजार चलाता है, त्योहार मनाता है और सुरक्षा की अनिश्चितताओं के बीच सामान्य जीवन को बनाए रखने की कोशिश करता है।

जिला प्रशासन के अनुसार कठुआ जम्मू-कश्मीर के दक्षिण-पश्चिमी हिस्से में स्थित है और इसके दक्षिण-पश्चिम में पाकिस्तान, दक्षिण-पूर्व में पंजाब तथा उत्तर-पूर्व में हिमाचल प्रदेश की सीमाएं हैं। जिला प्रशासन के वर्तमान प्रोफाइल में 2011 की जनगणना के आधार पर आबादी 6,16,435 बताई गई है। आधिकारिक प्रोफाइल में 11 तहसील, 19 विकासखंड और सैकड़ों गांवों का उल्लेख मिलता है।

कठुआ की भौगोलिक स्थिति ही उसकी ताकत भी है और चुनौती भी। यहां मैदानी कृषि क्षेत्र हैं, कंडी क्षेत्र हैं और पहाड़ी भूभाग भी है। जिला प्रशासन के अनुसार राष्ट्रीय राजमार्ग के दक्षिण का इलाका गहरी जलोढ़ मिट्टी और अपेक्षाकृत बेहतर सिंचाई वाला है, जबकि कंडी क्षेत्र में मिट्टी उथली, पथरीली और प्राकृतिक जलस्रोत सीमित हैं। इससे साफ है कि कठुआ में कृषि की तस्वीर पूरे जिले में एक जैसी नहीं है।

कठुआ का इतिहास: ‘कठाई’ से आधुनिक सीमांत जिले तक

कठुआ का इतिहास लोक परंपराओं, राजवंशों और सीमांत भूगोल से जुड़ा हुआ है। जम्मू-कश्मीर के आधिकारिक जिला विकास दस्तावेज में प्रचलित ऐतिहासिक मान्यता का उल्लेख मिलता है कि एंडोत्रा राजपूत वंश से जुड़े जोध सिंह लगभग दो हजार वर्ष पहले इस क्षेत्र में आए थे। उनके वंशजों से जुड़े तीन बसेरों के नाम समय के साथ कठाई और फिर कठुआ से जुड़ते बताए जाते हैं।

इतिहास की दूसरी बड़ी पहचान बशोहली है। आज का बशोहली केवल कठुआ की एक तहसील नहीं, बल्कि भारतीय कला इतिहास का महत्वपूर्ण केंद्र है। जिला प्रशासन के अनुसार बशोहली में 17वीं और 18वीं शताब्दी के दौरान विकसित बशोहली चित्रकला ने पश्चिमी हिमालय की पहाड़ी चित्रकला परंपरा को प्रभावित किया। इसकी शैली में गहरे और चमकीले प्राथमिक रंग, विशिष्ट चेहरे और धार्मिक एवं लोक विषयों का प्रभाव दिखाई देता है।

बशोहली की कहानी यह भी बताती है कि कठुआ को केवल सीमा और सुरक्षा के चश्मे से देखना अधूरा होगा। यहां इतिहास ने कला को जन्म दिया और कला ने इस क्षेत्र को राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक पहचान दी।

बशोहली की पेंटिंग परंपरा में रामायण, भागवत, रागमाला, रसमंजरी और कृष्ण संबंधी विषयों के साथ स्थानीय जीवन और पहाड़ी परिवेश भी दिखाई देता है। आधिकारिक जिला दस्तावेज बशोहली को पहाड़ी चित्रकला की महत्वपूर्ण प्रारंभिक शैलियों में रखता है।

डोगरी संस्कृति और पहाड़ी पहचान

कठुआ की सांस्कृतिक पहचान बहुस्तरीय है। जिला प्रशासन के अनुसार यहां की पारंपरिक भाषा डोगरी है, जबकि पूर्वी पहाड़ी क्षेत्रों में पहाड़ी भाषाओं का प्रभाव मिलता है। शिक्षा और प्रशासनिक संचार में हिंदी, अंग्रेजी और उर्दू भी महत्वपूर्ण हैं।

डोगरी केवल बातचीत की भाषा नहीं, बल्कि इस भूभाग की सामाजिक स्मृति का हिस्सा है। विवाह, लोकगीत, कृषि जीवन, धार्मिक उत्सव और पारंपरिक सामाजिक संबंधों में स्थानीय भाषाई संस्कृति की भूमिका महत्वपूर्ण है।

कठुआ और आसपास का क्षेत्र जम्मू की डोगरा संस्कृति से जुड़ा है, लेकिन पंजाब से निकटता के कारण यहां खान-पान, बाजार और सामाजिक व्यवहार में पंजाब की छाप भी दिखाई देती है। वहीं पहाड़ी इलाकों में जीवनशैली, वास्तुशैली और लोक परंपराएं अलग रंग ग्रहण करती हैं।

सुक्राला माता, माता बाला सुंदरी, एयरवन, चंचलो माता और अन्य धार्मिक-सांस्कृतिक स्थल इस क्षेत्र की विविध आस्था परंपरा को सामने लाते हैं। जिला प्रशासन की संस्कृति एवं विरासत सूची में बशोहली कला के साथ इन स्थलों को भी स्थान दिया गया है।

इस सांस्कृतिक विविधता की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि सीमावर्ती होने के बावजूद कठुआ का समाज केवल सुरक्षा की भाषा में नहीं जीता। उसके पास अपनी कला, लोकस्मृति, धार्मिक परंपरा और सामाजिक जीवन की मजबूत जड़ें हैं।

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सामान्य जीवन के ऊपर सुरक्षा की छाया

कठुआ की सबसे संवेदनशील पहचान उसकी अंतरराष्ट्रीय सीमा से जुड़ी है। पाकिस्तान से सटा इलाका होने के कारण यहां प्रशासनिक व्यवस्था सामान्य जिलों की तुलना में अलग सुरक्षा आवश्यकताओं के साथ काम करती है।

सीमा के नजदीक रहने वाले ग्रामीणों के लिए सुरक्षा केवल समाचार की विषयवस्तु नहीं है। खेत, पशुधन, गांव की सड़क, स्कूल जाने वाले बच्चे और रात में घर लौटता व्यक्ति भी सुरक्षा व्यवस्था के व्यापक ढांचे का हिस्सा बन जाता है।

हाल के वर्षों में सीमा सुरक्षा की चुनौती पारंपरिक घुसपैठ से आगे बढ़कर ड्रोन, हथियारों और मादक पदार्थों की तस्करी जैसी नई चुनौतियों तक पहुंची है। 2026 में केंद्र सरकार के स्तर पर कठुआ के अंतरराष्ट्रीय सीमा क्षेत्र में तकनीक आधारित सीमा सुरक्षा पर विशेष जोर दिए जाने की खबरें सामने आईं।

हालिया घटनाओं में कठुआ के सीमावर्ती इलाकों में संदिग्ध ड्रोन गतिविधियों और सुरक्षा बलों की तलाशी कार्रवाइयों की खबरें भी सामने आती रही हैं।

यह बदलाव महत्वपूर्ण है। पहले सीमा सुरक्षा का अर्थ मुख्य रूप से तारबंदी, चौकियों, गश्त और मानव निगरानी से जोड़ा जाता था। अब सेंसर, कैमरा, ड्रोन डिटेक्शन सिस्टम और दूसरी तकनीकों की भूमिका बढ़ रही है।

लेकिन सवाल केवल यह नहीं है कि सीमा कितनी सुरक्षित है। असली सवाल यह भी है कि सीमा के किनारे रहने वाले नागरिक कितने सुरक्षित, आत्मनिर्भर और आर्थिक रूप से मजबूत हैं।

किसी भी सीमावर्ती जिले में स्थानीय नागरिक ही सुरक्षा व्यवस्था की पहली सामाजिक परत होते हैं। इसलिए सड़क, बिजली, इंटरनेट, स्वास्थ्य सुविधा, शिक्षा, रोजगार और बाजार तक आसान पहुंच को भी सीमा सुरक्षा की व्यापक रणनीति का हिस्सा मानना चाहिए।

सुरक्षा और नागरिक जीवन के बीच संतुलन

कठुआ में प्रशासनिक व्यवस्था को दो समानांतर जिम्मेदारियां निभानी पड़ती हैं। पहली जिम्मेदारी सामान्य नागरिक प्रशासन की है और दूसरी सीमावर्ती संवेदनशीलता के कारण सुरक्षा व्यवस्था की।

जिला प्रशासन के आंकड़ों के अनुसार कठुआ में सरकारी स्वास्थ्य और शिक्षा संस्थानों का बड़ा नेटवर्क है। आधिकारिक जिला प्रोफाइल में 1,459 सरकारी शैक्षणिक संस्थानों, सात सरकारी डिग्री कॉलेजों, पांच आईटीआई और विभिन्न स्तर के स्कूलों का उल्लेख है। स्वास्थ्य व्यवस्था में जिला अस्पताल, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और अन्य संस्थान शामिल हैं।

फिर भी आंकड़ों की मौजूदगी और सुविधा की गुणवत्ता दो अलग बातें हैं। पहाड़ी और दूरस्थ इलाकों में अस्पताल तक पहुंच, विशेषज्ञ चिकित्सकों की उपलब्धता, परिवहन और डिजिटल कनेक्टिविटी जैसी समस्याओं का समाधान लगातार आवश्यक रहता है।

इसी तरह सीमावर्ती गांवों में केवल पुलिस या सुरक्षा बलों की मौजूदगी पर्याप्त नहीं है। नागरिक प्रशासन की मजबूत उपस्थिति, समय पर राजस्व सेवाएं, स्कूल, स्वास्थ्य केंद्र, सड़क और संचार व्यवस्था भी जरूरी है।

जम्मू की राजनीति का महत्वपूर्ण सीमांत

कठुआ का राजनीतिक परिवेश जम्मू संभाग की व्यापक राजनीतिक धारा से गहराई से जुड़ा है। यहां राष्ट्रीय सुरक्षा, सीमा, विकास, रोजगार, सड़क, पानी, सरकारी सेवाएं और क्षेत्रीय पहचान जैसे मुद्दे चुनावी राजनीति को प्रभावित करते हैं।

2024 के जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव के बाद कठुआ जिले की राजनीतिक तस्वीर में भाजपा का मजबूत प्रभाव दिखाई दिया। उपलब्ध चुनावी आंकड़ों के अनुसार जिले की छह विधानसभा सीटों में भाजपा ने पांच सीटें जीतीं, जबकि एक सीट अन्य दल/उम्मीदवार के खाते में गई।

कठुआ विधानसभा क्षेत्र के 2024 परिणाम में भाजपा के डॉ. भारत भूषण विजयी रहे। उन्हें 45,944 वोट मिले, जबकि बसपा के संदीप मजोत्रा दूसरे स्थान पर रहे।

यह चुनावी परिणाम केवल राजनीतिक दलों की लोकप्रियता का आंकड़ा नहीं है। यह कठुआ की राजनीतिक प्राथमिकताओं की ओर भी संकेत करता है, जहां राष्ट्रीय सुरक्षा और जम्मू क्षेत्र की राजनीतिक पहचान महत्वपूर्ण मुद्दे हैं।

लेकिन कठुआ की राजनीति को केवल भारत-पाकिस्तान सीमा के सवाल तक सीमित करना उचित नहीं होगा। ग्रामीण सड़कें, सिंचाई, सरकारी नौकरियां, युवाओं का भविष्य, पहाड़ी क्षेत्रों का विकास, शिक्षा, उद्योग और पर्यटन भी स्थानीय राजनीति के महत्वपूर्ण मुद्दे हैं।

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सीमावर्ती गांवों में विकास और सुरक्षा को अलग-अलग विषय मानना भी गलत होगा। मजबूत अर्थव्यवस्था और नागरिक सुविधाएं स्थानीय समाज को अधिक स्थिर बनाती हैं।

आंकड़ों से आगे की चुनौती

कठुआ में शिक्षा का नेटवर्क व्यापक है। जिला प्रशासन के आंकड़ों के अनुसार 2011 में जिले की साक्षरता दर 73.09 प्रतिशत थी। पुरुष साक्षरता 81.40 प्रतिशत और महिला साक्षरता 64.56 प्रतिशत दर्ज की गई थी।

इन आंकड़ों में सबसे महत्वपूर्ण बात महिला साक्षरता का अंतर है। यह अंतर बताता है कि विद्यालयों की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। लड़कियों की माध्यमिक और उच्च शिक्षा तक निरंतर पहुंच, सुरक्षित परिवहन, डिजिटल संसाधन, व्यावसायिक शिक्षा और रोजगार से जुड़ी शिक्षा भी जरूरी है।

कठुआ में उच्च शिक्षा के लिए सरकारी डिग्री कॉलेज और जम्मू विश्वविद्यालय का कठुआ कैंपस जैसे संस्थान मौजूद हैं।

कठुआ कैंपस,यूनिवर्सिटी ऑफ जम्मू उच्च शिक्षा के विस्तार की दृष्टि से महत्वपूर्ण संस्थागत आधार है।

इसी तरह गवर्नमेंट पॉलिटेक्निक कॉलेज, कठुआ जैसे तकनीकी संस्थान युवाओं को कौशल आधारित शिक्षा से जोड़ने की संभावना बढ़ाते हैं।

आज कठुआ की शिक्षा व्यवस्था के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि पढ़े-लिखे युवाओं को स्थानीय अर्थव्यवस्था में अवसर कितने मिलते हैं। यदि शिक्षा के बाद रोजगार के लिए बड़ी संख्या में युवाओं को जम्मू, पंजाब, दिल्ली या दूसरे राज्यों की ओर जाना पड़े, तो शिक्षा और स्थानीय आर्थिक विकास के बीच का संबंध कमजोर बना रहता है।

कठुआ की अर्थव्यवस्था की जमीन

कठुआ का ग्रामीण जीवन कृषि से गहराई से जुड़ा हुआ है। जिला प्रशासन के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार 2017-18 में कुल खेती योग्य क्षेत्र लगभग 61,535 हेक्टेयर था, जिसमें करीब 20,515 हेक्टेयर क्षेत्र सिंचित था। इसी अवधि में धान, गेहूं और मक्का प्रमुख फसलों में शामिल थे। आधिकारिक आंकड़ों में धान का उत्पादन करीब 1.23 लाख टन, गेहूं का लगभग 1.04 लाख टन और मक्का का करीब 77 हजार टन दर्ज है।

इन आंकड़ों से कठुआ की कृषि क्षमता का अंदाजा लगाया जा सकता है, लेकिन यहां कृषि की असली कहानी खेत की भौगोलिक स्थिति में छिपी है।

मैदानी इलाकों में सिंचाई और उपज की संभावनाएं अपेक्षाकृत बेहतर हैं। इसके विपरीत कंडी क्षेत्र में पानी की समस्या, पथरीली मिट्टी और सीमित प्राकृतिक जलस्रोत किसानों की उत्पादकता को प्रभावित करते हैं। पहाड़ी क्षेत्रों में कृषि की संभावनाएं और सीमित हैं।

यही वह जगह है जहां कठुआ के लिए कृषि नीति को एक ही मॉडल पर आधारित नहीं किया जा सकता।

मैदानी क्षेत्र में बेहतर सिंचाई, आधुनिक मंडी व्यवस्था, भंडारण, प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन पर जोर होना चाहिए। कंडी क्षेत्र में जल संरक्षण, छोटे जलाशय, वर्षा जल संचयन, सूखा सहनशील फसलें और माइक्रो-इरिगेशन अधिक उपयोगी हो सकते हैं। पहाड़ी क्षेत्रों में बागवानी, पशुपालन, मधुमक्खी पालन, औषधीय पौधों और स्थानीय उत्पादों की ब्रांडिंग पर ध्यान दिया जा सकता है।

कृषि को केवल गेहूं-धान के चक्र तक सीमित रखने से किसान की आय बढ़ाने की क्षमता सीमित रहेगी। कठुआ की भौगोलिक विविधता वास्तव में विविध कृषि अर्थव्यवस्था की संभावना है।

किसान से बाजार तक की सबसे बड़ी चुनौती

कृषि उत्पादन तभी आर्थिक शक्ति बनता है जब किसान को बेहतर बाजार मिले। उत्पादन बढ़ना एक बात है और किसान की आय बढ़ना दूसरी।

कठुआ में फल और सब्जी बाजार तथा कृषि संबंधी संस्थागत व्यवस्था मौजूद है। लेकिन किसानों के लिए वास्तविक लाभ तब बढ़ेगा जब स्थानीय स्तर पर कोल्ड स्टोरेज, पैकेजिंग, ग्रेडिंग, प्रसंस्करण और सीधी बाजार पहुंच का नेटवर्क मजबूत होगा।

यहां एग्रीकल्चर डिपार्टमेंट कठुआ जैसे संस्थानों की भूमिका केवल योजनाएं लागू करने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। किसान को खेत से बाजार तक तकनीकी सलाह, मिट्टी परीक्षण, मौसम सूचना, बीमा, फसल विविधीकरण और बाजार मूल्य की जानकारी एक साथ मिलना जरूरी है।

सीमा से आर्थिक गलियारे तक

कठुआ की भौगोलिक स्थिति उसे उद्योग और परिवहन के लिहाज से भी महत्वपूर्ण बनाती है। पंजाब, जम्मू और हिमाचल के बीच स्थित होने तथा राष्ट्रीय राजमार्ग और रेल संपर्क के कारण जिले में आर्थिक गतिविधियों के विस्तार की संभावनाएं हैं।

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लेकिन उद्योग लगाने से ही रोजगार पैदा नहीं होता। स्थानीय युवाओं के कौशल और उद्योग की जरूरत के बीच तालमेल भी जरूरी है।

कठुआ में औद्योगिक क्षेत्र और तकनीकी शिक्षा संस्थानों का विस्तार स्थानीय अर्थव्यवस्था को कृषि से आगे ले जाने में मदद कर सकता है। छोटे और मध्यम उद्योग, खाद्य प्रसंस्करण, कृषि आधारित उद्योग, हस्तशिल्प और पर्यटन आधारित व्यवसाय रोजगार के नए रास्ते खोल सकते हैं।

पर्यटन: बशोहली से पहाड़ों तक

कठुआ की पर्यटन क्षमता अभी भी पूरी तरह सामने नहीं आई है। बशोहली की कला, रावी नदी, पहाड़ी क्षेत्र, धार्मिक स्थल और प्राकृतिक परिदृश्य मिलकर ऐसा पर्यटन मॉडल बना सकते हैं जिसमें संस्कृति और प्रकृति दोनों शामिल हों।

बशोहली को केवल चित्रकला की बिक्री तक सीमित न रखकर कला पर्यटन का केंद्र बनाया जा सकता है। कलाकारों के प्रशिक्षण केंद्र, संग्रहालय, लाइव डेमोंस्ट्रेशन, स्थानीय हस्तशिल्प बाजार और सांस्कृतिक उत्सव यहां पर्यटकों का ठहराव बढ़ा सकते हैं।

जिला प्रशासन के अनुसार बशोहली क्षेत्र रावी नदी के किनारे स्थित है और यहां प्राकृतिक तथा ऐतिहासिक आकर्षण मौजूद हैं। धार महानपुर जैसे क्षेत्र भी पर्यटन की संभावनाएं रखते हैं।

कठुआ की असली परीक्षा: सुरक्षा के साथ विकास

कठुआ को लेकर सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या सीमा सुरक्षा और विकास को एक-दूसरे के पूरक बनाया जा सकता है।

जवाब हां है, लेकिन इसके लिए दृष्टिकोण बदलना होगा।

सीमावर्ती गांव में पक्की सड़क केवल विकास परियोजना नहीं है। वह आपात स्थिति में सुरक्षा तंत्र के लिए भी महत्वपूर्ण है। बेहतर मोबाइल नेटवर्क केवल संचार सुविधा नहीं, बल्कि आपदा और सुरक्षा सूचना का माध्यम भी है। मजबूत स्कूल केवल शिक्षा संस्थान नहीं, बल्कि सीमावर्ती समाज के भविष्य की नींव हैं। स्थानीय रोजगार केवल आर्थिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि युवाओं को स्थायी अवसर देने की सामाजिक रणनीति है।

हाल की सुरक्षा घटनाओं ने यह दिखाया है कि सीमा पर ड्रोन और दूसरे आधुनिक माध्यम नई चुनौतियां पैदा कर रहे हैं।

ऐसे समय में स्थानीय जनता और सुरक्षा एजेंसियों के बीच विश्वास भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितनी तकनीकी निगरानी।

कठुआ को सीमा नहीं, संभावना के रूप में देखना होगा

कठुआ की कहानी केवल पाकिस्तान सीमा से शुरू होकर सुरक्षा पर समाप्त नहीं होती। यह कहानी प्राचीन इतिहास से निकलकर बशोहली की कला तक जाती है, डोगरी संस्कृति से होकर खेतों तक पहुंचती है और वहां से विश्वविद्यालय, उद्योग तथा आधुनिक सीमा सुरक्षा की दुनिया में प्रवेश करती है।

कठुआ के सामने चुनौतियां गंभीर हैं। सीमा सुरक्षा, ड्रोन और तस्करी की नई चुनौतियां, कंडी क्षेत्र की जल समस्या, पहाड़ी क्षेत्रों की कठिन भौगोलिक स्थिति, कृषि की सीमाएं, युवाओं के रोजगार और महिला शिक्षा जैसे मुद्दे लगातार ध्यान मांगते हैं।

लेकिन इसी कठुआ के पास बड़ी संभावनाएं भी हैं। उपजाऊ मैदानी क्षेत्र, पंजाब-जम्मू संपर्क, कृषि उत्पादन, बशोहली की विश्व प्रसिद्ध कला, पहाड़ी पर्यटन, उच्च शिक्षा संस्थान और सीमावर्ती रणनीतिक महत्व इसे जम्मू-कश्मीर के महत्वपूर्ण जिलों में स्थान देते हैं।

आने वाले वर्षों में कठुआ की सफलता इस बात से तय होगी कि वह अपनी सीमा को केवल सुरक्षा चुनौती मानता है या उसे विकास की रणनीतिक ताकत में बदलता है।

यदि सीमावर्ती गांवों में शिक्षा मजबूत होती है, किसानों को पानी और बाजार मिलता है, युवाओं को कौशल और रोजगार मिलता है, महिलाओं की शिक्षा बढ़ती है, बशोहली की कला को वैश्विक बाजार मिलता है और आधुनिक तकनीक से सीमा सुरक्षा मजबूत होती है, तो कठुआ केवल जम्मू-कश्मीर का सीमांत जिला नहीं रहेगा।

वह भारत के उस मॉडल का उदाहरण बन सकता है जहां सीमा की चौकसी और गांव की समृद्धि एक-दूसरे की विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे की ताकत बनती हैं।

यही कठुआ की असली कहानी है — सीमा पर खड़ा एक जिला, जिसकी पहचान खतरे से ज्यादा उसकी जीवटता, संस्कृति, कृषि और भविष्य की संभावनाओं से होनी चाहिए।

यायावर
Author: यायावर

यायावर

One Response

  1. कठुआ पर गहन खोज -पड़ताल के बाद ही इतनी सटीक रिपोर्ट तैयार की जा सकती है। प्रत्येक पहलू पर रोशनी डाली गई है। इस दृष्टि से यह रिपोर्ट सराहनीय और संग्रहणीय है। रजनी वर्मा को आशीष एवं शाबाशी!

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