कानून जेब में, इंसान कब्र में?

ये दिल की बदतमीजी है कि सच अब चुप रहने को तैयार नहीं

लेखक अनिल अनूप की तस्वीर के साथ बदतमीज दिल का प्रतीकात्मक चित्र, न्याय, व्यवस्था, समाज, साहित्य और कर्ज से जुड़े दृश्यों वाली फीचर इमेज

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कानून जेब में,
इंसान कब्र में?

ये दिल की बदतमीजी है कि सच अब चुप रहने को तैयार नहीं

✍️ अनिल अनूप

आज मेरा दिल तमीज़ की चादर फाड़कर बाहर आ गया है। और कह रहा है— “बहुत हो गया… अब सच को नंगा ही रहने दो।” तुम्हारी व्यवस्था… हाँ, वही जो संविधान की कसम खाती है— असल में एक नाटकघर है। जहाँ न्याय किरदार है, और अन्याय निर्देशक। जहाँ फैसले नहीं होते— फिक्स होते हैं। जहाँ गरीब की अर्ज़ी लाइन में खड़ी-खड़ी बूढ़ी हो जाती है, और रसूखदार का केस VIP गेट से अंदर चला जाता है। और फिर तुम कहते हो— “सब बराबर हैं।”

मेरा बदतमीज दिल हँस पड़ा… बोला— “बराबरी अब सिर्फ भाषण में बची है।” और समाज…तू तो कमाल है। तू हर घटना पर रोता है— लेकिन दो मिनट के लिए। फिर वही— रील, लाइक, शेयर, स्क्रोल। तू किसी की मौत पर भी पूछता है—“वीडियो है क्या?” तू इंसान नहीं रहा… तू एल्गोरिदम बन गया है। जहाँ दर्द का भी reach देखा जाता है।

अब बात करते हैं साहित्य की… ओह, माफ करना— साहित्य नहीं, कंटेंट इंडस्ट्री। जहाँ लेखक नहीं, “क्रिएटर” पैदा हो रहे हैं। जो पूछते हैं— “भाई, ये लाइन वायरल होगी क्या?” किसी की चीख को हेडलाइन बनाकर ताली बटोरना— यही अब कला है। और मेरा बदतमीज दिल चिल्ला रहा है— “तुम कलमकार नहीं हो… तुम दुकानदार हो।” लेकिन रुक जाओ… सच इतना सीधा भी नहीं है। क्योंकि ये दुकानदार भी मजबूर है।

जब शब्द रोटी नहीं देते, तो लेखक को बाजार में खड़ा होना पड़ता है। वो दर्द नहीं बेचता— वो अपनी भूख बेचता है। और खरीदने वाला कौन है? 👉 तुम… 👉 मैं… 👉 हम सब…

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सवाल जो चुभते हैं

आज मेरा दिल सच में बदतमीज है… वो पूछ रहा है— क्यों कर्ज लेने वाला मर जाता है‌ और कर्ज देने वाला सम्मानित रहता है? क्यों इंसान की इज्जत EMI से सस्ती हो गई है? क्यों पुलिस कानून से नहीं, फोन कॉल से चलती है? और सबसे बड़ा सवाल— क्या हम सच में बुरे हो गए हैं… या बस आदत पड़ गई है बुरा देखने की?

अब मेरा बदतमीज दिल थक गया है… क्योंकि उसे समझ आ गया— यहाँ कोई अंधा नहीं है… सब देख रहे हैं। बस फर्क इतना है— कुछ लोग बेच रहे हैं, कुछ लोग खरीद रहे हैं, और कुछ लोग मर रहे हैं। और सबसे खतरनाक बात— अब किसी को हैरानी भी नहीं होती। आज की सबसे बड़ी बदतमीजी यही है— कि हम सब शरीफ बनकर इस बदतमीजी में शामिल हैं।

बदतमीज दिल: नाम, नीयत और नंगा सच

आज मेरा दिल शरीफ नहीं है। आज वो सीधे आँख में देख रहा है—और पूछ रहा है, “कौन है असली गुनहगार?” सबसे पहले… व्यवस्था। हाँ, वही व्यवस्था जो हर मंच से न्याय का ढोल पीटती है। तुम कहते हो— “कानून सबके लिए बराबर है।” लेकिन मेरा बदतमीज दिल पूछता है— बराबर कहाँ है? कागज़ पर… या जमीन पर?

क्योंकि जमीन पर तो यह दिखता है कि— जिसके पास पहुँच है, उसका कानून अलग है। जिसके पास पैसा है, उसकी गलती भी “मैनेज” हो जाती है। और जो गरीब है… वो गलती नहीं करता, फिर भी सज़ा उसी को मिलती है।

कानून या कॉल लॉग?

अब आते हैं… सिस्टम के पहरेदारों पर। पुलिस…जिसे देखकर भरोसा आना चाहिए, वो अब “फोन आने” का इंतज़ार करती है। कार्रवाई से पहले पूछती है— “ऊपर से क्या आदेश है?” मेरा बदतमीज दिल हँसता है— “कानून अब किताब में नहीं, कॉल लॉग में लिखा जाता है।”

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कर्ज और वसूली का खेल

और फिर… बैंक और वसूली का खेल। कर्ज देना आसान है— बस साइन करवा लो। लेकिन जब वसूली की बारी आती है— तो इंसान नहीं, शिकार दिखता है। धमकी… अपमान… घर तक पहुँच जाना… और फिर कहते हैं— “यह प्रक्रिया का हिस्सा है।” मेरा दिल फट पड़ता है— “अगर प्रक्रिया में इंसान मर जाए…तो वह प्रक्रिया नहीं, अत्याचार है।”

समाज की चुप्पी

अब समाज… तू तो सबसे बड़ा खिलाड़ी निकला। तू सब जानता है— कौन गलत है, कौन सही। लेकिन तू चुप रहता है। क्यों? क्योंकि तू डरता है… या फिर…तुझे फर्क ही नहीं पड़ता। तू हर खबर पर दुख जताता है—लेकिन सिर्फ स्टेटस तक। फिर अगले दिन वही जिंदगी। मेरा बदतमीज दिल कहता है— “तू निर्दोष नहीं है…तू सहभागी है।”

बाजार बनता साहित्य

और अब…साहित्य। जिसे कभी सच की आवाज कहा जाता था। आज वही सच पैकेजिंग में बिक रहा है। दर्द को सजाकर लिखा जा रहा है— ताकि क्लिक बढ़ें। किसी की मौत…किसी की गरीबी…किसी की बेबसी… सब “कंटेंट” बन चुका है। मेरा दिल ताना मारता है— “अब लेखक नहीं लिखते…अब बाजार लिखवाता है।”

लेकिन…यहाँ भी कहानी अधूरी है। क्योंकि लेखक भी भूखा है। और भूख— सबसे बड़ा संपादक होती है। वो शब्दों को भी मोड़ देती है। तो असली दोषी कौन? 👉 सिस्टम? 👉 समाज? 👉 बाजार? या फिर… 👉 हम सब?

आखिरी बात

आज मेरा बदतमीज दिल आखिरी बात कह रहा है— “एक परिवार मरा है… लेकिन यह हादसा नहीं, संकेत है।” संकेत इस बात का कि— अब इंसान की कीमत उसकी आय से तय होती है। संकेत इस बात का कि— अब इज्जत भी EMI पर चलती है। और संकेत इस बात का कि— अगर अभी नहीं जागे… तो अगली खबर में नाम बदल जाएगा, कहानी वही रहेगी।

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और सबसे कड़वा सच— यहाँ कोई मासूम नहीं है। कुछ लोग दबाव बनाते हैं, कुछ लोग दबाव झेलते हैं, और बाकी लोग…खामोश रहकर इस खेल को चलने देते हैं। आज की सबसे बड़ी बदतमीजी यही है— हम सब जानते हैं कि क्या गलत है…फिर भी हम उसे रोकते नहीं।

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Author: यायावर

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