जब महिला ने लिखा— ‘हत्या से तलाक महंगा है!’

स्तंभकार केवल कृष्ण पनगोत्रा की तस्वीर के साथ वैवाहिक रिश्तों, पति की हत्या, कानून और लैंगिक समानता पर आधारित पनगोत्रा की चिट्ठी अंक-9 की फीचर इमेज

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पनगोत्रा की चिट्ठी | अंक–9
लेखक/स्वतंत्र पत्रकार : केवल कृष्ण पनगोत्रा

अजीज पाठकों,

आज की चिट्ठी एक ऐसी आपराधिक घटना से शुरू कर रहा हूं, जिसमें अपराध, विवाह, पैसा, बीमा, साहित्य और मनुष्य की बदलती मानसिकता—सब एक-दूसरे में इस तरह उलझ जाते हैं कि कहानी किसी अपराध-कथा से कम और हमारे समय के सामाजिक चरित्र का आईना अधिक लगती है। सोचिए, एक महिला अपने पति की हत्या करती है और कुछ वर्षों पहले वह स्वयं एक ऐसा लेख लिख चुकी होती है जिसका शीर्षक था—‘हाऊ टू मर्डर योर हसबैंड’ यानी ‘अपने पति की हत्या कैसे करें।’ कहानी यहीं खत्म नहीं होती। जिस महिला ने यह लिखा था, उसी पर बाद में अपने पति की हत्या का आरोप लगा, मुकदमा चला और अंततः उसे दोषी ठहराकर उम्रकैद की सजा सुनाई गई।

यह कहानी अमेरिका के ओरेगन की है। 2 जून 2018 को 63 वर्षीय डेनियल ब्रोफी, जो शेफ और पाक-कला प्रशिक्षक थे, ओरेगन क्यूलिनरी इंस्टीट्यूट में मृत पाए गए। उनकी पत्नी नैन्सी क्रॉम्पटन-ब्रोफी उस समय 71 वर्ष की थीं। जांच आगे बढ़ी और नैन्सी पर पति की हत्या का मुकदमा चला। मई 2022 में जूरी ने उन्हें सेकंड-डिग्री मर्डर का दोषी माना और जून 2022 में अदालत ने उम्रकैद की सजा सुनाई, जिसमें 25 वर्ष बाद पैरोल की संभावना थी। अभियोजन पक्ष का तर्क था कि हत्या के पीछे आर्थिक लाभ और जीवन बीमा की रकम हासिल करने का मकसद था।

लेकिन इस पूरे मामले को दुनिया भर में असाधारण बनाने वाली बात सिर्फ हत्या नहीं थी। असली सनसनी तो उस लेख ने पैदा की, जिसे नैन्सी ने 2011 में लिखा था—‘How to Murder Your Husband।’ उस लेख में उन्होंने एक रोमांटिक-सस्पेंस लेखिका के रूप में हत्या, उसके संभावित तरीकों, मकसद और पुलिस की जांच जैसी बातों पर विचार किया था। दिलचस्प यह भी था कि उन्होंने हत्या के संभावित कारणों में आर्थिक लाभ, धोखा और प्रताड़ना जैसे पहलुओं का उल्लेख किया था। हालांकि अदालत ने इस पुराने लेख को मुकदमे में साक्ष्य के रूप में स्वीकार नहीं किया। फिर भी सवाल अपनी जगह खड़ा रहा—क्या कल्पना कभी अपराध की भूमिका बन सकती है? और उससे भी बड़ा सवाल—जब किसी रिश्ते में प्रेम की जगह लाभ-हानि का हिसाब बैठने लगे तो क्या विवाह बचा रह सकता है?

नैन्सी के मामले में अभियोजन ने दावा किया कि पति की हत्या का आर्थिक लाभ से संबंध था। बचाव पक्ष ने इन आरोपों से इनकार किया और कहा कि उनके हथियार संबंधी शोध का संबंध उनके लेखन से था तथा दंपती आर्थिक भविष्य को लेकर अपनी योजनाएं बना रहे थे। अंततः अदालत ने अभियोजन के मामले को स्वीकार करते हुए उन्हें दोषी ठहराया। यहां से हमारी चिट्ठी अमेरिका से निकलकर भारत की गलियों, घरों और अदालतों तक पहुंचती है।

नैन्सी के पुराने लेख का एक विचार बेहद विचलित करने वाला था—अगर किसी पति से छुटकारा पाना है तो हत्या से पहले उसके आर्थिक और सामाजिक परिणामों के बारे में सोचिए। लेकिन आज इस बात को केवल एक अपराध-कथा की तरह पढ़ना पर्याप्त नहीं होगा। विवाह आखिर है क्या? क्या वह दो व्यक्तियों का कानूनी अनुबंध मात्र है? क्या वह आर्थिक साझेदारी है? क्या वह सामाजिक प्रतिष्ठा का माध्यम है? या फिर वह दो मनुष्यों का ऐसा संबंध है जिसमें दोनों एक-दूसरे की कमियों, कमजोरियों, आकांक्षाओं और संघर्षों को समझते हुए जीवन की यात्रा करते हैं?

भारतीय परंपरा में विवाह को केवल पति और पत्नी का संबंध नहीं माना गया। इसमें दो परिवार जुड़ते हैं, दो संस्कृतियां मिलती हैं, दो सामाजिक संसार एक-दूसरे के निकट आते हैं। मगर आधुनिक समय में विवाह का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। शादी अब कई जगहों पर रिश्ते से ज्यादा इवेंट बन रही है। कितना खर्च हुआ? क्या मिला? कौन कितना कमाता है? किस परिवार की सामाजिक हैसियत कितनी है? किसका करियर बेहतर है? किसे किससे क्या लाभ होगा? इन सवालों ने धीरे-धीरे रिश्तों की आत्मा को घेरना शुरू कर दिया है। और जहां प्रेम की जगह हिसाब-किताब ले लेता है, वहां संबंध साझेदारी से प्रतिस्पर्धा में बदलने लगते हैं।

विवाह की सबसे खूबसूरत कल्पना यह है कि पति-पत्नी एक-दूसरे के पूरक होते हैं। लेकिन आज अनेक रिश्तों में दोनों एक-दूसरे के साथ खड़े होने के बजाय एक-दूसरे के विरुद्ध खड़े दिखाई देते हैं। कभी आर्थिक अधिकार को लेकर विवाद, कभी संपत्ति को लेकर विवाद, कभी करियर को लेकर तनाव, कभी अहंकार का टकराव, कभी परिवारों की अपेक्षाओं का दबाव और कभी विवाहेतर संबंधों का जहर। इन सबके बीच संवाद कम होता जा रहा है और कानूनी लड़ाई बढ़ती जा रही है।

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यह कहना गलत होगा कि हर वैवाहिक विवाद में पुरुष निर्दोष और महिला दोषी होती है। बिल्कुल नहीं। महिलाओं के खिलाफ घरेलू हिंसा, दहेज उत्पीड़न, आर्थिक शोषण और मानसिक प्रताड़ना वास्तविक समस्याएं हैं। ऐसी पीड़ा को नकारना न न्याय है और न सभ्यता। लेकिन दूसरी तरफ यह मान लेना भी न्याय नहीं है कि हर शिकायत में आरोपी पुरुष ही दोषी होगा। न्याय का अर्थ यही है कि शिकायतकर्ता की आवाज सुनी जाए और आरोपी को भी निष्पक्ष जांच तथा न्यायिक प्रक्रिया का अधिकार मिले। यही लैंगिक समानता का वास्तविक अर्थ है।

हमारे समाज में एक विचित्र मानसिकता है। जब किसी पुरुष पर महिला के खिलाफ अपराध का आरोप लगता है तो समाज बहुत जल्दी निष्कर्ष पर पहुंच जाता है। लेकिन जब किसी महिला पर पुरुष के खिलाफ गंभीर अपराध का आरोप लगता है तो अक्सर पहला सवाल उठता है—‘आखिर महिला ऐसा क्यों करेगी?’ यह सवाल अपने आप में गलत नहीं है, लेकिन यदि यह सवाल पहले से यह मानकर पूछा जाए कि महिला अपराध कर ही नहीं सकती, तो समस्या पैदा होती है। अपराध का कोई लिंग नहीं होता। अपराधी पुरुष हो सकता है। अपराधी महिला हो सकती है। पीड़ित पुरुष हो सकता है। पीड़ित महिला हो सकती है। और कई बार दोनों पक्षों की कहानी में ऐसी जटिलताएं होती हैं जिन्हें सोशल मीडिया की कुछ पंक्तियों या टीवी की बहस में समझना संभव नहीं। इसलिए किसी भी मामले में ‘महिला है इसलिए सही’ या ‘पुरुष है इसलिए गलत’ जैसी सोच न्याय के विरुद्ध है।

नैन्सी क्रॉम्पटन-ब्रोफी का मामला इसी बात की याद दिलाता है कि अपराधी की पहचान उसके लिंग से नहीं, उसके कृत्य और न्यायिक निष्कर्ष से होती है। भारत में भी ऐसे मामले सामने आते रहे हैं जिनमें पति की हत्या में पत्नी या पत्नी के प्रेमी की भूमिका सामने आई। 2023 में चर्चित सुखजीत सिंह हत्याकांड में उनकी पत्नी रमनदीप कौर और उसके कथित प्रेमी गुरप्रीत सिंह उर्फ मिट्ठू को अदालत ने दोषी ठहराया था। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार पत्नी को मृत्युदंड और उसके प्रेमी को उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी।

लेकिन ऐसे मामलों को केवल सनसनी की दृष्टि से देखने के बजाय हमें उस मानसिकता पर विचार करना चाहिए जो किसी व्यक्ति को अपने जीवनसाथी की हत्या जैसे भयावह कदम तक ले जाती है। क्या कारण केवल प्रेम है? क्या कारण केवल पैसा है? क्या कारण संपत्ति है? क्या कारण विवाहेतर संबंध है? या इन सबके पीछे वह मानसिकता काम करती है जिसमें मनुष्य दूसरे मनुष्य को एक ‘बाधा’ समझने लगता है? यहीं से समस्या गंभीर हो जाती है। जिस व्यक्ति के साथ जीवन बिताने की शपथ ली गई थी, वही व्यक्ति रास्ते का कांटा दिखाई देने लगे तो समस्या सिर्फ विवाह में नहीं, सोच में भी है।

हमारे समाज में एक और गंभीर समस्या है—वैवाहिक तनाव से उपजी आत्महत्या। कई बार विवाह के बाद किसी महिला की असामयिक मृत्यु होती है। परिवार ससुराल वालों पर आरोप लगाता है। पुलिस में मामला दर्ज होता है। मीडिया में खबर आती है। समाज आरोपी परिवार को दोषी मान लेता है। लेकिन हर मामले में वास्तविकता एक जैसी नहीं होती। इसी तरह किसी महिला की आत्महत्या को स्वतः हत्या मान लेना भी उचित नहीं और हर मृत्यु को ससुराल की साजिश मान लेना भी नहीं। किसी भी आरोप की निष्पक्ष जांच जरूरी है।

मैं यहां किसी महिला की पीड़ा को कमतर नहीं आंक रहा। बल्कि मैं तो यह कह रहा हूं कि वास्तविक पीड़िता को न्याय तभी मिलेगा जब झूठे या कमजोर आरोपों और वास्तविक अपराध के बीच फर्क किया जाएगा। किसी अन्याय की स्थिति में कानून का रास्ता है। परिवार से संवाद का रास्ता है। काउंसलिंग का रास्ता है। अलग रहने का रास्ता है। तलाक का कानूनी रास्ता है। न्यायालय का रास्ता है। लेकिन आत्महत्या किसी समस्या का समाधान नहीं। और हत्या तो बिल्कुल नहीं।

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भारत में दहेज विरोधी कानूनों और वैवाहिक क्रूरता से जुड़े प्रावधानों का उद्देश्य महिलाओं को संरक्षण देना था। यह उद्देश्य अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि दहेज और घरेलू हिंसा आज भी वास्तविक सामाजिक समस्याएं हैं। लेकिन कानून का उद्देश्य किसी निर्दोष को दंडित करना नहीं हो सकता। भारतीय न्यायपालिका ने भी समय-समय पर इस बात पर चिंता जताई है कि वैवाहिक विवादों में आपराधिक कानूनों का इस्तेमाल सोच-समझकर किया जाना चाहिए। शिकायतों की गंभीरता को देखते हुए निष्पक्ष जांच और अनावश्यक गिरफ्तारी से बचने की जरूरत है।

इसका अर्थ यह कतई नहीं कि दहेज कानून बेकार हैं। इसका अर्थ यह है कि कानून मजबूत भी हो और निष्पक्ष भी। दोषी बचना नहीं चाहिए, लेकिन निर्दोष फंसना भी नहीं चाहिए। यही न्याय की पहली शर्त है।

हमारी सामाजिक मानसिकता का एक पहलू बहुत विचित्र है। अपनी बेटी के लिए हम कहते हैं—ससुराल वालों ने उसे प्रताड़ित किया। लेकिन अपनी बहू के मामले में हम अक्सर कहते हैं—‘लड़की ही ऐसी थी।’ अपनी बेटी के लिए अच्छा परिवार चाहिए, लेकिन बहू के लिए अपेक्षाएं बदल जाती हैं। अपनी बेटी के सम्मान की चिंता होती है, लेकिन बहू के सम्मान को लेकर वही संवेदनशीलता हर घर में दिखाई नहीं देती। यह दोहरा मापदंड कब खत्म होगा? अगर बेटी इंसान है तो बहू भी इंसान है। अगर बेटी के अधिकार हैं तो बहू के भी अधिकार हैं। और अगर बेटी की पीड़ा वास्तविक है तो बेटे की पीड़ा को भी काल्पनिक मान लेना उचित नहीं।

आज की सबसे बड़ी त्रासदी शायद यही है कि हमने रिश्तों में भी निवेश और रिटर्न की भाषा घुसा दी है। शादी में कितना लगाया? कितना मिला? पति कितना कमाता है? पत्नी कितनी कमाती है? ससुराल कितना संपन्न है? मायके से क्या आएगा? किसके नाम कितनी संपत्ति है? किसके पास कितने संसाधन हैं? यह मानसिकता धीरे-धीरे विवाह को परिवार से बाजार में ले आती है।

जब संबंध लाभ-हानि की कसौटी पर परखे जाने लगते हैं तो त्याग मूर्खता लगता है, समर्पण कमजोरी और क्षमा घाटा। फिर पति-पत्नी एक-दूसरे के साथ नहीं, एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा करने लगते हैं। और प्रतिस्पर्धा में प्रेम बहुत जल्दी हार जाता है।

यह कहना अतिशयोक्ति होगा कि भारत में विवाह संस्था समाप्त होने की स्थिति में है। भारत में आज भी लाखों परिवार ऐसे हैं जहां पति-पत्नी कठिन परिस्थितियों में एक-दूसरे का साथ निभाते हैं। वे बीमारी में साथ खड़े होते हैं, आर्थिक संकट में एक-दूसरे को संभालते हैं और बच्चों के भविष्य के लिए अपने निजी सुखों का त्याग करते हैं। लेकिन यह भी सच है कि विवाह संस्था संक्रमण के दौर से गुजर रही है।

महिलाएं आर्थिक रूप से स्वतंत्र हो रही हैं। पुरुष भी पारंपरिक भूमिकाओं से बाहर निकल रहे हैं। नई पीढ़ी व्यक्तिगत स्वतंत्रता को अधिक महत्व दे रही है। सोशल मीडिया ने रिश्तों की तुलना बढ़ा दी है। आर्थिक आकांक्षाएं तेज हुई हैं और परिवारों की संरचना बदल रही है। इन बदलावों को अपराध या पतन कहकर खारिज नहीं किया जा सकता। जरूरत इस बात की है कि स्वतंत्रता और जिम्मेदारी दोनों साथ चलें।

आज भारत में पुरुष आयोग की मांग भी सुनाई देती है। इस मांग के समर्थन में केवल पुरुष ही नहीं, कुछ महिलाएं भी आवाज उठाती दिखाई देती हैं। इस मांग को भी भावनात्मक नारे के बजाय निष्पक्षता की कसौटी पर देखने की जरूरत है। यदि महिला सुरक्षा के लिए संस्थाएं और कानूनी व्यवस्थाएं हैं तो पुरुषों की शिकायतों के लिए भी प्रभावी तंत्र होना चाहिए—लेकिन इसका उद्देश्य महिला विरोधी व्यवस्था खड़ी करना नहीं होना चाहिए।

न्याय का मतलब यह नहीं कि एक पक्ष को हराकर दूसरे पक्ष को जीताया जाए। न्याय का मतलब है—सच की जीत। महिला की आवाज सुनी जाए। पुरुष की आवाज भी सुनी जाए। वास्तविक पीड़ित को सुरक्षा मिले। निर्दोष को सुरक्षा मिले। दोषी को सजा मिले। और कानून किसी के हाथ में प्रतिशोध का हथियार न बने। यही सभ्य समाज की पहचान है।

यहां एक सुखद पहलू भी दिखाई देता है। आज अनेक महिलाएं स्वयं उन सामाजिक प्रवृत्तियों पर सवाल उठा रही हैं जिन्हें कभी केवल पुरुष-विरोधी या महिला-विरोधी चश्मे से देखा जाता था। वे कहती हैं कि महिलाओं की सुरक्षा जरूरी है, लेकिन कानून का दुरुपयोग स्वीकार्य नहीं। वे कहती हैं कि महिला सम्मान जरूरी है, लेकिन पुरुष को स्वतः अपराधी मानना भी अन्याय है। यह सोच वास्तव में लैंगिक समानता की ओर बढ़ता हुआ कदम है।

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क्योंकि असली नारीवाद वह नहीं जो हर परिस्थिति में महिला को सही और पुरुष को गलत घोषित कर दे। असली समानता वह है जिसमें व्यक्ति को उसके लिंग से नहीं, उसके व्यवहार और कर्म से आंका जाए।

नैन्सी क्रॉम्पटन-ब्रोफी की कहानी का सबसे डरावना पहलू यह नहीं कि उसने एक लेख लिखा और बाद में पति की हत्या के मामले में दोषी ठहराई गई। सबसे डरावना पहलू यह है कि एक वैवाहिक संबंध में ऐसा बिंदु आ सकता है जहां जीवनसाथी जीवन का साथी न रहकर आर्थिक लाभ का साधन दिखाई देने लगे। अगर रिश्ता वहां पहुंच गया है तो समस्या केवल अपराध कानून की नहीं है। यह समाज की समस्या है। यह परिवार की समस्या है। यह हमारी आर्थिक मानसिकता की समस्या है। और सबसे बढ़कर यह मनुष्य के भीतर पैदा हो रही उस स्वार्थी प्रवृत्ति की समस्या है जो कहती है—‘मुझे इससे क्या मिलेगा?’

जब यह सवाल हर रिश्ते से पहले पूछा जाने लगे तो प्रेम का क्या होगा? मां-बाप से क्या मिलेगा? भाई से क्या मिलेगा? दोस्त से क्या मिलेगा? पति या पत्नी से क्या मिलेगा? और अंततः मनुष्य खुद से क्या खो देगा?

नैन्सी के प्रसंग को शीर्षक की सनसनी तक सीमित करना आसान है—‘हत्या से तलाक महंगा है।’ लेकिन असली सवाल इससे कहीं बड़ा है। तलाक महंगा हो सकता है। मुकदमा महंगा हो सकता है। संपत्ति का बंटवारा महंगा हो सकता है। लेकिन हत्या की कीमत कभी केवल पैसा नहीं होती। हत्या एक जीवन छीनती है। एक परिवार को तोड़ती है। बच्चों से उनका भविष्य छीन सकती है। माता-पिता से बेटा या बेटी छीन सकती है। और अपराधी के जीवन को भी जेल की दीवारों में कैद कर देती है।

इसलिए किसी भी टूटते रिश्ते के सामने सबसे पहले हत्या या आत्महत्या नहीं, बल्कि संवाद, दूरी, परामर्श, कानूनी सहायता और जरूरत पड़ने पर सम्मानजनक अलगाव का रास्ता होना चाहिए। विवाह जीवन का साधन है, जीवन का अंत नहीं। और विवाह टूट जाए तो जीवन समाप्त नहीं हो जाता। लेकिन यदि विवाह को बचाने के नाम पर हिंसा सहते रहना पड़े, तो वह भी कोई आदर्श नहीं। संबंध तभी सुंदर है जब उसमें प्रेम के साथ सम्मान हो, अधिकार के साथ जिम्मेदारी हो और स्वतंत्रता के साथ संवेदनशीलता हो।

अजीज पाठकों, हमारे समय का सबसे बड़ा सवाल शायद यह नहीं है कि नैन्सी क्रॉम्पटन-ब्रोफी ने अपने पति की हत्या क्यों की। सवाल यह है कि हमारे रिश्तों में वह कौन-सी चीज धीरे-धीरे मर रही है जिसके कारण कभी दो अनजान लोग एक-दूसरे के लिए पूरी जिंदगी समर्पित कर देते थे? क्या वह विश्वास है? क्या वह धैर्य है? क्या वह संवाद है? क्या वह त्याग है? या फिर वह भावना है जिसमें पति-पत्नी एक-दूसरे को अपना ‘प्रतिद्वंद्वी’ नहीं, अपना ‘सहयात्री’ समझते थे?

शादी दो व्यक्तियों का मिलन भर नहीं। यह दो परिवारों, दो संस्कृतियों और दो जीवन-दृष्टियों का संवाद भी है। इसे बाजार मत बनाइए। इसे युद्ध मत बनाइए। इसे लाभ-हानि की बैलेंस शीट मत बनाइए। और सबसे बढ़कर—इसे अहंकार का अखाड़ा मत बनाइए। क्योंकि जब रिश्तों में प्रेम कम और हिसाब ज्यादा हो जाता है, तब घर मकान तो रह जाता है, लेकिन परिवार नहीं। और जब परिवार नहीं बचता तो समाज की नींव भी धीरे-धीरे कमजोर होने लगती है।

नैन्सी क्रॉम्पटन-ब्रोफी की कहानी हमें अपराध की भयावहता बताती है, लेकिन उससे कहीं अधिक वह एक चेतावनी देती है—रिश्ते तब तक ही रिश्ते हैं, जब तक उनमें मनुष्य बचा हुआ है। बाकी सब हिसाब है। और जीवन को केवल हिसाब में बदल देना शायद मनुष्य की सबसे बड़ी हार है।

सप्ताह की अगली चिट्ठी के जरिए फिर मिलेंगे। तब तक प्यारी-सी अलविदा!

— केवल कृष्ण पनगोत्रा
लेखक/स्वतंत्र पत्रकार

यायावर
Author: यायावर

यायावर

11 Responses

  1. आदरणीय पनगोत्रा जी,

    ‘पनगोत्रा की चिट्ठी’ का यह अंक पढ़कर मन में कई सवाल उठे। पति की हत्या की घटना के बहाने आपने जिस तरह बदलते वैवाहिक रिश्तों, स्वार्थ और कानून के निष्पक्ष उपयोग पर चर्चा की है, वह बेहद विचारणीय है।

    मुझे सबसे महत्वपूर्ण बात यह लगी कि आपने अपराध को स्त्री या पुरुष के चश्मे से देखने के बजाय इंसान और उसके कर्म के आधार पर देखने की बात कही है। महिलाओं की सुरक्षा जरूरी है, लेकिन किसी निर्दोष पुरुष के साथ अन्याय भी न्याय नहीं हो सकता।

    आज सचमुच रिश्तों में प्रेम और विश्वास की जगह कहीं-कहीं आर्थिक लाभ, अधिकार और अपेक्षाओं ने ले ली है। विवाह साझेदारी है, प्रतियोगिता नहीं। मतभेद हों तो संवाद, परामर्श और जरूरत पड़े तो सम्मानजनक अलगाव का रास्ता अपनाया जाना चाहिए—हिंसा या प्रतिशोध का नहीं।

    आपकी चिट्ठी की सबसे बड़ी सीख मुझे यही लगी कि रिश्ते तब तक रिश्ते हैं, जब तक उनमें इंसानियत और विश्वास बचा है।

    पंजाब की ओर से इस सार्थक और सोचने को मजबूर करने वाली चिट्ठी के लिए आपको साधुवाद।

    1. हरदीप जी,
      बहुत बहुत शुक्रिया।
      मालूम नहीं संपादक अनिल अनूप जी को क्या सूझा। जनगनदूत के लिए हफ्ता वार एक चिट्ठी लिखने को कह दिया। अब उनसे संबंध पुराना और गहरा होने पर इन्कार भी नहीं कर सका।
      उपर से आप जैसे बौद्धिक पाठकों ने चिट्ठी को जारी रखने की प्रेरणा दी।
      दिल की अथाह गहराई से धन्यवाद।
      केवल कृष्ण पनगोत्रा कठुआ
      जम्मू-कश्मीर

  2. रिश्ता है जी, बैलेंस शीट नहीं!

    “पनगोत्रा जी की चिट्ठी-9” पढ़ी तो लगा कि आजकल शादी में सात फेरे कम और हिसाब-किताब ज्यादा होने लगा है! 😄

    पति-पत्नी का रिश्ता आखिर बैंक अकाउंट तो है नहीं कि हर बात में जमा-खर्च का हिसाब लगाया जाए। प्यार में थोड़ा घाटा भी चलेगा और कभी-कभी सामने वाले की गलती भी ‘राइट ऑफ’ करनी पड़ेगी!

    चिट्ठी की सबसे अच्छी बात लगी कि आपने अपराध को महिला या पुरुष के चश्मे से नहीं, इंसानियत और न्याय के चश्मे से देखने की बात कही। सही भी है—गलत काम करने वाला ‘गलत इंसान’ है, सिर्फ पुरुष या महिला नहीं।

    और हां, रिश्ता अगर बिगड़ जाए तो बातचीत, सलाह, दूरी या तलाक के रास्ते खुले हैं। लेकिन गुस्से में हत्या जैसा फैसला? अरे भई, जिंदगी कोई ड्राफ्ट नहीं कि गलती हुई तो डिलीट करके फिर से लिख ली!

    पटनीटाप की ठंडी हवा में बैठकर बस इतना ही कहूंगी—रिश्तों में थोड़ी गर्मजोशी, थोड़ी शरारत और ढेर सारा भरोसा रखिए; हिसाब-किताब की कॉपी घर से बाहर ही रखिए। 😊

    पनगोत्रा जी, ऐसी चिट्ठियां पढ़कर मुस्कुराते हुए सोचने का मौका मिलता रहे—इसी उम्मीद के साथ!

    1. केवल कृष्ण पनगोत्रा स्वतंत्र लेखक-पत्रकार जम्मू-कश्मीर says:

      रजनी -रजनी-रजनी,
      गुस्सा मत करना, छोटी हो और घर की हो।
      पटनी टॉप यानि घर की बात!
      इसलिए अंदाज़-ए-बयां यानि कहने का सलीका भी घर जैसा ही है। बहुत अच्छा लगता है।
      मुस्कुराते हुए, अगली चिट्ठी का इन्तजार जरूर करना

  3. रिश्तों में बढ़ती असहिष्णुता चिंता का विषय

    आदरणीय पनगोत्रा जी,

    ‘पनगोत्रा की चिट्ठी’ का यह अंक अत्यंत गंभीर और विचारोत्तेजक लगा। वैवाहिक रिश्तों में बढ़ते तनाव, स्वार्थ और अविश्वास के पीछे छिपी सामाजिक मानसिकता पर आपने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं।

    आज जरूरत इस बात की है कि हम स्त्री और पुरुष के आधार पर नहीं, बल्कि न्याय और मानवीय संवेदना के आधार पर घटनाओं को देखें। महिलाओं की सुरक्षा से जुड़े कानून आवश्यक हैं, लेकिन उनका दुरुपयोग किसी निर्दोष व्यक्ति के साथ अन्याय का कारण नहीं बनना चाहिए।

    रिश्तों में मतभेद होना स्वाभाविक है, लेकिन मतभेद का परिणाम हिंसा या अपराध बने, यह समाज के लिए गंभीर चेतावनी है। विवाह अधिकारों के साथ जिम्मेदारियों और परस्पर सम्मान का भी संबंध है।

    इस चिट्ठी की सबसे महत्वपूर्ण सीख यही है कि रिश्ते बचाने के लिए संवाद, धैर्य और विश्वास जरूरी हैं; और जब रिश्ता बचाना संभव न हो तो सम्मानजनक अलगाव हिंसा से कहीं बेहतर विकल्प है।

    ऐसे विषय पर समाज को सोचने के लिए मजबूर करने के लिए पनगोत्रा जी को साधुवाद।

    1. केवल कृष्ण पनगोत्रा स्वतंत्र लेखक-पत्रकार जम्मू-कश्मीर says:

      सुधीर साव जी,
      चिट्ठी पढ़ने और प्रतिक्रिया देने के लिए धन्यवाद

  4. पनगोत्रा जी,

    आपकी चिट्ठी पढ़ते हुए मन कई बार ठिठक गया। पति-पत्नी का रिश्ता जब प्रेम और विश्वास से निकलकर शक, स्वार्थ और बदले की भावना तक पहुंच जाता है, तब केवल एक परिवार नहीं टूटता, कई जीवन भीतर से बिखर जाते हैं।

    सबसे दुखद बात यह है कि आज हम रिश्तों में साथ निभाने से पहले अपने अधिकारों का हिसाब करने लगे हैं। छोटी-सी बात पर संवाद खत्म हो जाता है और अहंकार इतना बड़ा हो जाता है कि सामने वाला अपना ही नहीं, दुश्मन नजर आने लगता है।

    कानून न्याय के लिए है, प्रतिशोध के लिए नहीं। स्त्री हो या पुरुष, निर्दोष को बचाना और दोषी को दंडित करना ही सच्चा न्याय है।

    आपकी चिट्ठी ने दिल में यही बात उतारी कि रिश्ता टूट जाए तो शायद जीवन फिर संभल सकता है, लेकिन किसी की जान चली जाए तो लौटकर कुछ नहीं आता।

    काश, हम रिश्ते खत्म करने से पहले एक बार दिल से बात करना सीख जाएं।

    1. केवल कृष्ण पनगोत्रा स्वतंत्र लेखक-पत्रकार जम्मू-कश्मीर says:

      प्रमीला राजहंस जी,
      उड़ीसा जम्मू-कश्मीर से बहुत दूर है लेकिन आपने नजदीकी का एहसास करवा दिया।
      बहुत बहुत धन्यवाद

  5. ‘पनगोत्रा की चिट्ठी’ का यह अंक पढ़कर महसूस हुआ कि एक बेहद संजीदा और नाज़ुक मौज़ू को बहुत सलीके से सामने रखा गया है। लेखन में दर्द भी है, सवाल भी हैं और समाज के बदलते रवैये पर गहरी सोच भी।

    तहरीर के एतबार से ज़बान आसान, रवां और पाठक से सीधा संवाद करती है। कहीं-कहीं एक ही ख़याल की दोहराई हुई बात को थोड़ा मुख़्तसर किया जाए तो मज़मून और ज्यादा असरदार हो सकता है। गंभीर दावों के साथ अगर कुछ मुनासिब हवाले और तथ्य भी जोड़ दिए जाएं तो तहरीर की साख और बढ़ेगी।

    संपादन और पेशकश भी बा कमाल है। अलबत्ता छोटे पैराग्राफ, मुनासिब सब-हेडिंग और अहम बातों को अलग से उभारने से पढ़ने में और आसानी होगी। शुरुआत में वाक़ये और आखिर में उसके सामाजिक असर के बीच थोड़ा और मजबूत राब्ता बनाया जा सकता है।

    मेरी गुज़ारिश बस इतनी है कि ऐसे हस्सास मौज़ू पर जज़्बात और हक़ीक़त के बीच तवाज़ुन कायम रखा जाए। औरत या मर्द को एक-दूसरे के मुकाबले खड़ा करने के बजाय इंसाफ, बराबरी और इंसानियत को बुनियाद बनाया जाए।

    कुल मिलाकर यह चिट्ठी काबिले-गौर है और पाठक को अपने रिश्तों और समाज के बारे में सोचने पर मजबूर करती है। थोड़ी और संपादकीय कसावट और मुनासिब हवाले इसे और मजबूत बना सकते हैं।
    परवीन सुल्ताना, बस्ती मालोक, मुलतान, पाकिस्तान

    1. केवल कृष्ण पनगोत्रा स्वतंत्र लेखक-पत्रकार जम्मू-कश्मीर says:

      परवीन सुल्ताना साहिबा,
      यकीन नहीं हो रहा कि पाकिस्तान से भी चिट्ठी का जवाब मिलेगा! मेरे घर से पांच किलोमीटर दूर पाकिस्तान का सूबा पंजाब है। बेशक, सियासत के सौदों ने जुदा कर दिया लेकिन हमारे रिवाज एक हैं। आपका जवाब पढ़ कर जो खुशी हो रही है, बयां नहीं कर सकता।
      बहुत बहुत शुक्रिया।
      हां, गलती से किसी को दिया गया जवाब आपकी जानिब आ गया, मुआफी चाहता हूं
      केवल कृष्ण पनगोत्रा कठुआ जम्मू

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