संजय सिंह राणा की खास रिपोर्ट
माड़वी हिड़मा के कथित मुठभेड़ में मारे जाने के बाद बस्तर एक बार फिर राष्ट्रीय बहस के केंद्र में है। मीडिया और सोशल मीडिया में हिड़मा को लेकर दो बिल्कुल अलग तस्वीरें सामने आ रही हैं। एक तरफ सरकार और मीडिया का बड़ा हिस्सा उसे खूंखार माओवादी कमांडर के रूप में देखता है, जिसके नाम पर कई घातक हमलों की जिम्मेदारी जुड़ी रही है। दूसरी तरफ आदिवासी समाज से जुड़े कुछ लोग उसे ऐसे व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं, जिसने जल, जंगल और जमीन पर आदिवासियों के अधिकारों के लिए हथियार उठाए।
इन दो तस्वीरों के बीच बस्तर का असली सवाल कहीं ज्यादा बड़ा है। सवाल केवल यह नहीं है कि माओवाद खत्म होगा या नहीं। सवाल यह भी है कि माओवाद के कमजोर पड़ने के बाद बस्तर के आदिवासियों के जल-जंगल-जमीन, ग्रामसभा और प्राकृतिक संसाधनों के अधिकारों का भविष्य क्या होगा?
क्योंकि बस्तर की कहानी माओवाद से शुरू नहीं हुई थी और संभवतः माओवाद के अंत के साथ समाप्त भी नहीं होगी।
माओवाद से कहीं पुराना है बस्तर का प्रतिरोध
बस्तर में माओवादी आंदोलन को लगभग साढ़े चार दशक पुराना माना जाता है, लेकिन आदिवासी प्रतिरोध की जड़ें इससे कहीं गहरी हैं। यहां सत्ता, जंगल, जमीन, प्राकृतिक संसाधनों और बाहरी हस्तक्षेप के खिलाफ संघर्ष का इतिहास दो सौ वर्ष से भी अधिक पुराना है।
1774 से 1779 के बीच हुआ हल्बा विद्रोह बस्तर के शुरुआती बड़े संगठित आदिवासी प्रतिरोधों में गिना जाता है। इसके बाद 1825 का परालकोट विद्रोह हुआ, जिसका नेतृत्व गेंदसिंह ने किया। यह संघर्ष उस दौर की राजनीतिक और आर्थिक दखलंदाजी के खिलाफ स्थानीय असंतोष का बड़ा उदाहरण था।
1859 का कोया विद्रोह जंगलों की अंधाधुंध कटाई के खिलाफ आदिवासी प्रतिरोध का महत्वपूर्ण अध्याय था। अंग्रेजों की वन नीतियों और प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ते नियंत्रण ने आदिवासी जीवन-पद्धति को सीधे प्रभावित किया।
1876-77 का मुरिया विद्रोह भी इसी संघर्ष की अगली कड़ी था। जबरन लगान, कर, जंगलों पर सरकारी नियंत्रण और पारंपरिक स्वशासन में हस्तक्षेप के खिलाफ आदिवासी समाज ने हथियार उठाए। और फिर आया 1910 का भूमकाल विद्रोह।
गुंडाधूर और भूमकाल की विरासत
बस्तर के इतिहास में भूमकाल विद्रोह का स्थान सबसे महत्वपूर्ण अध्यायों में है। धुरवा समुदाय के गुंडाधूर के नेतृत्व में हुआ यह आंदोलन केवल अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ राजनीतिक विद्रोह नहीं था। इसके पीछे जंगल, जमीन, बेगारी, कर, सांस्कृतिक हस्तक्षेप और आदिवासी स्वायत्तता से जुड़े प्रश्न भी थे।
बस्तर के आदिवासी समाज के लिए जंगल केवल लकड़ी का स्रोत नहीं था। जंगल उनका भोजन था, औषधि था, संस्कृति था, देवस्थान था और जीवन का आधार था। जमीन केवल खेती का साधन नहीं थी। वह समुदाय की पहचान और आने वाली पीढ़ियों की सुरक्षा से जुड़ी थी।
इसीलिए बस्तर में जल, जंगल और जमीन का प्रश्न किसी आधुनिक राजनीतिक नारे से पैदा नहीं हुआ। यह यहां की सामाजिक संरचना और जीवन-पद्धति का हिस्सा रहा है।
आजादी के बाद भी खत्म नहीं हुआ संघर्ष
देश आजाद हुआ तो आदिवासी समाज को उम्मीद थी कि अब जंगल और जमीन पर उसका अधिकार मजबूत होगा। लेकिन समय के साथ वन कानून, राजस्व व्यवस्था, ठेकेदारों का प्रभाव और सरकारी नियंत्रण बढ़ता गया।
1956 के बाद वन क्षेत्र पर सरकारी नियंत्रण और मजबूत हुआ। इसका असर उन समुदायों पर पड़ा जो पीढ़ियों से जंगलों के साथ सामुदायिक संबंध में रहते आए थे।
बस्तर के आखिरी राजा प्रवीर चंद्र भंजदेव ने आदिवासी अधिकारों को लेकर मुखर भूमिका निभाई। 25 मार्च 1966 को जगदलपुर के महाराजा महल में हुई पुलिस गोलीबारी में उनकी मौत हो गई। सरकारी दस्तावेज इसे पुलिस कार्रवाई के रूप में दर्ज करते हैं, लेकिन बस्तर की सामूहिक स्मृति में यह घटना आज भी गहरे राजनीतिक और सामाजिक दर्द से जुड़ी हुई है।
प्रवीर चंद्र भंजदेव का प्रसंग यह बताता है कि बस्तर में आदिवासी अधिकारों और सत्ता के बीच तनाव माओवादी आंदोलन से बहुत पहले मौजूद था।
फिर आया माओवादी दौर
बीसवीं शताब्दी के अंतिम दशकों में माओवादी आंदोलन ने बस्तर के इस पुराने असंतोष को अपने राजनीतिक और सशस्त्र संघर्ष का आधार बनाया। माओवादियों ने आदिवासियों के शोषण, वन अधिकार, जमीन, विस्थापन और खनिज संसाधनों से जुड़े सवालों को अपने आंदोलन के केंद्र में रखा। लेकिन इसके साथ ही हिंसा का एक लंबा और भयावह दौर भी शुरू हुआ।
सुरक्षा बलों और माओवादियों के बीच संघर्ष में आम आदिवासी सबसे अधिक प्रभावित हुआ। ग्रामीणों पर दोनों तरफ से दबाव के आरोप लगे। कई गांवों का विस्थापन हुआ। स्कूल, सड़क और सरकारी संस्थाओं तक पहुंच बाधित हुई। दूसरी तरफ सुरक्षा अभियान में मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप भी लगातार सामने आते रहे। यही कारण है कि बस्तर की समस्या को केवल ‘माओवादी बनाम सरकार’ के द्वंद्व में देखना अधूरा होगा।
हिड़मा के बाद क्या बदलेगा?
माड़वी हिड़मा जैसे नेताओं का अंत माओवादी संगठन के लिए निश्चित रूप से बड़ा झटका माना जा सकता है। सरकार ने भी माओवाद के उन्मूलन के लिए 31 मार्च 2026 की समयसीमा निर्धारित की थी। अब बस्तर में माओवादी प्रभाव के लगातार सिमटने की तस्वीर दिखाई दे रही है।
सरकार का तर्क है कि सुरक्षा की स्थिति बेहतर होने के बाद विकास का रास्ता खुलेगा। सड़कें बनेंगी, बिजली पहुंचेगी, मोबाइल नेटवर्क मजबूत होगा, स्कूल और अस्पताल खुलेंगे तथा दूरदराज के गांव मुख्यधारा से जुड़ेंगे। यह विकास निश्चित रूप से जरूरी है।
लेकिन सवाल यह है कि विकास किसकी शर्तों पर होगा? क्या बस्तर के गांवों में सड़क और बिजली के साथ ग्रामसभा की ताकत भी बढ़ेगी? क्या खनिज संपदाओं पर निर्णय लेते समय स्थानीय समुदाय की सहमति को वास्तविक महत्व मिलेगा? क्या विस्थापन की स्थिति में आदिवासियों को केवल मुआवजा मिलेगा या उनकी सामाजिक-सांस्कृतिक दुनिया की भी रक्षा होगी? यही वे सवाल हैं जिनका जवाब आने वाले वर्षों में बस्तर की दिशा तय करेगा।
हर कुछ किलोमीटर पर सुरक्षा कैंप और नई आशंकाएं
नक्सल उन्मूलन अभियान के दौरान बस्तर के कई इलाकों में सुरक्षा बलों के कैंप बढ़े हैं। सरकार की दृष्टि से ये कैंप सुरक्षा और विकास की पहुंच बढ़ाने के लिए आवश्यक हैं। लेकिन ग्रामीणों के एक हिस्से के मन में दूसरा सवाल है।
अगर माओवादी हिंसा खत्म हो जाती है तो क्या ये कैंप धीरे-धीरे हटेंगे? यदि नहीं, तो क्या स्थानीय लोगों को अपने संसाधनों, जंगल और जमीन से जुड़े मुद्दों पर शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक ढंग से आंदोलन करने की पर्याप्त स्वतंत्रता मिलेगी?
यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि लोकतंत्र की सफलता केवल हिंसा रोकने में नहीं, बल्कि असहमति को जगह देने में भी मापी जाती है।
माओवादी हिंसा का समर्थन करना और आदिवासी अधिकारों की लोकतांत्रिक मांग का समर्थन करना—दो अलग बातें हैं। इन दोनों को एक ही तराजू पर रख देना समस्या को और जटिल कर सकता है।
बस्तर की जमीन के नीचे छिपी खनिज संपदा
अविभाजित बस्तर क्षेत्र प्राकृतिक संसाधनों से बेहद समृद्ध रहा है। लौह अयस्क, बॉक्साइट, टिन, कोयला, कोरंडम, चूना पत्थर और ग्रेनाइट जैसी खनिज संपदाएं यहां मौजूद हैं।
यही संपदा बस्तर को आर्थिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण बनाती है। लेकिन जिस जमीन के नीचे खनिज हैं, उसके ऊपर हजारों वर्षों से आदिवासी जीवन भी मौजूद है।
रावघाट और आमदाई जैसे इलाकों में खनन से जुड़े सवालों को लेकर स्थानीय स्तर पर विरोध और चिंता सामने आती रही है। आदिवासी समुदायों का एक हिस्सा आशंकित है कि सुरक्षा की स्थिति सुधरने के बाद खनन और औद्योगिक परियोजनाओं की रफ्तार और बढ़ सकती है। यदि ऐसा होता है तो बस्तर के सामने विकास और संरक्षण के बीच संतुलन बनाने की सबसे बड़ी चुनौती होगी।
गढ़चिरौली से क्या संकेत मिलते हैं?
महाराष्ट्र का गढ़चिरौली जिला बस्तर के लिए एक महत्वपूर्ण उदाहरण माना जा सकता है। वहां माओवादी प्रभाव के कमजोर होने के साथ खनन और औद्योगिक गतिविधियों को लेकर बहस तेज हुई है।
स्थानीय स्तर पर पर्यावरणीय क्षति, पेड़ों की कटाई, पानी और मिट्टी के प्रदूषण तथा कृषि पर असर जैसी शिकायतें सामने आती रही हैं। खनन क्षेत्रों में बाहर से आने वाली आबादी और स्थानीय समुदाय के बीच सामाजिक तनाव की स्थितियां भी चिंता का विषय बनती हैं। इन परिस्थितियों से बस्तर के लिए एक बड़ा सबक निकलता है—माओवाद का अंत अपने आप में बस्तर की समस्या का अंत नहीं है।
यदि माओवादी हिंसा समाप्त होने के बाद भी विस्थापन, पर्यावरण विनाश, भूमि अधिग्रहण और संसाधनों पर स्थानीय अधिकार के सवाल अनसुलझे रह जाते हैं, तो असंतोष का कोई नया रूप पैदा होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
विकास बनाम अधिकार नहीं, विकास के साथ अधिकार चाहिए
बस्तर को विकास चाहिए। इसमें कोई दो राय नहीं। दूरदराज के गांवों में अच्छी सड़कें हों, बिजली हो, अस्पताल हों, इंटरनेट हो, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा हो और रोजगार के अवसर हों—यह हर नागरिक का अधिकार है। लेकिन विकास का अर्थ यह नहीं हो सकता कि स्थानीय समुदाय अपने निर्णयों से बाहर कर दिए जाएं।
आदिवासी समाज के लिए विकास का अर्थ केवल कंक्रीट की सड़क और खदान नहीं है। उनके लिए जंगल का सुरक्षित रहना भी विकास है। नदी का साफ रहना भी विकास है। खेती योग्य जमीन का बचना भी विकास है। ग्रामसभा की आवाज का सम्मान भी विकास है।
यहीं संविधान की पांचवीं अनुसूची, पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम यानी पेसा और वनाधिकार कानून जैसे प्रावधानों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। कानून यदि आदिवासी समुदायों को अधिकार देता है तो उन अधिकारों का जमीन पर प्रभावी क्रियान्वयन भी उतना ही जरूरी है।
क्या शांतिपूर्ण प्रतिरोध की जगह बचेगी?
बस्तर का सबसे महत्वपूर्ण भविष्य का प्रश्न शायद यही है। अगर माओवादी आंदोलन खत्म हो जाता है और कोई आदिवासी ग्रामसभा किसी खदान का विरोध करती है, तो क्या उसे माओवादी समर्थक मान लिया जाएगा?
अगर कोई आदिवासी संगठन विस्थापन के खिलाफ आंदोलन करता है, तो क्या उसे विकास विरोधी कह दिया जाएगा? अगर कोई सामाजिक कार्यकर्ता जंगल कटाई के खिलाफ आवाज उठाता है, तो क्या उस पर सुरक्षा संबंधी आरोप लगेंगे?
लोकतंत्र में इन सवालों का जवाब ‘नहीं’ होना चाहिए। हिंसा का रास्ता स्वीकार्य नहीं हो सकता, लेकिन शांतिपूर्ण असहमति लोकतंत्र का अधिकार है। बस्तर को यदि वास्तव में माओवाद के बाद का नया अध्याय लिखना है तो यह अध्याय बंदूक के सन्नाटे से नहीं, बल्कि संविधान और लोकतंत्र की आवाज से लिखा जाना चाहिए।
बीडी शर्मा से मूलवासी बचाओ मंच तक
बस्तर में आदिवासी अधिकारों को लेकर संघर्ष करने वालों का इतिहास लंबा है। 1992 में बैलाडीला के डिपॉजिट नंबर 5 को निजी कंपनी को दिए जाने के विरोध के दौरान तत्कालीन कलेक्टर बीडी शर्मा से जुड़ा विवाद भी इसी तनाव को सामने लाता है।
2011 में सलवा जुडूम के दौर में ताड़मेटला, तिम्मापुरम और मोरपल्ली गांवों को जलाए जाने के आरोपों की जांच के लिए गए स्वामी अग्निवेश के साथ मारपीट की घटना ने भी राष्ट्रीय स्तर पर सवाल उठाए।
आदिवासी कार्यकर्ता सोनी सोरी की गिरफ्तारी और हिरासत में कथित यातना के आरोपों ने मानवाधिकारों की बहस को और तीखा किया। बाद में उन पर हुए एसिड हमले ने भी बस्तर में कार्यकर्ताओं की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए।
अक्टूबर 2024 में मूलवासी बचाओ मंच पर प्रतिबंध और उसके कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी को लेकर भी बहस हुई। सरकार ने संगठन पर विकास कार्यों और सुरक्षा कैंपों के विरोध तथा लोगों को भड़काने के आरोप लगाए, जबकि संगठन से जुड़े लोगों की ओर से इसे आदिवासी अधिकारों की आवाज दबाने की कार्रवाई बताया गया।
इन घटनाओं का अंतिम मूल्यांकन इतिहास करेगा। लेकिन इतना स्पष्ट है कि बस्तर में राज्य और आदिवासी समाज के बीच विश्वास की कमी आज भी एक गंभीर चुनौती है।
असली परीक्षा अब शुरू होगी
माओवाद के खिलाफ सैन्य और सुरक्षा अभियान की सफलता को केवल मारे गए या गिरफ्तार किए गए माओवादियों की संख्या से नहीं मापा जाना चाहिए।
असली सफलता तब होगी जब बस्तर का युवा बंदूक के बजाय शिक्षा और रोजगार को अपना भविष्य समझे। जब आदिवासी परिवार को अपनी जमीन बचाने के लिए जंगल में छिपने की जरूरत न पड़े। जब ग्रामसभा अपने अधिकारों के साथ मजबूत हो। जब कोई खदान खुले तो स्थानीय समुदाय को निर्णय प्रक्रिया में वास्तविक भागीदारी मिले। जब विकास परियोजना से विस्थापन हो तो प्रभावित परिवार केवल मुआवजे का आंकड़ा न बन जाए।
और सबसे बढ़कर, जब कोई आदिवासी अपने जल, जंगल और जमीन के सवाल पर शांतिपूर्ण ढंग से आवाज उठाए तो उसे देशविरोधी या माओवादी कहकर खारिज न किया जाए।
हिड़मा के बाद बस्तर का सबसे बड़ा सवाल
हिड़मा की कहानी चाहे जिस नजरिए से देखी जाए, उसके बाद बस्तर में एक युग के खत्म होने की चर्चा जरूर तेज हुई है।
सरकार के लिए यह माओवादी हिंसा के निर्णायक अंत का अवसर है। आदिवासी समाज के लिए यह अपने अधिकारों और भविष्य को लेकर नई चिंता का समय भी हो सकता है।
बस्तर के जंगलों में अब बंदूकों की आवाज कम हो सकती है। सुरक्षा बलों की मौजूदगी बढ़ सकती है। नई सड़कें बन सकती हैं। मोबाइल टावर खड़े हो सकते हैं। खदानें खुल सकती हैं। उद्योग आ सकते हैं।
लेकिन इस पूरे बदलाव के बीच सबसे जरूरी सवाल यही रहेगा— क्या बस्तर का विकास बस्तर के लोगों के साथ होगा या बस्तर के संसाधनों पर होगा?
यदि विकास स्थानीय समुदाय की भागीदारी, संविधान में मिले अधिकारों, पर्यावरणीय सुरक्षा और ग्रामसभा की सहमति के साथ आगे बढ़ता है, तो माओवाद के बाद बस्तर वास्तव में एक नई शुरुआत कर सकता है।
लेकिन यदि बंदूक की जगह केवल बुलडोजर ले लेता है, यदि जंगल की जगह खदान और खेत की जगह परियोजनाएं ही विकास का पैमाना बन जाती हैं, तो समस्या समाप्त नहीं होगी—उसका स्वरूप बदल जाएगा। बस्तर को अब किसी नए हिड़मा की जरूरत नहीं है।
उसे जरूरत है ऐसी लोकतांत्रिक व्यवस्था की, जिसमें आदिवासी को अपने अधिकार के लिए बंदूक उठाने की जरूरत ही न पड़े। यही माओवाद के बाद बस्तर की सबसे बड़ी परीक्षा होगी।

























