पांच शिक्षकों की तैनाती, स्कूल में पहुंचे सिर्फ तीन बच्चे ;  प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था की जमीनी हकीकत

कानपुर के प्राथमिक विद्यालय लोधवा खेड़ा में डीएम के निरीक्षण और रिपोर्टर दुर्गा प्रसाद शुक्ला की तस्वीर वाली समाचार फीचर इमेज

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दुर्गा प्रसाद शुक्ला की रिपोर्ट

KANPUR उत्तर प्रदेश में सरकारी स्कूलों की शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए सरकार लगातार निगरानी और सुधार के दावे कर रही है। अधिकारियों को विद्यालयों का नियमित निरीक्षण करने और बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराने के निर्देश भी दिए जाते रहे हैं। इसके बावजूद कानपुर नगर में सामने आया एक मामला सरकारी प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था की जमीनी स्थिति पर गंभीर सवाल खड़े करता है। यहां जिलाधिकारी के औचक निरीक्षण के दौरान विद्यालय में शिक्षकों की अनुपस्थिति के साथ-साथ विद्यार्थियों की बेहद कम उपस्थिति का मामला सामने आया।

सरकार के निर्देश पर कानपुर नगर में प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था की वास्तविक स्थिति का जायजा लेने के लिए जिलाधिकारी जितेन्द्र प्रताप सिंह सोमवार को स्वयं निरीक्षण पर निकले। उन्होंने सदर तहसील क्षेत्र के प्राथमिक विद्यालय लोधवा खेड़ा का अचानक निरीक्षण किया। जिलाधिकारी के पहुंचते ही विद्यालय की व्यवस्थाओं की परतें खुलने लगीं। जांच के दौरान सामने आया कि विद्यालय में पांच शिक्षकों की तैनाती है, लेकिन निरीक्षण के समय चार शिक्षक विद्यालय में मौजूद नहीं थे।

पांच शिक्षकों की तैनाती, चार विद्यालय से बाहर

विद्यालय में कुल पांच शिक्षकों की तैनाती होने के बावजूद निरीक्षण के समय केवल एक शिक्षिका मौजूद थीं। वह भी नियमित शिक्षक नहीं बल्कि शिक्षामित्र थीं। विद्यालय में शिक्षकों की इतनी कम उपस्थिति ने जिलाधिकारी को भी गंभीर चिंता में डाल दिया।

जांच के दौरान अधिकारियों को बताया गया कि प्रभारी प्रधानाध्यापक रंजना गुप्ता और शिक्षिका क्षमा श्रीवास्तव आकस्मिक अवकाश पर थीं। वहीं शिक्षिका साफिया खातून अंसारी बीआरसी में आयोजित प्रशिक्षण कार्यक्रम में शामिल होने गई थीं। इसके अलावा शिक्षिका सबीहा हसन जैदी चिकित्सकीय अवकाश पर थीं।

अर्थात विद्यालय में तैनात अधिकांश शिक्षक किसी न किसी कारण से अनुपस्थित थे। हालांकि इन शिक्षकों के अवकाश या प्रशिक्षण से संबंधित स्थिति की जानकारी अधिकारियों के सामने रखी गई, लेकिन जिलाधिकारी ने स्पष्ट किया कि शिक्षकों की अनुपस्थिति की स्थिति में भी विद्यालय में पढ़ाई प्रभावित नहीं होनी चाहिए।

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106 बच्चों में केवल तीन की उपस्थिति

निरीक्षण के दौरान विद्यालय में विद्यार्थियों की उपस्थिति का आंकड़ा सामने आया तो स्थिति और भी चिंताजनक मिली। प्राथमिक विद्यालय में कुल 106 बच्चों का नामांकन दर्ज था, लेकिन निरीक्षण के समय केवल तीन विद्यार्थी ही विद्यालय में उपस्थित मिले।

नामांकन और वास्तविक उपस्थिति के बीच इतना बड़ा अंतर प्रशासन के लिए गंभीर विषय बन गया। जिलाधिकारी ने बच्चों की बेहद कम उपस्थिति पर नाराजगी जताई और संबंधित अधिकारियों को इस मामले की प्रभावी निगरानी करने के निर्देश दिए।

सरकारी विद्यालयों में बच्चों का नामांकन बढ़ाने के साथ-साथ उनकी नियमित उपस्थिति सुनिश्चित करना भी शिक्षा व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यदि विद्यालय के रजिस्टर में बच्चों की संख्या अधिक हो, लेकिन कक्षा में उनकी मौजूदगी बेहद कम हो, तो इससे शिक्षा की गुणवत्ता, अभिभावकों की भागीदारी और विद्यालय प्रबंधन की निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

बीईओ का वेतन रोकने के निर्देश

विद्यालय की स्थिति से नाराज जिलाधिकारी ने संबंधित खंड शिक्षा अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई करते हुए वेतन रोकने के निर्देश दिए। जिलाधिकारी ने कहा कि विद्यालय में शिक्षकों की कमी या अनुपस्थिति को पढ़ाई बाधित होने का कारण नहीं बनने दिया जा सकता।

उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि कोई शिक्षक अवकाश पर है या प्रशिक्षण के लिए बाहर गया है तो विद्यालय में वैकल्पिक व्यवस्था सुनिश्चित करना संबंधित खंड शिक्षा अधिकारी की जिम्मेदारी है। विद्यालय में बच्चों की पढ़ाई नियमित रूप से चलती रहे, इसके लिए स्थानीय स्तर पर प्रभावी निगरानी आवश्यक है।

जिलाधिकारी ने जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी से भी इस पूरे मामले में स्पष्टीकरण तलब किया है। प्रशासन की इस कार्रवाई से स्पष्ट है कि विद्यालयों में शिक्षकों की उपलब्धता और बच्चों की उपस्थिति को लेकर अब अधिकारियों की जवाबदेही तय करने पर जोर दिया जा रहा है।

बच्चों की कम उपस्थिति पर भी प्रशासन सख्त

निरीक्षण के दौरान जिलाधिकारी ने केवल शिक्षकों की अनुपस्थिति को ही मुद्दा नहीं बनाया, बल्कि विद्यालय में विद्यार्थियों की बेहद कम उपस्थिति को भी गंभीरता से लिया। उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिया कि बच्चों के विद्यालय नहीं आने के कारणों की जानकारी जुटाई जाए और नियमित उपस्थिति के लिए प्रभावी कदम उठाए जाएं।

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सरकारी प्राथमिक विद्यालयों में बड़ी संख्या में ऐसे बच्चे पढ़ते हैं जिनके परिवारों के लिए सरकारी शिक्षा महत्वपूर्ण सहारा होती है। ऐसे में बच्चों का विद्यालय से लगातार दूर रहना उनकी शैक्षिक प्रगति पर सीधा असर डाल सकता है। प्रशासन का मानना है कि बच्चों को विद्यालय तक लाना केवल नामांकन कराने तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि उन्हें नियमित रूप से कक्षा में उपस्थित कराकर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराना भी जरूरी है।

जिलाधिकारी ने संबंधित अधिकारियों से कहा कि सरकारी स्कूलों में विद्यार्थियों की उपस्थिति की लगातार निगरानी की जाए। कम उपस्थिति वाले विद्यालयों को चिह्नित कर उसके कारणों की पड़ताल की जाए और आवश्यकतानुसार विद्यालय प्रबंधन तथा अभिभावकों के साथ समन्वय स्थापित किया जाए।

मध्याह्न भोजन की व्यवस्था की भी ली जानकारी

निरीक्षण के दौरान विद्यालय में मध्याह्न भोजन की व्यवस्था के बारे में भी जानकारी ली गई। जिलाधिकारी ने स्कूल में उपलब्ध व्यवस्थाओं और बच्चों को मिलने वाली सुविधाओं की स्थिति जानी। सरकारी विद्यालयों में मध्याह्न भोजन योजना का उद्देश्य बच्चों को पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराने के साथ-साथ उन्हें विद्यालय आने के लिए प्रोत्साहित करना भी है।

ऐसे में विद्यालय में बच्चों की मात्र तीन उपस्थिति का मामला इस दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है कि योजनाओं और सुविधाओं के बावजूद विद्यार्थी नियमित रूप से विद्यालय पहुंच रहे हैं या नहीं।

निरीक्षण ने निगरानी व्यवस्था पर उठाए सवाल

कानपुर के प्राथमिक विद्यालय लोधवा खेड़ा में सामने आई स्थिति ने शिक्षा विभाग की निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल खड़े किए हैं। यदि किसी विद्यालय में पांच शिक्षकों की तैनाती के बावजूद निरीक्षण के समय चार शिक्षक मौजूद नहीं हैं और 106 नामांकित बच्चों में केवल तीन विद्यार्थी विद्यालय पहुंचे हैं, तो नियमित निरीक्षण और स्थानीय स्तर पर निगरानी की प्रभावशीलता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

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हालांकि अनुपस्थित शिक्षकों की ओर से अवकाश, प्रशिक्षण और चिकित्सकीय अवकाश से जुड़े कारण बताए गए, लेकिन प्रशासन का जोर इस बात पर है कि किसी भी परिस्थिति में बच्चों की पढ़ाई बाधित नहीं होनी चाहिए। यही कारण है कि जिलाधिकारी ने खंड शिक्षा अधिकारी की जवाबदेही तय करते हुए वेतन रोकने के निर्देश दिए और जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी से स्पष्टीकरण मांगा।

सरकारी स्कूलों में जवाबदेही जरूरी

कानपुर का यह निरीक्षण केवल एक विद्यालय की स्थिति का मामला नहीं है, बल्कि सरकारी प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था में निगरानी, शिक्षक उपलब्धता और विद्यार्थियों की नियमित उपस्थिति जैसे बुनियादी मुद्दों को सामने लाता है। सरकारी स्कूलों को मजबूत बनाने के लिए भवन, सुविधाओं और योजनाओं के साथ-साथ विद्यालय में शिक्षक और विद्यार्थी दोनों की नियमित मौजूदगी बेहद जरूरी है।

प्रशासन की ओर से की गई कार्रवाई यह संकेत देती है कि विद्यालयों में लापरवाही मिलने पर जिम्मेदार अधिकारियों से जवाब मांगा जाएगा। साथ ही बच्चों की उपस्थिति और शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर भी निगरानी बढ़ाने की जरूरत महसूस की जा रही है।

जिलाधिकारी जितेन्द्र प्रताप सिंह ने स्पष्ट किया कि सरकारी विद्यालयों में बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराना प्रशासन की प्राथमिकता है। किसी भी स्तर पर ऐसी लापरवाही स्वीकार नहीं की जाएगी, जिससे विद्यार्थियों की पढ़ाई प्रभावित हो।

कानपुर के प्राथमिक विद्यालय लोधवा खेड़ा का यह औचक निरीक्षण इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि कागजों पर दर्ज नामांकन और विद्यालय में मौजूद विद्यार्थियों की संख्या के बीच भारी अंतर सामने आया। अब देखना होगा कि प्रशासनिक कार्रवाई के बाद विद्यालय में शिक्षकों की उपलब्धता, बच्चों की नियमित उपस्थिति और पठन-पाठन की व्यवस्था में कितना सुधार आता है। फिलहाल जिलाधिकारी की कार्रवाई ने सरकारी प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था की जमीनी निगरानी को लेकर विभागीय अधिकारियों की जिम्मेदारी जरूर रेखांकित कर दी है।

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Author: यायावर

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