नयन ज्योति की रिपोर्ट
देहरादून। देवभूमि उत्तराखंड विश्वविद्यालय के विधि विभाग की ओर से 14 अगस्त को ‘विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस’ के अवसर पर विशेष गोष्ठी का आयोजन किया गया। गोष्ठी में वर्ष 1947 में हुए भारत विभाजन की त्रासदी, उसके दौरान हुई मानवीय क्षति, विस्थापन और सामाजिक पीड़ा को याद करते हुए विद्यार्थियों को इतिहास के उस दौर से सीख लेने तथा सामाजिक एकता, सद्भाव और भाईचारे को मजबूत करने का संदेश दिया गया।
कार्यक्रम में वक्ताओं ने कहा कि भारत का विभाजन केवल राजनीतिक सीमाओं के पुनर्निर्धारण की घटना नहीं थी, बल्कि यह करोड़ों लोगों के जीवन को प्रभावित करने वाली एक गहरी मानवीय त्रासदी थी। विभाजन के दौरान बड़ी संख्या में लोगों को अपने घर, जमीन, संपत्ति और अपने प्रियजनों तक को छोड़कर अनजान स्थानों की ओर पलायन करना पड़ा। इस दौरान हिंसा और नफरत ने समाज को गहरे जख्म दिए, जिनकी पीड़ा आज भी इतिहास की स्मृतियों में मौजूद है।
विभाजन की त्रासदी को समझना जरूरी
गोष्ठी को संबोधित करते हुए देवभूमि उत्तराखंड विश्वविद्यालय के विधि विभाग के संकायाध्यक्ष डॉ. अनिल कुमार दीक्षित ने कहा कि ‘विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस’ का उद्देश्य केवल अतीत की घटनाओं को याद करना नहीं, बल्कि उन परिस्थितियों से सीख लेना भी है, जिन्होंने समाज को विभाजन और हिंसा की ओर धकेला।
उन्होंने कहा कि सामाजिक असामंजस्य और विभाजन से पैदा होने वाली नफरत को समाप्त करने के लिए समाज में आपसी विश्वास, एकता और सामाजिक सद्भाव की भावना को मजबूत करना आवश्यक है। मानवता और भाईचारे को केंद्र में रखकर ही एक सशक्त समाज का निर्माण किया जा सकता है।
डॉ. दीक्षित ने कहा कि 1947 का भारत विभाजन ऐसी ऐतिहासिक त्रासदी थी, जिसमें नफरत ने भयावह रूप ले लिया था। विभाजन के परिणामस्वरूप करोड़ों लोग विस्थापित हुए और बड़ी संख्या में निर्दोष लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी। उन्होंने कहा कि विभाजन की मानवीय कीमत का एक बड़ा हिस्सा ऐसा भी है, जिसे इतिहास के आंकड़ों में पूरी तरह दर्ज कर पाना संभव नहीं है।
आजादी के साथ जुड़ी विभाजन की पीड़ा
डॉ. अनिल कुमार दीक्षित ने कहा कि 15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ, लेकिन इसी ऐतिहासिक क्षण के साथ देश के विभाजन की पीड़ा भी जुड़ी हुई थी। एक ओर देश स्वतंत्रता का उत्सव मना रहा था, वहीं दूसरी ओर लाखों परिवार अपने घरों से उजड़कर विस्थापन की पीड़ा झेल रहे थे।
उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता दिवस देश की उपलब्धियों और आजादी के संघर्ष को याद करने का अवसर है, लेकिन इसके साथ उन लोगों को याद करना भी जरूरी है, जिन्होंने विभाजन की हिंसा में अपने परिवार, घर, संपत्ति और जीवन तक खो दिए। विभाजन की स्मृति हमें यह संदेश देती है कि किसी भी समाज में नफरत और हिंसा का परिणाम अंततः आम इंसान को ही भुगतना पड़ता है।
उन्होंने विद्यार्थियों से इतिहास को केवल किताबों तक सीमित न रखने और उसके सामाजिक एवं मानवीय पक्ष को समझने का आह्वान किया। उनके अनुसार, नई पीढ़ी को यह समझना होगा कि लोकतांत्रिक समाज में असहमति के बावजूद संवाद, सहिष्णुता और परस्पर सम्मान बनाए रखना कितना महत्वपूर्ण है।
प्रेमनगर की कहानी में छिपी है विस्थापन की स्मृति
गोष्ठी के दौरान डॉ. दीक्षित ने विभाजन के बाद विस्थापित लोगों के पुनर्वास से जुड़ी स्थानीय स्मृतियों का भी उल्लेख किया। उन्होंने दिल्ली कैंट से लगे प्रेमनगर और देहरादून कैंट के समीप स्थित प्रेमनगर का संदर्भ देते हुए बताया कि इन क्षेत्रों की पहचान विभाजन के बाद आए शरणार्थी परिवारों की स्मृतियों से भी जुड़ी हुई है।
उन्होंने बताया कि विभाजन की त्रासदी के बाद विस्थापित परिवारों को सरकार की ओर से विभिन्न स्थानों पर आश्रय उपलब्ध कराया गया। सैनिकों और प्रशासन ने भी इन परिवारों को सामान्य जीवन की ओर लौटने में सहायता की। उन्होंने कहा कि विस्थापित परिवारों के संघर्ष और उनके पुनर्वास की कहानी भारत के सामाजिक इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
डॉ. दीक्षित ने कहा कि विपरीत परिस्थितियों के बावजूद इन परिवारों ने अपने जीवन को दोबारा खड़ा किया और देश के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। आज उनके परिवार समाज की मुख्यधारा का हिस्सा हैं और देश के निर्माण में अपनी भूमिका निभा रहे हैं।
स्मृति दिवस का उद्देश्य नफरत नहीं, सद्भाव का संदेश
गोष्ठी में यह भी कहा गया कि विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस को केवल दुख और पीड़ा की स्मृति के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इसका एक महत्वपूर्ण उद्देश्य वर्तमान और आने वाली पीढ़ियों को यह समझाना भी है कि समाज में नफरत, सांप्रदायिक विभाजन और हिंसा किस प्रकार गंभीर मानवीय संकट पैदा कर सकती है।
यह स्मृति दिवस वर्ष 2021 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की घोषणा के बाद मनाया जाना शुरू हुआ। इसका उद्देश्य विभाजन के दौरान पीड़ित लोगों की स्मृति को सम्मान देना और देशवासियों को उस त्रासदी से सीख लेने के लिए प्रेरित करना है।
वक्ताओं ने कहा कि इतिहास को याद करने का सबसे सार्थक तरीका यही है कि उससे वर्तमान के लिए सकारात्मक संदेश लिया जाए। यदि अतीत की त्रासदियों से समाज एकता, सहिष्णुता और मानवता का पाठ सीखता है तो स्मृतियां भविष्य को बेहतर बनाने का माध्यम बन सकती हैं।
विद्यार्थियों ने दी विभाजन पीड़ितों को श्रद्धांजलि
कार्यक्रम के अंत में विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राओं ने दो मिनट का मौन रखकर विभाजन की हिंसा में जान गंवाने वाले लोगों को श्रद्धांजलि अर्पित की। विद्यार्थियों ने उन सभी परिवारों के प्रति सम्मान व्यक्त किया, जिन्हें 1947 के विभाजन के दौरान अपने घर और अपनी जड़ों से विस्थापित होना पड़ा।
इस अवसर पर विभाजन पीड़ितों के संघर्ष और उनके साहस को नमन करते हुए यह संदेश दिया गया कि देश की वर्तमान पीढ़ी को अपने अतीत की पीड़ा को समझते हुए भविष्य में सामाजिक एकता और सद्भाव को मजबूत करने की दिशा में काम करना चाहिए।
गोष्ठी में वक्ताओं ने कहा कि भारत की विविधता उसकी सबसे बड़ी शक्ति है। विभिन्न भाषाओं, संस्कृतियों, समुदायों और परंपराओं के बावजूद देश की एकता को मजबूत बनाए रखना प्रत्येक नागरिक की जिम्मेदारी है। विभाजन की त्रासदी इसी बात की याद दिलाती है कि नफरत की राजनीति और सामाजिक विभाजन की कीमत सबसे अधिक आम नागरिक चुकाता है।
कार्यक्रम का संचालन सुश्री आकांक्षा भट्ट ने किया। गोष्ठी में छात्र-छात्राओं और विश्वविद्यालय परिवार के सदस्यों ने सहभागिता करते हुए विभाजन पीड़ितों को श्रद्धांजलि अर्पित की तथा सामाजिक सद्भाव, मानवता और राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने का संदेश दिया।

























