जम्मू-कश्मीर: सदियों का संघर्ष, सत्ता और रणनीति की पूरी कहानी

जम्मू-कश्मीर के सुंदर प्राकृतिक दृश्य के साथ लेखक केवल कृष्ण पनगोत्रा की तस्वीर, जिसमें डल झील, शिकारा और पहाड़ों की पृष्ठभूमि दिखाई दे रही है

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✍️केवल कृष्ण पनगोत्रा

भारत के उत्तरी छोर पर स्थित जम्मू-कश्मीर का इतिहास जितना गौरवशाली है, उतना ही जटिल और संघर्षपूर्ण भी रहा है। यह क्षेत्र अपनी प्राकृतिक सुंदरता के कारण “धरती का स्वर्ग” कहा जाता है, लेकिन इसके पीछे सदियों की राजनीतिक उथल-पुथल, सत्ता संघर्ष और रणनीतिक महत्व छिपा हुआ है। प्राचीन मान्यताओं के अनुसार महर्षि कश्यप ने इस क्षेत्र को झील से मुक्त कर बसाया, जिससे इसका नाम कश्मीर पड़ा। सम्राट अशोक ने यहां बौद्ध धर्म का प्रचार किया, जबकि कुषाण काल में यह और अधिक फला-फूला।

कर्कोटा राजवंश से मध्यकालीन शासन तक

सातवीं शताब्दी में कर्कोटा राजवंश के संस्थापक दुर्लभवर्धन ने कश्मीर में संगठित शासन की नींव रखी। इसके बाद उत्पल, लोहार और अन्य राजवंशों का शासन रहा। 14वीं शताब्दी में शम्स-उद-दीन के साथ मुस्लिम शासन की शुरुआत हुई, जो लगभग पांच शताब्दियों तक चला। 1586 में मुगल सम्राट अकबर ने कश्मीर को अपने अधीन कर लिया, जिसके बाद यह मुगल, अफगान और सिख शासन के अधीन रहा।

सिख और डोगरा शासन का उदय

1819 में महाराजा रणजीत सिंह ने कश्मीर को सिख साम्राज्य में शामिल किया। इसके बाद प्रथम आंग्ल-सिख युद्ध (1845-46) ने क्षेत्र के इतिहास को निर्णायक मोड़ दिया। 16 मार्च 1846 की अमृतसर संधि के तहत ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने जम्मू-कश्मीर को 75 लाख नानकशाही सिक्कों में गुलाब सिंह को सौंप दिया, जिससे डोगरा राजवंश की स्थापना हुई।

डोगरा शासकों में गुलाब सिंह, रणबीर सिंह, प्रताप सिंह और हरि सिंह प्रमुख रहे। इन शासकों ने 1947 तक इस रियासत पर शासन किया।

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रणनीतिक और आर्थिक महत्व

जम्मू-कश्मीर की भौगोलिक स्थिति इसे भारत, पाकिस्तान और चीन के बीच अत्यंत महत्वपूर्ण बनाती है। सिंधु, झेलम और चिनाब जैसी नदियां यहां से बहती हैं, जो क्षेत्रीय जल आपूर्ति और कृषि के लिए अहम हैं। इसके अलावा पर्यटन, केसर उत्पादन, पश्मीना शॉल और विलो लकड़ी से बने क्रिकेट बैट इस क्षेत्र की आर्थिक पहचान हैं।

भारत विभाजन और विलय की कहानी

1947 में भारत के स्वतंत्र होने के बाद जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरि सिंह स्वतंत्र रहना चाहते थे। लेकिन पाकिस्तान समर्थित कबायली हमले के बाद परिस्थितियां बदल गईं। 26 अक्टूबर 1947 को महाराजा हरि सिंह ने ‘इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन’ पर हस्ताक्षर कर जम्मू-कश्मीर को भारत में विलय कर दिया। इसके बाद भारतीय सेना ने क्षेत्र की रक्षा की।

अनुच्छेद 370 और आधुनिक बदलाव

1947 के बाद जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा मिला और 1957 में इसका संविधान लागू हुआ। लेकिन 5 अगस्त 2019 को भारत सरकार ने अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी कर दिया और 31 अक्टूबर 2019 को इसे दो केंद्र शासित प्रदेशों—जम्मू-कश्मीर और लद्दाख—में विभाजित कर दिया गया।

क्या यह अंतिम स्थिति है?

इतिहास कभी स्थिर नहीं रहता। जम्मू-कश्मीर की वर्तमान स्थिति राजनीतिक रूप से तय हो सकती है, लेकिन इसके ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और भौगोलिक आयाम लगातार बदलते रहे हैं। गिलगित-बाल्टिस्तान जैसे क्षेत्र आज भी विवाद का विषय बने हुए हैं।

FAQ (अक्सर पूछे जाने वाले सवाल)

जम्मू-कश्मीर का सबसे पुराना राजवंश कौन सा था?

कर्कोटा राजवंश को संगठित शासन का प्रारंभिक प्रमुख राजवंश माना जाता है।

अमृतसर संधि कब हुई थी?
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16 मार्च 1846 को ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और गुलाब सिंह के बीच अमृतसर संधि हुई थी।

जम्मू-कश्मीर भारत में कब शामिल हुआ?

26 अक्टूबर 1947 को महाराजा हरि सिंह ने भारत में विलय के दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए।

अनुच्छेद 370 कब हटाया गया?

5 अगस्त 2019 को अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी किया गया।

जम्मू-कश्मीर का विभाजन कब हुआ?

31 अक्टूबर 2019 को इसे दो केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित किया गया।

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Meta Description: जम्मू-कश्मीर का इतिहास जानिए—कर्कोटा राजवंश से लेकर अनुच्छेद 370 हटने तक संघर्ष, सत्ता और रणनीतिक बदलाव की पूरी कहानी।

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