रिपोर्ट: संजय सिंह राणा
चित्रकूट का नाम आते ही मन में भगवान श्रीराम की तपोभूमि, मंदाकिनी के तट और आध्यात्मिक वातावरण की तस्वीर उभरती है। वर्षों से यह नगर श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र रहा है, लेकिन अब इसकी पहचान केवल धार्मिक पर्यटन तक सीमित नहीं रही। यहां की पारंपरिक काष्ठ कला और लकड़ी के खिलौनों ने भी देशभर में अपनी अलग छाप छोड़नी शुरू कर दी है। कभी सीमित संसाधनों और छोटे बाजार के कारण संघर्ष कर रहे स्थानीय शिल्पकार आज आत्मविश्वास के साथ अपने उत्पाद देश के विभिन्न राज्यों और विदेशी पर्यटकों तक पहुंचा रहे हैं। इस बदलाव के केंद्र में उत्तर प्रदेश सरकार की ‘एक जिला-एक उत्पाद (ODOP)’ योजना है, जिसने चित्रकूट की सदियों पुरानी काष्ठ कला को नई ऊर्जा, नया बाजार और नई पहचान प्रदान की है।
परंपरा से उद्योग तक का प्रेरक सफर
कुछ वर्ष पहले तक चित्रकूट की लकड़ी कला का कारोबार बेहद सीमित था। स्थानीय बाजार और कुछ चुनिंदा मेलों तक ही इसकी पहुंच थी। अधिकांश शिल्पकार पारिवारिक परंपरा को बचाए रखने के लिए काम कर रहे थे, लेकिन मेहनत के अनुरूप आमदनी नहीं मिलती थी। परिणामस्वरूप नई पीढ़ी इस व्यवसाय से दूरी बनाने लगी थी।
स्थिति तब बदली, जब चित्रकूट की पारंपरिक काष्ठ कला को ओडीओपी योजना में शामिल किया गया। प्रशिक्षण, आधुनिक उपकरण, वित्तीय सहायता और विपणन सुविधाओं ने इस उद्योग की तस्वीर बदल दी। आज वही कारोबार, जो कभी सालाना 20 से 25 लाख रुपये के आसपास सिमटा रहता था, पांच करोड़ रुपये से अधिक का स्वरूप ग्रहण कर चुका है। यह बदलाव केवल आंकड़ों का नहीं, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था और हजारों परिवारों की आजीविका का भी है।
लकड़ी के खिलौनों से लेकर गणेश प्रतिमाओं तक बढ़ी मांग
चित्रकूट के शिल्पकार पारंपरिक लकड़ी के खिलौनों के साथ-साथ सुंदर नक्काशीदार गणेश प्रतिमाएं, सजावटी वस्तुएं, धार्मिक स्मृति-चिह्न और घरेलू उपयोग की आकर्षक कलाकृतियां तैयार करते हैं। इन उत्पादों में स्थानीय संस्कृति, भारतीय परंपरा और हस्तशिल्प की महीन कारीगरी साफ दिखाई देती है।
राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित प्रदर्शनियों, हस्तशिल्प मेलों और धार्मिक आयोजनों में इन उत्पादों की लगातार मांग बढ़ रही है। मथुरा, मैहर, ओरछा, दिल्ली सहित अनेक प्रमुख धार्मिक और पर्यटन स्थलों पर चित्रकूट के शिल्पकार अपने स्टॉल लगाकर उत्पादों का प्रदर्शन कर रहे हैं। विदेशी पर्यटक भी इन्हें भारतीय संस्कृति की स्मृति के रूप में खरीदकर अपने देशों तक ले जा रहे हैं। इससे चित्रकूट की काष्ठ कला को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिलने लगी है।
ओडीओपी योजना बनी बदलाव की सबसे बड़ी ताकत
‘एक जिला-एक उत्पाद’ योजना का उद्देश्य प्रत्येक जिले की पारंपरिक और विशिष्ट कला अथवा उद्योग को प्रोत्साहन देना है। चित्रकूट में इस योजना के प्रभाव ने स्पष्ट कर दिया है कि यदि स्थानीय प्रतिभा को सही दिशा और संसाधन मिल जाएं तो वह वैश्विक बाजार में भी अपनी जगह बना सकती है।
योजना के अंतर्गत शिल्पकारों को आधुनिक तकनीकों का प्रशिक्षण दिया गया। उन्हें बेहतर गुणवत्ता वाले उपकरण उपलब्ध कराए गए, बैंक ऋण दिलाने में सहायता की गई और राष्ट्रीय प्रदर्शनियों में भाग लेने का अवसर मिला। इससे उत्पादों की गुणवत्ता में सुधार हुआ, डिजाइन अधिक आकर्षक बने और बाजार का दायरा लगातार बढ़ता चला गया।
करीब 100 इकाइयों में हजारों लोगों को मिला रोजगार
चित्रकूट में वर्तमान समय में लगभग 100 काष्ठ कला इकाइयां संचालित हो रही हैं। इनमें करीब 40 उद्यमियों को विभिन्न योजनाओं के तहत ऋण उपलब्ध कराया गया है। इस उद्योग से लगभग एक हजार शिल्पकार प्रत्यक्ष रूप से जुड़े हुए हैं, जबकि पांच हजार से अधिक लोगों को अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार मिल रहा है।

लकड़ी की कटाई, डिजाइनिंग, नक्काशी, रंगाई, पैकिंग, परिवहन और विपणन जैसे अनेक कार्यों से जुड़े लोगों की आय में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में स्वरोजगार को बढ़ावा मिला है और पारंपरिक हस्तशिल्प को नई पीढ़ी अपनाने के लिए प्रेरित हुई है।
जिलाधिकारी की पहल बनी नई मिसाल
चित्रकूट के जिलाधिकारी पुलकित गर्ग ने इस उद्योग को बढ़ावा देने के लिए एक सराहनीय पहल की है। उन्होंने निर्देश दिए हैं कि सरकारी कार्यक्रमों में आने वाले विशिष्ट अतिथियों का स्वागत अब केवल फूलों के गुलदस्ते से नहीं, बल्कि ओडीओपी के अंतर्गत तैयार की गई लकड़ी की गणेश प्रतिमा और अन्य स्थानीय हस्तशिल्प उत्पाद भेंट करके किया जाए।
इस निर्णय का दोहरा लाभ सामने आया है। एक ओर स्थानीय उत्पादों को स्थायी बाजार मिलने लगा है, वहीं दूसरी ओर सरकारी मंचों के माध्यम से चित्रकूट की काष्ठ कला का व्यापक प्रचार भी हो रहा है। इससे शिल्पकारों का उत्साह बढ़ा है और स्थानीय उत्पादों के प्रति लोगों का विश्वास भी मजबूत हुआ है।
सामान्य सुविधा केंद्र से खुलेगी नई संभावनाएं
काष्ठ कला उद्योग को तकनीकी रूप से और अधिक मजबूत बनाने के लिए जिले में लगभग डेढ़ करोड़ रुपये की लागत से एक सामान्य सुविधा केंद्र (सीएफसी) तैयार किया गया है। यहां आधुनिक मशीनों और तकनीकी संसाधनों की सहायता से बेहतर गुणवत्ता वाले उत्पाद तैयार किए जा सकेंगे।
इस केंद्र के संचालन से आकर्षक डिजाइन, बारीक नक्काशी और अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप उत्पादों का निर्माण आसान होगा। इससे उत्पादन क्षमता बढ़ेगी, लागत घटेगी और निर्यात की संभावनाएं भी मजबूत होंगी। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में यह सुविधा केंद्र चित्रकूट की काष्ठ कला को वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
संघर्ष से सफलता तक की कहानी
स्थानीय शिल्पकार सालू सिंह बताते हैं कि कुछ वर्ष पहले तक बाजार सीमित था और मेहनत का उचित मूल्य नहीं मिल पाता था। कई बार ऐसा लगता था कि पारंपरिक व्यवसाय को आगे बढ़ाना मुश्किल हो जाएगा। लेकिन ओडीओपी योजना से प्रशिक्षण, आधुनिक उपकरण और राष्ट्रीय प्रदर्शनियों में भागीदारी का अवसर मिलने के बाद परिस्थितियां पूरी तरह बदल गईं।
आज उनके उत्पाद देश के अनेक शहरों तक पहुंच रहे हैं। धार्मिक पर्यटन स्थलों पर लगने वाले स्टॉलों से बिक्री लगातार बढ़ रही है और विदेशी पर्यटक भी बड़ी संख्या में लकड़ी के खिलौने तथा हस्तशिल्प उत्पाद खरीद रहे हैं। उनका कहना है कि इस बदलाव ने न केवल उनकी आय बढ़ाई है, बल्कि युवा पीढ़ी का विश्वास भी इस पारंपरिक व्यवसाय में लौटाया है।
प्रशासन और उद्योग विभाग की सक्रिय भूमिका
उद्योग विभाग के अधिकारियों के अनुसार वर्ष 2018 से शुरू हुई पहल के तहत उद्यमियों को दस दिवसीय प्रशिक्षण, टूलकिट, ऋण सुविधा तथा विपणन सहयोग उपलब्ध कराया गया। बड़े शहरों में आयोजित मेलों और प्रदर्शनियों में स्टॉल लगाने की सुविधा मिलने से चित्रकूट के उत्पाद देश-विदेश के खरीदारों तक पहुंचे।

अधिकारियों का कहना है कि पहले जहां कारोबार 20 से 25 लाख रुपये के बीच सीमित था, वहीं अब यह पांच करोड़ रुपये से अधिक हो चुका है। यह वृद्धि इस बात का प्रमाण है कि योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन स्थानीय उद्योगों की दिशा और दशा दोनों बदल सकता है।
आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ता चित्रकूट
चित्रकूट की काष्ठ कला आज केवल पारंपरिक हस्तशिल्प नहीं, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था का मजबूत आधार बनती जा रही है। यह उद्योग रोजगार, स्वरोजगार, महिला सहभागिता और ग्रामीण विकास के नए अवसर पैदा कर रहा है। साथ ही यह भारतीय हस्तशिल्प की समृद्ध विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का माध्यम भी बन रहा है।
यदि भविष्य में निर्यात, ई-कॉमर्स, ब्रांडिंग और डिजाइन नवाचार पर और अधिक ध्यान दिया जाए तो चित्रकूट की काष्ठ कला देश के प्रमुख हस्तशिल्प उद्योगों में शामिल हो सकती है। इससे स्थानीय शिल्पकारों की आय में और वृद्धि होगी तथा पारंपरिक कला को स्थायी संरक्षण भी मिलेगा।
चित्रकूट की पहचान आज दो मजबूत आधारों पर खड़ी दिखाई देती है—आस्था और आत्मनिर्भरता। जहां एक ओर यह नगर करोड़ों श्रद्धालुओं की धार्मिक भावनाओं का केंद्र है, वहीं दूसरी ओर यहां की काष्ठ कला स्थानीय हुनर, सरकारी सहयोग और बाजार की नई संभावनाओं का प्रेरक उदाहरण बन चुकी है। ओडीओपी योजना ने यह साबित कर दिया है कि सही नीति, प्रभावी क्रियान्वयन और शिल्पकारों की मेहनत मिलकर किसी भी पारंपरिक उद्योग को नई ऊंचाइयों तक पहुंचा सकती है। 25 लाख रुपये से पांच करोड़ रुपये तक का यह सफर केवल कारोबार की वृद्धि नहीं, बल्कि चित्रकूट के हजारों परिवारों की बदली हुई जिंदगी की भी कहानी है।

























