अल्हड़ चेहरे के पीछे खड़ा एक शांत हिमालय ; जोगिंदर सिंह ‘कालू’
सेवा, संस्कार और एक गाँव की आत्मा से मेरा साक्षात्कार
जीवनगाथा | अनिल अनूप✍️ जनगणदूत
चौदह वर्षों की आत्मीय अनुभूति एवं प्रत्यक्ष अनुभव के आधार पर वरिष्ठ लेखक एवं संपादक अनिल अनूप ने लिखा है यह आश्रम हरियाणा के बस्ती चारा निवासी युवा गौसेवक जोगिंदर सिंह ‘कालू’ के सेवा-भाव, पारिवारिक संस्कार एवं बाबा छारिया धाम से जुड़े जीवन दर्शन को शब्द देता है।
कुछ व्यक्तित्वों को संकेत में कुछ दिन नहीं, कई साल लग जाते हैं। जोगिंदर सिंह ‘कालू’ भी मेरे लिए एक ऐसी ही शख्सियत हैं। पिछले चौदह वर्षों से मैं उसे दूर और निकट, सिद्धांतों में अध्ययन, परखता और महसूस कर रहा हूँ। उनके अस्वाभाविक स्वभाव, सेवा-भाव और मौन व्यक्तित्व ने मुझे हमेशा आकर्षित किया, लेकिन हाल ही में हरियाणा के झज्जर जिले के बस्ती छारा गांव के निवासियों का वास्तविक जीवन, उनका पारिवारिक संस्कार, गौसेवा, मूक उपदेश के प्रति करुणा और बाबा छत्रिय धाम पर उनके निस्वार्थ गुणों को करीब से देखने के बाद मुझे ही लगा कि इस युवा के बारे में लिखा जाना चाहिए। यह लेख किसी भूमिका परिचय का नहीं है, बल्कि तेरह वर्षों के अनुभव, आत्मीयता और प्रत्यक्ष भावना से उपजी एक लेखक की अभिव्यक्ति है।
कई बार जिंदगी में ऐसे लोग मिलते हैं, जहां के बारे में पहली नजर में कोई खास धारणा नहीं बनती। वे भीड़ में बने हुए हैं, साधारण कपड़े पहने हुए हैं, पिछलग्गू हैं और उनके बारे में कभी कोई दावा नहीं किया जाता है। लेकिन समय उनके अंदर साकीत उस व्यक्तित्व को धीरे-धीरे हमारे सामने खोलता है, गहराई का अनुमान पहली मुलाक़ात में डूबना अप्रभावी होता है। ऐसे लोग संयुक्त के लिए नहीं जीते, बल्कि अपने संस्कारों के आधार पर जीवन को स्वीकार करते हैं। उनका उजाला किसी मंच की रोशनी से नहीं, बल्कि परिवार और परिवेश से है।
जोगिंदर सिंह, जिसे पूरा गांव प्यार से ‘कालू’ कहकर बुलाता है, मेरे लिए ऐसा ही एक युवक है।
आज उसकी उम्र 37 साल है, लेकिन मेरा परिचय टैब का है, जब वह किशोर भी नहीं था। समय कैसे बीत गया, इसका पता तब चला जब मैंने पीछे मुड़कर देखा कि चौदह साल की एक लंबी अवधि में हमारे बीच बिना किसी अभिनय के उलझा हुआ है। इस पूरे समय में वह लगातार संपर्क में रहा। कभी किसी सामाजिक विषय पर सलाह लेने के लिए हालचाल लैपटॉप पर फोन करें, तो कभी केवल यह देखने के लिए कि “भाई साहब, आप कैसे हैं?” उनके इन छोटे-छोटे फोन कभी भी आकर्षक नहीं लगते। उनका अपनापन, आर्द्रीकरण और एक ऐसा सम्मान था जो आज की पीढ़ी में धीरे-धीरे दुर्लभ होता जा रहा है।
सच कहूं तो उसे मेरी प्रशंसा कम और दांत ज्यादा मिली है। मेरा स्वभाव ही कुछ ऐसा है। जिन लोगों से आत्मीयता होती है, उनकी अपेक्षाएँ और भी अधिक होती हैं। कभी किसी ने उसे फ्रैंक टोक दिया, कभी किसी डिसीजन पर डेट-लापेट के बारे में और कभी बिना किसी लाग-लपेट के उसे कठोर शब्द भी कहा। मुझे कई बार लगा कि शायद आज के बाद यह बॉय माय डिस्टेंस बना हुआ है। लेकिन हर बार उनकी प्रतिक्रिया एक जैसी रही। वह शांत हो गया। न प्रतिवाद, न सफाई और न ही कोई शिकायत। उस समय मुझे उसका मौन केवल आर्द्र ही लगता था, लेकिन आज सामने आया है कि वह मौन अपने व्यक्तित्व का सबसे मजबूत पक्ष है। वह जानता है। शायद इसी वजह से वह अपनी उम्र से कहीं ज्यादा विदेशी दिखती हैं।
पहली दृष्टि में जोगिंदर लिटिल अल्हड़-सा लगता है। उनका चेहरा एक ग्रामीण ग्रामीण की सहजता है। बातचीत में आर्द्र है। किसी प्रकार का दृढ़ विश्वास नहीं, किसी प्रकार का दिखावा नहीं। लेकिन उसके साथ कुछ समय बिताया, फिर महसूस हुआ कि यह युवा हर बात को बहुत गहराई से पीछे छोड़ देता है। वह बोलता कम है, लेकिन सामने वाले की हर बात ध्यान से सुनता है। यही गुण उसे भीड़ से अलग करता है।
आज का समय युवाओं के लिए आसान नहीं है। मोबाइल की चमक, सोशल मीडिया की दुनिया और रात-रात की मशहूर होने वाली होड ने अपने अंदर का साहस कम कर दिया है। अधिकांश युवा स्वयं को गोद में लिए हुए हैं, स्वयं को बनाया नहीं है। ऐसे समय में जब मैं जोगिंदर को देखता हूं तो ऐसा लगता है कि भारतीय गांवों की मिट्टी अभी पूरी तरह से बंजर नहीं हुई है। वहां अब भी ऐसे उपाय उग रहे हैं जो मूलाधार संस्कारों में ढाँसी हुए हैं।
यही सोच शायद मुझे एक दिन हरियाणा की ओर ले जाया गया।
मैंने तय कर लिया कि इस युवक को केवल सामासांठगांठ पर फोन नहीं करना है। उसके जीवन को चिह्नित किया गया है तो उसकी मिट्टी तक पहुंचना होगा। उसके गाँव को देखना होगा। उस वातावरण को महसूस करना होगा, जहां उसकी पहचान हुई है।
इसी भावना के साथ मैं हरियाणा के झज्जर जिले के बस्ती छारा गांव की ओर चला गया।
हरियाणा मेरे लिए नया प्रदेश नहीं था, लेकिन इस बार की यात्रा का उद्देश्य अलग था। मैं किसी कार्यक्रम में नहीं जा रहा था, न किसी समाचार के लिए निकल पड़ा था। इस बार मैंने एक ऐसे ही युवा की तलाश की थी, जिसे मैंने वर्षों तक देखा, लेकिन शायद अभी तक पूरी तरह से समझ नहीं आया।
गांव की सीमा में प्रवेश करते ही हरियाणा की साक्षात् साक्षातता सामने आ गई। चौड़ी गलियाँ, खुली आँगनें, खाटों पर बैठे बुज़ुर्ग, पंखों से किसान और दूर तक की तस्वीरें, हुई मिट्टी की खेती, जो शहरों में लाख कोशिश करने पर भी नहीं। हवा में एक अलग ही आत्मीयता थी। ऐसा लगता है जैसे गांव में अभी भी अपने पुराने संस्कारों को बचाया गया है।
मैं अभी मुख्य गली में ही पहुँचा था कि एक बुज़ुर्ग ने मुस्कुराते हुए पूछा, “के भाई, किसे ढूंढे सै?”
मैंने भी मुस्कुराकर उत्तर दिया, “जोगिंदर सिंह से मिलना है।”
उन्होंने तुरंत कहा, “अरे… कालू की बात करै सै? वो तो सब जाणैं सैं। सीधा छोरा सै। सेवा-पाणी का बड़ा शौकीन सै।”
मैंने उत्सुकता से पूछा, “आप जानते हैं उसे?”
वे हल्के से हँसे और बोले, “जानैं? अरे भाई, यो गाँव छोटा सै। यहाँ कौन किसनै ना जाणै। कालू तै बचपन तै ऐसा सै। काम कह दे, फेर पीछे ना हटै। अर बाबा छारिया धाम का रास्ता पूछे बिना मत जइयो। उड़े जाके समझ आवैगा कि छोरा क्यूँ अलग सै।”
उनके शब्दों में कोई बनावट नहीं थी। वह किसी की प्रशंसा नहीं कर रहे थे, बल्कि अपने गाँव के एक बेटे का सहज परिचय दे रहे थे। उस क्षण मुझे लगा कि किसी व्यक्ति के बारे में सबसे निष्पक्ष राय उसके गाँव के लोग ही दे सकते हैं। वहाँ न प्रचार होता है, न दिखावा। गाँव आदमी को उसके व्यवहार से पहचानता है।
मैं आगे बढ़ा तो रास्ते में एक चाय की छोटी-सी दुकान दिखाई दी। पत्रकार होने की पुरानी आदत है कि किसी भी गाँव की चाय की दुकान मेरे लिए सबसे बड़ा सूचना केंद्र होती है। मैं वहीं रुक गया। चाय बन रही थी और आसपास कुछ ग्रामीण बैठे थे। बातचीत का विषय खेती, मौसम और मंडी के भाव थे। जब मैंने जोगिंदर सिंह का नाम लिया तो एक अधेड़ किसान मुस्कुराकर बोला, “कालू की बात कर रहे हो? बढ़िया छोरा सै। अपने काम तै काम रखै सै। गौ माता की सेवा में मन लागै सै। आजकल ऐसे छोरे घणे कहाँ मिलैं सैं?”
मैंने सहजता से पूछा, “क्या वह बचपन से ऐसा ही था?”
उन्होंने कुल्हड़ हाथ में लेते हुए उत्तर दिया, “भाई, संस्कार घर तै मिलैं सैं। जिस घर की रोटी मूक जीव खावैं, उस घर का छोरा बुरा कैसे हो सके सै?”
उनका यह वाक्य मेरे मन में उतर गया।
मैंने अभी तक जोगिंदर से मुलाकात भी नहीं की थी, लेकिन उससे पहले उसके गाँव ने मुझे उसका परिचय देना शुरू कर दिया था। मुझे पहली बार लगा कि किसी व्यक्ति को समझने के लिए उसकी उपलब्धियाँ नहीं, उसके बारे में उसके गाँव वालों की राय सुननी चाहिए। यदि गाँव किसी युवक की चर्चा सम्मान से करे, तो समझ लीजिए कि उसने जीवन में कुछ ऐसा अवश्य किया है जो शब्दों से बड़ा है।
उस समय मुझे बिल्कुल भी अंदाज़ा नहीं था कि अगले कुछ घंटों में मैं केवल जोगिंदर सिंह से ही नहीं, बल्कि एक ऐसे आध्यात्मिक वातावरण से भी मिलने वाला हूँ, जो उसके व्यक्तित्व को समझने की सबसे बड़ी कुंजी बनने वाला था। गाँव के लगभग हर व्यक्ति ने एक ही नाम लिया था—बाबा छारिया धाम। अब मेरी उत्सुकता बढ़ चुकी थी। मन में एक ही प्रश्न था—आख़िर इस धाम और इस युवक के बीच ऐसा कौन-सा संबंध है, जिसकी चर्चा पूरा गाँव इतनी सहजता से कर रहा है?
यहीं से मेरी उस यात्रा का दूसरा अध्याय प्रारंभ हुआ, जिसने न केवल जोगिंदर सिंह को देखने का मेरा दृष्टिकोण बदला, बल्कि यह भी समझाया कि किसी मनुष्य का वास्तविक परिचय उसके शब्दों में नहीं, बल्कि उसकी मिट्टी, उसके संस्कार और उसकी निस्वार्थ सेवा में छिपा होता है।
बाबा छारिया धाम में एक युवक नहीं, संस्कारों का दर्शन हुआ
चाय की दुकान से उठते समय मेरे मन में एक अजीब-सी उत्सुकता थी। गाँव के जिन-जिन लोगों से बातचीत हुई, लगभग हर किसी ने एक ही बात कही—“पहले बाबा छारिया धाम देखिए, फिर कालू को समझिए।” यह मेरे लिए सामान्य बात नहीं थी। किसी युवक का परिचय उसके विद्यालय, उसके काम या उसके परिवार से पहले किसी धाम से कराया जाए, इसका अर्थ अवश्य कुछ विशेष था।
गाँव के एक बुज़ुर्ग स्वयं मुझे रास्ता दिखाने चल पड़े। चलते-चलते उन्होंने कहा, “भाई साहब, आदमी की पहचान उसके कपड़ों से मत करियो, उसके उठने-बैठने और सेवा से करियो। कालू की पहचान भी उड़े जाके होवैगी।” उनकी आवाज़ में अनुभव की दृढ़ता थी। मैं चुपचाप उनके साथ चलता रहा। गाँव की गलियों से निकलते हुए ऐसा लग रहा था कि मैं किसी समाचार की तलाश में नहीं, बल्कि एक चरित्र की जड़ों तक पहुँचने जा रहा हूँ।
कुछ ही देर बाद बाबा छारिया धाम का परिसर सामने था। प्रवेश करते ही वातावरण बदल गया। बाहर की चहल-पहल पीछे छूट गई और भीतर एक ऐसी शांति थी, जिसे शब्दों में बाँधना कठिन है। विशाल वृक्षों की छाया, मंदिर परिसर की स्वच्छता, गौशाला की सहज व्यवस्था, श्रद्धालुओं का शांत आवागमन और हर ओर फैली हुई आत्मीयता ने मन को भीतर तक छू लिया। कई धार्मिक स्थानों पर भीड़ दिखाई देती है, लेकिन यहाँ भीड़ नहीं, अपनापन दिखाई दे रहा था।
मैं अभी परिसर को देख ही रहा था कि मेरी नज़र दूर खड़े जोगिंदर सिंह पर पड़ी। वही संकोची मुस्कान, वही सहज चेहरा और वही विनम्रता, जिसे मैं वर्षों से फोन पर महसूस करता आया था। उसने मुझे देखते ही हाथ जोड़कर प्रणाम किया। उसके चेहरे पर मिलने की खुशी थी, लेकिन उसमें उत्साह का प्रदर्शन नहीं था। उसने बिल्कुल सहज स्वर में कहा, “आ गए भाई साहब… आइए।”
उसने न अपने बारे में कुछ कहा, न अपनी सेवा का कोई उल्लेख किया। वह मुझे धाम दिखाने लगा, मानो यह उसका अपना घर हो और मैं कोई अतिथि। चलते-चलते वह हर छोटे-बड़े व्यक्ति को आदर से प्रणाम करता जा रहा था। किसी बुज़ुर्ग के पैर छूना, किसी बच्चे के सिर पर हाथ फेर देना, किसी श्रद्धालु को पानी का स्थान बता देना—यह सब उसके स्वभाव का हिस्सा था। मुझे यह देखकर प्रसन्नता हुई कि उसका व्यवहार बनावटी नहीं था। वह ऐसा इसलिए नहीं कर रहा था कि मैं वहाँ उपस्थित था। यह उसके जीवन की सामान्य शैली थी।
मैंने उससे कहा, “तुम्हारे बारे में गाँव के लोग बड़ी आत्मीयता से बात करते हैं।”
वह हल्का-सा मुस्कुराया और बोला, “भाई साहब, गाँव वाले अपने हैं। वे तो सबकी तारीफ़ कर देते हैं।”
उसका यह उत्तर भी उसके स्वभाव का परिचायक था। उसने अपनी प्रशंसा को सहजता से टाल दिया। शायद विनम्रता का अर्थ यही होता है कि व्यक्ति अपने बारे में सुनकर भी स्वयं को केंद्र में न रखे।
कुछ देर बाद हम गौशाला की ओर बढ़े। वहाँ अनेक गौमाताएँ शांत भाव से चारा खा रही थीं। जोगिंदर हर एक को पहचानता था। किसी के सिर पर हाथ फेर देता, किसी के लिए चारा ठीक कर देता और किसी बीमार पशु के बारे में वहाँ मौजूद लोगों से पूछताछ करता। मैं उसे देख रहा था। उसकी हर हरकत में अपनापन था। उस समय मुझे लगा कि वह गौसेवा नहीं कर रहा, बल्कि अपने परिवार के सदस्यों के बीच खड़ा है।
मैंने सहज ही पूछा, “तुम्हें यह लगाव कैसे हुआ?”
उसने बहुत सरलता से उत्तर दिया, “भाई साहब, हमारे घर में तो जब से मेरा जन्म हुआ, तब से गौमाता हैं। हमने उन्हें कभी अलग नहीं माना। घर के बड़े जैसे रहते हैं, वैसे ही गौमाता भी रहती हैं।”
उसका उत्तर छोटा था, लेकिन उसमें पूरा जीवन-दर्शन समाया हुआ था। उसी क्षण मुझे यह भी समझ में आ गया कि संस्कार सिखाए नहीं जाते, जीए जाते हैं। जिस बच्चे की सुबह गाय की रंभाहट से होती हो, जिसके बचपन का खेल पशुओं के बीच बीता हो, उसके भीतर करुणा अपने आप जन्म लेती है।
बातों ही बातों में उसने एक और ऐसी बात बताई, जिसने मुझे भीतर तक छू लिया। उसने कहा, “हमारे घर के बाहर गली में करीब बारह कुत्ते हैं। उनका खाना भी घर से ही जाता है। अगर किसी दिन उन्हें रोटी न मिले तो लगता है जैसे घर का कोई सदस्य भूखा रह गया।”
उसकी यह बात सुनकर मैं कुछ क्षण मौन हो गया। पत्रकारिता के जीवन में मैंने पशु-प्रेम पर अनेक भाषण सुने थे, लेकिन यह पहला अवसर था जब किसी युवक ने इतनी सहजता से यह बात कही। उसने इसे उपलब्धि की तरह नहीं बताया। उसके लिए यह घर की सामान्य दिनचर्या थी। उसी क्षण मुझे लगा कि इस परिवार में धर्म केवल पूजा तक सीमित नहीं है। यहाँ धर्म रसोई से शुरू होता है और मूक प्राणियों के पेट तक पहुँचता है।
धीरे-धीरे हमारी बातचीत परिवार की ओर मुड़ गई। उसने बड़े सम्मान से अपने पिता का उल्लेख किया। “पिताजी हवासिंह किसान हैं,” उसने कहा, “उन्होंने कभी हमें बड़े उपदेश नहीं दिए, लेकिन मेहनत करना सिखा दिया।” उसके स्वर में पिता के प्रति गहरा सम्मान था। उसने अपनी माता सुशीला देवी का उल्लेख करते हुए कहा कि घर की सारी आत्मीयता उन्हीं से शुरू होती है। “माँ हमेशा कहती हैं कि घर की थाली में किसी भूखे का हिस्सा ज़रूर होना चाहिए,” उसने मुस्कुराते हुए कहा। मुझे लगा कि यही वह वाक्य है जिसने शायद इस परिवार की पूरी जीवन-शैली तय कर दी।
उसने अपने बड़े भाई जितेंद्र दलाल के बारे में भी बताया कि वे ऑटो चलाते हैं और पूरे परिवार की जिम्मेदारियों को पूरी निष्ठा से निभाते हैं। बड़ी बहन कविता का विवाह हो चुका है। भाई के एक बेटा और दो बेटियाँ हैं। जब वह अपने भतीजे और भतीजियों का ज़िक्र करता था, तो उसके चेहरे पर एक अलग ही स्नेह दिखाई देता था। उसने कहा, “वे ही तो मेरी दुनिया हैं।” इस एक वाक्य में परिवार के प्रति उसका अपनापन साफ झलक रहा था।
धाम में बैठे एक बुज़ुर्ग हमारी बातचीत सुन रहे थे। उन्होंने मुस्कुराकर मेरी ओर देखा और बोले, “भाई साहब, यो छोरा अपने घर का ही ना, पूरे गाँव का छोरा सै। आजकल के छोरे शहर भागण की सोचैं सैं, अर यो गाँव, गौशाला अर धाम छोड़कै कहीं जाण की बात भी ना करै।” मैंने उनकी ओर देखा तो लगा कि यह किसी एक व्यक्ति की राय नहीं, पूरे गाँव की भावना है।
धीरे-धीरे शाम उतरने लगी थी। धाम में आरती की तैयारी हो रही थी। घंटियों की मधुर ध्वनि वातावरण में गूँजने लगी। जोगिंदर बिना किसी विशेष भूमिका के उसी भीड़ में शामिल हो गया। न वह सबसे आगे था, न सबसे पीछे। वह वहीं था जहाँ एक सेवक होना चाहिए—भीड़ के बीच, लेकिन स्वयं को भीड़ से बड़ा समझे बिना।
मैंने उस समय मन ही मन सोचा कि शायद इसी कारण गाँव के लोग उसे केवल नाम से नहीं, अपनत्व से याद करते हैं। उसके लिए “कालू” केवल एक पुकार नहीं, बल्कि उस विश्वास का नाम है जो पूरे गाँव ने उसके व्यक्तित्व पर रखा है।
आरती समाप्त होने के बाद मैं कुछ देर वहीं सीढ़ियों पर बैठा रहा। सामने दीपक की लौ जल रही थी और मेरे भीतर अनेक विचार एक साथ उठ रहे थे। मुझे लग रहा था कि मैं अब तक जोगिंदर सिंह को केवल सुनता आया था, आज पहली बार उसे समझ रहा हूँ। उसके व्यक्तित्व का रहस्य उसके शब्दों में नहीं, बल्कि उसके परिवेश में छिपा था। बस्ती छारा केवल उसका गाँव नहीं है, बल्कि उसके संस्कारों की पहली पाठशाला है। बाबा छारिया धाम केवल एक धार्मिक स्थान नहीं, बल्कि उसकी सेवा-भावना का जीवंत विस्तार है।
उसी क्षण मेरे भीतर यह निर्णय भी जन्म ले चुका था कि इस युवक के बारे में लिखा जाना चाहिए। इसलिए नहीं कि वह कोई बड़ा पदाधिकारी है या उसने कोई असाधारण उपलब्धि प्राप्त की है, बल्कि इसलिए कि आज के समय में ऐसे युवाओं की चर्चा होना आवश्यक है, जिनकी पहचान प्रसिद्धि नहीं, बल्कि विनम्रता, सेवा और संस्कार हों। उस शाम मुझे पहली बार लगा कि मैं किसी व्यक्ति पर नहीं, बल्कि एक ऐसे परिवार, एक ऐसे गाँव और एक ऐसी संस्कृति पर लिखने जा रहा हूँ, जो बिना किसी शोर के आज भी भारतीय जीवन-मूल्यों को जीवित रखे हुए है।
एक युवक नहीं, एक परिवार के संस्कारों का जीवंत परिचय
बाबा छारिया धाम से लौटते समय सांझ पूरी तरह गाँव पर उतर चुकी थी। खेतों से लौटते किसानों के कदमों में दिनभर की थकान थी, लेकिन चेहरों पर संतोष भी था। कहीं बैलों की घंटियाँ सुनाई दे रही थीं, कहीं बच्चों की किलकारियाँ और कहीं घरों से उठती रोटियों की सोंधी महक। गाँव अपनी स्वाभाविक लय में लौट रहा था। मैं जोगिंदर के साथ धीरे-धीरे उसके घर की ओर बढ़ रहा था, लेकिन सच तो यह है कि अब मैं किसी युवक के साथ नहीं चल रहा था; मैं उस जीवन-दर्शन के साथ चल रहा था, जिसकी तलाश शायद वर्षों से मेरे भीतर कहीं चल रही थी।
पत्रकारिता ने मुझे लोगों को देखने की दृष्टि दी है। वर्षों के अनुभव ने यह सिखाया है कि किसी व्यक्ति का मूल्यांकन उसके परिचय-पत्र से नहीं, बल्कि उसके घर के वातावरण से करना चाहिए। बड़े-बड़े शब्दों से चरित्र नहीं बनते, चरित्र घर के आँगन में बनता है। जोगिंदर को समझने के बाद यह बात और अधिक स्पष्ट हो गई।
आज के समाज में सफलता की परिभाषाएँ बदल चुकी हैं। लोग पूछते हैं कि कौन-सी नौकरी करता है, कितनी आय है, कितनी पहचान है, कितने अनुयायी हैं। बहुत कम लोग यह पूछते हैं कि वह मनुष्य कैसा है। उसका व्यवहार कैसा है। उसके संस्कार कैसे हैं। वह अपने से कमजोर लोगों के साथ कैसा व्यवहार करता है। शायद इसलिए हमारे समय का सबसे बड़ा संकट यही है कि हमने उपलब्धियों को महत्व दिया और चरित्र को पीछे छोड़ दिया।
जोगिंदर सिंह से मिलकर लगा कि भारतीय समाज की सबसे बड़ी पूँजी अभी भी उसके गाँवों में सुरक्षित है। वहाँ ऐसे परिवार आज भी हैं, जो अपने बच्चों को केवल पढ़ाते नहीं, बल्कि मनुष्य बनना भी सिखाते हैं।
उसके पिता हवासिंह का चेहरा भले उस दिन मैं प्रत्यक्ष न देख सका, लेकिन उनके संस्कार पूरे घर में दिखाई दे रहे थे। एक किसान का जीवन केवल खेत जोतने तक सीमित नहीं होता। किसान प्रकृति से धैर्य सीखता है। बीज बोकर वह महीनों प्रतीक्षा करता है। उसे विश्वास होता है कि समय आने पर वही बीज फसल बनकर लौटेगा। शायद यही धैर्य उन्होंने अपने बच्चों के भीतर भी बोया। यही कारण है कि जोगिंदर के स्वभाव में कहीं भी उतावलापन दिखाई नहीं देता।
माता सुशीला देवी से भी उस दिन मुलाकात नहीं हो सकी, लेकिन यह महसूस करने के लिए उनसे मिलना आवश्यक भी नहीं था कि इस घर के संस्कारों की पहली पाठशाला वही हैं। जिस घर की रसोई से गौमाता के लिए रोटी निकलती हो, गली के मूक कुत्तों के लिए भोजन निकलता हो और अतिथि के लिए सम्मान निकलता हो, वहाँ किसी माँ ने अपने बच्चों को केवल भोजन बनाना नहीं, बल्कि जीवन जीना सिखाया है।
एक क्षण के लिए मैंने मन ही मन सोचा कि कितनी विचित्र बात है—हम अक्सर बड़े विश्वविद्यालयों की चर्चा करते हैं, लेकिन चरित्र निर्माण का सबसे बड़ा विश्वविद्यालय आज भी भारतीय परिवार ही है।
जोगिंदर ने कभी अपने परिवार का गुणगान नहीं किया। उसने केवल सहजता से इतना भर कहा कि उनके घर में उसके जन्म से ही गौमाता हैं और घर के बाहर रहने वाले लगभग बारह कुत्तों का भोजन भी उनका परिवार करता है। पहली बार सुनने पर यह एक सामान्य जानकारी लग सकती है, लेकिन यदि इस एक वाक्य को ध्यान से समझा जाए तो उसके भीतर पूरे परिवार का दर्शन छिपा है। जहाँ मूक प्राणियों के लिए भी घर का दरवाज़ा खुला हो, वहाँ मनुष्य का हृदय संकीर्ण नहीं हो सकता।
मैंने अनेक बार देखा है कि लोग धर्म पर बड़े-बड़े भाषण देते हैं। मंचों से संस्कृति की बातें करते हैं। लेकिन जब व्यवहार की बारी आती है तो वही संवेदना कहीं खो जाती है। जोगिंदर का परिवार धर्म की व्याख्या नहीं करता, धर्म को जीता है। शायद यही कारण है कि उनके घर में करुणा किसी विशेष अवसर का विषय नहीं, बल्कि रोज़मर्रा के जीवन का हिस्सा है।
उस दिन मुझे गाँव के एक बुज़ुर्ग की कही हुई बात बार-बार याद आती रही। उन्होंने मुस्कुराकर कहा था, “जिस घर की रोटी मूक जीव खावैं, उस घर का छोरा बुरा कैसे हो सके सै?” जितना मैं इस वाक्य पर विचार करता गया, उतना ही लगा कि उन्होंने पूरे लेख का सार एक ही पंक्ति में कह दिया था।
पत्रकार होने के नाते मैं अक्सर अपराध, राजनीति, संघर्ष और विवादों के बीच रहता हूँ। रोज़ ऐसी खबरें सामने आती हैं जो मनुष्य के भीतर निराशा भर देती हैं। कभी लगता है कि समाज बहुत तेजी से बदल रहा है और संवेदनाएँ पीछे छूटती जा रही हैं। लेकिन फिर ऐसे ही किसी गाँव में जोगिंदर जैसा युवक मिल जाता है और विश्वास लौट आता है कि भारतीय समाज की आत्मा अभी जीवित है।
इस यात्रा ने मुझे केवल जोगिंदर से नहीं मिलाया, बल्कि स्वयं से भी मिलाया। लौटते समय मैं लगातार सोच रहा था कि यदि मैं इस युवक से चौदह वर्ष पहले नहीं मिला होता और केवल आज उससे परिचित होता, तब शायद मैं भी उसे एक साधारण ग्रामीण युवक मानकर आगे बढ़ जाता। लेकिन चौदह वर्षों का परिचय और इस यात्रा की प्रत्यक्ष अनुभूति ने यह समझा दिया कि मनुष्य को समझने के लिए समय देना पड़ता है।
लेखन केवल शब्दों का संयोजन नहीं है। लेखक का सबसे बड़ा दायित्व उन लोगों को शब्द देना है, जो स्वयं कभी अपने बारे में नहीं लिखते। समाज में ऐसे हजारों लोग हैं जो चुपचाप अपना जीवन समाज और संस्कारों के लिए समर्पित कर देते हैं, लेकिन उनके हिस्से में न मंच आता है, न पुरस्कार और न ही सुर्खियाँ। यदि लेखक भी उनके बारे में न लिखे, तो इतिहास केवल शोर मचाने वालों का होकर रह जाएगा।
मेरा यह दावा नहीं है कि जोगिंदर सिंह किसी संत की तरह निष्कलंक हैं। वह भी हमारी तरह एक साधारण इंसान है। वह भी भूल सकता है, वह भी जीवन से सीख रहा है। लेकिन उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उनके अंदर की शिक्षा की विरासत है, बड़ों के प्रति सम्मान है और सेवा के प्रति निष्ठा है। यही गुण किसी भी युवा को चौंका देते हैं।
आज भी मुझे उसका आर्द्री चेहरा याद आ गया, जब उसने मेरी डाँट को चिप्स खाते हुए सुना था। उस समय शायद मैं केवल उसकी शैलियाँ दृष्टिगोचर था। आज समझ में आता है कि उसने अपनी गरीबी नहीं, उसका संस्कार किया था। हर उत्तर शब्द से नहीं दिया जाता। कुछ उत्तर जीवन देता है, और जोगिंदर ने अपने जीवन से यह उत्तर दिया है कि अभिलेख कभी पराजय नहीं होता, बल्कि चरित्र की सबसे बड़ी शक्ति होती है।
जब मैं बस्ती चारा से वापस आ रहा था, तब धीरे-धीरे-धीरे-धीरे मेरी आँखों से ओझल हो रहा था। लेकिन सच तो यह है कि उसने गांव में बस भुगतान किया था। बाबा छारिया धाम की शांति, गांव के लोगों का अपनापन, हरियाणवी बोली की मिठास, साओक की सुगंध और जोगिंदर का सहज व्यक्तित्व- ये सब मेरे साथ लौट रहे थे।
उस यात्रा के बाद मैंने आपसे एक प्रश्न पूछा-क्या वास्तव में मैंने जोगिंदर सिंह का लेख लिखा है?
बहुत देर तक विचार के बाद उत्तर मिला—नहीं।
मैंने एक ऐसे परिवार पर लिखा है जिसने अपने बच्चों का संस्कार नीचे दिया है। मैंने एक ऐसे गांव पर लिखा है जिसने अपने बेटे की सेवा का रास्ता दिखाया। मैंने एक ऐसे धाम पर लिखा है जो मनुष्य को अधिक दान का महत्व सिखाता है। और मैंने उस भारतीय संस्कृति पर लिखा है, जो आज भी गांवों की मिट्टी में सांस ले रही है।
जोगिंदर सिंह ‘कालू’ इस लेख के नायक हैं, लेकिन अकेले नहीं हैं। उनके पीछे उनके माता-पिता, उनके परिवार, उनके गांव, बाबा छारिया धाम और वे सभी लोग इस कहानी के मौन पात्र हैं, जिनमें से एक साधारण व्यक्ति के भीतर सामान्य संस्कारों का निर्माण किया गया है।
मैं इस लेख का समापन किसी निष्कर्ष से नहीं, बल्कि एक विश्वास के साथ करना चाहता हूं। जिस देश के गाँवों में आज भी ऐसे युवा हैं, जहाँ परिवार अपने हिस्सों की रोटी मूक मके के लिए बचाकर रखता है, जहाँ सेवा नहीं बल्कि स्वभाव है, जहाँ शीलहीनता नहीं बल्कि चरित्र का आभूषण है, उस देश की आत्मा कभी पराजित नहीं हो सकती।
ईश्वर से मेरी एक ही प्रार्थना है कि जोगिंदर सिंह ‘कालू’ अपने जीवन की इसी सादगी, इसी तत्व और इसी सेवा-पथ पर निरंतर आगे बढ़ते रहें। क्योंकि समाज को केवल समाज की आवश्यकता नहीं है, समाज को केवल उनके परिवार की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि आने वाली पीढ़ियां यह विश्वास कर सकती हैं कि मनुष्यता अभी भी जीवित है, संस्कार अभी भी जीवित हैं और भारत की मिट्टी आज भी ऐसे चरित्र गढ़ रही है, जिन पर केवल उनका परिवार नहीं है, पूरा गौरव समाज कर सकता है।










बाबूजी, हम पढ़े-लिखे कम हैं, पर मन की बात समझ गए…
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हम गाँव के किसान लोग हैं। ज़्यादा पढ़ाई-लिखाई नहीं किए, लेकिन ज़िंदगी ने बहुत कुछ सिखा दिया है।
दिन भर खेत में पसीना बहाने के बाद जब रात को “गीतों की साहित्यिक यात्रा” की तीसरी कड़ी पढ़ी,
तो लगा जैसे कोई अपना आदमी चौपाल पर बैठकर मन की गाँठ खोल रहा हो।
फिल्म दोस्ती का यह गीत तो बचपन से सुनत आए हैं,
लेकिन इसके भीतर इतना बड़ा जीवन का सच छिपा है, यह पहली बार समझ में आया।
अनूप बाबू, आपने तो गीत का मतलब ही बदल डाला।
अब जब यह गीत सुनेंगे, तो सिर्फ़ कान से नहीं, दिल से सुनेंगे।
🌾 हमरे बुजुर्ग कहत रहेन—
“दुख आदमी को तोड़त नहीं, गढ़त है।”
आपकी लेखनी पढ़कर वही बात फिर याद आ गई। खेत में सूखा पड़ जाए,
फसल बरबाद हो जाए, कर्जा चढ़ जाए, तब भी किसान अगले मौसम की आस नहीं छोड़ता।
आपके लेख में भी वही हिम्मत दिखाई दी।
हम जैसे गाँव के सीधे-सादे लोग बड़ी-बड़ी किताबें नहीं पढ़ पाते,
लेकिन आपकी यह लिखाई समझ में भी आई और सीधे मन में उतर गई।
यही सबसे बड़ी बात है।
🌼 ई “गीतों की साहित्यिक यात्रा” सिर्फ़ गीतन की कहानी नाहीं है,
ई त हम सबके जीवन की कहानी है।
भगवान से यही दुआ है कि अनूप बाबू ऐसे ही लिखत रहैं अउर
अंजनी कुमार त्रिपाठी जी ऐसे ही हम जइसन गाँव-देहात के लोगन तक
ई अनमोल लिखाई पहुँचावत रहैं।
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🚜 एक ग्रामीण किसान
“मैं ज्यादा पढ़ी-लिखी तो ना सूँ, पर आदमी की पहचान करणी जरूर आवै सै। अनिल अनूप जी का यो लेख पढ़के मन भर आया। आजकल जमाना ऐसा हो गया सै कि अच्छे काम करण वाले छोरे भी दुनिया की नजर तै ओझल रह जावैं सैं। ऐसे में लेखक नै जोगिंदर सिंह ‘कालू’ जैसे संस्कारी छोरे नै सबके सामने ल्याकर बहुत नेक काम कर्या सै। इस खातर वे सचमुच बधाई के हकदार सैं।
कालू बेटा जोगिंदर के बारे में पढ़के लाग्या कि आज भी धरती पर ऐसे छोरे बचे सैं, जिणकै मन में गौ माता की सेवा, बड़ों का आदर अर मूक जीवां खातर दया जिंदा सै। ऐसे संस्कार पैसे तै ना आवैं, ये तो माँ-बाप की परवरिश अर घर के माहौल तै मिलैं सैं। भगवान इस छोरे नै लंबी उमर दे अर इसकी सेवा में कभी कमी ना आवण दे। ऐसे बच्चे पूरे समाज की शान हों सैं। लेखक जी नै भी राम-राम, जो ऐसे हीरे नै दुनिया के सामने ल्याया।”
जोगिंदर सिंह ‘कालू’ का उत्तर
आदरणीय इंदु बहन जी, सादर प्रणाम।
आपने मेरे बारे में जो स्नेह और आशीर्वाद से भरे शब्द लिखे, उन्हें पढ़कर मैं सचमुच भावुक हो गया। मैं अपने आपको इस सम्मान के योग्य नहीं मानता। मैं तो एक साधारण किसान परिवार का बेटा हूँ। जो कुछ भी मेरे जीवन में अच्छा है, वह मेरे माता-पिता के संस्कार, परिवार के आशीर्वाद, बाबा छारिया धाम की कृपा और गाँव के बड़ों के मार्गदर्शन का परिणाम है।
गौसेवा हो, मूक प्राणियों की सेवा हो या बड़ों का सम्मान—मैंने इसे कभी कोई उपलब्धि नहीं माना। यह तो हमारे घर की परंपरा है, जिसे निभाने का छोटा-सा प्रयास करता हूँ। आपकी जैसी बहनों और समाज के सम्मानित लोगों का स्नेह मेरे लिए किसी पुरस्कार से कम नहीं है।
मैं विशेष रूप से आदरणीय अनिल अनूप जी का भी हृदय से आभारी हूँ। उन्होंने मेरे जैसे एक साधारण ग्रामीण युवक में जो विश्वास व्यक्त किया है, वह मेरे लिए बहुत बड़ी जिम्मेदारी है। मैं ईश्वर से यही प्रार्थना करता हूँ कि मुझे इतना सामर्थ्य दे कि मैं उनके विश्वास और आप सबके स्नेह पर हमेशा खरा उतर सकूँ।
आपका यह आशीर्वाद मेरे लिए प्रेरणा है। ईश्वर से प्रार्थना है कि आप स्वस्थ रहें, सुखी रहें और आपका स्नेह सदैव बना रहे।
सादर प्रणाम।
— आपका छोटा भाई
जोगिंदर सिंह ‘कालू’