शख्शियत

संघर्ष ने गढ़ी सोच, शिक्षा ने दिलाया सम्मान ; लेखनी ने जगाई चेतना, यही है केवल कृष्ण पनगोत्रा की पहचान

केवल कृष्ण पनगोत्रा ; किसान पुत्र से ‘भारत गौरवरत्न’ तक

अनिल अनूप की प्रस्तुति

भारत की लोकतांत्रिक और बौद्धिक परंपरा की सबसे बड़ी विशेषता यह रही है कि यहां विचारों की ऊंचाई किसी वंश, वैभव या सत्ता की मोहताज नहीं रही। इस देश में खेतों की मेड़ पर चलने वाला किसान पुत्र भी अपने ज्ञान, कर्म और चिंतन के बल पर ऐसी पहचान बना सकता है, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बन जाए। जम्मू-कश्मीर के प्रतिष्ठित लेखक, चिंतक और शिक्षक केवल कृष्ण पनगोत्रा ऐसे ही व्यक्तित्व हैं, जिनका जीवन संघर्ष, शिक्षा, सामाजिक चेतना और वैचारिक प्रतिबद्धता की एक प्रेरक गाथा है।

एक मध्यमवर्गीय किसान परिवार में जन्मे केवल कृष्ण पनगोत्रा ने कभी यह नहीं सोचा होगा कि एक दिन उनकी पहचान केवल एक शिक्षक या लेखक तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि उन्हें देश और समाज के विभिन्न मंचों पर सम्मानित किया जाएगा। लेकिन यह भी सत्य है कि जिन लोगों के भीतर सीखने की भूख और समाज को समझने की बेचैनी होती है, वे अपने लिए अलग रास्ते स्वयं बना लेते हैं।

ग्रामीण परिवेश में पले-बढ़े पनगोत्रा ने जीवन की कठिनाइयों को बहुत निकट से देखा। सीमित संसाधनों, जटिल शिक्षा व्यवस्था और सामाजिक चुनौतियों के बीच उन्होंने अपनी शिक्षा जारी रखी। यही संघर्ष आगे चलकर उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी पूंजी बना। उन्होंने जम्मू-कश्मीर विश्वविद्यालय से एम.ए. की उपाधि प्राप्त की और शिक्षा के क्षेत्र में अपना योगदान देना प्रारंभ किया।

शिक्षक के रूप में उनका सफर केवल रोजगार का माध्यम नहीं था, बल्कि समाज निर्माण का एक मिशन था। उन्होंने विद्यार्थियों को केवल पाठ्यक्रम की जानकारी नहीं दी, बल्कि उन्हें जीवन के मूल्यों, सामाजिक उत्तरदायित्व और सकारात्मक सोच का महत्व भी समझाया। यही कारण है कि वे अपने विद्यार्थियों के बीच एक शिक्षक से अधिक मार्गदर्शक के रूप में प्रतिष्ठित हुए।

समय के साथ उनका अध्ययन और सामाजिक सरोकार उन्हें लेखन की दुनिया में ले आया। वर्ष 2000 से उन्होंने स्वतंत्र लेखन की शुरुआत की और धीरे-धीरे उनकी पहचान एक गंभीर लेखक और विचारक के रूप में स्थापित होने लगी। उनके लेखों में समाज की नब्ज को समझने की क्षमता दिखाई देती है। वे केवल घटनाओं का वर्णन नहीं करते, बल्कि उनके पीछे छिपे सामाजिक, सांस्कृतिक और मानवीय पक्षों को भी सामने लाते हैं।

उनकी लेखनी में संवेदनशीलता और वैचारिक दृढ़ता का सुंदर संतुलन दिखाई देता है। यही कारण है कि पाठक उनके लेखों को केवल पढ़ते नहीं, बल्कि उन पर विचार भी करते हैं। एक लेखक के रूप में उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे जटिल विषयों को भी सरल और प्रभावी भाषा में प्रस्तुत करने की क्षमता रखते हैं।

चौदह वर्षों की निकटता में देखा एक असाधारण इंसान

पत्रकारिता और लेखन के क्षेत्र में मेरा अनेक साहित्यकारों, लेखकों और चिंतकों से परिचय रहा है, लेकिन केवल कृष्ण पनगोत्रा उन चुनिंदा व्यक्तित्वों में हैं जिनके साथ लंबे समय तक संवाद करने के बाद भी उनके प्रति सम्मान लगातार बढ़ता ही गया। पिछले लगभग चौदह वर्षों से मुझे उन्हें निकट से देखने, सुनने और समझने का अवसर मिला है।

आज के दौर में जब थोड़ी-सी उपलब्धि भी लोगों के व्यवहार में परिवर्तन ला देती है, तब पनगोत्रा जी का व्यक्तित्व अपनी विनम्रता के कारण अलग पहचान रखता है। वे जितने बड़े विचारक हैं, उससे कहीं अधिक बड़े इंसान हैं। उनके भीतर अदब, तहजीब और इंसानियत का जो सुंदर संगम दिखाई देता है, वह आज दुर्लभ होता जा रहा है।

उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे हर परिस्थिति में स्थिर भाव बनाए रखते हैं। मैंने उन्हें कभी उत्तेजित होते नहीं देखा। किसी विषय पर उनकी असहमति हो सकती है, लेकिन उनके शब्दों में कटुता नहीं होती। वे सुनते अधिक हैं और बोलते कम। शायद यही कारण है कि उनके विचारों में गहराई और शब्दों में गंभीरता दिखाई देती है।

जब भी उन्हें फोन कीजिए, अक्सर दूसरी ओर से एक मुस्कुराती हुई आवाज सुनाई देती है। ऐसा लगता है जैसे जीवन की सारी व्यस्तताओं और संघर्षों के बीच उन्होंने मुस्कुराना नहीं छोड़ा। यह मुस्कान केवल औपचारिक नहीं होती, बल्कि उसमें आत्मीयता और अपनापन झलकता है। बातचीत शुरू होते ही सामने वाला सहज महसूस करने लगता है।

कश्मीरी संस्कृति की नजाकत और शिष्टता उनके व्यवहार में स्वाभाविक रूप से दिखाई देती है। उनके बोलने का अंदाज बेहद सलीकेदार है। वे हर व्यक्ति को सम्मान देते हैं, चाहे वह किसी भी आयु, पद या सामाजिक स्तर का क्यों न हो। बातचीत के दौरान उनके शब्दों में जो मिठास और संतुलन दिखाई देता है, वह उनके संस्कारित व्यक्तित्व का परिचायक है।

पनगोत्रा जी मूलतः हमदर्द इंसान हैं। दूसरों के सुख-दुख को महसूस करना और मानवीय संवेदनाओं को समझना उनके स्वभाव का हिस्सा है। यही संवेदनशीलता उनकी लेखनी में भी दिखाई देती है। वे समाज को केवल घटनाओं के माध्यम से नहीं देखते, बल्कि मनुष्य की पीड़ा, संघर्ष और आशाओं के माध्यम से समझते हैं।

जीवन में उनके अपने संघर्ष भी रहे हैं। कुछ ऐसे दर्द भी हैं जिन्हें उन्होंने बहुत निकट से जिया है। लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि उन्होंने कभी अपने निजी दुखों को अपने व्यक्तित्व पर हावी नहीं होने दिया। मैंने उन्हें हमेशा सकारात्मकता के साथ जीवन को स्वीकार करते देखा है। शायद यही कारण है कि उनके आसपास रहने वाले लोगों को उनके भीतर छिपे संघर्षों का एहसास भी नहीं हो पाता।

उनकी एक और विशेषता जिसने मुझे हमेशा प्रभावित किया, वह है अहंकार का पूर्ण अभाव। सम्मान, पुरस्कार और उपलब्धियां मिलने के बावजूद उनके भीतर कभी आत्ममुग्धता नहीं आई। वे आज भी उसी सरलता और आत्मीयता से मिलते हैं जैसे वर्षों पहले मिला करते थे। उनके व्यवहार में न दिखावा है, न कृत्रिमता और न ही किसी प्रकार का बड़प्पन प्रदर्शित करने की कोशिश।

मेरे लिए केवल कृष्ण पनगोत्रा केवल एक लेखक या विचारक नहीं हैं, बल्कि उन विरले व्यक्तित्वों में से एक हैं जो यह विश्वास दिलाते हैं कि ज्ञान और विनम्रता साथ-साथ चल सकते हैं। उनकी लेखनी जितनी प्रभावशाली है, उनका व्यक्तित्व उससे कहीं अधिक प्रेरक है।

सम्मान और उपलब्धियों की स्वर्णिम यात्रा

केवल कृष्ण पनगोत्रा का साहित्यिक और सामाजिक अवदान समय-समय पर विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित किया गया है। वर्ष 2014 में उन्हें पंडित प्रेम नाथ भट्ट मेमोरियल ट्रस्ट द्वारा प्रतिष्ठित Amateur Journalist Award से सम्मानित किया गया। यह सम्मान उनके स्वतंत्र लेखन, सामाजिक चेतना और वैचारिक प्रतिबद्धता का प्रमाण है।

इसके अतिरिक्त अंतर्राष्ट्रीय सम्मानोपाधि महाविद्यालय द्वारा उन्हें मानद उपाधि प्रदान की गई। वहीं अंतर्राष्ट्रीय पराविद्या शोध संस्थान द्वारा उन्हें भारत गौरवरत्न की मानद उपाधि से अलंकृत किया गया। यह सम्मान उनके बौद्धिक योगदान और समाज के प्रति समर्पण की राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृति है।

युवाओं के लिए एक जीवंत संदेश

आज का समय त्वरित सफलता और तात्कालिक प्रसिद्धि का समय माना जाता है। ऐसे दौर में केवल कृष्ण पनगोत्रा का जीवन युवाओं को यह सिखाता है कि वास्तविक सफलता धैर्य, निरंतर अध्ययन, विनम्रता और सामाजिक सरोकारों से प्राप्त होती है।

उनकी यात्रा बताती है कि संसाधनों की कमी कभी भी सपनों की दुश्मन नहीं होती। एक किसान परिवार का युवक भी अपने परिश्रम, शिक्षा और चिंतन के बल पर राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान प्राप्त कर सकता है। यह कहानी केवल उनकी नहीं, बल्कि उन लाखों युवाओं की संभावना का प्रतीक है जो संघर्षों के बीच अपने भविष्य को आकार देने का प्रयास कर रहे हैं।

केवल कृष्ण पनगोत्रा का जीवन हमें यह सिखाता है कि व्यक्ति की असली पहचान उसके पद, पुरस्कार या प्रसिद्धि से नहीं, बल्कि उसके चरित्र, विचार और व्यवहार से बनती है। किसान परिवार की साधारण पृष्ठभूमि से निकलकर शिक्षक, लेखक, विचारक और ‘भारत गौरवरत्न’ तक की उनकी यात्रा वास्तव में प्रेरणा, संघर्ष और मानवीय मूल्यों की एक अनूठी कहानी है।

पिछले चौदह वर्षों में मैंने उन्हें जितना जाना है, उतना ही यह विश्वास मजबूत हुआ है कि बड़े लोग अपनी उपलब्धियों से नहीं, बल्कि अपनी सरलता और इंसानियत से बड़े बनते हैं। केवल कृष्ण पनगोत्रा उन्हीं विरले व्यक्तित्वों में से एक हैं जिनकी लेखनी समाज को दिशा देती है और जिनका व्यक्तित्व स्वयं एक पाठशाला है।

आज जब समाज को संवेदनशील विचारकों, विनम्र बुद्धिजीवियों और सकारात्मक सोच वाले नागरिकों की आवश्यकता है, तब केवल कृष्ण पनगोत्रा जैसे व्यक्तित्व हमारे समय की एक महत्वपूर्ण आवश्यकता और प्रेरणा दोनों हैं। उनका जीवन आने वाली पीढ़ियों को यह संदेश देता रहेगा कि संघर्ष चाहे कितना भी कठिन क्यों न हो, यदि मन में सीखने की जिज्ञासा, समाज के प्रति समर्पण और इंसानियत के प्रति सम्मान बना रहे, तो सफलता स्वयं रास्ता तलाश लेती है। –आलेख और प्रस्तुति : अनिल अनूप

केवल कृष्ण पनगोत्रा: क्लिकेबल सवाल-जवाब

केवल कृष्ण पनगोत्रा कौन हैं?

केवल कृष्ण पनगोत्रा जम्मू-कश्मीर के लेखक, शिक्षक, विचारक और स्वतंत्र लेखन से जुड़े जागरूक व्यक्तित्व हैं। उनका जीवन संघर्ष, शिक्षा और सामाजिक चेतना की प्रेरक कहानी है।

उनकी जीवन यात्रा प्रेरणादायी क्यों मानी जाती है?

मध्यमवर्गीय किसान परिवार से निकलकर जटिल शिक्षा व्यवस्था से संघर्ष करते हुए उन्होंने शिक्षक, लेखक और विचारक के रूप में पहचान बनाई। यही सफर युवाओं के लिए प्रेरणा है।

केवल कृष्ण पनगोत्रा को कौन-कौन से सम्मान मिले हैं?

उन्हें 2014 में पंडित प्रेम नाथ भट्ट मेमोरियल ट्रस्ट द्वारा Amateur Journalist Award से सम्मानित किया गया। इसके अलावा अंतर्राष्ट्रीय सम्मानोपाधि महाविद्यालय की मानद उपाधि और ‘भारत गौरवरत्न’ की मानद उपाधि से भी अलंकृत किया गया।

उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषता क्या है?

वे बेहद बा-अदब, गंभीर सोच वाले, स्थिर भाव के और हमदर्द इंसान हैं। बातचीत में अहंकार नहीं, बल्कि अदब, लिहाज और कश्मीरी नजाकत साफ दिखाई देती है।

अनिल अनूप ने उनके बारे में क्या अनुभव साझा किया है?

अनिल अनूप के अनुसार, पिछले लगभग 14 वर्षों की लेखकीय निकटता में पनगोत्रा जी हमेशा विनम्र, आत्मीय और सहज दिखे। फोन करते ही मुस्कुराकर बात करना और अपने निजी दुखों को कभी महसूस न होने देना उनके व्यक्तित्व की खास पहचान है।

युवाओं को उनके जीवन से क्या सीख मिलती है?

उनकी जीवन यात्रा सिखाती है कि संसाधनों की कमी सफलता को रोक नहीं सकती। शिक्षा, धैर्य, विनम्रता और लेखन के माध्यम से समाज में सम्मानजनक पहचान बनाई जा सकती है।

2 Comments

  1. केवल कृष्ण पन्गोत्रा स्वतंत्र लेखक-पत्रकार जम्मू-कश्मीर says:

    लोग साहिब सुन कर खुश होते हैं!
    जहां साहिब कहने से डर लगता है!!
    (केवल कृष्ण पनगोत्रा

    इन्सानी फितरत कुछ ऐसी है कि वह जितना ज्यादा सोचता है उतना ही व्याकुल भी हो सकता है। फिर वो सोच चाहे उदासी की हो या फिर उल्लास की। उदासी की व्याकुलता समझ आती है लेकिन उल्लास की व्याकुलता को शब्द नहीं दिए जा सकते। यह असमंजस की एक ऐसी मनोदशा है जहां किसी नेक और दिलदार रूह के मालिक की कृतज्ञता या अनापेक्षित खुशी को बयां करना मुश्किल हो जाता है। ऐसी मनोस्थिति को बयां करने के लिए और दुनियादारी निभाने के लिए धन्यवाद स्वरूप कह दिया जाता है- किन शब्दों में शुक्रिया अदा करें।
    लेकिन जब कृतज्ञता का लेवल दुनियादारी की सीमाओं से परे हो तो..?
    अंग्रेजी का एक शब्द है प्रोटोकॉल। यह एक सरकारी और प्रशासनिक स्थिति है जहां किसी के कुछ करने-कहने का मसविदा तय किया जाता है।
    लेखन और पत्रकारिता की दुनिया में एक लेखक रहता है और एक संपादक। प्रोटोकॉल का मसविदा कहता है कि संपादक महोदय ‘साहब’ हैं। अगर कोई लेखक संपादक जी को साहिब कहे तो आश्चर्य का सवाल ही नहीं उठता।
    25 वर्ष के लेखन काल में विभिन्न जे़हनी और दिमागी तासीर के कई संपादकों से पाला पड़ा। कुछ तो प्रशंसा के पात्र हैं और सच कहूं तो मुझे लेखन कर्म को लेकर प्रोत्साहित करने वाले भी हैं मगर प्रोटोकॉल के दृष्टिगत हर संपादक मेरे लिए ‘साहिब’ था।
    इन संपादकों की कतार में एक नाम है अनिल अनूप। जहां प्रोटोकॉल का मसविदा मेरे लिए पता नहीं किस रद्दी की टोकरी में सड़ गया होगा। इस दुनिया में जहां लोग ‘साहिब’ सुनने से खुश होते हैं, वहीं अनिल अनूप को साहिब कहने से मुझे डर लगता है।
    सच कहूं तो आज तक 25 वर्ष के लेखन काल में मुझे अपने आप को उद्घाटित करना अच्छा नहीं लगा। लेखन को मैंने अर्थलाभ के बजाए सामाजिक कर्तव्य माना। लेकिन मुझे लेकर अनिल अनूप की अभिव्यक्ति से आश्चर्य हो रहा है कि अनूप भाई संबंधित लोगों के अच्छे-बुरे किरदार, अपने आसपास के साज-नासाज माहौल और सफलताओं-असफलताओं का लेखा-जोखा पर बड़ी पैनी नजर रखते हैं।
    मैं अपनी गति से चलना जानता हूं, रूह को जिंदा रखने की कोशिश करता हूं। कमी उन किरदारों की भी नहीं, जो मेरे कर्म और कर्तव्य के मार्ग पर हर मुमकिन अवरोध उत्पन्न करने की कोशिश में रहे हैं। ये उन खास अपनों का हुजूम है जो दुनियादारी में सीना ठोककर अपना होने का स्वांग रचते हैं।असल में यह उन कायरों की टोली है जो समाज में नेक इरादों को फलने फूलने नहीं देते। नेकी का जन्म नेकी से ही होता है। आजकल अगर बदी (बुराई) प्रधान है तो इसका कारण नेकियों के प्रचार-प्रसार और प्रशंसा में निरंतर होती जा रही कमी है।
    इसलिए प्रशंसा करना मुश्किल नहीं है लेकिन यह इतना आसान भी नहीं है। नेकी और बदी जन्नत और जहन्नुम का रास्ता तय करती है, यादों की उल्लास और उदास इमारतें खड़ी करती हैं।
    अनिल अनूप जी ने यादों की जिस इमारत का आग़ाज़ किया है उसकी दिवारें जीते जी बुलंद रहें। उन दिवारों को खुदगर्जी का कोई तूफान छूने न पाए।
    कुछ रोज पहले मशहूर शायर बशीर बद्र साहब यादों के उजाले छोड़ गए। इन उजालों में कहीं खुदगर्जी का पुट नहीं था, बस जमाने की अच्छी-बुरी तासीर की तस्वीरें थीं।
    अनिल अनूप जी, ऐसी यादें रहनी चाहिए कि कोई याद करे-
    बकौल बशीर बद्र:
    उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो!
    न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए!!
    बहुत बहुत शुक्रिया
    (केवल कृष्ण पनगोत्रा)

    1. प्रिय पनगोत्रा जी,

      आपकी इस आत्मीय प्रतिक्रिया को पढ़कर मन सचमुच शब्दहीन हो गया। एक लेखक के लिए उसकी रचना पर मिली प्रशंसा महत्वपूर्ण होती है, लेकिन एक संपादक के लिए किसी लेखक का विश्वास उससे कहीं अधिक मूल्यवान होता है। आपने जो कुछ लिखा, वह किसी लेख पर टिप्पणी भर नहीं, बल्कि वर्षों से चले आ रहे विश्वास, सम्मान और आत्मीय संवाद का दस्तावेज़ है।

      सच तो यह है कि मैंने आपके व्यक्तित्व और कृतित्व को लेकर जो लिखा, वह कोई उपकार नहीं था। वह केवल उस सच्चाई को शब्द देना था जिसे मैं पिछले अनेक वर्षों से देखता, समझता और महसूस करता रहा हूं। आपने अपने बारे में कभी कुछ कहने की कोशिश नहीं की, शायद यही कारण है कि आपके बारे में लिखना जरूरी लगा। जो लोग स्वयं का बखान नहीं करते, उनके बारे में समय को गवाही देनी पड़ती है।

      जहां तक ‘साहिब’ का सवाल है, मेरा मानना है कि पद, प्रतिष्ठा और संबोधन मनुष्य को बड़ा नहीं बनाते। आदमी अपने व्यवहार, संवेदनाओं और अपने हिस्से की नेकी से बड़ा होता है। यदि आप मुझे ‘अनूप भाई’ कहकर पुकारते हैं तो उसमें जो अपनापन है, वह किसी भी औपचारिक संबोधन से कहीं अधिक मूल्यवान है।

      मैंने हमेशा आपको एक ऐसे व्यक्ति के रूप में देखा है, जो शोर से दूर रहकर भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराता है। जो संघर्षों को प्रदर्शन नहीं बनाता, जो अपने दुखों को दूसरों पर नहीं लादता और जो अपनी लेखनी को साधन नहीं, साधना मानता है। आज के समय में यह गुण दुर्लभ होते जा रहे हैं।

      आपने नेकी और बदी की जो बात कही, वह मेरे मन को छू गई। सचमुच, समाज में बुराई का विस्तार केवल बुरे लोगों के कारण नहीं होता, बल्कि अच्छे लोगों की चुप्पी के कारण भी होता है। यदि हम अपने समय के अच्छे लोगों का उल्लेख नहीं करेंगे, उनकी सराहना नहीं करेंगे, तो आने वाली पीढ़ियां प्रेरणा कहां से लेंगी?

      आपके बारे में लिखा गया लेख दरअसल किसी व्यक्ति विशेष का गुणगान नहीं था। वह उन मूल्यों का सम्मान था जिनका प्रतिनिधित्व आप करते हैं— सादगी, संवेदनशीलता, विनम्रता, अध्ययनशीलता और इंसानियत।

      बशीर बद्र साहब का शेर आपने जिस संदर्भ में याद किया, उसने इस संवाद को और भी खूबसूरत बना दिया। सच है, अंततः मनुष्य के पास उसकी यादें ही बचती हैं। पद, प्रतिष्ठा, पुरस्कार और विवाद समय की धूल में खो जाते हैं, लेकिन अच्छे व्यवहार और सच्चे रिश्तों की रोशनी बहुत दूर तक जाती है।

      मैं दुआ करता हूं कि आपकी कलम यूं ही चलती रहे, आपकी रूह की गर्माहट यूं ही बनी रहे और आपकी सोच आने वाले समय में भी समाज को रोशनी देती रहे।

      आपके शब्दों के लिए हृदय से आभार।

      स्नेह, सम्मान और आत्मीयता सहित,

      अनिल अनूप
      संपादक, जनगणदूत

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