लखनऊ

गरीबी नहीं रोक सकी हौसलों की उड़ान : माँ घरों में करती है चौका-बरतन, बेटी ने क्रैक किया NEET-UG

लखनऊ की नीलू और गोरखपुर के विशाल तिवारी ने आर्थिक अभावों के बावजूद राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (NEET-UG) में सफलता हासिल कर यह साबित किया कि दृढ़ संकल्प, मेहनत और परिवार का साथ किसी भी कठिनाई से बड़ा होता है।

रिपोर्ट : सर्वेश कुमार यादव

लखनऊ. आर्थिक तंगी, सीमित संसाधन और सामाजिक चुनौतियाँ अक्सर प्रतिभाशाली छात्रों के सामने बड़ी बाधा बन जाती हैं, लेकिन कुछ युवा अपनी मेहनत और अटूट विश्वास के दम पर इन सभी बाधाओं को पीछे छोड़ देते हैं। उत्तर प्रदेश के लखनऊ और गोरखपुर से सामने आई दो प्रेरणादायक कहानियाँ इसी सच को साबित करती हैं। एक ओर घरेलू सहायिका की बेटी ने डॉक्टर बनने का सपना साकार करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बढ़ाते हुए NEET-UG परीक्षा में सफलता प्राप्त की, वहीं दूसरी ओर ऑटो रिक्शा चालक के बेटे ने कई असफलताओं, पारिवारिक जिम्मेदारियों और आर्थिक संघर्षों के बावजूद आखिरकार मेडिकल प्रवेश परीक्षा में सफलता हासिल कर ली।

दोनों विद्यार्थियों की उपलब्धि केवल व्यक्तिगत सफलता नहीं है, बल्कि उन हजारों युवाओं के लिए प्रेरणा है जो सीमित संसाधनों के कारण अपने सपनों को अधूरा मान लेते हैं।

पिता की असमय मृत्यु ने बदल दी नीलू की जिंदगी

लखनऊ के गोमती नगर क्षेत्र के एक साधारण परिवार में रहने वाली नीलू का बचपन संघर्षों के बीच बीता। जब वह आठवीं कक्षा में पढ़ रही थी, तभी उसके पिता का इलाज समय पर न हो पाने के कारण निधन हो गया। परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर थी कि बेहतर चिकित्सा का खर्च उठाना संभव नहीं था।

इस दर्दनाक घटना ने नीलू के मन में एक ऐसा संकल्प जगा दिया जिसने उसके जीवन की दिशा बदल दी। उसने उसी समय तय कर लिया कि वह डॉक्टर बनेगी ताकि भविष्य में किसी गरीब परिवार को इलाज के अभाव में अपने किसी प्रियजन को न खोना पड़े।

नीलू का कहना है कि पिता को खोने का दुख आज भी उसके साथ है, लेकिन यही दर्द उसकी सबसे बड़ी प्रेरणा बन गया। उसने कठिन परिस्थितियों को कमजोरी नहीं, बल्कि अपनी ताकत बना लिया।

मेहनत और छात्रवृत्ति ने खोले सफलता के द्वार

नीलू ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा प्रेरणा बालिका स्कूल से पूरी की। आगे की पढ़ाई के लिए उसे छात्रवृत्ति मिली, जिससे उसकी शिक्षा बिना आर्थिक रुकावट जारी रह सकी।

इस वर्ष उसने केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) की 12वीं की परीक्षा में 94 प्रतिशत अंक प्राप्त किए। इसके साथ ही उसने NEET-UG में भी सफलता हासिल कर मेडिकल कॉलेज का रास्ता खोल लिया।

नीलू का सपना आगे चलकर हृदय रोग विशेषज्ञ (कार्डियोलॉजिस्ट) बनने का है। उसकी उच्च शिक्षा के लिए भी छात्रवृत्ति की व्यवस्था की गई है, जिससे मेडिकल शिक्षा का खर्च और अन्य आवश्यक व्यय पूरे किए जाएंगे।

माँ ने हर मुश्किल का डटकर किया सामना

नीलू की सफलता के पीछे उसकी माँ का संघर्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। परिवार की जिम्मेदारी उनके कंधों पर है। वह अस्पताल में अटेंडेंट के रूप में काम करने के साथ-साथ घर-घर जाकर घरेलू सहायिका का कार्य भी करती हैं।

आर्थिक कठिनाइयों के बीच कई लोगों ने उन्हें बेटियों की पढ़ाई बंद कर शादी कराने की सलाह दी, लेकिन उन्होंने किसी की बात नहीं मानी। उनका विश्वास था कि शिक्षा ही उनकी बेटियों का भविष्य बदल सकती है।

आज नीलू की सफलता उनकी इसी सोच और त्याग का परिणाम मानी जा रही है। नीलू भी अपनी उपलब्धि का श्रेय अपनी माँ, शिक्षकों और स्कूल को देती है, जिन्होंने हर कदम पर उसका मनोबल बढ़ाया।

शिक्षकों का भरोसा बना सबसे बड़ी ताकत

नीलू का कहना है कि स्कूल के शिक्षकों ने हमेशा उसमें आत्मविश्वास जगाया और यह विश्वास दिलाया कि अच्छी शिक्षा किसी भी व्यक्ति का जीवन बदल सकती है।

शिक्षकों के मार्गदर्शन और नियमित अध्ययन के कारण वह अपने लक्ष्य की ओर लगातार बढ़ती रही। विद्यालय प्रबंधन ने भी उसकी उपलब्धि को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और निरंतर मेहनत का परिणाम बताया है।

गोरखपुर के विशाल ने चौथे प्रयास में हासिल की सफलता

लखनऊ की नीलू की तरह गोरखपुर के विशाल तिवारी की कहानी भी संघर्ष और धैर्य की मिसाल है।

विशाल के पिता संतोष तिवारी ऑटो रिक्शा चलाकर परिवार का पालन-पोषण करते हैं। सीमित आमदनी के कारण मेडिकल प्रवेश परीक्षा की महंगी कोचिंग कराना परिवार के लिए आसान नहीं था।

12वीं की पढ़ाई पूरी करने के बाद विशाल ने अपने दम पर तैयारी शुरू की। शुरुआती प्रयासों में सफलता नहीं मिली, लेकिन उसने हार नहीं मानी। लगातार मेहनत जारी रखी और चौथे प्रयास में 720 में से 605 अंक प्राप्त कर NEET-UG परीक्षा में सफलता हासिल कर ली।

जिम्मेदारियाँ बढ़ीं, लेकिन सपना नहीं टूटा

विशाल की तैयारी के दौरान उसकी शादी हो गई। कुछ समय बाद वह एक बेटे का पिता भी बन गया। पारिवारिक जिम्मेदारियाँ बढ़ने के बावजूद उसने डॉक्टर बनने का सपना नहीं छोड़ा।

आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण पढ़ाई के साथ-साथ उसे अतिरिक्त मेहनत भी करनी पड़ी। उसने बच्चों को ट्यूशन पढ़ाकर अपनी पढ़ाई का खर्च निकालने में सहयोग किया और देर रात तक लाइब्रेरी में बैठकर तैयारी जारी रखी। आखिरकार उसके पिता ने भी उधार लेकर उसे कोचिंग में प्रवेश दिलाया, जिससे उसकी तैयारी और मजबूत हुई।

परिवार के सहयोग ने दिलाई मंजिल

विशाल अपनी सफलता का पूरा श्रेय अपने माता-पिता और पत्नी को देता है। उनका कहना है कि यदि परिवार ने हर परिस्थिति में उसका साथ नहीं दिया होता तो यह उपलब्धि संभव नहीं थी।

विशाल ने भावुक होकर कहा कि डॉक्टर बनने के बाद उसकी पहली इच्छा अपने पिता के लिए एक कार खरीदने की है, ताकि जिन्होंने जीवनभर परिवार के लिए संघर्ष किया, उन्हें कुछ सुखद पल मिल सकें।

युवाओं के लिए प्रेरणा बनी दोनों की कहानी

नीलू और विशाल की सफलता यह संदेश देती है कि परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, यदि लक्ष्य स्पष्ट हो और मेहनत निरंतर जारी रहे तो सफलता अवश्य मिलती है।

इन दोनों विद्यार्थियों ने साबित कर दिया कि संसाधनों की कमी प्रतिभा को रोक नहीं सकती। परिवार का विश्वास, शिक्षकों का मार्गदर्शन और स्वयं का अटूट संकल्प किसी भी सपने को साकार करने की सबसे बड़ी शक्ति बन सकता है।

आज उनकी कहानी केवल दो विद्यार्थियों की सफलता नहीं, बल्कि उन लाखों परिवारों के लिए उम्मीद की किरण है जो आर्थिक अभावों के बावजूद अपने बच्चों को बेहतर भविष्य देना चाहते हैं। यह उपलब्धि समाज को भी यह संदेश देती है कि बेटियों की शिक्षा और युवाओं के सपनों में किया गया निवेश आने वाले समय में पूरे समाज की सबसे बड़ी पूंजी साबित होता है।

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