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गाय, गौशालाएं और राजनीति : हमीरपुर में शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के बयानों से फिर गरमाया गौसंरक्षण का मुद्दा

हमीरपुर में गौ रक्षा यात्रा के दौरान सरकार पर साधा निशाना

ठाकुर बख्श सिंह की रिपोर्ट

उत्तर प्रदेश के हमीरपुर जिले में आयोजित ‘गविष्टि गोरक्षा धर्मयुद्ध यात्रा’ के दौरान ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने गौसंरक्षण, गौशालाओं की स्थिति और हिंदुत्व की राजनीति को लेकर कई तीखी टिप्पणियां कीं। उनके बयानों ने एक बार फिर राजनीतिक और सामाजिक गलियारों में बहस को तेज कर दिया है।

गोरखपुर से प्रारंभ हुई इस यात्रा के क्रम में हमीरपुर पहुंचे शंकराचार्य ने कहा कि देश में गाय को लेकर बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर गौसंरक्षण की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकारें और राजनीतिक दल चुनावी मंचों पर गौमाता के सम्मान की बात तो करते हैं, लेकिन वास्तविक संरक्षण के लिए अपेक्षित प्रयास नहीं दिखाई देते।

“गाय 14 वर्ष तक मां रहेगी…” बयान से उठाए गंभीर सवाल

मीडिया से बातचीत के दौरान शंकराचार्य ने कुछ नेताओं के हालिया बयानों का उल्लेख करते हुए कहा कि इससे गौमाता के प्रति उनकी वास्तविक सोच सामने आती है। उन्होंने कटाक्ष करते हुए कहा कि यदि गाय को केवल सीमित समय तक ही सम्मान देने की मानसिकता विकसित हो रही है, तो यह भारतीय संस्कृति और सनातन परंपरा के मूल भाव के विपरीत है।

उन्होंने कहा कि भारत में गाय को केवल एक पशु के रूप में नहीं देखा गया, बल्कि उसे मातृत्व, सेवा और करुणा के प्रतीक के रूप में सम्मान प्राप्त है। ऐसे में राजनीतिक लाभ के लिए गौमाता का नाम लेना और व्यवहार में उसके संरक्षण के लिए ठोस कदम न उठाना समाज को भ्रमित करने वाला है।

शंकराचार्य ने कहा कि सनातन परंपरा में गाय का महत्व किसी आयु, उपयोगिता या आर्थिक गणना से निर्धारित नहीं होता। गौसेवा और गौरक्षा भारतीय सांस्कृतिक विरासत का अभिन्न अंग हैं और इन्हें राजनीतिक दृष्टिकोण से नहीं देखा जाना चाहिए।

हिंदुत्व की राजनीति पर उठाए सवाल

अपने संबोधन में शंकराचार्य ने कहा कि आज हिंदुत्व के नाम पर राजनीति करने वाले अनेक लोग स्वयं अपने बयानों से विरोधाभास पैदा कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि यदि कोई व्यक्ति या राजनीतिक दल वास्तव में हिंदुत्व की बात करता है तो उसे गौसंरक्षण, गौसेवा और भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों के संरक्षण को प्राथमिकता देनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि हिंदुत्व केवल चुनावी नारा नहीं है बल्कि यह जीवनशैली और सांस्कृतिक चेतना का विषय है। यदि गौमाता की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं हो पा रही है तो इस पर गंभीर आत्ममंथन की आवश्यकता है।

सड़क पर नमाज को लेकर भी रखी स्पष्ट राय

हमीरपुर प्रवास के दौरान शंकराचार्य ने सड़क पर नमाज पढ़ने के मुद्दे पर भी अपनी राय व्यक्त की। उन्होंने कहा कि हर धर्म की धार्मिक गतिविधियों का अपना महत्व और पवित्रता होती है। नमाज भी एक पवित्र धार्मिक क्रिया है, जिसे उचित और निर्धारित स्थान पर ही संपन्न किया जाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि सड़कें सार्वजनिक उपयोग के लिए होती हैं, जहां निरंतर यातायात और लोगों का आवागमन बना रहता है। ऐसी स्थिति में किसी भी धार्मिक आयोजन या अनुष्ठान के लिए सड़क का उपयोग करना व्यावहारिक दृष्टि से उचित नहीं माना जा सकता।

शंकराचार्य ने कहा कि धार्मिक स्वतंत्रता का सम्मान करते हुए यह भी आवश्यक है कि सार्वजनिक व्यवस्था और आम नागरिकों की सुविधा का ध्यान रखा जाए।

गौशाला निरीक्षण को लेकर प्रशासन पर जताई नाराजगी

गौसंरक्षण के मुद्दे पर सबसे गंभीर टिप्पणी उन्होंने स्थानीय प्रशासन की कार्यप्रणाली को लेकर की। शंकराचार्य ने दावा किया कि वह क्षेत्र की एक गौशाला और गौ आश्रम का निरीक्षण करना चाहते थे, लेकिन उन्हें वहां प्रवेश नहीं करने दिया गया।

उन्होंने बताया कि जब वह निरीक्षण के लिए पहुंचे तो परिसर में ताला लगा हुआ था और प्रशासनिक स्तर पर अनुमति की आवश्यकता का हवाला दिया गया। इस घटना पर उन्होंने नाराजगी व्यक्त करते हुए कहा कि यदि गौशालाओं में सब कुछ व्यवस्थित है तो निरीक्षण से किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि उन्हें लगातार ऐसी सूचनाएं प्राप्त हो रही थीं कि कई गौशालाओं में गायों की स्थिति संतोषजनक नहीं है। इसलिए वह स्वयं जाकर वास्तविक स्थिति देखना चाहते थे। उनके अनुसार, यदि किसी संस्था या प्रशासन को पारदर्शिता पर विश्वास है तो निरीक्षण को रोकने का कोई कारण नहीं होना चाहिए।

गौशालाओं की स्थिति पर चिंता

शंकराचार्य ने कहा कि देश के अनेक हिस्सों में संचालित गौशालाओं की हालत चिंताजनक है। कई स्थानों पर चारे, पानी, चिकित्सा और रखरखाव जैसी मूलभूत सुविधाओं का अभाव देखा जाता है।

उन्होंने कहा कि सरकारों द्वारा गौशालाओं के संचालन के लिए बजट और योजनाएं बनाई जाती हैं, लेकिन उनका प्रभाव अंतिम स्तर तक पहुंच रहा है या नहीं, इसकी नियमित समीक्षा आवश्यक है।

उन्होंने सुझाव दिया कि गौशालाओं की स्वतंत्र निगरानी व्यवस्था विकसित की जानी चाहिए ताकि गायों की देखभाल और सुविधाओं की गुणवत्ता सुनिश्चित हो सके।

मोदी सरकार के 12 वर्षों पर भी उठाए प्रश्न

केंद्र सरकार के 12 वर्ष पूरे होने से जुड़े सवाल पर शंकराचार्य ने कहा कि इतने लंबे समय के बाद भी गौसंरक्षण के क्षेत्र में अपेक्षित परिणाम दिखाई नहीं देते। उन्होंने कहा कि देश में आज भी बड़ी संख्या में निराश्रित गोवंश सड़कों पर दिखाई देता है।

उन्होंने आरोप लगाया कि गोवंश की तस्करी, अवैध व्यापार और कटान जैसी समस्याएं पूरी तरह समाप्त नहीं हो सकी हैं। उनका कहना था कि यदि सरकारें गंभीर इच्छाशक्ति के साथ कार्य करें तो इन समस्याओं पर प्रभावी नियंत्रण संभव है।

उन्होंने कहा कि गौसंरक्षण केवल धार्मिक भावना का विषय नहीं बल्कि कृषि, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और पर्यावरण से भी जुड़ा हुआ मुद्दा है। इसलिए इसे व्यापक दृष्टिकोण से देखने की आवश्यकता है।

गोरक्षा यात्रा का उद्देश्य

शंकराचार्य ने बताया कि ‘गविष्टि गोरक्षा धर्मयुद्ध यात्रा’ का मुख्य उद्देश्य समाज में गौसंरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाना है। यात्रा के माध्यम से लोगों को गाय के धार्मिक, सांस्कृतिक और आर्थिक महत्व के बारे में जानकारी दी जा रही है।

उन्होंने कहा कि यह अभियान किसी राजनीतिक दल के विरोध या समर्थन के लिए नहीं बल्कि गौमाता के सम्मान और संरक्षण के लिए चलाया जा रहा है। यात्रा विभिन्न जिलों से होकर गुजर रही है और जहां-जहां पहुंच रही है, वहां लोगों का व्यापक समर्थन मिल रहा है।

उनका कहना था कि जब तक समाज स्वयं गौसंरक्षण को अपनी जिम्मेदारी नहीं मानेगा, तब तक केवल सरकारी योजनाओं के भरोसे इस लक्ष्य को पूरी तरह हासिल नहीं किया जा सकता।

समाज और सरकार दोनों की जिम्मेदारी

शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने अपने संबोधन के अंत में कहा कि गौसंरक्षण का विषय केवल सरकारों या धार्मिक संगठनों तक सीमित नहीं है। यह पूरे समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है।

उन्होंने लोगों से अपील की कि वे गौसेवा को केवल धार्मिक अनुष्ठान न मानें, बल्कि सामाजिक उत्तरदायित्व के रूप में स्वीकार करें। साथ ही उन्होंने सरकारों से आग्रह किया कि गौशालाओं की स्थिति सुधारने, निराश्रित गोवंश की समस्या का समाधान करने और गौसंरक्षण संबंधी कानूनों को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए ठोस कदम उठाए जाएं।

हमीरपुर में दिए गए उनके बयानों ने एक बार फिर गौसंरक्षण, हिंदुत्व की राजनीति और गौशालाओं की वास्तविक स्थिति जैसे मुद्दों को राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में ला दिया है। आने वाले दिनों में इन बयानों पर राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रियाएं देखने को मिल सकती हैं।

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