हर हजार यात्रियों में एक चोर! भारतीय रेल के बेडरोल की चोरी का बढ़ता संकट, आखिर जिम्मेदार कौन?

भारतीय रेलवे के एसी कोच में बेडरोल के साथ रिपोर्टर विनीता साहू की तस्वीर, आरटीआई में 1.27 करोड़ बेडरोल चोरी का खुलासा दर्शाती फीचर इमेज।

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विनीता साहू की रिपोर्ट

भारतीय रेलवे को देश की जीवनरेखा कहा जाता है। प्रतिदिन लगभग ढाई करोड़ लोग रेल से यात्रा करते हैं। इनमें लाखों यात्री वातानुकूलित (एसी) कोचों में सफर करते हैं, जहां टिकट के साथ उन्हें बेडरोल किट उपलब्ध कराई जाती है। इस किट में सामान्यतः दो चादरें, एक कंबल, एक तकिया, एक तकिया कवर और एक फेस टॉवल शामिल होता है। यात्रियों की सुविधा के लिए शुरू की गई यह व्यवस्था अब रेलवे के लिए भारी आर्थिक बोझ बनती जा रही है।

सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत सामने आए आंकड़ों ने एक चौंकाने वाली तस्वीर पेश की है। महामारी के बाद जनवरी 2022 से मई 2026 तक भारतीय रेलवे के एसी कोचों से कम से कम 1.27 करोड़ बेडरोल आइटम गायब हो गए। यानी हर दिन हजारों चादरें, कंबल, तकिए और तौलिये रेलवे की संपत्ति से बाहर चले गए।

यह केवल चोरी का मामला नहीं है, बल्कि सार्वजनिक संपत्ति के प्रति समाज के बदलते नजरिए, यात्रियों की जिम्मेदारी और व्यवस्था की चुनौतियों पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है।

हर रात लाखों यात्रियों तक पहुंचता है बेडरोल

भारतीय रेलवे नेटवर्क पर प्रतिदिन लगभग आठ लाख एसी यात्री यात्रा करते हैं। हर यात्री को यात्रा शुरू होने पर एक सीलबंद बेडरोल पैक दिया जाता है।

यात्रा पूरी होने पर यह पूरा सामान वापस रेलवे के पास लौटना चाहिए ताकि उसकी धुलाई, सफाई और पुनः उपयोग किया जा सके। लेकिन वास्तविकता इससे बिल्कुल अलग है।

आरटीआई से मिले आंकड़े बताते हैं कि औसतन हर एक हजार यात्रियों में से कम से कम एक यात्री बेडरोल का कोई न कोई सामान अपने साथ ले जाता है।

पहली नजर में यह संख्या छोटी लग सकती है, लेकिन जब इसे करोड़ों यात्रियों के पैमाने पर देखा जाता है तो नुकसान बेहद बड़ा दिखाई देता है।

आरटीआई ने खोली पोल

यह जानकारी देश के विभिन्न रेलवे जोनों और मंडलों से सूचना के अधिकार के तहत जुटाई गई। भारतीय रेलवे के 18 जोनों में से 16 जोनों के 54 मंडलों ने उपलब्ध जानकारी साझा की। इन्हीं आंकड़ों के विश्लेषण से पता चला कि जनवरी 2022 से मई 2026 तक कम से कम 1.27 करोड़ बेडरोल सामग्री गायब हुई।

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आंकड़ों का अध्ययन यह भी बताता है कि वर्ष 2022 से 2025 के बीच ऐसी घटनाओं में लगभग 56 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। यह बढ़ोतरी इस बात का संकेत है कि समस्या लगातार गंभीर होती जा रही है।

आखिर चोरी क्या-क्या होती है?

रेलवे अधिकारियों के अनुसार सबसे अधिक गायब होने वाली वस्तुओं में शामिल हैं—

  • सफेद चादरें
  • कंबल
  • तकिया
  • तकिया कवर
  • फेस टॉवल

इनमें चादर और तौलिये सबसे ज्यादा चोरी होने वाली वस्तुएं मानी जाती हैं क्योंकि इन्हें आसानी से बैग में रखा जा सकता है। हालांकि कई मामलों में पूरा बेडरोल पैकेट ही गायब हो जाता है।

रेलवे को करोड़ों का नुकसान

इन चोरी की घटनाओं के कारण केवल सामान ही नहीं खोता, बल्कि पूरी व्यवस्था प्रभावित होती है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार पिछले चार वर्षों में बेडरोल सेवा देने वाले ठेकेदारों को करीब 104.51 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ।

यह नुकसान आखिरकार रेलवे व्यवस्था पर अतिरिक्त आर्थिक दबाव बनाता है। बेडरोल की नई खरीद, धुलाई, परिवहन और रखरखाव की लागत भी लगातार बढ़ती जा रही है।

कर्मचारियों पर भी पड़ता है असर

सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि कई मामलों में चोरी हुए सामान का आर्थिक बोझ सीधे उन कर्मचारियों पर डाल दिया जाता है जो कोचों में बेडरोल वितरित करते हैं।

कोच परिचारकों का कहना है कि कई बार गायब सामान की कीमत उनके वेतन से काट ली जाती है। ऐसी स्थिति में कर्मचारी ऐसी गलती की सजा भुगतते हैं जिसके लिए वे प्रत्यक्ष रूप से जिम्मेदार नहीं होते। उनका काम केवल बेडरोल बांटना और वापस लेना होता है। यदि कोई यात्री जानबूझकर सामान लेकर उतर जाए तो उसे रोकना हमेशा संभव नहीं होता।

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आखिर लोग ऐसा क्यों करते हैं?

सबसे बड़ा प्रश्न यही है। क्या कुछ चादरों और तौलियों की कीमत इतनी अधिक है कि लोग सार्वजनिक संपत्ति अपने घर ले जाने में संकोच नहीं करते? विशेषज्ञों का मानना है कि इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं—

  • मुफ्त समझकर सामान घर ले जाने की मानसिकता।
  • सार्वजनिक संपत्ति को निजी संपत्ति जितना महत्व न देना।
  • यह धारणा कि “एक सामान ले जाने से क्या फर्क पड़ेगा।”
  • जांच और दंड का लगभग अभाव।

यही सोच धीरे-धीरे करोड़ों रुपये के नुकसान का कारण बन जाती है।

केवल चोरी नहीं, सामाजिक मानसिकता का सवाल

सार्वजनिक संपत्ति आखिर किसकी होती है? सीधा उत्तर है—देश के प्रत्येक नागरिक की। रेलवे की चादर, कंबल या तकिया किसी अधिकारी की निजी संपत्ति नहीं बल्कि करदाताओं के पैसे से खरीदी गई राष्ट्रीय संपत्ति है। जब कोई यात्री उसे घर ले जाता है तो वास्तव में उसका नुकसान पूरे देश को उठाना पड़ता है। यानी अंततः इसकी भरपाई फिर सरकारी धन से ही होती है।

रेलवे क्या कर सकता है?

विशेषज्ञ कई उपाय सुझाते हैं। सबसे पहले बेडरोल वितरण और वापसी की डिजिटल निगरानी को मजबूत किया जा सकता है। प्रत्येक बेडरोल पैक पर क्यूआर कोड अथवा आरएफआईडी टैग लगाए जा सकते हैं। यात्रा समाप्त होने पर उसकी स्कैनिंग अनिवार्य की जा सकती है। कोचों में नियमित घोषणा के माध्यम से यात्रियों को यह याद दिलाया जा सकता है कि बेडरोल रेलवे की संपत्ति है। इसके अतिरिक्त बड़े रेलवे स्टेशनों पर बेडरोल वापसी की विशेष निगरानी भी प्रभावी साबित हो सकती है।

यात्रियों की भी है जिम्मेदारी

रेलवे अकेले इस समस्या का समाधान नहीं कर सकता। यदि करोड़ों यात्री ईमानदारी से केवल अपनी जिम्मेदारी निभाएं तो यह समस्या लगभग समाप्त हो सकती है। यात्रा पूरी होने के बाद बेडरोल वहीं छोड़ देना केवल नियम का पालन नहीं बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी भी है। यदि कोई व्यक्ति सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करता है तो वह अप्रत्यक्ष रूप से देश के संसाधनों की भी रक्षा करता है।

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क्या सख्त कार्रवाई जरूरी है?

कई विशेषज्ञ मानते हैं कि केवल अपील से समस्या समाप्त नहीं होगी। यदि चोरी करते हुए पकड़े गए यात्रियों पर जुर्माना लगाया जाए अथवा भविष्य की यात्रा पर प्रतिबंध जैसी सख्त कार्रवाई हो तो इसका सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। हालांकि इसके लिए स्पष्ट नियम और व्यवहारिक व्यवस्था दोनों आवश्यक होंगे।

व्यवस्था में सुधार की भी जरूरत

रेलवे को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि बेडरोल की गुणवत्ता बेहतर रहे, वितरण व्यवस्थित हो और रिकॉर्ड पारदर्शी रखा जाए। जहां चोरी अधिक होती है वहां विशेष निगरानी अभियान चलाए जाने चाहिए।

साथ ही कर्मचारियों को चोरी के लिए अनुचित रूप से जिम्मेदार ठहराने के बजाय वास्तविक दोषियों तक पहुंचने की व्यवस्था विकसित करनी होगी।

भारतीय रेलवे केवल परिवहन का माध्यम नहीं, बल्कि देश की साझा धरोहर है। ऐसे में रेलवे की संपत्ति की सुरक्षा भी हर नागरिक की जिम्मेदारी है। आरटीआई से सामने आए आंकड़े बताते हैं कि बेडरोल चोरी कोई छोटी-मोटी समस्या नहीं, बल्कि करोड़ों रुपये के नुकसान और सामाजिक उत्तरदायित्व से जुड़ा गंभीर विषय है।

हर यात्री यदि केवल इतना संकल्प ले कि वह रेलवे का कोई भी सामान अपने साथ नहीं ले जाएगा, तो करोड़ों रुपये की बचत संभव है। सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा केवल कानून का पालन नहीं, बल्कि एक जागरूक नागरिक होने का प्रमाण भी है। रेलवे की चादर या तौलिया घर ले जाना शायद किसी व्यक्ति के लिए मामूली बात लगे, लेकिन जब यही सोच लाखों लोगों में फैल जाती है तो उसका खामियाजा पूरे देश को भुगतना पड़ता है। इसलिए समय की मांग है कि व्यवस्था और नागरिक—दोनों अपनी-अपनी जिम्मेदारी निभाएं, ताकि भारतीय रेलवे की यह महत्वपूर्ण सेवा भविष्य में भी सुचारु रूप से चलती रहे।

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Author: यायावर

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