गर्मी की मार के बीच हरियाली बरकरार, वन विभाग की पहल बनी मिसाल

चित्रकूट में भीषण गर्मी के बीच पौधों को बचाने के लिए लगाए गए नमी वाले डिब्बों के साथ पौध और रिपोर्टर संजय सिंह राणा

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ग्राउंड रिपोर्ट | संजय सिंह राणा

चित्रकूट की तपती ज़मीन, 45 डिग्री सेल्सियस के आसपास पहुंचता तापमान और सूखे की मार—ऐसे हालात में जहां बड़े-बड़े पेड़ तक झुलसने लगते हैं, वहां नन्हे पौधों का हरा-भरा बने रहना अपने आप में हैरान करने वाला दृश्य है। लेकिन रानीपुर टाइगर रिजर्व के मानिकपुर रेंज द्वितीय में यह सिर्फ संयोग नहीं, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति और जमीनी नवाचार का नतीजा है।

आंकड़ों में समझिए पूरी तस्वीर

वित्तीय वर्ष 2025 में सामाजिक वानिकी एससीपी योजना के तहत इस क्षेत्र में बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण किया गया।

  • 25 हेक्टेयर क्षेत्रफल में पौधारोपण
  • 10,000 पौधे सीधे रोपे गए
  • लगभग 30,000 पौधे बीज से विकसित किए गए
  • कुल मिलाकर 40,000 पौधों का हरित लक्ष्य

लेकिन गर्मी की शुरुआत के साथ ही चुनौती सामने आई। आम तौर पर ऐसे हालात में 60–70% तक पौधों के सूखने का खतरा रहता है, खासकर तब जब सिंचाई की कोई स्थायी व्यवस्था न हो।

संकट के बीच समाधान

वन क्षेत्राधिकारी राजेश कुमार सोनकर ने इस संभावित नुकसान को भांपते हुए एक स्थानीय और सस्ता उपाय खोजा। प्लास्टिक के डिब्बों में छोटे-छोटे छेद कर उन्हें पौधों के पास जमीन में गाड़ दिया गया और उनमें नियमित रूप से पानी भरा जाने लगा।

इस तकनीक के पीछे का विज्ञान सरल है—

  • एक डिब्बे से धीरे-धीरे 24–48 घंटे तक नमी रिसती रहती है
  • इससे मिट्टी की ऊपरी सतह सूखने के बावजूद जड़ों तक नमी बनी रहती है
  • पारंपरिक सिंचाई के मुकाबले लगभग 40–50% पानी की बचत संभव होती है

परिणाम: उम्मीद से बेहतर

जहां सामान्य परिस्थितियों में इतनी गर्मी में पौधों की जीवित रहने की दर 30–40% तक गिर जाती है, वहीं इस प्रयोग के बाद यहां 70–80% पौधे सुरक्षित और जीवित बताए जा रहे हैं।

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स्थानीय कर्मचारियों के अनुसार: पहले जहां हर सप्ताह सैकड़ों पौधे सूख रहे थे  अब वही संख्या घटकर बहुत न्यूनतम स्तर पर आ गई है, कई पौधों में नई कोंपलें भी निकलने लगी हैं.

जमीनी मेहनत का बड़ा रोल

इस सफलता के पीछे केवल तकनीक नहीं, बल्कि लगातार निगरानी भी है। 2 सुरक्षा कर्मी पौधों की सुरक्षा में लगे हैं, 1 श्रमिक नियमित रूप से पानी भरने और देखभाल का कार्य करता है. औसतन हर 2–3 दिन में डिब्बों में पानी भरा जाता है यह टीम सुनिश्चित करती है कि कोई डिब्बा सूखा न रहे और हर पौधे तक नमी पहुंचती रहे।

तुलना: परंपरागत बनाम नई तकनीक

पहलू परंपरागत तरीका डिब्बा-नमी तकनीक
पानी की खपत अधिक 40–50% कम
श्रम ज्यादा सीमित
पौधों की जीवित दर 30–40% 70–80%
लागत मध्यम बेहद कम

बड़ी तस्वीर: देशभर की चुनौती

भारत में हर साल करोड़ों पौधे लगाए जाते हैं। विभिन्न सरकारी रिपोर्टों के अनुसार: हर साल लगभग 200–300 करोड़ पौधारोपण का लक्ष्य रखा जाता है, लेकिन कई जगहों पर जीवित रहने की दर 50% से भी कम रह जाती है, मुख्य कारण: सिंचाई, रखरखाव और निगरानी की कमी ऐसे में चित्रकूट का यह मॉडल एक व्यवहारिक समाधान के रूप में सामने आता है।

पर्यावरणीय और आर्थिक लाभ

इस तकनीक के दूरगामी फायदे भी हैं:

  • जल संरक्षण: कम पानी में अधिक पौधे बचाना
  • लागत में कमी: महंगे सिंचाई सिस्टम की जरूरत नहीं
  • स्थानीय संसाधनों का उपयोग: बेकार प्लास्टिक का पुन: उपयोग
  • कार्बन संतुलन: अधिक पेड़ = अधिक कार्बन अवशोषण

अगर 40,000 में से 75% पौधे जीवित रहते हैं, तो भविष्य में यह क्षेत्र हजारों टन कार्बन डाइऑक्साइड अवशोषित करने की क्षमता विकसित कर सकता है।

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नीति स्तर पर क्या जरूरी?

यह प्रयोग साफ संकेत देता है कि: वृक्षारोपण के साथ पोस्ट-प्लांटेशन मैनेजमेंट अनिवार्य होना चाहिए, हर परियोजना में सिंचाई के लिए अलग बजट तय होना चाहिए, स्थानीय स्तर पर इनोवेशन को बढ़ावा दिया जाना चाहिए.

 छोटी सोच नहीं, बड़ा बदलाव

चित्रकूट के मानिकपुर रेंज में अपनाई गई यह ‘नमी तकनीक’ बताती है कि पर्यावरण संरक्षण के लिए बड़े-बड़े बजट से ज्यादा जरूरी है सही सोच और जमीन पर काम करने की इच्छाशक्ति।

भीषण गर्मी के बीच लहलहाते ये पौधे सिर्फ हरियाली नहीं, बल्कि एक संदेश हैं—
अगर प्रयास ईमानदार हो और समाधान स्थानीय हो, तो प्रकृति को बचाया जा सकता है।

यह पहल अब सिर्फ एक क्षेत्र तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि इसे नीति और मॉडल के रूप में अपनाकर देशभर में लागू किया जाना चाहिए। तभी वृक्षारोपण अभियान कागजों से निकलकर जमीन पर वास्तविक हरियाली में बदल पाएंगे।

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Author: यायावर

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