धर्मेंद्र प्रधान की विदाई से आरएसएस की शिक्षा परियोजना को बड़ा झटका?

लेखिका सीमा चिश्ती की तस्वीर के साथ शिक्षा नीति, युवा असंतोष और बदलाव की मांग को दर्शाती फीचर इमेज

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संपादकीय भूमिका – भारत में शिक्षा केवल पाठ्यक्रम, परीक्षाओं और डिग्रियों का विषय नहीं है। यह किसी भी समाज की वैचारिक दिशा, वैज्ञानिक चेतना, सामाजिक गतिशीलता और लोकतांत्रिक भविष्य को निर्धारित करने वाली सबसे महत्वपूर्ण संस्थागत व्यवस्था है। इसलिए शिक्षा नीति में होने वाला प्रत्येक बड़ा बदलाव केवल प्रशासनिक निर्णय नहीं होता, बल्कि उसके दूरगामी सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव भी होते हैं।

पिछले कुछ वर्षों में भारत की शिक्षा व्यवस्था को लेकर पाठ्यक्रमों में बदलाव, राष्ट्रीय शिक्षा नीति, परीक्षाओं के केंद्रीकरण, प्रश्नपत्र लीक, छात्रवृत्तियों में कटौती, विश्वविद्यालयों में नियुक्तियों, राज्यों के अधिकारों और शिक्षा के बढ़ते वैचारिकीकरण को लेकर लगातार बहस होती रही है। इसी व्यापक संदर्भ में प्रस्तुत आलेख शिक्षा मंत्रालय और उससे जुड़ी नीतियों को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की दीर्घकालिक वैचारिक परियोजना के संदर्भ में देखता है।

यह आलेख मूलतः लेखिका सीमा चिश्ती के विचारों और विश्लेषण पर आधारित है। इसमें प्रस्तुत तर्कों को उनके मूल वैचारिक आशय को बनाए रखते हुए संपादकीय रूप से व्यवस्थित, भाषिक रूप से परिष्कृत और विस्तृत किया गया है।

आलेख : सीमा चिश्ती

भारत की राजनीति में शिक्षा मंत्रालय का महत्व अक्सर उसके प्रशासनिक दायरे से कहीं अधिक व्यापक रहा है। शिक्षा मंत्रालय पाठ्यक्रम तय करता है, पाठ्यपुस्तकों की दिशा निर्धारित करता है, उच्च शिक्षा संस्थानों के स्वरूप को प्रभावित करता है और आने वाली पीढ़ियों की बौद्धिक दृष्टि को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यही कारण है कि भारतीय राजनीति में शिक्षा को लेकर वैचारिक संघर्ष नया नहीं है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ लंबे समय से यह समझता रहा है कि किसी समाज की दीर्घकालिक वैचारिक दिशा को प्रभावित करने के लिए शिक्षा व्यवस्था सबसे प्रभावी माध्यमों में से एक है। पाठ्यक्रम, इतिहास की व्याख्या, सांस्कृतिक संदर्भ, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता और छात्र संगठनों की भूमिका—इन सभी क्षेत्रों में होने वाले बदलावों का असर केवल वर्तमान पीढ़ी पर नहीं पड़ता, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की सोच और सामाजिक दृष्टि पर भी पड़ता है।

इसी दृष्टि से देखा जाए तो शिक्षा मंत्रालय पर प्रभाव स्थापित करना संघ परिवार की दीर्घकालिक राजनीतिक और वैचारिक प्राथमिकताओं में महत्वपूर्ण रहा है। 1967 में भारतीय जनसंघ के माध्यम से जब आरएसएस पहली बार सत्ता के प्रत्यक्ष राजनीतिक ढांचे में प्रभावशाली रूप से दिखाई दिया और उत्तर भारत के कुछ राज्यों में समाजवादियों के साथ संयुक्त विधायक दल की सरकारों में शामिल हुआ, तब से ही सत्ता और शिक्षा के संबंध को लेकर संघ की रणनीतिक सोच स्पष्ट दिखाई देती रही।

स्वतंत्र भारत के पहले शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आजाद का व्यक्तित्व इस संदर्भ में विशेष महत्व रखता है। वे स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख नेताओं में थे, प्रख्यात विद्वान थे और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष भी रह चुके थे। उनकी शिक्षा संबंधी दृष्टि आधुनिक, वैज्ञानिक और बहुलतावादी भारत की कल्पना पर आधारित थी। इसलिए शिक्षा मंत्रालय में उनका योगदान संघ परिवार की वैचारिक दृष्टि से हमेशा एक अलग तरह की चुनौती का प्रतिनिधित्व करता रहा।

शिक्षा और वैचारिक प्रभाव की राजनीति

शिक्षा के माध्यम से वैचारिक प्रभाव स्थापित करने की कोशिश केवल किसी एक राजनीतिक संगठन तक सीमित नहीं रही है। दुनिया भर में सत्ता और विचारधारा के बीच शिक्षा को लेकर संघर्ष देखने को मिलता है। भारत में भी अलग-अलग राजनीतिक दलों और सरकारों ने शिक्षा व्यवस्था में अपने दृष्टिकोण के अनुरूप बदलाव किए हैं।

इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली सरकार के दौरान भी शिक्षा के क्षेत्र में अधिक केंद्रीकरण की दिशा में कदम उठाए गए थे। शिक्षा को राज्यों के विशेष अधिकार क्षेत्र से निकालकर केंद्र की भूमिका को मजबूत करने की प्रक्रिया इसी व्यापक राजनीतिक पृष्ठभूमि का हिस्सा थी। हालांकि, संघ परिवार की शिक्षा संबंधी वैचारिक प्राथमिकताओं के पीछे मौजूद कारण इससे अलग और अधिक स्पष्ट वैचारिक आधार पर खड़े दिखाई देते हैं।

यह वैचारिक संघर्ष 2002 में भाजपा नेतृत्व वाली पहली एनडीए सरकार के दौरान खुलकर सामने आया। उस समय स्कूली पाठ्यपुस्तकों और पाठ्यक्रमों में किए गए बदलावों को लेकर देशभर में व्यापक विवाद हुआ। आलोचकों ने आरोप लगाया कि पाठ्यक्रम में बदलाव करते समय इतिहास और सामाजिक विज्ञान की सामग्री को वैचारिक दृष्टि से प्रभावित किया गया।

मामला अंततः सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा तैयार करते समय धर्मनिरपेक्षता के संवैधानिक सिद्धांतों की अनदेखी की गई और केंद्रीय शिक्षा सलाहकार बोर्ड से पर्याप्त परामर्श नहीं किया गया। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह माना कि केंद्रीय शिक्षा सलाहकार बोर्ड की भूमिका भले ही सलाहकार हो, लेकिन स्थापित परंपरा और केंद्र-राज्य समन्वय की दृष्टि से उससे परामर्श करना महत्वपूर्ण है।

उस समय शिक्षा मंत्रालय का नेतृत्व भाजपा के वरिष्ठ नेता और पार्टी के दो बार राष्ट्रीय अध्यक्ष रह चुके डॉ. मुरली मनोहर जोशी कर रहे थे। यह तथ्य अपने आप में बताता है कि शिक्षा मंत्रालय भाजपा और संघ परिवार की वैचारिक राजनीति में कितना महत्वपूर्ण स्थान रखता रहा है।

धर्मेंद्र प्रधान और शिक्षा मंत्रालय की भूमिका

मोदी सरकार के लंबे कार्यकाल में धर्मेंद्र प्रधान का शिक्षा मंत्री के रूप में कार्यकाल विशेष महत्व रखता है। वे केवल एक प्रशासनिक मंत्री नहीं थे, बल्कि भाजपा के संगठनात्मक ढांचे और संघ परिवार के वैचारिक तंत्र के साथ गहरे संबंध रखने वाले नेता के रूप में भी देखे जाते रहे।

उनकी राजनीतिक पृष्ठभूमि, संगठनात्मक अनुभव और संघ से जुड़े संबंधों ने उन्हें भाजपा के भीतर एक महत्वपूर्ण स्थान दिलाया। उनके पिता भी अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में केंद्रीय मंत्री रह चुके थे। धर्मेंद्र प्रधान स्वयं संगठनात्मक राजनीति में सक्रिय रहे और पार्टी के भीतर विभिन्न महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाते रहे।

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यही कारण है कि शिक्षा मंत्रालय की जिम्मेदारी लंबे समय तक उनके पास रहना महज संयोग नहीं माना जा सकता। शिक्षा के क्षेत्र में राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 को लागू करना, उच्च शिक्षा में संरचनात्मक बदलाव लाना, पाठ्यक्रमों में संशोधन करना और केंद्रीय संस्थानों के माध्यम से नई शैक्षिक दिशा निर्धारित करना—इन सभी प्रक्रियाओं में शिक्षा मंत्रालय की केंद्रीय भूमिका रही।

आरएसएस की दीर्घकालिक वैचारिक परियोजना के संदर्भ में धर्मेंद्र प्रधान का महत्व इसी बिंदु पर दिखाई देता है। संघ नेतृत्व को यह विश्वास रहा कि शिक्षा के क्षेत्र में उसके वैचारिक एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए धर्मेंद्र प्रधान उपयुक्त राजनीतिक नेतृत्व प्रदान कर सकते हैं।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 और राज्यों के अधिकारों का प्रश्न

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 को केंद्र सरकार ने शिक्षा व्यवस्था में व्यापक बदलाव के उद्देश्य से प्रस्तुत किया। नीति में प्रारंभिक शिक्षा, मातृभाषा, कौशल विकास, उच्च शिक्षा, तकनीकी शिक्षा और बहुविषयक अध्ययन से जुड़े अनेक प्रावधान शामिल हैं।

हालांकि, इस नीति को लेकर देशभर में कई गंभीर प्रश्न भी उठे हैं। आलोचकों का कहना है कि शिक्षा जैसे विषय में राज्यों की भूमिका को कमजोर करते हुए केंद्र सरकार की भूमिका को अत्यधिक मजबूत किया जा रहा है। भारत जैसे संघीय देश में शिक्षा व्यवस्था का संचालन केंद्र और राज्यों के बीच संतुलित सहयोग से होना चाहिए। लेकिन यदि नीतिगत निर्णयों और वित्तीय संसाधनों का नियंत्रण केंद्र के हाथों में अत्यधिक केंद्रित हो जाए, तो राज्यों की स्वायत्तता प्रभावित हो सकती है।

तमिलनाडु और केरल जैसे राज्यों ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति के कई प्रावधानों को लेकर अपनी आपत्तियां व्यक्त की हैं। इन राज्यों का तर्क रहा है कि शिक्षा नीति में राज्यों की सामाजिक, भाषाई और सांस्कृतिक विविधता को पर्याप्त महत्व दिया जाना चाहिए।

आलोचकों का आरोप है कि केंद्र सरकार ने कई अवसरों पर केंद्रीय वित्तीय सहायता को नीतिगत अनुपालन से जोड़कर राज्यों पर दबाव बनाने का प्रयास किया। यदि यह आरोप सही है, तो यह केवल राजनीतिक विवाद नहीं, बल्कि भारतीय संघीय ढांचे से जुड़ा गंभीर प्रश्न है।

शिक्षा में ‘इंडियन नॉलेज सिस्टम’ और वैज्ञानिक दृष्टिकोण

भारतीय ज्ञान परंपरा का अध्ययन अपने आप में कोई समस्या नहीं है। भारत की प्राचीन और मध्यकालीन बौद्धिक परंपराओं में गणित, चिकित्सा, दर्शन, भाषा, खगोल और साहित्य के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान रहा है। इन परंपराओं का गंभीर और आलोचनात्मक अध्ययन शिक्षा का हिस्सा हो सकता है।

समस्या तब पैदा होती है जब अतीत के गौरव को वैज्ञानिक परीक्षण से ऊपर रख दिया जाए। ज्ञान की किसी भी परंपरा का मूल्यांकन तर्क, प्रमाण और वैज्ञानिक पद्धति के आधार पर होना चाहिए। यदि किसी ऐतिहासिक दावे को केवल इसलिए सत्य मान लिया जाए कि वह प्राचीन ग्रंथों में वर्णित है, तो यह वैज्ञानिक दृष्टिकोण के विरुद्ध होगा।

आलोचकों का कहना है कि वर्तमान शिक्षा नीति के कुछ हिस्सों में भारतीय ज्ञान प्रणाली को बढ़ावा देने के नाम पर वैज्ञानिक दृष्टिकोण और आलोचनात्मक सोच को पीछे धकेलने का खतरा मौजूद है। आईआईटी जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में इंडियन नॉलेज सिस्टम पर जोर, विश्वविद्यालयों में पारंपरिक ज्ञान को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाने की कोशिश और तकनीक के साथ सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को जोड़ने की प्रक्रिया इसी बहस का हिस्सा है।

भारत का संविधान नागरिकों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानवतावाद और सुधार की भावना विकसित करने की बात करता है। इसलिए शिक्षा व्यवस्था का मूल उद्देश्य केवल अतीत के गौरव का बखान करना नहीं, बल्कि विद्यार्थियों को प्रश्न पूछने, असहमति व्यक्त करने और प्रमाणों के आधार पर निष्कर्ष निकालने के लिए तैयार करना होना चाहिए।

विश्वविद्यालयों में स्वायत्तता और नियुक्तियों पर सवाल

उच्च शिक्षा संस्थानों की स्वायत्तता लोकतांत्रिक समाज की बुनियादी आवश्यकता है। विश्वविद्यालय केवल डिग्री देने वाले संस्थान नहीं होते। वे विचार, बहस, शोध और असहमति के केंद्र होते हैं।

लेकिन पिछले वर्षों में विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता को लेकर लगातार चिंताएं व्यक्त की गई हैं। कुलपतियों और शीर्ष पदों पर नियुक्तियों को लेकर भी कई बार विवाद सामने आए। आलोचकों का आरोप रहा कि कुछ नियुक्तियों में वैचारिक निकटता को योग्यता और अकादमिक स्वतंत्रता से अधिक महत्व दिया गया।

यदि विश्वविद्यालयों के प्रशासनिक ढांचे में किसी विशेष विचारधारा से जुड़े लोगों का लगातार वर्चस्व स्थापित हो जाए, तो इसका असर शोध, पाठ्यक्रम और छात्र जीवन पर पड़ सकता है। विश्वविद्यालयों को किसी भी राजनीतिक संगठन का विस्तार नहीं, बल्कि स्वतंत्र बौद्धिक संस्थान होना चाहिए।

यही कारण है कि विश्वविद्यालयों में नियुक्तियों और अकादमिक स्वायत्तता का प्रश्न इतना महत्वपूर्ण है। शिक्षा व्यवस्था में विचारधारा की भूमिका पर बहस हो सकती है, लेकिन किसी भी विचारधारा का पूर्ण संस्थागत वर्चस्व लोकतांत्रिक शिक्षा के लिए चुनौती बन सकता है।

छात्र संगठनों की भूमिका और एबीवीपी का बढ़ता प्रभाव

भारतीय विश्वविद्यालय परिसरों में छात्र संगठनों की भूमिका ऐतिहासिक रही है। स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर लोकतांत्रिक आंदोलनों तक, छात्रों ने हमेशा महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

विभिन्न विचारधाराओं से जुड़े छात्र संगठन विश्वविद्यालयों में बहस और लोकतांत्रिक संवाद को मजबूत करते हैं। लेकिन यदि स्वतंत्र छात्र संगठनों को प्रशासनिक दबाव, वित्तीय संकट या राजनीतिक वातावरण के कारण कमजोर किया जाता है, तो परिसरों में वैचारिक संतुलन प्रभावित हो सकता है।

आलोचकों का कहना है कि अनेक विश्वविद्यालयों में स्वतंत्र छात्र राजनीति के कमजोर पड़ने के साथ अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का प्रभाव बढ़ा है। एबीवीपी आरएसएस से संबद्ध छात्र संगठन है और देश के अनेक विश्वविद्यालय परिसरों में उसकी मजबूत उपस्थिति है।

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किसी भी छात्र संगठन का मजबूत होना अपने आप में लोकतांत्रिक समस्या नहीं है। समस्या तब पैदा होती है जब अन्य विचारों और संगठनों के लिए समान अवसर उपलब्ध न रहें। विश्वविद्यालयों में लोकतंत्र तभी मजबूत हो सकता है, जब अलग-अलग विचारों को समान रूप से अभिव्यक्ति का अवसर मिले।

हाशिये के विद्यार्थियों के लिए घटते अवसर

भारत में शिक्षा सामाजिक न्याय का सबसे प्रभावी माध्यम रही है। दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के विद्यार्थियों के लिए छात्रवृत्तियां और सार्वजनिक शिक्षा संस्थान सामाजिक गतिशीलता के महत्वपूर्ण साधन हैं।

लेकिन पिछले वर्षों में सामाजिक रूप से वंचित वर्गों के विद्यार्थियों को मिलने वाली छात्रवृत्तियों और वित्तीय सहायता को लेकर लगातार चिंताएं सामने आई हैं। आलोचकों का आरोप है कि अल्पसंख्यक और दलित विद्यार्थियों के लिए कई छात्रवृत्ति योजनाओं के बजट में कटौती की गई।

यदि किसी गरीब विद्यार्थी को उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए छात्रवृत्ति पर निर्भर रहना पड़ता है और वह सहायता कम कर दी जाती है, तो इसका सीधा असर उसके भविष्य पर पड़ता है। शिक्षा में समान अवसर केवल संवैधानिक नारा नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की मूल शर्त है।

विज्ञान के विद्यार्थियों के लिए चलाई जा रही इंस्पायर-एसएचई जैसी छात्रवृत्ति योजनाओं को लेकर भी चिंता व्यक्त की गई है। विज्ञान और शोध के क्षेत्र में भारत को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिभाशाली विद्यार्थियों को आर्थिक सहायता देना आवश्यक है। यदि ऐसी योजनाएं कमजोर होती हैं, तो इसका असर देश की वैज्ञानिक क्षमता पर पड़ सकता है।

शिक्षा बजट में गिरावट का व्यापक असर

सार्वजनिक शिक्षा पर सरकारी खर्च में कमी का मुद्दा लंबे समय से बहस का विषय रहा है। शिक्षा केवल भवनों, शिक्षकों और पाठ्यपुस्तकों पर खर्च का विषय नहीं है। यह देश के मानव संसाधन में निवेश है।

केंद्रीय बजट में शिक्षा मंत्रालय की हिस्सेदारी में आई गिरावट को लेकर कई विश्लेषण सामने आए हैं। उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर आलोचकों का कहना है कि केंद्रीय बजट में शिक्षा का हिस्सा पिछले वर्षों की तुलना में घटा है।

यदि सरकार शिक्षा को अपनी प्राथमिकता मानती है, तो उसके बजट में भी उसका स्पष्ट प्रतिबिंब दिखाई देना चाहिए। शिक्षा पर पर्याप्त खर्च के बिना गुणवत्तापूर्ण विद्यालय, प्रशिक्षित शिक्षक, शोध संस्थान, छात्रवृत्तियां और उच्च शिक्षा के अवसर उपलब्ध कराना कठिन है।

एक ओर सरकार भारत को ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था बनाने की बात करती है, वहीं दूसरी ओर सार्वजनिक शिक्षा में निवेश घटता है, तो यह विरोधाभास पैदा करता है।

प्रश्नपत्र लीक और परीक्षा व्यवस्था का संकट

शिक्षा व्यवस्था में विद्यार्थियों और युवाओं का विश्वास केवल पाठ्यक्रम से नहीं, बल्कि परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता से भी बनता है।

पिछले वर्षों में प्रश्नपत्र लीक, परीक्षा परिणामों में अनियमितता और भर्ती परीक्षाओं के आयोजन में देरी को लेकर युवाओं में गहरा असंतोष पैदा हुआ है। राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी जैसी संस्थाओं पर भी परीक्षा संचालन और प्रबंधन को लेकर सवाल उठे हैं।

जब कोई विद्यार्थी वर्षों तक तैयारी करता है और परीक्षा से ठीक पहले प्रश्नपत्र लीक हो जाता है, तो उसका भरोसा केवल एक परीक्षा से नहीं टूटता, बल्कि पूरी व्यवस्था से उठने लगता है।

भारत में लाखों युवा प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं। उनके परिवार आर्थिक और सामाजिक स्तर पर भारी sacrifices करते हैं। यदि परीक्षाएं बार-बार रद्द हों, प्रश्नपत्र लीक हों या परिणामों में विवाद पैदा हो, तो इसका सीधा असर युवाओं के भविष्य पर पड़ता है।

रोजगार संकट और अग्निवीर योजना

शिक्षा और रोजगार को अलग-अलग करके नहीं देखा जा सकता। विद्यार्थी शिक्षा इसलिए प्राप्त करता है कि वह अपने जीवन को बेहतर बना सके और सम्मानजनक रोजगार प्राप्त कर सके।

सरकारी नौकरियों में लंबे समय तक भर्ती न निकलना, परीक्षाओं का नियमित आयोजन न होना और भर्ती प्रक्रियाओं में देरी ने युवाओं की चिंता बढ़ाई है।

सशस्त्र बलों में अग्निवीर योजना लागू होने के बाद भी व्यापक बहस हुई। सेना की नौकरी को लंबे समय से युवा स्थायी और सुरक्षित रोजगार के रूप में देखते रहे हैं। ऐसे में सेवा अवधि और भविष्य की सुरक्षा से जुड़े सवालों ने युवाओं के बीच असंतोष पैदा किया।

जब शिक्षा, परीक्षा और रोजगार—तीनों क्षेत्रों में अनिश्चितता बढ़ती है, तो युवाओं का असंतोष व्यापक सामाजिक आंदोलन का रूप ले सकता है।

क्या धर्मेंद्र प्रधान की विदाई केवल राजनीतिक बदलाव है?

यदि धर्मेंद्र प्रधान को शिक्षा मंत्रालय से हटाया गया है, तो इसे केवल एक प्रशासनिक फेरबदल के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। उनके कार्यकाल में शिक्षा व्यवस्था से जुड़े अनेक बड़े निर्णय लिए गए।

उनकी विदाई के बाद यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या सरकार शिक्षा नीति को लेकर अपनी रणनीति में कोई बदलाव करेगी? क्या राज्यों की भूमिका बढ़ेगी? क्या परीक्षा व्यवस्था में सुधार होगा? क्या छात्रवृत्तियों और सार्वजनिक शिक्षा में निवेश बढ़ेगा? क्या विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता को मजबूत किया जाएगा?

या फिर केवल मंत्री बदलेगा और नीतिगत दिशा वही रहेगी?

यह प्रश्न इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि शिक्षा व्यवस्था की समस्याओं को केवल किसी एक मंत्री की प्रशासनिक विफलता बताकर समाप्त नहीं किया जा सकता। यदि समस्याएं संरचनात्मक हैं, तो उनका समाधान भी संरचनात्मक होना चाहिए।

आरएसएस की शिक्षा परियोजना के सामने नई चुनौती

आरएसएस के लिए शिक्षा केवल सरकार का एक विभाग नहीं है। यह समाज के वैचारिक पुनर्गठन का माध्यम है। आने वाली पीढ़ियों को इतिहास, संस्कृति, राष्ट्र और समाज के बारे में किस दृष्टि से शिक्षित किया जाए—यह किसी भी वैचारिक संगठन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न होता है।

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इसीलिए धर्मेंद्र प्रधान का शिक्षा मंत्रालय से हटना संघ परिवार के लिए राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा सकता है। यदि उनके कार्यकाल के दौरान लागू की गई नीतियों को लेकर व्यापक जनअसंतोष पैदा हुआ है, तो इसका असर केवल एक मंत्री की छवि तक सीमित नहीं रहेगा। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या युवा पीढ़ी शिक्षा के क्षेत्र में किए जा रहे वैचारिक बदलावों को स्वीकार करेगी?

आज का युवा पहले की तुलना में अधिक जुड़ा हुआ है। वह सोशल मीडिया, डिजिटल प्लेटफॉर्म और स्वतंत्र स्रोतों के माध्यम से अलग-अलग विचारों तक पहुंच रखता है। वह सरकारी दावों को बिना प्रश्न स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है।

यही कारण है कि युवाओं के बीच शिक्षा, रोजगार, परीक्षा और अवसरों का प्रश्न लगातार राजनीतिक महत्व हासिल कर रहा है।

जेन-जी और वैचारिक राजनीति की चुनौती

आरएसएस और भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह हो सकती है कि नई पीढ़ी को केवल अतीत की गौरवगाथाओं के माध्यम से प्रभावित करना अब उतना आसान नहीं है।

आज का युवा रोजगार चाहता है। वह गुणवत्तापूर्ण शिक्षा चाहता है। वह निष्पक्ष परीक्षा चाहता है। वह विश्वविद्यालयों में स्वतंत्र वातावरण चाहता है। वह विज्ञान और तकनीक में अवसर चाहता है। वह अपने भविष्य को लेकर स्पष्टता चाहता है।

यदि शिक्षा व्यवस्था उसे केवल सांस्कृतिक गौरव का पाठ पढ़ाए, लेकिन रोजगार न दे; यदि उसे तकनीक का सपना दिखाया जाए, लेकिन वैज्ञानिक शोध के लिए पर्याप्त संसाधन न हों; यदि उसे राष्ट्रवाद का संदेश दिया जाए, लेकिन परीक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता न हो—तो असंतोष पैदा होना स्वाभाविक है। यही वह बिंदु है जहां विचारधारा और वास्तविक जीवन की समस्याओं के बीच टकराव पैदा होता है।

क्या शिक्षा आंदोलन ‘संपूर्ण क्रांति’ की ओर बढ़ सकता है?

धर्मेंद्र प्रधान की विदाई और उससे जुड़े राजनीतिक घटनाक्रम ने शिक्षा के प्रश्न को एक बार फिर राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया है।

यदि युवाओं का असंतोष केवल किसी एक परीक्षा, एक नीति या एक मंत्री के खिलाफ नहीं है, बल्कि शिक्षा और रोजगार की पूरी व्यवस्था को लेकर है, तो भविष्य में आंदोलन का दायरा व्यापक हो सकता है।

संभव है कि युवा केवल प्रश्नपत्र लीक की जांच या परीक्षा रद्द करने की मांग तक सीमित न रहें। वे शिक्षा के बजट, छात्रवृत्ति, विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता, राज्यों के अधिकार, रोजगार और परीक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधार की मांग करें।

यही वह स्थिति है जिससे किसी भी सरकार को सबसे अधिक सावधान रहना चाहिए। जनआंदोलन अक्सर किसी एक घटना से शुरू होते हैं, लेकिन उनका विस्तार व्यापक असंतोष की जमीन पर होता है।

आज शिक्षा का प्रश्न भारत के करोड़ों परिवारों का प्रश्न है। यह उन माता-पिता का प्रश्न है, जो अपने बच्चों की पढ़ाई के लिए अपनी आय का बड़ा हिस्सा खर्च करते हैं। यह उन विद्यार्थियों का प्रश्न है, जो वर्षों तक प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं। यह उन युवाओं का प्रश्न है, जो डिग्री लेने के बाद भी रोजगार की तलाश में भटकते हैं।

इसलिए धर्मेंद्र प्रधान की विदाई को केवल एक मंत्री के राजनीतिक भविष्य के संदर्भ में देखना पर्याप्त नहीं है। इससे बड़ा सवाल यह है कि भारत की शिक्षा व्यवस्था किस दिशा में जाएगी।

क्या शिक्षा वैज्ञानिक दृष्टिकोण, आलोचनात्मक सोच, सामाजिक न्याय और लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूत करेगी? या फिर वह किसी एक वैचारिक परियोजना का माध्यम बन जाएगी?

आरएसएस और भाजपा के लिए चुनौती यही है कि शिक्षा के क्षेत्र में उनकी दीर्घकालिक वैचारिक परियोजना अब व्यापक सार्वजनिक बहस के केंद्र में आ गई है। धर्मेंद्र प्रधान के कार्यकाल से जुड़े विवादों को केवल प्रशासनिक चूक बताकर समाप्त करना संभव नहीं होगा। यदि शिक्षा व्यवस्था में वास्तविक समस्याएं हैं, तो उनका समाधान भी वास्तविक और व्यापक होना चाहिए। भारत की युवा पीढ़ी केवल अतीत की व्याख्या सुनना नहीं चाहती। वह अपने भविष्य की गारंटी चाहती है।

वह ऐसी शिक्षा चाहती है, जो उसे प्रश्न पूछना सिखाए। वह ऐसी परीक्षा व्यवस्था चाहती है, जिस पर उसे भरोसा हो। वह ऐसा विश्वविद्यालय चाहती है, जहां विचारों की स्वतंत्रता हो। वह ऐसी सरकार चाहती है, जो शिक्षा को राजनीतिक प्रयोगशाला नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण का आधार माने।

यदि वर्तमान जनाक्रोश आगे बढ़ता है, तो संभव है कि आने वाले समय में शिक्षा का प्रश्न भारत की राजनीति के सबसे बड़े मुद्दों में शामिल हो जाए। तब बहस केवल किसी एक मंत्री के इस्तीफे या किसी एक नीति की समीक्षा तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि देश की पूरी शिक्षा व्यवस्था की दिशा पर होगी।

और शायद यही वह क्षण होगा, जब भारत के युवा यह तय करेंगे कि उनकी शिक्षा उन्हें केवल अतीत का आज्ञाकारी वाहक बनाएगी या भविष्य का स्वतंत्र, वैज्ञानिक और आलोचनात्मक नागरिक।

लेखकीय परिचय – सीमा चिश्ती डिजिटल समाचार पोर्टल द वायर की संपादकों में से एक हैं। वह बीबीसी के दिल्ली ब्यूरो की प्रमुख और द न्यू इंडियन एक्सप्रेस में उप-संपादक के रूप में भी कार्य कर चुकी हैं।

[संपादकीय अस्वीकरणइस आलेख में व्यक्त विचार लेखिका के निजी विचार हो सकते हैं। ‘जनगणदूत’ संपादकीय परिवार इन विचारों से सहमत या असहमत हो, यह आवश्यक नहीं है। आलेख का प्रकाशन लेखिका के विचारों को पाठकों तक पहुंचाने के उद्देश्य से किया गया है।]

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Author: यायावर

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One Response

  1. केवल कृष्ण पनगोत्रा स्वतंत्र लेखक-पत्रकार says:

    सीमा चिश्ती मैडम जी ने धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे के आलोक में भारतीय शिक्षा नीति २०२० का बहुत बढ़िया और विस्तृत पोस्ट मार्टम किया है। इसमें कोई संदेह नहीं कि २००२ से ही हमारी विज्ञान आधारित शिक्षा को चौपट करने की तैयारी की बू आना शुरू हो गई थी। इस बात हर नागरिक नहीं समझ पाया कि शिक्षा मंत्री के इस्तीफे पर पढ़े लिखे युवा इतना जोर क्यों दे रहे थे।
    आने वाले समय में वैज्ञानिक और तर्कसंगत शिक्षा एक बड़ा मुद्दा होना चाहिए। शिक्षा किसी एक विचारधारा की गुलाम नहीं होनी चाहिए। लेकिन इस समय हम एक दुर्भाग्य के दौर से गुज़र रहे हैं।
    आशा करता हूं कि जनगनदूत डॉट कॉम पर और लेख पढ़ने को मिलेंगे।

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