रिपोर्ट: दुर्गा प्रसाद शुक्ला
राजनीति में समय बीतता रहता है, लेकिन कुछ घटनाएं ऐसी होती हैं जो वर्षों बाद अचानक वर्तमान के सवालों के साथ खड़ी दिखाई देने लगती हैं। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान से जुड़ा प्रश्नपत्र लीक का एक पुराना प्रसंग इन दिनों इसी तरह चर्चा में है। विडंबना यह है कि करीब तीन दशक पहले प्रश्नपत्र लीक के विरोध में जिस छात्र आंदोलन का नेतृत्व करते हुए धर्मेंद्र प्रधान स्वयं पुलिस लाठीचार्ज में घायल हुए थे, आज उन्हीं से प्रश्नपत्र लीक के मुद्दे पर इस्तीफे की मांग की जा रही है।
साल 1997 में ओडिशा की तत्कालीन सरकार के दौरान प्रश्नपत्र लीक के खिलाफ अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद यानी एबीवीपी ने बड़ा प्रदर्शन किया था। उस समय धर्मेंद्र प्रधान संगठन के राष्ट्रीय महासचिव थे और प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे थे। प्रदर्शनकारियों पर पुलिस की कार्रवाई हुई और कई छात्र कार्यकर्ता घायल हुए। बताया जाता है कि घायल होने वालों में धर्मेंद्र प्रधान भी शामिल थे।
करीब 29 वर्ष बाद, जुलाई 2026 में प्रश्नपत्र लीक और परीक्षा व्यवस्था से जुड़े विवाद को लेकर छात्रों और युवाओं के आंदोलन ने एक बार फिर इस पुराने प्रसंग को राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया। इस बार सवाल यह है कि जिस नेता ने कभी प्रश्नपत्र लीक के खिलाफ सड़क पर उतरकर आंदोलन किया था, क्या आज शिक्षा मंत्री के रूप में परीक्षा व्यवस्था की जवाबदेही भी उसी राजनीतिक कसौटी पर तय की जानी चाहिए?
यही वह विरोधाभास है, जिसने धर्मेंद्र प्रधान के पुराने छात्र आंदोलन और वर्तमान राजनीतिक भूमिका को आमने-सामने ला दिया है।
1997 में प्रश्नपत्र लीक के खिलाफ सड़क पर उतरे थे धर्मेंद्र प्रधान
उपलब्ध विवरण के अनुसार 1997 में ओडिशा में प्लस टू यानी बारहवीं कक्षा की परीक्षा का प्रश्नपत्र लीक होने के विरोध में एबीवीपी ने राज्य विधानसभा और सचिवालय के आसपास प्रदर्शन किया था। उस समय धर्मेंद्र प्रधान एबीवीपी के राष्ट्रीय महासचिव थे और आंदोलन का नेतृत्व कर रहे थे।
इस घटना का उल्लेख वर्ष 2021 में प्रकाशित एक रिपोर्ट में भी किया गया था, जिसे मौजूदा विवाद के बीच दोबारा सोशल मीडिया और मुख्यधारा के मीडिया में साझा किया जा रहा है।
उस समय प्रदर्शन में शामिल रहे प्रशांत राउत ने बाद में इस घटना को याद करते हुए बताया कि वे एबीवीपी की भुवनेश्वर शाखा के अध्यक्ष थे। उनके मुताबिक प्रश्नपत्र लीक के विरोध में सैकड़ों कार्यकर्ता प्रदर्शन कर रहे थे। प्रदर्शनकारियों को नियंत्रित करने के लिए पुलिस ने लाठीचार्ज किया, जिसमें बड़ी संख्या में कार्यकर्ता घायल हुए।
राउत के अनुसार करीब 64 कार्यकर्ता घायल हुए और उन्हें अस्पताल ले जाना पड़ा। उनका दावा है कि घायलों में धर्मेंद्र प्रधान और वह स्वयं भी शामिल थे।
प्रशांत राउत ने उस दौर की स्थिति को बेहद गंभीर बताते हुए कहा था कि 1988 से 1997 के बीच ओडिशा में लगभग हर वर्ष प्रश्नपत्र लीक होने की घटनाओं की चर्चा होती थी। इसी कारण आंदोलनकारी उस दौर को प्रश्नपत्र लीक का दशक कहा करते थे।
आज जब परीक्षा व्यवस्था, पेपर लीक और छात्रों के भविष्य का मुद्दा फिर राजनीतिक संघर्ष का कारण बना है, तब 1997 की यह घटना स्वाभाविक रूप से वर्तमान बहस से जुड़ गई है।
छात्र राजनीति से शुरू हुआ था धर्मेंद्र प्रधान का राजनीतिक सफर
धर्मेंद्र प्रधान का राजनीतिक सफर छात्र राजनीति से शुरू हुआ। वह शुरुआती दौर से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के साथ सक्रिय रहे। तालचेर कॉलेज छात्रसंघ के अध्यक्ष पद तक पहुंचे और बाद में उत्कल विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति में भी सक्रिय भूमिका निभाई।
उत्कल विश्वविद्यालय छात्रसंघ अध्यक्ष पद के चुनाव में उन्होंने एबीवीपी के प्रत्याशी के तौर पर चुनाव लड़ा था। हालांकि इस चुनाव में उन्हें सफलता नहीं मिली। चुनाव में एसएफआई के उम्मीदवार अरुण साहू विजयी हुए, जबकि सिंधुज्योति त्रिपाठी दूसरे स्थान पर रहे और धर्मेंद्र प्रधान तीसरे स्थान पर रहे।
दिलचस्प बात यह है कि छात्र राजनीति में धर्मेंद्र प्रधान के प्रतिद्वंद्वी रहे अरुण साहू आगे चलकर ओडिशा की राजनीति के महत्वपूर्ण चेहरों में शामिल हुए और बीजू जनता दल की सरकार में उच्च शिक्षा मंत्री की जिम्मेदारी भी संभाली।
इस राजनीतिक यात्रा का एक दिलचस्प संयोग यह भी रहा कि वर्षों बाद दोनों नेता एक ही मंच पर दिखाई दिए। 2019 में उत्कल विश्वविद्यालय के प्लैटिनम जयंती समारोह में धर्मेंद्र प्रधान और अरुण साहू साथ उपस्थित थे।
कभी विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति में आमने-सामने खड़े रहे दो चेहरे बाद में ओडिशा की राजनीति में अलग-अलग राजनीतिक धाराओं के महत्वपूर्ण प्रतिनिधि बन गए।
छात्र राजनीति में साधारण चेहरा, राष्ट्रीय राजनीति में बड़ा नाम
धर्मेंद्र प्रधान के पुराने सहपाठी सिंधुज्योति त्रिपाठी के अनुसार छात्र जीवन में प्रधान बहुत चर्चित चेहरा नहीं थे। उनके मुताबिक विश्वविद्यालय परिसर में एबीवीपी की संगठनात्मक पकड़ मजबूत थी और इसी वजह से प्रधान को चुनाव में अपेक्षाकृत अच्छा समर्थन मिला।
हालांकि चुनाव हारने के बाद भी उनका राजनीतिक सफर रुका नहीं। संगठनात्मक गतिविधियों में सक्रियता और लगातार काम करने की क्षमता ने उन्हें एबीवीपी के राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाया।
1994 में धर्मेंद्र प्रधान एबीवीपी के राष्ट्रीय महासचिव बने और 1997 तक इस पद पर रहे। इसके बाद भारतीय जनता युवा मोर्चा में भी उन्होंने महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभाई। आगे चलकर वे भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव बने और विभिन्न राज्यों में संगठनात्मक जिम्मेदारियां संभालीं।
यहीं से छात्र राजनीति का वह चेहरा राष्ट्रीय राजनीति के बड़े मंच पर दिखाई देने लगा, जिसने कभी प्रश्नपत्र लीक के खिलाफ आंदोलन में पुलिस कार्रवाई का सामना किया था।
चुनावी राजनीति में प्रवेश और लगातार बढ़ता कद
धर्मेंद्र प्रधान का सक्रिय चुनावी राजनीतिक सफर वर्ष 2000 में शुरू हुआ। उन्होंने ओडिशा के पल्लहड़ा विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ा और जीत दर्ज की। इसके बाद 2004 में देवगढ़ लोकसभा क्षेत्र से सांसद चुने गए।
समय के साथ उनका राजनीतिक प्रभाव बढ़ता गया। बाद में वह बिहार और मध्य प्रदेश से राज्यसभा सांसद रहे। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में 2014 में केंद्र में भाजपा की सरकार बनने के बाद उन्हें पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मिली।
केंद्र सरकार में मंत्री बनने के बाद भी ओडिशा से उनका राजनीतिक संपर्क बना रहा। पार्टी संगठन को मजबूत करने के लिए उनके लगातार राज्य दौरे की चर्चा होती रही। बताया जाता है कि सप्ताहांत में वह ओडिशा में रहकर पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ संवाद करते और संगठन की जमीनी स्थिति पर काम करते थे। यही संगठनात्मक सक्रियता आगे चलकर ओडिशा में भाजपा के विस्तार की रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बनी।
ओडिशा में भाजपा के विस्तार में प्रधान की भूमिका
वरिष्ठ पत्रकार रूबेन बनर्जी समेत कई राजनीतिक विश्लेषकों ने ओडिशा में भाजपा के संगठनात्मक विस्तार में धर्मेंद्र प्रधान की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया है।
2014 के बाद जब भाजपा केंद्र में मजबूत स्थिति में आई, तब प्रधान ने ओडिशा में पार्टी संगठन को मजबूत करने के लिए लगातार काम किया। बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं से संवाद, स्थानीय समस्याओं की जानकारी और संगठनात्मक नेटवर्क को विस्तार देने पर विशेष जोर दिया गया।
धर्मेंद्र प्रधान के साथ काम कर चुके संबित त्रिपाठी का भी दावा रहा है कि प्रधान राज्य के जमीनी कार्यकर्ताओं से व्यक्तिगत स्तर पर संपर्क रखते थे। उनके मुताबिक वह कार्यकर्ताओं के नाम तक याद रखते थे और केंद्र में अपनी राजनीतिक स्थिति का इस्तेमाल स्थानीय समस्याओं को उठाने के लिए करते थे।
राजनीतिक दृष्टि से देखें तो यही संगठनात्मक मेहनत बाद के वर्षों में ओडिशा में भाजपा की बढ़ती राजनीतिक ताकत की पृष्ठभूमि बनी।
नवीन पटनायक और धर्मेंद्र प्रधान: राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता का दूसरा अध्याय
धर्मेंद्र प्रधान के राजनीतिक उत्थान की चर्चा ओडिशा के पूर्व मुख्यमंत्री और बीजू जनता दल के प्रमुख नवीन पटनायक के संदर्भ के बिना अधूरी रहती है।
वरिष्ठ पत्रकार रूबेन बनर्जी ने अपनी पुस्तक में एक प्रसंग का उल्लेख किया है कि वर्ष 2000 में चुनाव परिणाम आने के दौरान जब यह सूचना मिली कि पल्लहड़ा सीट पर धर्मेंद्र प्रधान आगे चल रहे हैं, तब नवीन पटनायक ने कथित तौर पर इसे अपने लिए समस्या बताया था।
हालांकि इस प्रसंग को लेकर अलग-अलग राजनीतिक मत रहे हैं। लेकिन यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि धर्मेंद्र प्रधान ने धीरे-धीरे ओडिशा की राजनीति में भाजपा के एक महत्वपूर्ण चेहरे के रूप में अपनी जगह बनाई।
बाद के वर्षों में भाजपा और बीजद के राजनीतिक संबंधों में बदलाव आया। गठबंधन के दौर से लेकर अलग राजनीतिक प्रतिस्पर्धा तक दोनों दलों की राह अलग होती गई। इसी राजनीतिक पृष्ठभूमि में आज धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग और नवीन पटनायक के रुख को देखा जा रहा है।
2026 का छात्र आंदोलन और फिर उठी इस्तीफे की मांग
जुलाई 2026 में परीक्षा और प्रश्नपत्र लीक से जुड़े विवाद को लेकर छात्रों और युवाओं के आंदोलन ने शिक्षा व्यवस्था को लेकर नई बहस पैदा कर दी। प्रदर्शनकारियों ने शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान की जवाबदेही पर सवाल उठाते हुए उनके इस्तीफे की मांग की।
20 जुलाई को संसद की ओर मार्च कर रहे छात्रों और युवाओं पर पुलिस कार्रवाई की खबरों के बाद यह विवाद और तेज हुआ। प्रदर्शन के दौरान कई प्रदर्शनकारियों के घायल होने और अस्पताल में भर्ती कराए जाने की बात सामने आई।
यहीं से 1997 और 2026 की घटनाओं के बीच तुलना शुरू हुई।
तीन दशक पहले प्रश्नपत्र लीक के विरोध में प्रदर्शन करने वाले धर्मेंद्र प्रधान पुलिस कार्रवाई में घायल हुए थे। 2026 में प्रश्नपत्र लीक के मुद्दे पर आंदोलन कर रहे छात्रों पर पुलिस कार्रवाई हुई और वे घायल हुए। फर्क सिर्फ इतना है कि 1997 में प्रधान आंदोलनकारी छात्र नेता थे, जबकि 2026 में वह देश के शिक्षा मंत्री हैं।
यही राजनीतिक विडंबना इस पूरे विवाद को सामान्य विरोध-प्रदर्शन से कहीं आगे ले जाती है।
विपक्ष का सवाल: जिस मुद्दे पर कभी आंदोलन किया, आज उसी पर जवाबदेही क्यों नहीं?
विपक्ष का मूल सवाल यही है कि शिक्षा मंत्री होने के नाते परीक्षा व्यवस्था की जिम्मेदारी राजनीतिक नेतृत्व की भी है। यदि प्रश्नपत्र लीक जैसी घटनाएं छात्रों के भविष्य और पूरी परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता को प्रभावित करती हैं, तो सरकार को जवाबदेही स्वीकार करनी चाहिए।
इस्तीफे की मांग करने वाले दल और छात्र संगठन इसे केवल राजनीतिक विरोध का विषय नहीं मानते। उनके लिए यह परीक्षा व्यवस्था में भरोसे, पारदर्शिता और छात्रों के भविष्य से जुड़ा प्रश्न है।
वहीं भाजपा नेताओं का तर्क इससे अलग है। उनका कहना है कि परीक्षा दोबारा आयोजित हो चुकी है और छात्रों के हित में आवश्यक कदम उठाए गए हैं। भाजपा नेताओं ने विपक्ष पर छात्रों की भावनाओं का राजनीतिक इस्तेमाल करने का आरोप लगाया है।
इस प्रकार एक ही घटना को लेकर दो बिल्कुल अलग राजनीतिक व्याख्याएं सामने आ रही हैं।
भाजपा का पलटवार: आंदोलन के पीछे राजनीति
भाजपा नेताओं ने प्रश्नपत्र लीक और परीक्षा विवाद को लेकर विपक्ष के आंदोलन को राजनीतिक रणनीति बताया है। पार्टी नेताओं का कहना है कि परीक्षा प्रक्रिया में सामने आई समस्या का समाधान किया जा चुका है और परीक्षा दोबारा आयोजित होने के बाद छात्रों का भविष्य सुरक्षित करने के प्रयास हुए हैं।
कुछ भाजपा नेताओं ने यह भी आरोप लगाया कि विपक्ष नई शिक्षा नीति और केंद्र सरकार की शिक्षा संबंधी नीतियों के विरोध को प्रश्नपत्र लीक के मुद्दे से जोड़ रहा है।
भाजपा के नेताओं की ओर से ओडिशा में पिछली सरकार के कार्यकाल में प्रश्नपत्र लीक की कथित घटनाओं का हवाला देकर पलटवार भी किया गया है। उनका तर्क है कि यदि आज प्रश्नपत्र लीक को लेकर जवाबदेही तय की जा रही है तो पिछली सरकारों के कार्यकाल में हुई ऐसी घटनाओं पर भी समान दृष्टि होनी चाहिए।
लेकिन विपक्ष का सवाल यही है कि अतीत की गलतियां वर्तमान सरकार की जवाबदेही को समाप्त नहीं कर सकतीं।
सवाल सिर्फ धर्मेंद्र प्रधान का नहीं, परीक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता का भी है
प्रश्नपत्र लीक का मामला किसी एक राजनीतिक दल या एक मंत्री तक सीमित नहीं है। यह शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता से जुड़ा विषय है।
एक छात्र वर्षों तक प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करता है। परिवार अपनी आय का बड़ा हिस्सा उसकी पढ़ाई और कोचिंग पर खर्च करता है। परीक्षा के दिन वह इस भरोसे के साथ केंद्र पहुंचता है कि प्रश्नपत्र सुरक्षित है और परिणाम उसकी मेहनत के आधार पर तय होगा।
यदि प्रश्नपत्र पहले ही लीक हो जाए, तो नुकसान केवल एक परीक्षा का नहीं होता। इससे छात्रों का भरोसा टूटता है, मेहनत पर सवाल उठता है और पूरी व्यवस्था की निष्पक्षता संदिग्ध होती है।
यही वजह है कि प्रश्नपत्र लीक का मुद्दा हर सरकार के लिए संवेदनशील होना चाहिए। राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से आगे जाकर परीक्षा प्रणाली में तकनीकी सुरक्षा, गोपनीयता, प्रश्नपत्र वितरण, डिजिटल निगरानी और दोषियों के खिलाफ त्वरित कार्रवाई जैसे उपायों पर गंभीरता से काम करने की जरूरत है।
1997 से 2026 तक बदल गया राजनीतिक किरदार
धर्मेंद्र प्रधान की राजनीतिक यात्रा का सबसे दिलचस्प पहलू यही है कि 1997 और 2026 में उनका किरदार पूरी तरह बदल गया।
1997 में वह युवा छात्र नेता थे। वह सरकार के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे थे और प्रश्नपत्र लीक को छात्रों के भविष्य से जुड़ा गंभीर मुद्दा मानकर सड़क पर उतरे थे।
2026 में वह केंद्र सरकार में शिक्षा मंत्री हैं। अब सवाल सरकार से पूछा जा रहा है और जवाबदेही का केंद्र भी सरकार ही है।
इसलिए 1997 की घटना को आज के संदर्भ में याद किया जाना केवल राजनीतिक व्यंग्य या विरोधाभास नहीं है। यह इस बात की याद दिलाता है कि सत्ता में आने के बाद हर राजनीतिक नेता को उन मूल्यों की कसौटी पर भी परखा जाता है, जिनके लिए उसने कभी संघर्ष किया था।
क्या इतिहास खुद को दोहरा रहा है?
29 साल का अंतराल बहुत लंबा होता है। एक छात्र नेता मंत्री बन सकता है, आंदोलनकारी सत्ता का हिस्सा बन सकता है और कभी जिस सरकार से सवाल पूछे गए थे, उसी तरह के सवाल बाद में उसके सामने खड़े हो सकते हैं।
धर्मेंद्र प्रधान के मामले में प्रश्नपत्र लीक से जुड़ी 1997 की घटना और 2026 का छात्र आंदोलन इसी राजनीतिक यात्रा का असाधारण विरोधाभास प्रस्तुत करते हैं।
हालांकि दोनों घटनाओं की परिस्थितियां समान नहीं हैं और उन्हें पूरी तरह एक-दूसरे के बराबर रखना भी उचित नहीं होगा। लेकिन दोनों में एक साझा तत्व जरूर है—छात्रों की परीक्षा और उनके भविष्य को लेकर उठी चिंता।
यही कारण है कि आज बहस केवल इस पर नहीं होनी चाहिए कि धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा दें या नहीं। असली सवाल यह होना चाहिए कि देश की परीक्षा प्रणाली को इस स्तर तक विश्वसनीय कैसे बनाया जाए कि किसी छात्र को यह आशंका न रहे कि उसकी मेहनत किसी लीक हुए प्रश्नपत्र या प्रशासनिक चूक से बेकार हो सकती है।
राजनीतिक जवाबदेही बनाम राजनीतिक आरोप
धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर राजनीतिक दलों के बीच मतभेद स्वाभाविक हैं। सरकार इसे विपक्ष की राजनीति बता रही है और विपक्ष इसे छात्रों के अधिकारों की लड़ाई बता रहा है।
लेकिन लोकतंत्र में दोनों के बीच एक तीसरी कसौटी भी होनी चाहिए—तथ्य और जवाबदेही।
यदि किसी परीक्षा में प्रश्नपत्र लीक हुआ है तो इसकी स्वतंत्र और विश्वसनीय जांच होनी चाहिए। यदि किसी स्तर पर लापरवाही या मिलीभगत सामने आती है तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। यदि मंत्री स्तर पर राजनीतिक जवाबदेही बनती है तो उसका निर्धारण भी तथ्यों के आधार पर होना चाहिए।
इसी तरह विपक्ष द्वारा छात्रों के आंदोलन को राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल किए जाने के आरोप भी प्रमाण के आधार पर परखे जाने चाहिए।
छात्रों को किसी राजनीतिक दल का मोहरा बनाना भी उतना ही अनुचित है जितना उनके वास्तविक सवालों को केवल राजनीति कहकर खारिज कर देना।
निष्कर्ष: 1997 का आंदोलन आज के लिए क्या संदेश देता है?
धर्मेंद्र प्रधान की राजनीतिक यात्रा को देखें तो 1997 का प्रश्नपत्र लीक विरोधी आंदोलन उनके जीवन का केवल एक प्रसंग नहीं, बल्कि उनके छात्र राजनीति के दौर की उस भूमिका का प्रतीक है जिसमें उन्होंने परीक्षा व्यवस्था की खामियों के खिलाफ आवाज उठाई थी।
आज जब वही प्रश्नपत्र लीक का मुद्दा उनके राजनीतिक जीवन के सामने खड़ा है, तो इतिहास और वर्तमान के बीच एक असहज समानता दिखाई देती है।
तब धर्मेंद्र प्रधान छात्रों की तरफ से सवाल पूछ रहे थे। आज छात्र उनसे और सरकार से सवाल पूछ रहे हैं।
तब पुलिस लाठीचार्ज में प्रधान के घायल होने की बात सामने आई थी। आज उनके इस्तीफे की मांग कर रहे छात्रों के पुलिस कार्रवाई में घायल होने की खबरों ने उस पुराने प्रसंग को फिर चर्चा में ला दिया है।
इस पूरे घटनाक्रम की सबसे बड़ी सीख यही है कि सत्ता बदल सकती है, राजनीतिक भूमिकाएं बदल सकती हैं, लेकिन छात्रों के सवाल नहीं बदलते। परीक्षा की निष्पक्षता, प्रश्नपत्र की सुरक्षा और मेहनत के सम्मान की मांग हर दौर में समान रहती है।
इसलिए 1997 और 2026 के बीच सबसे बड़ा सवाल धर्मेंद्र प्रधान का राजनीतिक विरोधाभास नहीं, बल्कि वह परीक्षा व्यवस्था है जिसमें प्रश्नपत्र लीक जैसी घटनाओं की गुंजाइश बार-बार क्यों बनती है।
यदि इस सवाल का स्थायी समाधान खोज लिया जाए तो शायद किसी शिक्षा मंत्री को इस्तीफे की मांग का सामना न करना पड़े और किसी छात्र को अपनी वर्षों की मेहनत के भविष्य को लेकर सड़क पर उतरने की जरूरत भी न पड़े।

























