स्टेशन पर ज्ञापन लेने से इनकार, ट्रेन ठहराव और यात्री सुविधाओं को लेकर बढ़ा विवाद
बनकटा | रेलवे स्टेशन पर पुरानी ट्रेनों के ठहराव की बहाली और आरक्षित टिकट काउंटर शुरू करने की मांग को लेकर उस समय विवाद की स्थिति पैदा हो गई, जब एक सामाजिक कार्यकर्ता एवं मीडिया प्रतिनिधि द्वारा सौंपे जाने वाले स्मरण पत्र को स्टेशन प्रशासन ने स्वीकार करने से इनकार कर दिया। आरोप है कि इस दौरान मोबाइल फोन छीनने की भी कोशिश की गई, जिससे मौके पर कुछ देर के लिए तनाव का माहौल बन गया। घटना को लेकर स्थानीय लोगों के बीच रेलवे की कार्यशैली और यात्री सुविधाओं को लेकर एक बार फिर चर्चा तेज हो गई है।
पुराने ट्रेन ठहराव बहाल करने की उठी मांग
जानकारी के अनुसार, संबंधित रेलवे स्टेशन पर पहले जिन ट्रेनों का नियमित ठहराव होता था, उन्हें कोरोना काल के दौरान बंद कर दिया गया था। इसके बाद से अब तक इन ट्रेनों का ठहराव बहाल नहीं किया गया है। स्थानीय लोगों का कहना है कि इससे हजारों यात्रियों को प्रतिदिन परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
मांग करने वाले पक्ष का कहना है कि उनकी ओर से किसी नई ट्रेन के ठहराव की मांग नहीं की जा रही है, बल्कि केवल उन ट्रेनों को पहले की तरह पुनः रोकने की मांग की जा रही है, जिनका वर्षों तक यहां नियमित ठहराव होता रहा है। उनका तर्क है कि कोरोना महामारी समाप्त होने के बाद अधिकांश रेलवे सेवाएं सामान्य हो चुकी हैं, इसलिए पुराने ठहराव को भी बहाल किया जाना चाहिए।
डीआरएम निरीक्षण की सूचना पर पहुंचा प्रतिनिधिमंडल
बताया गया कि मंडल रेल प्रबंधक (डीआरएम) के संभावित निरीक्षण की सूचना मिलने पर मांगों को दोबारा उठाने के उद्देश्य से स्टेशन पर स्मरण पत्र लेकर प्रतिनिधि पहुंचे थे। उनका उद्देश्य रेलवे अधिकारियों तक स्थानीय यात्रियों की समस्याओं को पहुंचाना था।
हालांकि, आरोप है कि स्टेशन अधीक्षक ने स्मरण पत्र लेने से इनकार कर दिया। इतना ही नहीं, प्रतिनिधि की ओर से लगाए गए आरोपों के अनुसार, स्टेशन अधीक्षक ने उनके हाथ से मोबाइल फोन छीनने का भी प्रयास किया। हालांकि, इस मामले में रेलवे प्रशासन की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
आरक्षित टिकट काउंटर की भी प्रमुख मांग
स्मरण पत्र में केवल ट्रेन ठहराव ही नहीं बल्कि स्टेशन पर आरक्षित टिकट काउंटर शुरू करने की मांग भी प्रमुख रूप से उठाई गई है। स्थानीय लोगों का कहना है कि स्टेशन पर कंप्यूटरीकृत आरक्षण सुविधा उपलब्ध नहीं होने के कारण यात्रियों को टिकट लेने के लिए आसपास के अन्य स्टेशनों का सहारा लेना पड़ता है।
इस स्थिति में संबंधित स्टेशन का नाम आरक्षण प्रणाली में दिखाई नहीं देता, जिससे यात्रियों को दूसरे स्टेशनों से टिकट बुक कराना पड़ता है। इससे यात्रियों को अतिरिक्त परेशानी होती है और टिकट से होने वाला राजस्व भी दूसरे स्टेशनों के खाते में दर्ज होता है। स्थानीय नागरिकों का मानना है कि यदि स्टेशन पर आरक्षित टिकट काउंटर शुरू हो जाए तो यात्रियों को सुविधा मिलेगी और रेलवे को भी राजस्व का सही लाभ प्राप्त होगा।
छात्रों, किसानों और मरीजों को हो रही परेशानी
ज्ञापन में यह भी उल्लेख किया गया है कि स्टेशन क्षेत्र के आसपास बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं, किसान, दैनिक यात्री और इलाज के लिए दूसरे शहरों में जाने वाले मरीज रेल सेवा पर निर्भर हैं। ट्रेनों का ठहराव समाप्त होने के कारण इन वर्गों को सबसे अधिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि रेल सेवा इस क्षेत्र के लिए आवागमन का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम है। ऐसे में ट्रेनों का ठहराव बंद होने से लोगों को अतिरिक्त दूरी तय कर दूसरे स्टेशनों तक जाना पड़ता है, जिससे समय और धन दोनों की बर्बादी होती है।
तीन माह का अल्टीमेटम, आंदोलन की चेतावनी
स्मरण पत्र में रेलवे प्रशासन को तीन माह का समय देते हुए मांगों पर सकारात्मक निर्णय लेने का आग्रह किया गया है। इसमें कहा गया है कि यदि निर्धारित अवधि के भीतर पुराने ट्रेन ठहराव बहाल नहीं किए गए और आरक्षित टिकट काउंटर शुरू नहीं किया गया, तो स्थानीय नागरिक लोकतांत्रिक तरीके से धरना, प्रदर्शन और भूख हड़ताल जैसे आंदोलन करने के लिए बाध्य होंगे।
ज्ञापन में यह भी कहा गया है कि यदि आंदोलन के दौरान किसी प्रकार की अप्रिय स्थिति उत्पन्न होती है तो उसकी जिम्मेदारी रेलवे प्रशासन और स्थानीय प्रशासन की होगी।
स्थानीय जनप्रतिनिधियों का भी मिला समर्थन
बताया जा रहा है कि इस मुद्दे को लेकर क्षेत्र के कुछ स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने भी समर्थन जताया है। उनका कहना है कि रेलवे को यात्रियों की वास्तविक जरूरतों को समझते हुए इस मामले पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। उनका मानना है कि पुराने ठहराव की बहाली और टिकट काउंटर की स्थापना से क्षेत्र के हजारों लोगों को सीधा लाभ मिलेगा।
रेलवे प्रशासन की प्रतिक्रिया का इंतजार
घटना के बाद अब सभी की निगाहें रेलवे प्रशासन की अगली कार्रवाई पर टिकी हुई हैं। एक ओर स्टेशन अधीक्षक पर ज्ञापन लेने से इनकार और मोबाइल छीनने की कोशिश का आरोप लगाया गया है, वहीं दूसरी ओर रेलवे की ओर से अभी तक इस पूरे मामले में कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है।
यदि रेलवे प्रशासन स्थानीय यात्रियों की मांगों पर सकारात्मक निर्णय लेता है तो लंबे समय से चली आ रही समस्याओं का समाधान संभव हो सकता है। वहीं, यदि मांगों पर कोई कार्रवाई नहीं होती है तो आगामी महीनों में आंदोलन की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि उनकी मांगें पूरी तरह जनहित से जुड़ी हैं और वे केवल उन सुविधाओं की बहाली चाहते हैं, जो पहले से उपलब्ध थीं। अब देखना होगा कि रेलवे प्रशासन इन मांगों पर क्या रुख अपनाता है और विवादित घटना की जांच कर संबंधित आरोपों पर क्या कार्रवाई करता है।










