मिश्री लाल कोरी (नेपाल) एवं इरफान अली लारी (गोरखपुर) की संयुक्त रिपोर्ट
गोरखपुर/काठमांडू। नेपाल के उत्तरी पर्वतीय क्षेत्र में आई विनाशकारी बाढ़ ने न केवल वहां के कई जिलों में तबाही मचाई है, बल्कि उसका असर अब भारत की सीमा से लगे उत्तर प्रदेश के इलाकों तक पहुंचने लगा है। नेपाल के रसुवा जिले से बहने वाली भोटेकोशी नदी में अचानक आए उफान ने दर्जनों गांवों को संकट में डाल दिया है। कई स्थानों पर लोगों को अपने घर छोड़कर सुरक्षित स्थानों की ओर भागना पड़ा। चीखते-पुकारते परिवारों के बीच जब पानी घरों में घुसा तो लोगों को अपनी जान बचाने के अलावा कुछ नहीं सूझा।
नेपाल में इस प्राकृतिक आपदा के कारण भारी जनधन हानि की आशंका जताई जा रही है। वहीं दूसरी ओर उत्तर प्रदेश के महराजगंज, कुशीनगर और गंडक नदी के तटीय क्षेत्रों में भी प्रशासन पूरी तरह सतर्क हो गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि नेपाल से आने वाला अतिरिक्त जलप्रवाह यदि इसी गति से बढ़ता रहा तो सीमा से लगे भारतीय इलाकों में भी बाढ़ की स्थिति गंभीर हो सकती है।
भोटेकोशी नदी का रौद्र रूप, कई जिलों में मचा संकट
नेपाल के रसुवा जिले में बहने वाली भोटेकोशी नदी ने बुधवार सुबह अचानक विकराल रूप धारण कर लिया। नदी का जलस्तर इतनी तेजी से बढ़ा कि नदी किनारे बसे कई गांवों को संभलने का मौका तक नहीं मिला। देखते ही देखते पानी बस्तियों, खेतों और सड़कों में फैल गया।
स्थानीय प्रशासन के अनुसार इस आपदा में अब तक कम से कम 18 लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है, जबकि बड़ी संख्या में लोग लापता बताए जा रहे हैं। राहत एजेंसियों का कहना है कि कई दूरस्थ इलाकों से अभी तक संपर्क स्थापित नहीं हो पाया है, जिससे वास्तविक नुकसान का आंकड़ा और भी अधिक हो सकता है।
नेपाल के कई गांवों में लोगों ने अपनी आंखों के सामने मकान बहते देखे। खेतों में खड़ी फसलें जलमग्न हो गईं और सड़कों का अस्तित्व तक मिट गया। पहाड़ी क्षेत्रों में भूस्खलन और बाढ़ के संयुक्त प्रभाव ने हालात को और अधिक भयावह बना दिया है।
384 पर्यटकों से संपर्क टूटा, भारतीयों की संख्या सबसे अधिक
नेपाल पर्यटन बोर्ड द्वारा जारी जानकारी के अनुसार बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में 384 पर्यटकों और नागरिकों से संपर्क नहीं हो पा रहा है। इनमें 291 विदेशी पर्यटक और 93 नेपाली नागरिक शामिल हैं।
चिंता की बात यह है कि लापता पर्यटकों में भारतीय नागरिकों की संख्या सबसे अधिक बताई जा रही है। प्रारंभिक आंकड़ों के अनुसार 105 भारतीय पर्यटक ऐसे हैं जिनसे संपर्क स्थापित नहीं हो सका है। इसके अलावा विभिन्न देशों के पर्यटक भी प्रभावित क्षेत्रों में फंसे होने की आशंका है।
संचार व्यवस्था प्रभावित होने के कारण राहत एजेंसियों को सही जानकारी जुटाने में कठिनाई हो रही है। कई स्थानों पर मोबाइल नेटवर्क और इंटरनेट सेवाएं ठप पड़ गई हैं।
भूकंप और हिमस्खलन से जुड़ी हो सकती है आपदा
नेपाल सरकार के अनुसार इस आपदा की वजह केवल सामान्य बाढ़ नहीं हो सकती। विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने संसद को संबोधित करते हुए कहा कि प्रारंभिक जांच में संकेत मिले हैं कि भूकंप के साथ हुए हिमस्खलन ने इस आपदा को जन्म दिया हो सकता है।
उन्होंने बताया कि सुबह करीब 8:37 बजे आए भूकंप के बाद कुछ ही मिनटों में भोटेकोशी नदी में असामान्य जलप्रवाह देखा गया। इसके बाद नदी का जलस्तर तेजी से बढ़ा और कई क्षेत्रों में तबाही फैल गई।
विशेषज्ञों का मानना है कि ऊंचाई वाले इलाकों में हिमखंड टूटने या ग्लेशियर झील के फटने जैसी घटना भी इसके पीछे हो सकती है। हालांकि अंतिम निष्कर्ष विस्तृत वैज्ञानिक जांच के बाद ही सामने आएगा।
रसुवा से नुवाकोट तक तबाही के निशान
नेपाल के रसुवा और नुवाकोट जिलों में बाढ़ का सबसे अधिक प्रभाव देखने को मिला है। तिमुरे, स्याफ्रुबेसी, बेत्रावती, त्रिशूली बत्तर और देवीघाट जैसे क्षेत्रों में भारी नुकसान की सूचना है।
कई पुल बह गए हैं, सड़कें टूट गई हैं और बिजली आपूर्ति बाधित हो गई है। नदी किनारे बने छोटे-बड़े व्यावसायिक प्रतिष्ठान भी बाढ़ की चपेट में आ गए हैं। अनेक परिवारों को राहत शिविरों में पहुंचाया गया है।
स्थानीय प्रशासन के अधिकारियों का कहना है कि कई गांवों तक पहुंचना अभी भी चुनौती बना हुआ है क्योंकि सड़क मार्ग पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुके हैं।
राहत और बचाव अभियान युद्धस्तर पर
नेपाल सरकार ने राहत और बचाव कार्यों को युद्धस्तर पर शुरू कर दिया है। सेना, सशस्त्र पुलिस बल, स्थानीय प्रशासन, रेड क्रॉस और स्वयंसेवी संस्थाओं को प्रभावित क्षेत्रों में लगाया गया है।
अब तक दर्जनों लोगों को सुरक्षित निकाला जा चुका है। हेलीकॉप्टरों की मदद से दुर्गम इलाकों में फंसे लोगों तक राहत सामग्री पहुंचाई जा रही है।
सशस्त्र पुलिस बल के अनुसार उसके 13 जवान भी लापता बताए जा रहे हैं। इनमें कुछ जवान तिमुरे और कुछ मैलुंग क्षेत्र में तैनात थे। उनके बारे में अभी कोई स्पष्ट जानकारी नहीं मिल सकी है।
काठमांडू स्थित अस्पतालों को भी अलर्ट पर रखा गया है ताकि गंभीर रूप से घायल लोगों का तत्काल उपचार किया जा सके।
राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री ने जताया दुख
नेपाल के राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल ने इस आपदा पर गहरा दुख व्यक्त किया है। उन्होंने मृतकों के परिजनों के प्रति संवेदना व्यक्त करते हुए राहत कार्यों को और तेज करने के निर्देश दिए हैं।
वहीं प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह ने आपातकालीन बैठक बुलाकर संबंधित विभागों को तत्काल कार्रवाई करने का आदेश दिया। उन्होंने कहा कि विस्थापित लोगों के लिए भोजन, चिकित्सा, आश्रय और अन्य आवश्यक सुविधाओं की व्यवस्था प्राथमिकता के आधार पर की जा रही है। सरकार ने प्रभावित क्षेत्रों को आपदा प्रभावित क्षेत्र घोषित करने की प्रक्रिया भी शुरू कर दी है।
चीन और भारत से सहयोग की कोशिश
नेपाल सरकार ने इस आपदा के बाद अंतरराष्ट्रीय सहयोग की दिशा में भी कदम बढ़ाए हैं। सरकारी प्रवक्ताओं के अनुसार भारत और चीन दोनों देशों से लगातार संपर्क किया जा रहा है।
नेपाल के अधिकारियों का कहना है कि बचाव एवं राहत कार्यों में तकनीकी और मानवीय सहायता की आवश्यकता पड़ सकती है। चीन ने सहायता देने की इच्छा जताई है जबकि भारत भी हालात पर लगातार नजर बनाए हुए है। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने भी राहत कार्यों को लेकर अधिकारियों को हरसंभव मदद देने के निर्देश दिए हैं।
उत्तर प्रदेश में बढ़ी चिंता, सिंचाई विभाग अलर्ट
नेपाल में आई इस बाढ़ का सीधा असर उत्तर प्रदेश के सीमावर्ती जिलों पर पड़ने की आशंका बढ़ गई है। गंडक नदी प्रणाली से जुड़े क्षेत्रों में प्रशासन ने निगरानी बढ़ा दी है।
सिंचाई विभाग के अधिकारियों के अनुसार नेपाल से आने वाले अतिरिक्त जलप्रवाह को देखते हुए लगभग 40 किलोमीटर लंबे क्षेत्र में विशेष सतर्कता बरती जा रही है। महराजगंज और कुशीनगर जिलों के तटवर्ती गांवों पर खास नजर रखी जा रही है।
नदी के जलस्तर की लगातार निगरानी की जा रही है। संवेदनशील तटबंधों का निरीक्षण किया जा रहा है और जरूरत पड़ने पर तत्काल मरम्मत की व्यवस्था भी की गई है।
गांवों में डर का माहौल
नेपाल की तबाही की खबरें जैसे-जैसे भारतीय सीमा तक पहुंच रही हैं, वैसे-वैसे नदी किनारे रहने वाले लोगों की चिंता भी बढ़ती जा रही है। कई गांवों में लोग पुराने बाढ़ के अनुभवों को याद कर रहे हैं।
स्थानीय निवासियों का कहना है कि यदि नेपाल से पानी का दबाव बढ़ता है तो निचले इलाकों में रहने वाले परिवारों को सबसे पहले नुकसान उठाना पड़ सकता है। ग्रामीणों ने प्रशासन से समय रहते चेतावनी और राहत व्यवस्था सुनिश्चित करने की मांग की है। कुछ स्थानों पर लोगों ने पहले से ही आवश्यक सामान सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाना शुरू कर दिया है।
जलवायु परिवर्तन और बढ़ती आपदाएं
विशेषज्ञ इस घटना को केवल एक स्थानीय प्राकृतिक आपदा नहीं मान रहे। उनका कहना है कि हिमालयी क्षेत्र में तेजी से बदलते मौसम, ग्लेशियरों के पिघलने और अनियमित वर्षा की घटनाओं के कारण इस प्रकार की आपदाओं का खतरा लगातार बढ़ रहा है।
पिछले कुछ वर्षों में नेपाल और हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियर झीलों के फटने, अचानक बाढ़ आने और भूस्खलन की घटनाओं में वृद्धि देखी गई है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि समय रहते प्रभावी निगरानी और चेतावनी प्रणाली विकसित नहीं की गई तो भविष्य में ऐसी घटनाएं और अधिक विनाशकारी साबित हो सकती हैं।
प्रशासन की अपील
नेपाल और भारत दोनों देशों के प्रशासन ने नदी किनारे रहने वाले लोगों से सतर्क रहने की अपील की है। लोगों से कहा गया है कि अफवाहों पर ध्यान न दें और केवल आधिकारिक सूचनाओं पर भरोसा करें।
उत्तर प्रदेश में भी जिला प्रशासन ने बाढ़ चौकियों को सक्रिय कर दिया है। आपदा प्रबंधन विभाग को आवश्यक संसाधनों के साथ तैयार रहने के निर्देश दिए गए हैं।
नेपाल की भोटेकोशी नदी में आई विनाशकारी बाढ़ ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि हिमालयी क्षेत्र की प्राकृतिक आपदाएं केवल सीमाओं तक सीमित नहीं रहतीं। रसुवा और नुवाकोट से शुरू हुई तबाही का असर अब उत्तर प्रदेश के सीमावर्ती इलाकों तक महसूस किया जा रहा है। नेपाल में जहां हजारों लोग भय और अनिश्चितता के बीच राहत का इंतजार कर रहे हैं, वहीं उत्तर प्रदेश के नदी तटीय क्षेत्रों में प्रशासन और जनता दोनों संभावित खतरे को लेकर सतर्क हो चुके हैं। आने वाले 24 से 48 घंटे स्थिति की गंभीरता तय करने में महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं। इसलिए प्रशासनिक तैयारी, समय पर चेतावनी और जनसहयोग ही इस संभावित संकट से बचाव का सबसे प्रभावी उपाय होगा।

























