लखनऊ

मासूमों का सौदा करने वाला गिरोह बेनकाब! रेलवे स्टेशन से बच्चों को अगवा कर निसंतान दंपतियों को बेचता था नेटवर्क

ठाकुर बख्श सिंह की रिपोर्ट

उत्तर प्रदेश की राजधानी Lucknow से एक बेहद सनसनीखेज और दिल दहला देने वाला मामला सामने आया है, जहां पुलिस ने नवजात और मासूम बच्चों की खरीद-फरोख्त करने वाले एक संगठित नेटवर्क का पर्दाफाश किया है। यह गिरोह रेलवे स्टेशन और बस अड्डों जैसे सार्वजनिक स्थानों पर छोटे बच्चों के साथ यात्रा करने वाले परिवारों को निशाना बनाता था और मौका मिलते ही बच्चों को अगवा कर उन्हें मोटी रकम लेकर निसंतान दंपतियों को बेच देता था।

इस पूरे मामले ने न केवल पुलिस प्रशासन को झकझोर दिया है बल्कि समाज के सामने भी कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। पुलिस ने इस मामले में 9 लोगों को गिरफ्तार किया है और एक 9 महीने के मासूम बच्चे को सकुशल बरामद कर लिया है।

रेलवे स्टेशन पर रची गई खौफनाक साजिश

पूरा मामला 13 मई 2026 का बताया जा रहा है। जानकारी के मुताबिक एक महिला दिल्ली से मध्य प्रदेश की यात्रा कर रही थी। उसके साथ उसके दो छोटे बच्चे भी मौजूद थे। यात्रा के दौरान जब वह Lucknow Junction Railway Station पहुंची, तब उसकी मुलाकात एक अज्ञात महिला और पुरुष से हुई।

बताया जा रहा है कि दोनों आरोपियों ने बड़ी चालाकी से महिला से बातचीत शुरू की और धीरे-धीरे उसका विश्वास जीत लिया। यात्रा के दौरान उन्होंने खुद को बेहद मददगार और भरोसेमंद दिखाया। इसी दौरान आरोपियों ने महिला की परिस्थितियों और बच्चों के बारे में जानकारी हासिल कर ली।

जब ट्रेन Raebareli Railway Station पहुंची, तब दोनों आरोपियों ने महिला को स्टेशन के बाहर स्थित एक ढाबे पर खाना खाने के लिए राजी कर लिया। महिला जैसे ही भोजन करने में व्यस्त हुई, उसी दौरान आरोपियों ने उसके करीब 9 महीने के मासूम बच्चे को उठाया और वहां से फरार हो गए।

शिकायत मिलते ही हरकत में आई पुलिस

घटना की जानकारी मिलते ही रायबरेली पुलिस सक्रिय हो गई। पुलिस ने बच्चे की सकुशल बरामदगी और आरोपियों की पहचान के लिए कई टीमें गठित कीं। रेलवे स्टेशन के आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज खंगाली गई और संदिग्धों की लोकेशन ट्रैक करने का काम शुरू किया गया।

जांच के दौरान पुलिस को अहम सुराग मिले, जिसके बाद टीमों को मुरादाबाद और रामपुर क्षेत्र में भेजा गया। लगातार तकनीकी निगरानी और मुखबिरों की सूचना के आधार पर पुलिस ने आखिरकार अगवा किए गए बच्चे को सुरक्षित बरामद कर लिया।

पुलिस कार्रवाई के दौरान मुख्य आरोपियों की पहचान बिहार के अररिया निवासी रामकुमार दास और उसकी पत्नी रेशमा देवी के रूप में हुई। दोनों को हिरासत में लेकर जब सख्ती से पूछताछ की गई तो पूरे नेटवर्क का खुलासा होता चला गया।

बच्चा चोरी नहीं, पूरा संगठित कारोबार

पुलिस जांच में सामने आया कि यह कोई सामान्य अपहरण की घटना नहीं थी, बल्कि बच्चों की खरीद-फरोख्त करने वाला एक संगठित और सुनियोजित नेटवर्क था। इस गिरोह का काम करने का तरीका बेहद खतरनाक और पेशेवर बताया जा रहा है।

जांच में पता चला कि गिरोह के सदस्य सबसे पहले ऐसे दंपतियों की तलाश करते थे, जिनकी कोई संतान नहीं होती थी। इसके बाद उनसे संपर्क स्थापित किया जाता था और मोटी रकम के बदले बच्चे उपलब्ध कराने का भरोसा दिया जाता था।

दूसरी ओर गिरोह के कुछ सदस्य रेलवे स्टेशन, बस स्टेशन और सार्वजनिक स्थानों पर ऐसे परिवारों की निगरानी करते थे, जिनके साथ छोटे बच्चे होते थे। मौका मिलते ही बच्चों को अगवा कर लिया जाता था और फिर उन्हें अलग-अलग राज्यों में ले जाकर बेच दिया जाता था।

नेटवर्क में बंटी हुई थीं जिम्मेदारियां

पुलिस जांच में यह भी सामने आया कि इस गिरोह में हर सदस्य की अलग भूमिका तय थी। कोई बच्चों को अगवा करने का काम करता था तो कोई संभावित खरीदारों की तलाश करता था। वहीं कुछ लोग दलाल की भूमिका निभाते थे और कुछ लोग क्लीनिक या दस्तावेजी प्रक्रियाओं से जुड़े हुए थे।

यानी यह नेटवर्क पूरी तरह से पेशेवर तरीके से संचालित किया जा रहा था। बच्चों की तस्वीरें भेजना, खरीदारों से संपर्क करना, रकम तय करना और पैसों का लेनदेन करना—हर काम के लिए अलग-अलग लोग सक्रिय थे।

पुलिस अब यह भी जांच कर रही है कि इस नेटवर्क ने अब तक कितने बच्चों को अगवा कर बेचा है और किन राज्यों तक इसका कनेक्शन फैला हुआ है।

गिरफ्तार आरोपियों में कौन-कौन शामिल?

पुलिस ने इस मामले में कुल 9 लोगों को गिरफ्तार किया है। इनमें मुख्य आरोपी और नेटवर्क से जुड़े कई अहम चेहरे शामिल हैं।

गिरफ्तार आरोपियों में शामिल हैं—

  • रामकुमार दास — बच्चे के अपहरण का मुख्य आरोपी
  • रेशमा देवी — सह आरोपी
  • किरनजीत उर्फ सरदार आंटी — संपर्क सूत्र और उकसाने वाली
  • सुमित कुमार — दलाल और मध्यस्थ
  • संजय कुमार — अपहृत बच्चे का संभावित खरीदार
  • ब्रह्मपाल सिंह — क्लीनिक से जुड़ा व्यक्ति, भूमिका की जांच जारी
  • अर्चना — बाल हस्तांतरण प्रक्रिया में संदिग्ध भूमिका
  • बबीता — नेटवर्क से जुड़ी संदिग्ध महिला
  • हरिश्चंद्र — बच्चों की तस्वीरें हासिल करने में संदिग्ध भूमिका

पुलिस इन सभी आरोपियों से लगातार पूछताछ कर रही है। साथ ही बैंक खातों और मोबाइल रिकॉर्ड की भी जांच की जा रही है ताकि यह पता लगाया जा सके कि नेटवर्क कितना बड़ा था और इसके तार किन-किन राज्यों से जुड़े हुए हैं।

बच्चों की तस्करी का खतरनाक चेहरा

यह मामला सिर्फ एक बच्चे के अपहरण तक सीमित नहीं है। यह देश में तेजी से फैल रहे बच्चों की तस्करी के उस भयावह सच को सामने लाता है, जिसमें मासूमों को वस्तु की तरह खरीदा और बेचा जा रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि रेलवे स्टेशन और बस अड्डे ऐसे अपराधियों के लिए सबसे आसान जगह बनते जा रहे हैं क्योंकि वहां भारी भीड़ होती है और यात्रियों की निगरानी करना मुश्किल होता है। कई बार गरीब, अकेली या परेशान महिलाएं ऐसे गिरोहों का आसान निशाना बन जाती हैं।

पुलिस कर रही नेटवर्क की गहराई से जांच

पुलिस अब इस मामले में यह जानने की कोशिश कर रही है कि कहीं इस नेटवर्क का संबंध मानव तस्करी या अवैध गोद लेने वाले रैकेट से तो नहीं है। साथ ही उन लोगों की भी पहचान की जा रही है जिन्होंने बच्चों को खरीदने के लिए आरोपियों से संपर्क किया था।

जांच एजेंसियां अब बैंक खातों, मोबाइल कॉल डिटेल्स और सोशल मीडिया कनेक्शन की मदद से पूरे नेटवर्क की जड़ तक पहुंचने की कोशिश कर रही हैं। संभावना जताई जा रही है कि आने वाले दिनों में इस मामले में और भी बड़े खुलासे हो सकते हैं।

सार्वजनिक स्थानों पर सतर्क रहने की जरूरत

यह घटना आम लोगों के लिए भी बड़ा संदेश है। खासतौर पर छोटे बच्चों के साथ यात्रा करने वाले परिवारों को अजनबियों से सावधान रहने की जरूरत है। अपराधी अक्सर मददगार बनकर भरोसा जीतते हैं और फिर वारदात को अंजाम देते हैं।

पुलिस ने लोगों से अपील की है कि यात्रा के दौरान किसी अनजान व्यक्ति पर जल्दी भरोसा न करें और बच्चों को कभी भी अकेला न छोड़ें।

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