पंचायत चुनाव पर बढ़ा सियासी और प्रशासनिक सस्पेंस, ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाने की मांग तेज
26 मई के बाद पंचायतों की कमान किसके हाथ में होगी, सरकार के फैसले पर टिकी प्रदेशभर की निगाहें
संजय सिंह राणा की रिपोर्ट
उत्तर प्रदेश में आगामी त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव को लेकर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। पंचायतों का मौजूदा कार्यकाल समाप्त होने की तारीख नजदीक आते ही ग्राम प्रधान संगठनों ने अपनी मांगों को लेकर दबाव बढ़ाना शुरू कर दिया है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि समय पर पंचायत चुनाव नहीं हो पाते, तो ग्राम पंचायतों का संचालन आखिर किसके हाथ में जाएगा? इसी मुद्दे को लेकर राजधानी लखनऊ में राष्ट्रीय पंचायतीराज ग्राम प्रधान संगठन की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की अहम बैठक आयोजित की गई, जिसमें प्रदेशभर से आए पदाधिकारियों ने हिस्सा लिया।
बैठक में यह फैसला लिया गया कि संगठन फिलहाल 26 मई तक सरकार के अंतिम निर्णय का इंतजार करेगा। संगठन का दावा है कि सरकार और भाजपा संगठन की ओर से उन्हें सकारात्मक संकेत मिले हैं। ऐसे में अब सभी की नजरें सरकार के अगले कदम पर टिकी हुई हैं।
ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाने की मांग क्यों तेज हुई?
प्रदेश में ग्राम प्रधानों का कार्यकाल 26 मई को समाप्त हो रहा है। सामान्य परिस्थितियों में इससे पहले पंचायत चुनाव संपन्न हो जाने चाहिए थे, लेकिन इस बार पिछड़ा वर्ग आरक्षण, मतदाता सूची पुनरीक्षण और कानूनी प्रक्रियाओं में देरी के कारण चुनावी प्रक्रिया आगे खिसकती नजर आ रही है।
इसी बीच ग्राम प्रधान संगठनों ने यह मांग तेज कर दी है कि यदि चुनाव समय पर नहीं होते हैं, तो पंचायतों में प्रशासनिक अधिकारियों की नियुक्ति करने के बजाय मौजूदा ग्राम प्रधानों को ही कार्यवाहक प्रशासक बनाया जाए। संगठन का तर्क है कि गांव की परिस्थितियों, विकास कार्यों और पंचायत की प्रशासनिक जरूरतों की सबसे बेहतर जानकारी मौजूदा प्रधानों को ही होती है।
संगठन का कहना है कि यदि बाहरी प्रशासनिक अधिकारियों को पंचायतों का जिम्मा दिया गया, तो गांवों में विकास कार्य प्रभावित हो सकते हैं और स्थानीय लोकतांत्रिक व्यवस्था कमजोर पड़ सकती है।
डॉ. अखिलेश सिंह बने संगठन के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष
लखनऊ के हजरतगंज स्थित एक होटल में आयोजित राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में डॉ. अखिलेश सिंह को संगठन का नया राष्ट्रीय अध्यक्ष चुना गया। अध्यक्ष बनने के बाद उन्होंने साफ कहा कि संगठन पंचायतों के अधिकारों और ग्राम प्रधानों के सम्मान के लिए लगातार संघर्ष करता रहेगा।
उन्होंने बताया कि संगठन पहले ही मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात कर अपनी मांग रख चुका है। उनके अनुसार 20 अप्रैल को मुख्यमंत्री से हुई बैठक में ग्राम प्रधानों को कार्यवाहक प्रशासक बनाए जाने का मुद्दा विस्तार से उठाया गया था।
डॉ. अखिलेश सिंह ने कहा कि पंचायतें ग्रामीण लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण इकाई हैं। ऐसे में यदि चुनाव में देरी होती है, तो पंचायतों का संचालन उन लोगों के हाथ में रहना चाहिए जिन्हें जनता ने चुना है।
पंचायतीराज मंत्री और भाजपा नेतृत्व से भी हुई बातचीत
संगठन ने अपनी मांग को केवल ज्ञापन तक सीमित नहीं रखा, बल्कि सरकार और सत्ताधारी दल के शीर्ष नेताओं से लगातार संवाद भी जारी रखा है। संगठन के मुताबिक 6 मई को पंचायतीराज मंत्री ओम प्रकाश राजभर को ज्ञापन सौंपकर विस्तार से मांगों से अवगत कराया गया।
इसके बाद 16 मई को भाजपा प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी के साथ भी संगठन की बैठक हुई। संगठन का दावा है कि दोनों स्तरों पर उन्हें सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली है और सरकार इस विषय पर गंभीरता से विचार कर रही है। यही वजह है कि फिलहाल संगठन ने आंदोलन को सीमित रखते हुए 26 मई तक इंतजार करने का निर्णय लिया है।
राजस्थान और उत्तराखंड मॉडल का दिया गया उदाहरण
बैठक के दौरान संगठन के नेताओं ने राजस्थान और उत्तराखंड का उदाहरण भी सामने रखा। उनका कहना था कि इन राज्यों में पंचायत चुनाव में देरी होने पर मौजूदा प्रधानों को प्रशासनिक जिम्मेदारियां जारी रखने दी गई थीं।
संगठन चाहता है कि उत्तर प्रदेश सरकार भी इसी मॉडल को अपनाए। उनका तर्क है कि इससे पंचायतों में विकास कार्य बाधित नहीं होंगे और गांवों में प्रशासनिक स्थिरता बनी रहेगी।
बैठक में राष्ट्रीय महासचिव गणेश ठाकुर, प्रदेश अध्यक्ष ललित शर्मा, गोपीनाथ गिरी, ताकीब रिजवी और घनश्याम पांडेय समेत कई वरिष्ठ पदाधिकारी मौजूद रहे।
गांधी प्रतिमा पर प्रदर्शन, सरकार के खिलाफ नारेबाजी
जहां एक ओर राष्ट्रीय पंचायतीराज ग्राम प्रधान संगठन ने इंतजार की रणनीति अपनाई, वहीं दूसरी ओर अखिल भारतीय ग्राम प्रधान संगठन ने सड़क पर उतरकर विरोध प्रदर्शन किया।
हजरतगंज स्थित गांधी प्रतिमा के पास सोमवार को संगठन के कार्यकर्ताओं ने जोरदार प्रदर्शन किया और सरकार के खिलाफ नारेबाजी की। संगठन के प्रदेश अध्यक्ष ज्ञानेंद्र सिंह ने कहा कि यदि सरकार समय पर पंचायत चुनाव नहीं करा पाती और प्रशासनिक अधिकारियों को पंचायतों की जिम्मेदारी सौंपती है, तो यह ग्राम स्वराज की मूल भावना के खिलाफ होगा।
उन्होंने कहा कि पंचायत व्यवस्था लोकतंत्र की जड़ है और चुने हुए प्रतिनिधियों को हटाकर अधिकारियों के हाथ में पंचायतें सौंपना लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर करेगा।
पंचायत चुनाव से पहले मतदाता सूची पर जोर
उधर राज्य निर्वाचन आयोग पंचायत चुनाव की तैयारियों में जुटा हुआ है। आयोग ने घोषणा की है कि पंचायत चुनाव की अंतिम मतदाता सूची 10 जून को प्रकाशित की जाएगी।
आयोग का कहना है कि इस बार मतदाता सूची को पूरी तरह त्रुटिरहित और पारदर्शी बनाने पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। इसी वजह से हर नाम और विवरण का दोबारा सत्यापन कराया जा रहा है।
दिसंबर 2025 में आयोग ने अनंतिम मतदाता सूची जारी की थी। उस सूची के अनुसार प्रदेश में कुल 12.69 करोड़ मतदाता दर्ज किए गए थे। यह संख्या पिछले पंचायत चुनाव की तुलना में करीब 40 लाख अधिक बताई गई थी।
लाखों दावे और आपत्तियों का हुआ निस्तारण
अनंतिम सूची जारी होने के बाद आयोग ने लोगों से दावे और आपत्तियां मांगी थीं। बड़ी संख्या में लोगों ने नाम जोड़ने, हटाने और संशोधन संबंधी आवेदन दिए।
आयोग ने इन सभी आवेदनों की सुनवाई कर उनका निस्तारण भी किया। इसके बावजूद आयोग कोई जोखिम नहीं लेना चाहता। यही कारण है कि अंतिम सूची जारी करने से पहले दोबारा गहन सत्यापन कराया जा रहा है। सूत्रों के मुताबिक आयोग भविष्य में किसी भी प्रकार के विवाद, फर्जी मतदान या नामों की गड़बड़ी से बचना चाहता है।
पांच बार बढ़ चुकी अंतिम सूची की तारीख
पंचायत चुनाव की प्रक्रिया में देरी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अंतिम मतदाता सूची जारी करने की तारीख अब तक पांच बार बढ़ाई जा चुकी है।
हर बार आयोग की ओर से यही कहा गया कि सूची को और अधिक सटीक बनाने के लिए अतिरिक्त समय की आवश्यकता है। हालांकि राजनीतिक हलकों में इसे पंचायत चुनाव में संभावित देरी से भी जोड़कर देखा जा रहा है।
पिछड़ा वर्ग आयोग को लेकर हाईकोर्ट सख्त
पंचायत चुनाव में सबसे बड़ी अड़चन पिछड़ा वर्ग आरक्षण को लेकर मानी जा रही है। इसी विषय पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने भी सख्त रुख अपनाया है।
न्यायमूर्ति सौरभ लवानिया की एकल पीठ ने पिछड़ा वर्ग आयोग के गठन में हो रही देरी को गंभीरता से लेते हुए पंचायती राज विभाग के अपर मुख्य सचिव और प्रमुख सचिव अनिल कुमार से जवाब मांगा है।
यह आदेश स्थानीय अधिवक्ता मोतीलाल यादव की अवमानना याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया गया। अदालत ने अगली सुनवाई 19 मई तय की है।
कानूनी जानकारों का मानना है कि जब तक पिछड़ा वर्ग आरक्षण का मुद्दा पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो जाता, तब तक पंचायत चुनाव की अधिसूचना जारी होना मुश्किल दिखाई देता है।
कार्यकाल बढ़ाने के संकेत भी मिल रहे
इस पूरे घटनाक्रम के बीच पंचायतीराज मंत्री ओम प्रकाश राजभर का बयान भी काफी चर्चा में है। उन्होंने संकेत दिए हैं कि यदि समय पर पंचायत चुनाव नहीं हो पाते हैं, तो ग्राम प्रधानों, ब्लॉक प्रमुखों और जिला पंचायत अध्यक्षों का कार्यकाल बढ़ाया जा सकता है। उन्होंने कहा कि सरकार इस प्रस्ताव के समर्थन में है और आवश्यकता पड़ने पर इसे मुख्यमंत्री के समक्ष रखा जाएगा।
राजभर के इस बयान के बाद राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं तेज हो गई हैं कि सरकार पंचायतों में प्रशासनिक संकट से बचने के लिए कार्यकाल विस्तार या कार्यवाहक व्यवस्था में से किसी एक विकल्प पर आगे बढ़ सकती है।
ग्रामीण राजनीति के लिए बेहद अहम मोड़
उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव केवल स्थानीय निकाय का चुनाव नहीं माना जाता, बल्कि इसे प्रदेश की बड़ी राजनीतिक तस्वीर से भी जोड़कर देखा जाता है। ग्राम प्रधान, क्षेत्र पंचायत सदस्य और जिला पंचायत प्रतिनिधि गांवों की राजनीति में मजबूत पकड़ रखते हैं।
यही वजह है कि पंचायत चुनाव में देरी और पंचायतों की प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर उठ रहे सवालों ने राजनीतिक माहौल को गर्म कर दिया है। आने वाले दिनों में सरकार क्या फैसला लेती है, यह न केवल लाखों जनप्रतिनिधियों बल्कि ग्रामीण राजनीति की दिशा भी तय करेगा।








