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यूपी की राजनीति में अभी तो ‘खेला’ शुरू हुआ है, असली ‘पिक्चर’ बाकी है ! सत्ता, समीकरण और सामाजिक संतुलन की जंग

बीजेपी की रणनीति, सपा का पीडीए दांव, कांग्रेस की बेचैनी और मायावती की चुप्पी ने बढ़ाई राजनीतिक गर्मी

कमलेश कुमार चौधरी की रिपोर्ट

लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजनीति इन दिनों धीरे-धीरे उस उबाल की ओर बढ़ रही है, जिसकी आंच अगले विधानसभा चुनाव तक और तेज होने वाली है। भले ही चुनाव में अभी कुछ महीने बाकी हों, लेकिन राजनीतिक दलों की गतिविधियां यह संकेत देने लगी हैं कि प्रदेश में सत्ता की लड़ाई अब पूरी तरह शुरू हो चुकी है। बैठकों का दौर तेज है, नेताओं के दौरे बढ़ गए हैं, जातीय समीकरणों की नई गणित तैयार हो रही है और गठबंधनों की संभावनाओं पर लगातार मंथन जारी है।

देश की सबसे बड़ी आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश का चुनाव केवल प्रदेश तक सीमित नहीं होता, बल्कि उसका असर राष्ट्रीय राजनीति पर भी पड़ता है। यही वजह है कि बीजेपी से लेकर समाजवादी पार्टी, कांग्रेस, बीएसपी और छोटे क्षेत्रीय दल तक हर कोई अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने में जुट गया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस बार का चुनाव केवल विकास बनाम जाति की राजनीति तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसमें सामाजिक ध्रुवीकरण, गठबंधन प्रबंधन, युवा असंतोष, बेरोजगारी, कानून व्यवस्था और धार्मिक भावनाएं भी निर्णायक भूमिका निभा सकती हैं।

बीजेपी के सामने सत्ता बचाने की सबसे बड़ी चुनौती

भारतीय जनता पार्टी लगातार तीसरी बार उत्तर प्रदेश की सत्ता में वापसी का सपना देख रही है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में पार्टी कानून व्यवस्था, इंफ्रास्ट्रक्चर और धार्मिक पर्यटन को अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि के रूप में जनता के सामने रख रही है। अयोध्या राम मंदिर, एक्सप्रेस-वे, एयरपोर्ट, डिफेंस कॉरिडोर और निवेश सम्मेलन जैसे मुद्दों को बीजेपी चुनावी नैरेटिव का हिस्सा बना चुकी है।

हाल ही में हुए कैबिनेट विस्तार को भी बीजेपी की चुनावी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है। पार्टी ने अलग-अलग जातीय समूहों को साधने के लिए मंत्रिमंडल में नए चेहरों को जगह दी है। पूर्वांचल, बुंदेलखंड और पश्चिमी यूपी के सामाजिक समीकरणों को ध्यान में रखते हुए नए मंत्रियों का चयन किया गया।

बीजेपी का सबसे बड़ा भरोसा उसके गठबंधन सहयोगियों पर भी है। राष्ट्रीय लोकदल के जरिए जाट वोट, निषाद पार्टी के जरिए मछुआरा समुदाय, अपना दल के जरिए कुर्मी वोट बैंक और सुभासपा के जरिए राजभर समाज को साधने की कोशिश की जा रही है। पार्टी यह अच्छी तरह समझती है कि यूपी की राजनीति केवल हिंदुत्व के सहारे नहीं जीती जा सकती, बल्कि जातीय संतुलन भी उतना ही जरूरी है।

क्या एंटी इनकंबेंसी बीजेपी के लिए खतरा बनेगी?

हालांकि बीजेपी के सामने चुनौतियां भी कम नहीं हैं। प्रदेश में बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी, बिजली संकट, पेपर लीक, किसानों की नाराजगी और स्थानीय स्तर पर जनप्रतिनिधियों के खिलाफ असंतोष जैसे मुद्दे विपक्ष को हमला करने का मौका दे रहे हैं।

ग्रामीण इलाकों में बिजली कटौती और किसानों की सिंचाई संबंधी समस्याएं लगातार चर्चा में हैं। दूसरी ओर युवाओं में सरकारी नौकरियों को लेकर असंतोष भी देखने को मिल रहा है। विपक्ष इन मुद्दों को लगातार हवा देने की कोशिश कर रहा है।

राजनीतिक जानकार मानते हैं कि बीजेपी की सबसे बड़ी ताकत उसका मजबूत संगठन है। बूथ स्तर तक पार्टी की पकड़ अभी भी विपक्ष के मुकाबले काफी मजबूत मानी जाती है। लेकिन अगर विपक्ष एकजुट हो गया तो मुकाबला बेहद कठिन हो सकता है।

अखिलेश यादव का ‘पीडीए’ फॉर्मूला कितना कारगर?

समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव इस बार पूरी तरह सामाजिक समीकरणों पर दांव लगा रहे हैं। उनका ‘पीडीए’ फॉर्मूला यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक गठजोड़ सपा की मुख्य रणनीति बन चुका है।

लोकसभा चुनाव में सपा को मिले सकारात्मक परिणामों ने पार्टी कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाया है। सपा अब गांव-गांव जाकर यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि बीजेपी की नीतियों से पिछड़े और दलित वर्ग सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं।

अखिलेश यादव लगातार संविधान, आरक्षण और सामाजिक न्याय के मुद्दों को उठा रहे हैं। सपा को उम्मीद है कि यदि मुस्लिम वोट पूरी तरह उसके साथ आता है और पिछड़े वर्गों में सेंध लगाने में सफलता मिलती है तो बीजेपी के लिए मुकाबला कठिन हो जाएगा।

हालांकि सपा के सामने भी कई चुनौतियां हैं। पार्टी अभी भी यादव-मुस्लिम छवि से पूरी तरह बाहर नहीं निकल पाई है। गैर यादव पिछड़े वर्गों को अपने साथ जोड़ना उसके लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है।

कांग्रेस की बढ़ती बेचैनी और बढ़ती महत्वाकांक्षा

लोकसभा चुनाव में अपेक्षा से बेहतर प्रदर्शन के बाद कांग्रेस भी यूपी में खुद को फिर से मजबूत करने की कोशिश में लगी हुई है। पार्टी अब केवल सहयोगी दल बनकर नहीं रहना चाहती, बल्कि अपनी स्वतंत्र राजनीतिक ताकत दिखाने की तैयारी में है।

प्रदेश अध्यक्ष अजय राय लगातार आक्रामक बयान दे रहे हैं और कांग्रेस हर सीट पर चुनाव लड़ने का दावा कर रही है। हालांकि राजनीतिक जानकार मानते हैं कि कांग्रेस अभी अकेले दम पर बड़ी चुनौती देने की स्थिति में नहीं है।

कांग्रेस की सबसे बड़ी चिंता सीट बंटवारे को लेकर है। पार्टी चाहती है कि उसे सम्मानजनक संख्या में सीटें मिलें। लोकसभा चुनाव के आंकड़ों के आधार पर कांग्रेस कम से कम 70 सीटों की मांग कर सकती है। लेकिन समाजवादी पार्टी इतनी सीटें देने के मूड में दिखाई नहीं देती। यही वजह है कि दोनों दलों के बीच अंदरखाने तनाव की स्थिति भी बनती दिखाई दे रही है।

मायावती की चुप्पी सबसे बड़ा राजनीतिक रहस्य

बहुजन समाज पार्टी सुप्रीमो मायावती अभी पूरी तरह शांत दिखाई दे रही हैं, लेकिन उनकी यह चुप्पी राजनीतिक दलों को बेचैन कर रही है। यूपी की राजनीति में बीएसपी आज भी ऐसा फैक्टर है जो चुनावी गणित को पूरी तरह बदल सकती है।

दलित वोट बैंक पर मायावती की पकड़ भले पहले जैसी मजबूत न दिख रही हो, लेकिन उनका कोर वोट अब भी उनके साथ माना जाता है। यदि बीएसपी अलग चुनाव लड़ती है और मुस्लिम उम्मीदवारों को मैदान में उतारती है तो इसका सीधा नुकसान समाजवादी पार्टी को हो सकता है।

कांग्रेस की कोशिश है कि किसी तरह मायावती को विपक्षी गठबंधन में शामिल किया जाए। लेकिन मायावती का अब तक का राजनीतिक व्यवहार यह संकेत देता है कि वह आखिरी समय तक अपने पत्ते नहीं खोलेंगी।

ओवैसी और चंद्रशेखर आजाद बढ़ा सकते हैं विपक्ष की मुश्किलें

एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी उत्तर प्रदेश में करीब 50 सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं। पश्चिमी यूपी और पूर्वांचल के मुस्लिम बहुल इलाकों में उनकी पार्टी लगातार सक्रियता बढ़ा रही है।

दूसरी तरफ चंद्रशेखर आजाद की आजाद समाज पार्टी भी दलित युवाओं के बीच तेजी से प्रभाव बढ़ा रही है। खासकर पश्चिमी यूपी में उनका प्रभाव लगातार बढ़ता दिख रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि मुस्लिम और दलित वोट अलग-अलग दलों में बंट गए तो बीजेपी को सीधा फायदा मिल सकता है।

यूपी का चुनाव केवल चुनाव नहीं, 2029 का सेमीफाइनल भी

राजनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 केवल प्रदेश की सत्ता का चुनाव नहीं होगा, बल्कि यह 2029 के लोकसभा चुनाव की दिशा भी तय करेगा। जो दल यूपी में मजबूत स्थिति बनाएगा, उसका राष्ट्रीय राजनीति में प्रभाव स्वतः बढ़ जाएगा।

बीजेपी के लिए यह चुनाव योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व की अग्निपरीक्षा माना जा रहा है। वहीं विपक्ष के लिए यह अवसर है कि वह बीजेपी को उसके सबसे मजबूत किले में चुनौती दे सके।

फिलहाल राजनीतिक तस्वीर पूरी तरह साफ नहीं है। गठबंधन की शक्ल क्या होगी, कौन किसके साथ जाएगा, सीटों का बंटवारा कैसे होगा और कौन सा मुद्दा चुनाव का केंद्र बनेगा—इन सभी सवालों के जवाब आने वाले महीनों में मिलेंगे। लेकिन इतना तय है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में अभी केवल ट्रेलर शुरू हुआ है, असली फिल्म अभी बाकी है।

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