850 किलोमीटर दूर रिश्वत का खेल! घूस लेते अयोध्या साइबर थाने के 4 पुलिसकर्मी गिरफ्तार, खाकी पर फिर दाग

सीकर में कथित 2.80 लाख रुपये की रिश्वत लेते गिरफ्तार अयोध्या साइबर क्राइम थाने के चार पुलिसकर्मियों की तस्वीर और रिपोर्टर चुन्नीलाल प्रधान

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मुकदमे से नाम हटाने के लिए 4 लाख की मांग का आरोप, 2.80 लाख में तय हुआ सौदा; एसीबी की घेराबंदी में भागने की कोशिश और सरकारी वाहन को टक्कर देने का भी आरोप

चुन्नीलाल प्रधान की रिपोर्ट

लखनऊ। उत्तर प्रदेश पुलिस की वर्दी कानून, सुरक्षा और भरोसे का प्रतीक मानी जाती है। आम आदमी जब किसी संकट में पुलिस के पास पहुंचता है तो उसकी सबसे बड़ी उम्मीद यही होती है कि कानून का रखवाला उसके साथ न्याय करेगा। लेकिन जब उसी खाकी पर रिश्वत मांगने और कानून की धाराओं को कथित तौर पर पैसों के तराजू पर तौलने के आरोप लगें, तो मामला केवल किसी एक कर्मचारी के आचरण तक सीमित नहीं रहता। वह पुलिस व्यवस्था, निगरानी तंत्र और प्रशासनिक जवाबदेही पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है।

राजस्थान के सीकर में सामने आया मामला इसी वजह से बेहद गंभीर है। अयोध्या साइबर क्राइम थाने में तैनात एक सब-इंस्पेक्टर और तीन कांस्टेबलों को राजस्थान भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो यानी ACB ने कथित तौर पर 2.80 लाख रुपये की रिश्वत लेते हुए गिरफ्तार किया है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, यह मामला एक ऐसे मुकदमे से जुड़ा है जिसमें शिकायतकर्ता के भाई का नाम हटाने और मामले को निपटाने के बदले कथित रूप से रिश्वत मांगी जा रही थी।

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि मामला अयोध्या में दर्ज मुकदमे से जुड़ा होने के बावजूद रिश्वत की कथित डील राजस्थान के सीकर में पहुंचकर हुई। यानी आरोप अगर जांच में सही साबित होते हैं तो यह सिर्फ रिश्वत लेने का मामला नहीं, बल्कि सरकारी पद और पुलिस अधिकार क्षेत्र के कथित दुरुपयोग का भी गंभीर उदाहरण माना जाएगा।

अयोध्या से सीकर तक पहुंचा कथित रिश्वत का सौदा

जानकारी के मुताबिक, शिकायतकर्ता के भाई के खिलाफ वर्ष 2024 से अयोध्या साइबर क्राइम थाने में मुकदमा दर्ज था। शिकायत में आरोप लगाया गया कि इस मामले से नाम हटाने और केस को रफा-दफा करने के लिए पुलिसकर्मियों की ओर से पैसे की मांग की जा रही थी।

शिकायत राजस्थान एसीबी तक पहुंची। इसके बाद एजेंसी ने शिकायत का गोपनीय सत्यापन कराया। सत्यापन के दौरान कथित रूप से यह बात सामने आई कि एक कांस्टेबल ने शिकायतकर्ता से चार लाख रुपये की मांग की थी। बाद में बातचीत और कथित मोलभाव के बाद रकम घटकर 2.80 लाख रुपये पर तय होने की बात सामने आई।

यहीं से इस पूरे मामले की गंभीरता और बढ़ जाती है। यदि किसी पुलिसकर्मी पर मुकदमे में आरोपी का नाम हटाने अथवा जांच को प्रभावित करने के बदले धन मांगने का आरोप लगता है तो यह सामान्य रिश्वतखोरी से कहीं अधिक गंभीर प्रश्न पैदा करता है। क्योंकि पुलिस जांच की निष्पक्षता सीधे नागरिक के मौलिक अधिकारों और न्याय व्यवस्था के भरोसे से जुड़ी होती है।

रकम लेकर पहुंचा परिवादी, पहले से तैयार थी एसीबी

शिकायत की पुष्टि के बाद राजस्थान एसीबी ने कथित ट्रैप की तैयारी की। रिपोर्टों के अनुसार, जयपुर एसीबी के डीआईजी डॉ. रामेश्वर सिंह के सुपरविजन में और सीकर एसीबी के एएसपी विजय कुमार तथा इंस्पेक्टर सुभाष मील के नेतृत्व में कार्रवाई की गई।

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तय योजना के अनुसार शिकायतकर्ता 2.80 लाख रुपये लेकर आरोपित पुलिसकर्मियों के पास पहुंचा। आरोप है कि कांस्टेबल सोहनलाल ने रकम अपने हाथ में ली। जैसे ही कथित रिश्वत की रकम लेने की कार्रवाई हुई, एसीबी की टीम ने घेराबंदी कर दी।

इसके बाद घटनाक्रम ने और गंभीर रूप ले लिया। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, खुद को एसीबी टीम से घिरा देखकर आरोपित पुलिसकर्मियों ने वाहन से भागने की कोशिश की और इस दौरान एसीबी के सरकारी वाहन को टक्कर भी मारी। हालांकि, टीम ने पीछा कर चारों आरोपितों को पकड़ लिया।

किसी सरकारी जांच एजेंसी की टीम से बचने के लिए कथित तौर पर वाहन से भागने और सरकारी वाहन को टक्कर मारने की घटना इस प्रकरण को और गंभीर बना देती है। अब जांच एजेंसी के सामने केवल कथित रिश्वत की रकम और मांग की जांच ही नहीं, बल्कि घटनास्थल पर हुए पूरे घटनाक्रम और भागने की कोशिश की भी पड़ताल का सवाल है।

चारों आरोपित अयोध्या साइबर थाने में तैनात बताए गए

एसीबी की कार्रवाई में जिन चार पुलिसकर्मियों के नाम सामने आए हैं, उनमें सब-इंस्पेक्टर यशवंत सिंह, कांस्टेबल गौरव चारग, कांस्टेबल सोहनलाल और कांस्टेबल पवन त्रिपाठी शामिल बताए गए हैं।

इन सभी के अयोध्या साइबर क्राइम थाने में तैनात होने की जानकारी सामने आई है। आरोपितों के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण कानून के तहत कार्रवाई किए जाने की बात कही गई है और पूछताछ के जरिए यह पता लगाने का प्रयास किया जा रहा है कि कथित रिश्वत की मांग केवल इसी मामले तक सीमित थी या इसके पीछे कोई व्यापक व्यवस्था अथवा अन्य लोगों की भूमिका भी थी।

यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि गिरफ्तारी किसी व्यक्ति को दोषी साबित नहीं करती। अंतिम दोष सिद्धि अदालत में उपलब्ध साक्ष्यों और न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर ही होगी। इसलिए जांच पूरी होने और न्यायालय के अंतिम निर्णय तक सभी आरोपों को आरोप के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

सवाल सिर्फ 2.80 लाख रुपये का नहीं है

इस पूरे प्रकरण का सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि कथित तौर पर 2.80 लाख रुपये की रिश्वत ली जा रही थी या नहीं। असली सवाल यह है कि अगर किसी पुलिसकर्मी को मुकदमे में नाम हटाने, केस को प्रभावित करने अथवा जांच की दिशा बदलने का अधिकार या प्रभाव हासिल है और उस प्रभाव का इस्तेमाल धन लेने के लिए किया जाता है, तो आम नागरिक कानून पर भरोसा कैसे करेगा?

पुलिस की सबसे बड़ी ताकत उसकी वर्दी नहीं, बल्कि जनता का विश्वास है। हथियार, वाहन, अधिकार और कानूनी शक्तियां प्रशासनिक संसाधन हैं; लेकिन पुलिस के प्रति समाज का भरोसा ऐसी पूंजी है जिसे किसी सरकारी आदेश से दोबारा पैदा नहीं किया जा सकता।

जब कोई पुलिसकर्मी रिश्वत के आरोप में पकड़ा जाता है तो उसका असर केवल उस कर्मचारी की छवि पर नहीं पड़ता। लोग पूरे विभाग के कामकाज को संदेह की नजर से देखने लगते हैं। यही कारण है कि भ्रष्टाचार के मामलों में विभागीय कार्रवाई और न्यायिक प्रक्रिया के साथ-साथ संस्थागत जवाबदेही भी जरूरी हो जाती है।

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साइबर क्राइम थाने पर लगा आरोप और भी गंभीर

अयोध्या साइबर क्राइम थाना सामान्य पुलिस थाने से अलग संवेदनशील जिम्मेदारियां निभाता है। साइबर अपराधों की जांच तकनीकी साक्ष्यों, डिजिटल रिकॉर्ड, बैंकिंग लेनदेन, मोबाइल डेटा और ऑनलाइन गतिविधियों से जुड़ी होती है। ऐसे मामलों में जांच अधिकारी के पास कई प्रकार की संवेदनशील सूचनाएं होती हैं।

ऐसे में यदि किसी साइबर क्राइम थाने के पुलिसकर्मी पर किसी आरोपी का नाम हटाने या मुकदमा खत्म कराने के बदले कथित रूप से पैसे मांगने का आरोप लगता है, तो विभागीय स्तर पर इसकी गहराई से जांच होना जरूरी है।

जांच का विषय केवल यह नहीं होना चाहिए कि ट्रैप में कितनी रकम मिली। यह भी देखा जाना चाहिए कि संबंधित मुकदमे में अब तक क्या कार्रवाई हुई थी, विवेचना किस स्तर पर थी, किन अधिकारियों को इसकी जानकारी थी और कथित रूप से रिश्वत मांगने की प्रक्रिया में किसी अन्य व्यक्ति की भूमिका तो नहीं थी।

राज्य प्रशासन के सामने जवाबदेही का सवाल

उत्तर प्रदेश पुलिस में भ्रष्टाचार के आरोपों पर समय-समय पर कार्रवाई होती रही है। लेकिन हर कार्रवाई के बाद एक बुनियादी सवाल सामने आता है—क्या केवल आरोपी कर्मचारी को गिरफ्तार कर लेने से व्यवस्था की जिम्मेदारी पूरी हो जाती है?

निश्चित रूप से भ्रष्टाचार के आरोपी के खिलाफ कानूनी कार्रवाई आवश्यक है, लेकिन उसके साथ यह भी जरूरी है कि विभाग अपनी आंतरिक निगरानी व्यवस्था को मजबूत करे। खासकर ऐसे थानों में जहां पुलिसकर्मियों का आम नागरिकों, आरोपितों, पीड़ितों और संवेदनशील मामलों से सीधा संपर्क होता है।

अगर कोई पुलिसकर्मी दूसरे प्रदेश में जाकर कथित रूप से रिश्वत लेते हुए पकड़ा जाता है, तो यह विभागीय निगरानी के लिए असहज करने वाला प्रश्न है। आखिर संबंधित कर्मचारियों की गतिविधियों पर स्थानीय और वरिष्ठ अधिकारियों की निगरानी कितनी प्रभावी थी? क्या किसी शिकायत, व्यवहार या गतिविधि के संबंध में पहले कोई संकेत मिला था? अगर मिला था तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई? और यदि कोई संकेत नहीं मिला तो निगरानी प्रणाली में ऐसी कौन-सी कमी है जिसे दूर करने की जरूरत है?

इन सवालों का जवाब केवल विभागीय बयान से नहीं, बल्कि निष्पक्ष जांच और पारदर्शी कार्रवाई से मिलना चाहिए।

खाकी की साख बचाने के लिए कठोर कार्रवाई जरूरी

पुलिस विभाग में हजारों-लाखों कर्मचारी ईमानदारी से अपनी ड्यूटी निभाते हैं। इसलिए कुछ कर्मचारियों पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों को पूरे पुलिस बल की ईमानदारी का प्रमाण मानना उचित नहीं होगा। लेकिन दूसरी ओर, ऐसे मामलों को केवल व्यक्तिगत गलती बताकर नजरअंदाज करना भी खतरनाक है।

क्योंकि भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा नुकसान सरकारी खजाने को नहीं, बल्कि संस्थाओं में जनता के विश्वास को होता है।

एक आम व्यक्ति के लिए पुलिस थाना न्याय की पहली सीढ़ी है। यदि उसे यह विश्वास होने लगे कि एफआईआर, विवेचना, गिरफ्तारी, नाम हटाने या केस की दिशा तय करने में पैसे की भूमिका हो सकती है, तो कानून के शासन की बुनियाद कमजोर होती है।

इसलिए अयोध्या साइबर थाने से जुड़े इस मामले में निष्पक्ष और समयबद्ध जांच जरूरी है। यह भी जरूरी है कि यदि आरोप प्रमाणित होते हैं तो दोषियों के खिलाफ ऐसी कार्रवाई हो जो विभाग के भीतर स्पष्ट संदेश दे कि पुलिस की वर्दी किसी भी कीमत पर निजी लाभ कमाने का लाइसेंस नहीं है।

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रिश्वत के खिलाफ कार्रवाई दिखनी भी चाहिए और दिखानी भी चाहिए

भ्रष्टाचार के खिलाफ कानून तभी प्रभावी माना जाएगा जब कार्रवाई निष्पक्ष हो और उसका परिणाम दिखाई दे। राजस्थान एसीबी की कार्रवाई ने यह संदेश जरूर दिया है कि रिश्वत की कथित डील चाहे किसी भी प्रदेश के सरकारी कर्मचारी से जुड़ी हो, जांच एजेंसी कार्रवाई कर सकती है।

अब नजर उत्तर प्रदेश पुलिस और प्रशासन की अगली कार्रवाई पर होगी।

क्या चारों आरोपित पुलिसकर्मियों के खिलाफ विभागीय स्तर पर भी कठोर कार्रवाई होगी? क्या संबंधित मुकदमे की विवेचना की समीक्षा की जाएगी? क्या यह पता लगाया जाएगा कि शिकायतकर्ता से कथित रिश्वत की मांग किस स्तर पर हुई और इसके पीछे कोई अन्य व्यक्ति या अधिकारी तो नहीं था? क्या अयोध्या साइबर क्राइम थाने में लंबित अन्य मामलों की भी आंतरिक समीक्षा होगी?

इन सवालों के जवाब जनता जानना चाहेगी।

कानून के रखवालों के लिए कानून से ऊपर कुछ नहीं

सीकर में हुई यह कार्रवाई इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि आरोपित पुलिसकर्मी उत्तर प्रदेश से राजस्थान तक पहुंचे थे। लगभग 850 किलोमीटर दूर कथित रिश्वत का यह प्रकरण बताता है कि भ्रष्टाचार की जांच का दायरा सीमाओं में बंधा नहीं है। मीडिया रिपोर्टों में अयोध्या से सीकर तक इस कथित रिश्वत कनेक्शन को लेकर सवाल उठाए गए हैं।

लेकिन इससे भी बड़ा संदेश यह है कि पुलिसकर्मी हों या कोई अन्य सरकारी कर्मचारी—कानून की जिम्मेदारी निभाने वाले व्यक्ति कानून से ऊपर नहीं हो सकते।

खाकी को समाज सम्मान इसलिए देता है क्योंकि वह अपराधियों से मुकाबला करती है, कमजोरों की रक्षा करती है और कानून लागू करती है। यही कारण है कि जब उसी खाकी पर भ्रष्टाचार का आरोप लगता है तो चोट सामान्य कर्मचारी पर नहीं, पूरे संस्थान की विश्वसनीयता पर पड़ती है।

अयोध्या साइबर क्राइम थाने के इन चार पुलिसकर्मियों की गिरफ्तारी के मामले में अब न्यायिक प्रक्रिया अपना रास्ता तय करेगी। आरोप सही हैं या गलत, इसका फैसला अदालत करेगी। लेकिन इस प्रकरण ने उत्तर प्रदेश पुलिस और राज्य प्रशासन के सामने एक बड़ा सवाल जरूर रख दिया है—क्या पुलिस की वर्दी में मौजूद हर व्यक्ति के लिए जवाबदेही की व्यवस्था उतनी ही मजबूत है, जितनी आम नागरिक से कानून का पालन कराने की व्यवस्था?

इस सवाल का जवाब केवल प्रेस विज्ञप्ति से नहीं मिलेगा। जवाब मिलेगा निष्पक्ष जांच से, पारदर्शी कार्रवाई से और उस व्यवस्था से जिसमें किसी भी पुलिसकर्मी को यह विश्वास न हो कि पद, वर्दी या अधिकार का इस्तेमाल निजी लाभ के लिए किया जा सकता है।

क्योंकि पुलिस की असली ताकत उसकी बंदूक नहीं, जनता का भरोसा है। और रिश्वत का एक मामला उस भरोसे पर वर्षों तक असर डाल सकता है।

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Author: यायावर

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