लाखों में बिकती मासूम जिंदगियां: पुलिस ने उजागर किया अंतरराज्यीय बाल तस्करी का भयावह नेटवर्क
गरीबी, लालच और संगठित अपराध की काली दुनिया में मासूमों का सौदा, कई राज्यों तक फैला था गिरोह
दुर्गा प्रसाद शुक्ला की खास रिपोर्ट
देश में बाल विवरण जैसे जघन्य घटना समय-समय पर सामने आती रहती हैं, लेकिन हाल ही में सामने आया यह मामला इंसानियत को झकझोर देने वाला है। राजधानी दिल्ली से शुरू हुई जांच में गुजरात और उत्तराखंड से लेकर खाड़ी तक अंतरराज्यीय गिरोह का पर्दाफाश किया गया है, जिसे नवजात और मासूम बच्चों को अलग-अलग व्यवसाय बनाया गया था। इस नेटवर्क में कथित तौर पर आशा कार्यकर्ता, बिचौलिए, बायोलॉजिकल माता-पिता, उपहार और अस्पताल तक शामिल पाए गए हैं।
दिल्ली पुलिस की कार्रवाई में अब तक कई चार अपराधियों और नौ नाबालिग बच्चों को सुरक्षित बचाकर सरकारी संरक्षण में भेजा गया है। पुलिस की शिकायत है कि यह नेटवर्क लंबे समय से सक्रिय था और इसकी जड़ें कई राज्यों तक पहुंच चुकी हैं।
गुप्त सूचना से खुला थोक व्यापारी का राज
इस हत्याकांड की शुरुआत 5 जून को हुई, जब दिल्ली पुलिस को सेंट्रल ईस्टर्न एंटी नारकोटिक्स सेल को सूचना मिली कि राजधानी में एक नवजात शिशु का अवैध सौदा होने वाला है। सूचना के आधार पर पुलिस टीम ने आर.के. आश्रम मेट्रो स्टेशन के आसपास जाल बिछाया।
जैसे ही रियल डील की प्रक्रिया शुरू हुई, पुलिस ने तीन लोगों को गिरफ्तार कर लिया। चार के व्यवसाय से नवजात शिशु के सौदे से जुड़ी आपत्ति भी बरामद की गई। आरंभिक पूछताछ में मिले सुराग इतने गंभीर थे कि मामले की जांच के लिए विशेष जांच दल (एसएटीटी) का गठन किया गया था।
जांच पड़ताल तो सामने आया बड़ा नेटवर्क कनेक्शन
मोटो ने तकनीकी प्रमाणन, मोबाइल कॉल विवरण, बैंक के गोदाम और विभिन्न राज्यों में संपर्कों की जांच शुरू की। जांच के दौरान यह स्पष्ट हुआ कि यह कोई सामान्य अपराध नहीं बल्कि योजनाबद्ध तरीके से संचालित किया जा रहा था।
गिरोह का साधन बेहद सुव्यवस्थित था। आर्थिक रूप से मित्र परिवार की पहचान कर उन्हें सिक्कों का लालच दिया गया था। कई मामलों में जबरन नवजात बच्चों को बेहद कम नकद में खरीद लिया गया था। इसके बाद बच्चों को लाखों-करोड़ों रुपए लेकर उन लोगों को बेच दिया गया जो किसी भी कारण से बच्चा चाहते थे।
आशा कार्यकर्ता पर भी गंभीर आरोप
जांच में सामने आया कि इस पूरे नेटवर्क में एक आशा कार्यकर्ता कथित रूप से अहम भूमिका निभा रही थी। पुलिस के अनुसार वह ऐसे परिवार तक पहुंच गया था जहां नवजात बच्चों के जन्म की जानकारी आसानी से मिल सकती थी।
इसी जानकारी के आधार पर धार्मिक संकट से जूझ रहे परिवारों से संपर्क किया गया था और फिर बच्चों का सौदा किया गया था। पुलिस का कहना है कि यह महिला कथित तौर पर पूरे नेटवर्क के प्रमुखों के बिचौलियों में शामिल थी।
कई राज्यों तक फैला हुआ था गिरोह
पुलिस जांच में दिल्ली के अलावा गुजरात, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश तक इस नेटवर्क की पड़ताल के सबूत मिले हैं। जांच के दौरान गुजरात से उन लोगों की भी हुई गुंडागर्दी, जिन पर अपने ही नवजात बच्चे को बंधक बनाने का आरोप है।
इसी प्रकार के विभिन्न राज्यों से ऐसे नमूनों की पहचान की गई, जिनमें लाखों करोड़ रुपये के बच्चों को अपने पास रखा गया था। पुलिस अब यह भी जांच कर रही है कि इन मामलों में और किस बच्चे को इस नेटवर्क के जरिए खत्म किया गया है।
लाखों रुपए में होते थे मासूमों के सौदे
जांच में सामने आया कि गैंग के बच्चों की उम्र, लिंग और मांग के आधार पर अलग-अलग कीमत तय की गई थी। विशेष रूप से नवजात और स्वस्थ बच्चों की कीमत कई लाख रुपये तक पहुंच गई थी।
पुलिस के मुताबिक कुछ मामलों में चार लाख, पांच लाख और आठ लाख रुपये तक के सबूत मिले हैं। इन पैसों का सामने भुगतान नकद और बैंक खाते के माध्यम से जानने की भी जानकारी है।
नौ बच्चों को सुरक्षित परिवहन निःशुल्क दिया गया
दिल्ली पुलिस की कार्रवाई के दौरान अलग-अलग जगहों से अब तक नौ बच्चों को सुरक्षित बरामद किया गया है। इनमें से कुछ नवजात शिशु थे, जबकि कुछ बच्चों की उम्र एक साल के आसपास बताई गई है।
बरामद किये गये सभी बच्चों को सम्मिलित रूप से सम्मिलित समिति (सीडब्ल्यूसी) में प्रस्तुत किया गया। समिति के निर्देशानुसार बच्चों की चिकित्सा जांच, सुरक्षा और रेखांकन की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।
बाल संरक्षण से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि बच्चों की आगे की देखभाल पूरी तरह से कानूनी प्रक्रिया के तहत की जाएगी ताकि उनका भविष्य सुरक्षित रहे।
बैंक लेनदेन और मनी ट्रेल की हो रही जांच
मामले की जांच को देखते हुए पुलिस अब इकोनोमिक ग्रुप की भी गहराई से जांच कर रही है। अलग-अलग बैंक खातों में चोरी का विश्लेषण किया जा रहा है ताकि यह पता चल सके कि इस अवैध कारोबार से कितनी बड़ी नकदी का कारोबार हुआ है।
पुलिस को खतरा है कि इस नेटवर्क में अभी कई अन्य लोग भी शामिल हो सकते हैं। इसलिए बॅथेर फर्म की तलाश के लिए कॉन्स्टैंट स्टॉक की जा रही है।
आईवीएफ और सरोगेसी से कोई संबंध नहीं मिला
जांच के दौरान पुलिस ने इस तथ्य की भी जांच की कि यह मामला कहां है, आईईएफ या सरोगेसी से तो कोई फर्क नहीं पड़ता। हालांकि अब तक की जांच में ऐसा कोई प्रमाण सामने नहीं आया है।
प्रारंभिक जांच के अनुसार पूरा मामला अवैध बाल और नवजात बच्चों की खरीद-फरोख्त से दुबई में होना स्पष्ट हो रहा है।
समाज के लिए गंभीर चेतावनी
यह मामला केवल कानूनी व्यवस्था का नहीं बल्कि सामाजिक संवेदनाओं पर भी बड़ा सवाल खड़ा करता है। आर्थिक मजबूरी, संत की चाहत और अवैध लालच का लाभ, मासूम बच्चों की जिंदगी को व्यवसाय बनाना बेहद वांछनीय है।
विशेषज्ञ का मानना है कि ऐसे मामलों को रोकने के लिए केवल पुलिस कार्रवाई का औचित्य नहीं है। स्वास्थ्य विभाग, महिला एवं बाल विकास विभाग, स्थानीय प्रशासन एवं समाज को सामूहिक आश्रय की आवश्यकता होगी ताकि नवजात शिशुओं की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।
पुलिस की जांच जारी
दिल्ली पुलिस का कहना है कि मामले की जांच अभी जारी है। बच्चों के बच्चों की तलाश की जा रही है और यह भी पता लगाया जा रहा है कि सालों में इस गिरोह ने बच्चों की अवैध सौदेबाजी की। जांच पूरी होने के बाद कई बड़े खुलासे होने की संभावनाओं को खारिज नहीं किया जा सकता है।
निरीक्षण पुलिस की कार्रवाई से नौ मासूम बच्चों को नया जीवन मिलता है, लेकिन यह घटना समाज के सामने यह सच भी बताती है कि अगर दोस्ती और निगरानी खराब हुई तो मासूम जिंदगियां दोषी के तौर पर एक सौदे की वस्तु बन जाती हैं।









