कृष्ण कांत सिंह की रिपोर्ट
मथुरा की धरती पर सावन केवल एक महीना नहीं होता, यह जैसे प्रकृति, प्रेम, भक्ति और श्रृंगार का ऐसा सम्मिलित उत्सव है, जिसमें आकाश से बरसती बूंदें भी किसी मधुर राग की तरह मन को भिगोती हैं। राधा-कृष्ण की प्रेमलीला से अनुप्राणित ब्रजभूमि में जब सावन उतरता है तो धरती का रूप ही बदल जाता है। कहीं कदंब की डालियां झूमती हैं, कहीं हरियाली अपनी कोमल चादर बिछा देती है, कहीं मेघों की गूंज सुनाई देती है और कहीं झूलों पर बैठी महिलाएं सावन के लोकगीतों से वातावरण को प्रेम और उल्लास से भर देती हैं। ऐसे ही मनोहारी वातावरण में सावन शुक्ल पक्ष की तृतीया पर महिलाओं ने परंपरागत रूप से हरियाली तीज का पर्व मनाया।
चहुंओर बिखरी हरियाली, वर्षा के बाद मिट्टी से उठती सौंधी सुगंध, मेढकों की टर्र-टर्र, पपीहे की पुकार और बादलों की रिमझिम के बीच मथुरा की शाम मानो किसी पुराने ब्रजगीत का जीवंत दृश्य बन उठी। प्रकृति ने जैसे स्वयं श्रृंगार किया हो और उसी श्रृंगार में महिलाओं ने हरे परिधानों से अपना सौंदर्य जोड़ दिया। बलदाऊ टाऊन में हरियाली तीज के अवसर पर महिलाओं ने व्रत रखा, झूले झूले और पारंपरिक उल्लास के साथ अपने पतियों की दीर्घायु, अच्छे स्वास्थ्य तथा परिवार की सुख-समृद्धि की कामना की।
सावन और ब्रज का प्रेम—प्रकृति का अपना श्रृंगार
प्रेम नगरी मथुरा का सावन अपने आप में एक अद्भुत अनुभूति है। यह वही ब्रज है जहां प्रेम को केवल भावना नहीं, बल्कि जीवन की भाषा माना गया है। यहां राधा-कृष्ण की लीलाओं की स्मृतियां आज भी गलियों, कुंजों, मंदिरों और लोकगीतों में सांस लेती हैं। सावन आते ही इस प्रेमभूमि की हरियाली जैसे उन स्मृतियों को फिर से जीवित कर देती है।
हरियाली तीज इसी प्रकृति-श्रृंगार की परंपरा से जुड़ा पर्व है। बारिश के बाद जब धरती का रंग बदलता है, पेड़-पौधों पर नई कोपलें मुस्कुराती हैं और वातावरण में ताजगी घुल जाती है, तब स्त्रियां भी अपने परिधानों, श्रृंगार और उल्लास के माध्यम से प्रकृति का स्वागत करती हैं। हरा रंग इस पर्व की आत्मा बन जाता है। हरी साड़ी, हरी चूड़ियां, मेहंदी की महक और झूले की धीमी गति—इन सबमें सावन का अपना सौंदर्य दिखाई देता है।
बलदाऊ टाऊन में भी यही मनोहारी दृश्य देखने को मिला। महिलाओं ने हरे वस्त्र धारण किए और सादगी के साथ हरियाली तीज मनाई। वातावरण में कहीं ठहाके थे, कहीं सावन के गीतों की मधुरता थी तो कहीं झूले की पींग के साथ चेहरे पर खिलती मुस्कान। ऐसा लगा जैसे वर्षा से भीगी प्रकृति ने महिलाओं के उल्लास के साथ अपना सुर मिला लिया हो।
झूले की पींग में उमड़ा सावन का उल्लास
हरियाली तीज और झूले का संबंध बेहद आत्मीय है। सावन की फुहारों के बीच पेड़ों की डालियों पर पड़ते झूले और उन पर बैठकर झूमती महिलाएं इस पर्व की सबसे आकर्षक छवियों में से एक हैं। बलदाऊ टाऊन में भी महिलाओं ने झूला झूलकर पर्व का आनंद लिया।
झूले की हर पींग जैसे मन को रोजमर्रा की चिंताओं से दूर ले जाती रही। एक ओर सावन की हवा बालों को छूकर गुजरती रही तो दूसरी ओर झूले की गति के साथ हंसी और उल्लास वातावरण में घुलता रहा। किसी के हाथों में हरी चूड़ियां खनकीं, किसी की हथेली पर मेहंदी का रंग गहरा हुआ और किसी के चेहरे पर वर्षों पुरानी सावन की स्मृतियां मुस्कुराती दिखाई दीं।
यह दृश्य केवल मनोरंजन का नहीं था, बल्कि उस सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा था जिसमें प्रकृति और स्त्री-जीवन एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। सावन की हरियाली जहां धरती को सजाती है, वहीं तीज का पर्व स्त्रियों के मन में उत्सव और उमंग के रंग भरता है।
शिव-पार्वती की आराधना से जुड़ी पौराणिक आस्था
हरियाली तीज का धार्मिक और पौराणिक महत्व भी अत्यंत गहरा है। मान्यता है कि इसी दिन माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की थी। उनकी तपस्या, समर्पण और अटूट निष्ठा के बाद भगवान शिव ने उन्हें स्वीकार किया। इसी पौराणिक प्रसंग से हरियाली तीज का पर्व सुहाग, दांपत्य प्रेम और पारिवारिक मंगल की कामनाओं से जुड़ गया।
मान्यता के अनुसार महिलाएं इस दिन अपने पति की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करती हैं। अनेक महिलाएं निर्जला व्रत भी रखती हैं। उनके लिए यह पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि दांपत्य जीवन की मंगलकामना और पारिवारिक सुख के प्रति आस्था की अभिव्यक्ति है।
ब्रजभूमि में इस आस्था का रंग और भी गहरा दिखाई देता है। यहां हर पर्व के साथ भक्ति और प्रेम की ऐसी धारा जुड़ जाती है, जिसमें धार्मिक विश्वास और लोकसंस्कृति एक साथ प्रवाहित होते हैं।
हरे परिधानों में सजा स्त्री सौंदर्य
हरियाली तीज पर हरे रंग का विशेष महत्व है। हरा रंग नई जिंदगी, समृद्धि, प्रकृति और आशा का प्रतीक माना जाता है। इसीलिए महिलाओं के परिधानों में हरे रंग की प्रमुखता दिखाई देती है। बलदाऊ टाऊन में भी महिलाओं ने हरे वस्त्र पहनकर सावन की हरियाली के साथ कदमताल की।
अनीता, विनीता, सरोज, मुस्कान, रामदुलारी, मोनिका, भूदेवी, सीमा, रेणु, मीनू, रेखा, पूजा, कमलेश, हेमा, सुनीता, मछला, ज्योति, नेहा, रूबी, नैना देवी, रुचि, पूनम, आरती, गुंजन, सुमन, कविता, अर्चना, ममता, मधु, निशा आदि महिलाओं ने कहा कि चारों ओर प्रकृति अनुपम छटा बिखेर रही है। ऐसे खुशनुमा वातावरण में मन का उल्लसित होना स्वाभाविक है।
महिलाओं ने कहा कि सावन अपने आप में आनंद का संदेश लेकर आता है। बारिश के बाद जब पेड़-पौधे धुलकर नए रूप में दिखाई देते हैं, खेतों और बागों में हरियाली उतरती है और वातावरण में ठंडक घुलती है, तब हरियाली तीज का उत्सव उस प्राकृतिक सौंदर्य को और अधिक जीवंत कर देता है।
राधा-कृष्ण की भूमि में सावन का श्रृंगार
मथुरा की विशेषता यही है कि यहां प्रकृति का सौंदर्य भी प्रेम की भाषा बोलता प्रतीत होता है। सावन की फुहारें हों या यमुना का प्रवाह, कदंब की छांव हो या मंदिरों में गूंजती भक्ति—ब्रज का प्रत्येक रंग राधा-कृष्ण की प्रेमपरंपरा से जुड़ा दिखाई देता है।
हरियाली तीज के अवसर पर झूलों का दृश्य इसी ब्रज संस्कृति की स्मृति जगाता है। राधा और कृष्ण की झूला-लीला की कल्पना करते ही सावन का पूरा वातावरण जैसे प्रेम के रंग में रंग जाता है। हवा की हल्की सरसराहट, झूले की पींग और महिलाओं के मधुर स्वर मिलकर ऐसा वातावरण रचते हैं, जिसमें आधुनिक जीवन की भागदौड़ कुछ क्षणों के लिए पीछे छूट जाती है।
यही कारण है कि मथुरा में हरियाली तीज केवल एक पर्व नहीं, बल्कि प्रकृति और प्रेम के अद्भुत मिलन का अवसर बन जाती है। यहां सावन की हर बूंद में भक्ति का स्पर्श और हरियाली की प्रत्येक पत्ती में श्रृंगार की झलक महसूस होती है।
प्रकृति और परंपरा का सुंदर संगम
हरियाली तीज की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि इसमें प्रकृति और परंपरा एक साथ दिखाई देती हैं। बारिश से धरती हरी होती है तो पर्व से जीवन में उल्लास आता है। पेड़ों पर झूले पड़ते हैं तो रिश्तों में अपनापन बढ़ता है। हाथों पर मेहंदी रचती है तो लोकगीतों में सावन उतर आता है।
बलदाऊ टाऊन में मनाया गया यह पर्व इसी सांस्कृतिक निरंतरता की सुंदर तस्वीर बना। महिलाओं ने बिना किसी आडंबर के सादगी से पर्व मनाया, व्रत रखा और झूलों का आनंद लिया। उनके चेहरे पर दिखाई देती प्रसन्नता बता रही थी कि त्योहारों का असली सौंदर्य बड़े आयोजनों में नहीं, बल्कि उस सामूहिक खुशी में है जो लोगों को कुछ समय के लिए एक-दूसरे के करीब ले आती है।
मथुरा की धरती पर सावन का यह दृश्य इसलिए भी विशेष है क्योंकि यहां प्रकृति का हर रंग किसी न किसी लोककथा, भक्ति परंपरा या प्रेम स्मृति से जुड़ जाता है। हरियाली तीज ने इस बार भी उसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए महिलाओं के जीवन में उल्लास के रंग भरे।
जब आसमान में बादल उमड़ते हैं, पपीहा पुकारता है, मेढक अपनी धुन में टर्राते हैं और बारिश की बूंदों से धरती महक उठती है, तब ब्रज की फिजा में सावन स्वयं गीत बन जाता है। उसी गीत पर झूमते झूले, हरे परिधानों में सजी महिलाएं और दांपत्य सुख की मंगलकामना—हरियाली तीज के इस दृश्य को और भी मनोहारी बना देते हैं।
सचमुच, प्रेम नगरी मथुरा में सावन, राधा-कृष्ण की प्रेमभूमि और हरियाली तीज का संगम ऐसा ऋंगारिक समागम रचता है, जिसमें प्रकृति स्वयं दुल्हन की तरह सजती है और लोकजीवन उसके माथे पर उत्सव की बिंदी सजा देता है। वर्षा की बूंदों में जहां धरती का श्रृंगार है, वहीं तीज की पींग में मन का उल्लास। यही ब्रज है, जहां मौसम भी प्रेम की भाषा समझता है और त्योहार भी प्रकृति के साथ कदम मिलाकर चलते हैं।

























