‘गीतों की वैज्ञानिक यात्रा-7’ का उद्देश्य प्रचलित ईसाइयों को सैद्धांतिक दृष्टि से सामने रखना है, ताकि उनकी बातें, भावबोध, सांस्कृतिक संदर्भ और मानवता के अर्थों को नए ईश्वरों से महसूस किया जा सके। इस कड़ी में पुराने पंजाबी कवियों के मित्र प्रेम, विरह, प्रतीक्षा और आत्मीयता के शास्त्रीय ग्रंथों को समझने का प्रयास किया गया है।
अनिल अनूप
कुछ गीत सुने नहीं जाते, अंदर उतरते हैं। उनकी आवाज किसी से गुजरकर सीधे स्मृति के ऐसे कोने में पहुंच जाती है, जहां सार्जेंट से कोई हमारा इंतजार कर रही होती है। पुराने अवशेषों की यही सबसे बड़ी खूबी है कि वे अपने समय से हमारे समय में चले गए और फिर भी पुराने नहीं रहे। उन्होंने कहा कि बात अच्छी हो तो किसी और युग की हो, लेकिन इंसान का दुख, प्रेम, इंतजार और अकेलापन कभी पुराना नहीं होता।
पंजाबी संगीत की ऐसी ही विरासत में वडाली ब्रदर्स की आवाज़ एक अलग पहचान है। उस्ताद पूर्णचंद वडाली और उस्ताद प्यारेलाल वडाली की गायकी ने पंजाबी लोकधुन, सूफियाना कलाम और शास्त्रीय संगीत की परंपरा को जिस आत्मीयता से एक-दूसरे में पिरोया किया, वह सुनने वाले को केवल संगीत नहीं सुनाता, बल्कि वह एक भावभूमि में ले जाता है।
इसी परंपरा का एक अत्यंत मार्मिक गीत है- ‘ओ नहीं आया मेरा महरम दिल दा’ । पुरानी पंजाबी आदिवासियों की स्मृति में यह गीत इसलिए भी अलग स्थान रखता है कि इसकी केंद्रीय भावना किसी भी तरह के जटिल उदाहरण से नहीं, बल्कि एक अत्यंत सरल मानव स्थिति से पैदा हुई है – जिसका मन अपना चित्रण करता है, वह नहीं आया।
ऐसी-ऐसी बात है, लेकिन ऐसी ही ‘न आने’ में पूरी दुनिया छुप गई है।
एक छोटी सी टेक और प्रतीक्षा का विराट संसार
गीत की टेक में आने वाली पंक्ति—
“ओ नहीं आया मेरा महरम दिल दा…”
आपके द्वारा एक पूरा भावलोक खोला गया है।
यहां ‘नहीं आया’ सिर्फ किसी व्यक्ति की पहुंच की सूचना नहीं है। यह प्रतीक्षा के आरंभिक साहस की आवाज है। और ‘महरम’ का केवल प्रिय मतलब नहीं है, बल्कि उस व्यक्ति की पहचान है जो सामने दिल अपना सारा राज खोल सकता है।
यही कारण है कि इस टेक में बताया गया है कि गीत का अर्थ केवल प्रेम तक सीमित नहीं है। यह उस प्रकार की याद बन जाती है जिसमें मनुष्य को कभी भी अपने मन को सुरक्षित महसूस नहीं होता है।
‘महरम’ उसे हमारे सामने अपने दुख को सजाकर पेश करने की जरूरत नहीं है। जो कि स्पष्ट रूप से विकसित वास्तुशिल्प की आवश्यकता नहीं है। जो सामने आया उसे स्वीकार करना हार नहीं माना गया। वह मन का वह दरवाज़ा है जिसे हम किसी के लिए नहीं चाहते।
इसलिए जब वह महरम नहीं आता है, तो केवल एक व्यक्ति का व्यक्तित्व नहीं होता है – मन का एक विश्वसनीय दुनिया हो जाता है।
‘महरम’ : एक शब्द, अनेक अर्थ
पंजाबी और फ़ारसी-उर्दू की सांस्कृतिक कविता में ‘महरम’ शब्द का अपना गहरा भावार्थ है। वह केवल प्रेमी या प्रियतम नहीं है। महरम वह आत्मीय है जो हमारे अंदर के रहस्यों से परिचित है।
साहित्य में ऐसे शब्दों की महत्ता बहुत अधिक होती है, क्योंकि एक शब्द अपने साथ पूरा सांस्कृतिक इतिहास लेकर आता है। ‘महरम’ में विश्वास है, अन्याय है, आलोचना है और सबसे उग्र आत्मिक अपनापन है।
यही कारण है कि अरेस्ट ने ‘महरम’ जैसे शब्द को चुनने के बजाय किसी भी सामान्य तस्वीर को चुना। यदि केवल इतना कहा जाता है कि प्रिय नहीं आया, तो अर्थ सीमित हो जाता है। लेकिन ‘महरम’ आते ही प्रेम से आगे आत्मीय संबंध की बात तक पहुंच जाती है।
इस शब्द में वह रिश्ता है जहां दो एक-दूसरे को केवल देखते लोग नहीं, तत्व हैं। और जब ऐसा कोई व्यक्ति नहीं आता, तो प्रतिवादी का दर्द भी सामान्य नहीं रह जाता।
विरह की पहली सीढ़ी : अनुपलब्धता
प्रेम-साहित्य में विरह कोई नया विषय नहीं है। भारतीय काव्य परंपरा में विरह के सबसे गहरे तीर्थों की पहचान की गई है। संस्कृत काव्य से लेकर हिंदी भक्ति साहित्य और पंजाबी सूफी काव्य तक, विरह ने प्रेम को अपने सबसे अंतःविषय अभिव्यक्ति दी है।
मिलन में प्रिय सामने आता है। विरह में प्रिय दिखाई नहीं देता है, लेकिन हर जगह उसकी अनुपस्थिति दिखाई देती है। यही इस गीत की केंद्रीय संवेदना है।
‘नहीं आया’ बोला छोटा वाक्य है, उसका भाव आकार ही बड़ा है। किसी के आने की प्रतीक्षा तब होती है जब उसके आने की उम्मीद हो। यानी शिकायत के अंदर भी जीवित होने की उम्मीद है।
अगर उम्मीद है कि पूरी तरह से खत्म हो गया है तो शिकायत भी नहीं होगी। इसलिए गीत की उदासी के अंदर एक महीन आशा बनी हुई है।
प्रतीक्षा का समय घड़ी से नहीं पता चलता
प्रतीक्षा में समय बदला जाता है।
जिस व्यक्ति को किसी के भी आने का इंतजार हो, उसके लिए एक घंटे कई चौथाई के बराबर हो सकता है। शाम जल्दी नहीं आती, रात जल्दी नहीं कटती और सुबह किसी उत्तर के साथ नहीं आती। प्रतीक्षा मनुष्य के अंदर एक अलग घड़ी बनाई गई है।
पंजाबी लोकगीतों में इस विचारधारा की अद्भुत अभिव्यक्तियाँ हैं। पंजाब की सामाजिक-सांस्कृतिक स्मृतियों में परदेस जाने वाले प्रियजन, सैनिक, व्यापारी, श्रमिक, ब्याह के बाद दूर हुई बेटियाँ और प्रेम में बिछड़े हुए लोग—इन किताबों ने लोकगीतों को भरोसा दिया।
इसलिए ‘ओ नहीं आया मेरा महरम दिल दा’ कहते हुए पंजाबी लोकजीवन की वह पूरी परंपरा याद आती है जिसमें किसी के आने की राह देखना स्वयं एक जीवन-अनुभव बन जाता है।
शिकायत है, लेकिन आरोप नहीं
इस गीत की खूबसूरती इस बात में भी है कि यहां याचिका पर आरोप नहीं लगाया गया है। आज के बहुत से प्रेमगीतों में प्रिय के न आने पर श्लोक, तकरार और हिसाब-किताब दिखाई देते हैं। लेकिन लोक और सूफी परंपरा की शिकायत में भी प्रेम पर प्रतिबंध बना हुआ है।
यहाँ मन कहता है कि वह आया नहीं, परन्तु यह भी कहता है कि अब वह अपना नहीं रहा। यही अंतर प्रेम और स्वामित्व के बीच है। मित्रो प्रेम में अनुपस्थित दुख स्थान है, मगर प्रिय की गरिमा नष्ट नहीं होती। यह गीत उसी परंपरा से प्रकट होता है।
वडाली ब्रदर्स की आवाज में शब्द का विस्तार
किसी भी गीत की वैज्ञानिकता केवल उनके शब्दों में नहीं होती। उनके शासक भी अर्थ रचते हैं। वडाली ब्रदर्स की गायकी की पसंद बनी हुई है कि उनके शब्दों को जल्दी से पार नहीं किया जा सकता। वे स्वर को संदर्भित करते हैं। एक शब्द के पीछे शिष्य भावना को शांति लेने का अवसर दिया जाता है।
इसलिए जब उनकी आवाज़ में ‘मेहरम’ जैसा शब्द आता है, तो वह केवल प्रार्थना नहीं रहती। उसके पीछे स्मृति, पीड़ा, प्रेम और आध्यात्म की कई परतें हैं।
उनकी गायकी में लोक की मिट्टी भी है और सूफियाना विचारधारा की गहराई भी। येही मिक्स इस गाने को एक साधारण प्रेमगीत से ऊपर उठाता है।
सूफ़ियाना अर्थ की ओर से खुला हुआ गीत
पंजाबी सूफी संगीत की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि आध्यात्मिक प्रेम और आध्यात्मिक प्रेम के बीच एक सहज पुल दिखाई देता है।
प्रिय कौन है?
कई बार वह ब्रह्मांड प्रेम का पात्र है। लेकिन वही प्रिय किसी अन्य स्तर पर परम प्रिय का प्रतीक भी बन सकता है।
सूफी परंपरा में मनुष्य की आत्मा अपने मूल से बिछुड़ी हुई मानी जाती है। इसलिए उसकी एकमात्र संपत्ति की कमी नहीं है। वह अपने अनुभव की पूर्णता की तलाश भी करती है। इस दृष्टि से ‘महरम’ उस आत्मीय सत्ता का प्रतीक बन सकता है, जिसका अर्थ है कि आत्मा को आवर्तित किया जाता है।
इसलिए गीत को केवल प्रेम-विरह के बारे में पढ़ना संभव है, लेकिन केवल अन्यत्र रोक लगाने की आवश्यकता नहीं है। यही शास्त्रज्ञ इसकी शक्ति है।
‘दिल दा’: प्रेम का भूगोल अंदर है
गाने की टेक में ‘दिल’ का जिक्र भी अहम है। प्रेम का स्थान शरीर से अधिक मन है। पंजाबी लोकगीतों में ‘दिल’ सिर्फ भावनाओं का केंद्र नहीं है, बल्कि स्मृति और पहचान का भी घर है।
जब कोई कहता है कि अमुक व्यक्ति मेरे दिल का है, तो उसका मतलब सिर्फ यही नहीं कि वह उसे पसंद करता है। वह कह रहा है कि उस व्यक्ति की उपस्थिति उसकी विशेषज्ञता का हिस्सा बन जाती है।
इसलिए ‘महरम दिल’ कहते हैं संबंध की गहराई को बताया गया है। वह शख्स बाहर नहीं, अंदर रहता है। और जब वह बाहर नहीं आता, तब भी भीतर नहीं आता। यही विरह का सबसे बड़ा विरोधाभास है।
जो सामने नहीं है, जो सबसे ज्यादा मौजूद है
विरह के यही वैज्ञानिक इस गीत को मार्मिक रूप देते हैं। जिसे हम सबसे ज्यादा याद करते हैं, वो हमारे सामने नहीं आता। लेकिन उसकी स्मृति में इतनी प्रचुरता है कि उसके आस-पास की हर चीज़ का संकेत मिलता है।
एक आवाज किसी पुराने संवाद की याद दिलाती है। किसी भी तरह पुराने सफर की सैर। कोई मौसम किसी पुराने मिलन की। और कोई गीत ऐसे किसी व्यक्ति की याद में बनाया गया है जो हमें कई वर्षों से नहीं मिला। इस प्रकार की एनिमेटेड वैयक्तिक स्मृति में उपस्थित रहना प्रतीत होता है। ‘ओ नहीं आया मेरा महरम दिल दा’ ऐसी ही उपस्थिति और अनुपस्थिति के बीच झूलता हुआ गीत है।
पुरानी पंजाबी की भाषा में आत्मीयता
आज की भाषा तेज़ है। संदेश छोटे हैं। बातचीत ज़रूरी है। लेकिन मनुष्य के उद्देश्य अभी भी धीमे हैं। यही कारण है कि पुराने पंजाबी गीत आज भी नए स्मारक बनाए जाते हैं। उनका भाव तुरंत समाप्त होने की जल्दी नहीं है।
एक शब्द कई बार प्रमाणित होता है, स्वेर कहीं रहता है, ट्यून्स कहीं लौटता है और श्रोता को उस भाव के साथ रहने का अवसर मिलता है। ‘ओ नहीं आया मेरा महरम दिल दा’ इसी तरह की घटिया भावना का गीत है।
ऐसा लगता है कि गीत हमें कह रहा है-थोड़ा देशो, इस कमी को महसूस करो। किसी के न आने को केवल घटना मत समझो। कभी-कभी किसी का न आना पूरे मन के अंदर एक खाली जगह बना देता है।
यह केवल प्रेमगीत क्या है?
नहीं. यही तो इसकी प्रकृति है। इसे एक प्रेमी अपने प्रियजन के लिए सुन सकते हैं। एक माँ अपने दूर के बेटों के लिए। एक दोस्त अपने बिछड़े दोस्त के लिए| एक प्रवासी अपने गांव के लिए। एक बूढ़ा व्यक्ति अपने समय के लिए निवेश करता है। और एक सूफियाना मन अदृश्य प्रिय की तलाश में वह पूरी जिंदगी भटकता रहता है। अच्छा गीत वही है जो आपके अर्थ का दरवाजा बंद नहीं करता। वह हर श्रोता को अंदर आने देती है।
आज के अकेलेपन में पुराने गीत की नई बर्बादी
हम टेक्नोलॉजी के रूप में पहले से कहीं ज्यादा जुड़े हुए हैं। हमारे हाथ में फोन करें, तुरंत मैसेज करें और दुनिया हमारी स्क्रीन पर मौजूद है। फिर भी आत्मीय संवाद का संकट कम नहीं हुआ। हजारों संपर्कों के बीच एक ‘महरम’ की प्राप्ति आज भी कठिन है।
ऐसा व्यक्ति जिसके सामने हमारे पद, प्रतिष्ठा, आयु, सफलता या असफलता का परिचय दिया गया है, वह है बिना योग्यता के। यह देखकर की जरूरत न पड़े कि हम दुखी क्यों हैं। जो हमारी शैलियाँ सुन सके।
शायद इसीलिए यह पुराना पंजाबी गीत आज भी ऐसा ही अपना लगता है। क्योंकि तकनीक ने दूरी तय कर ली है, लेकिन मन की दूरी का इलाज अब भी आत्मीयता ही है।
साहित्य की प्रस्तुति पर गीत
किसी भी गीत को साहित्य की दृष्टि से देखने का अर्थ केवल उसके कठिन शब्दों या अलंकारों को गिनाना नहीं है। वास्तविक प्रश्न यह है कि वह मनुष्य के अनुभव को कितनी गहराई से पकड़ता है।
‘ओ नहीं आया मेरा महरम दिल दा’ की ताकत आपकी सरलता है। एक व्यक्ति नहीं आया. लेकिन उसके न आने से मन में जो खालीपन पैदा हुआ, गीत वही खालीपन को स्वर देता है।
यही लोककाव्य की शक्ति है। लोकगीत बड़ी-बड़ी सैद्धान्तिक घोषणा नहीं करते। वे जीवन की छोटी-छोटी घटनाओं को पकड़ते हैं और उनसे बड़े अर्थ निकालते हैं। किसी का इंतजार करना छोटी घटना है। लेकिन किसी के लिए अपने अंदर के असली संसार को महसूस करने की प्रतीक्षा करना – यह साहित्य है।
विरह में भी प्रेम की लौ
इस गीत का सबसे सुन्दर पक्ष यह है कि यहाँ प्रेम ख़त्म नहीं होता। उल्टा, अनुपस्थित प्रेम को और स्पष्ट कर देता है। मुझे जो चाहिए वह महसूस होता है, वही प्रिय है। प्रतिवेदन होता है, वही महरम है। जिस न आने पर मन उदास होता है, उसकी उपस्थिति मन के लिए महत्वपूर्ण होती है।
इसलिए गीत का दर्द प्रेम का प्रमाण भी बन जाता है। विरह यहां प्रेम का विरोध नहीं, उसका विस्तार है।
गीत ख़त्म होता है, भावना नहीं
वडाली ब्रदर्स की गायिका का प्रभाव यही है कि गीत सुनने के बाद भी उनका भाव कुछ देर तक अंदर रहता है। आवाज तो चलती है, लेकिन मन में कोई प्रश्न बचा रहता है।
वह महरम कौन था? क्यों नहीं आया? बहुत देर तक प्रतीक्षा हुई? क्या वह कभी लौटा? या फिर वह केवल स्मृति में ही रह गया? गीत इन नमूनों का उत्तर नहीं देता। और शायद यही उसकी खूबसूरती है।
क्योंकि हर श्रोता अपने जीवन से इन आदर्शों की उत्तर खोज करता है। किसी को अपना बिछड़ा हुआ प्रेम की याद आती है। किसी को पुराना दोस्त। किसी को माता-पिता। किसी को अपना गाँव। किसी को अपना बीता हुआ समय। और किसी को वह व्यक्ति, जिससे मन की बात कहे उदाहरण गुजर गए।
‘महरम’ की तलाश कभी खत्म नहीं होती
इंसान कितना भी बड़ा हो जाए, उसके अंदर एक ऐसी जगह हमेशा रहती है जहां उसे किसी की ज़रूरत होती है। वह अपना कोई भी हो सकता है। लेकिन वह ऐसा होना चाहिए सामने मन को प्रदर्शन न करना पड़े।
शायद इसी तरह का नाम ‘महरम’ है। और शायद इसी वजह से ‘ओ नहीं आया मेरा महरम दिल दा’ जैसी छोटी-सी टेक इतनी बड़ी दुनिया को जन्म देती है।
यह पंक्ति हमें बताती है कि मिलन में प्रेम का हमेशा सबसे गहरा रूप रहा। कभी-कभी प्रतीक्षा में साक्षात्कार होता है। कभी किसी की अनुपस्थिति में। कभी-कभी वह अपनी शिकायत में, जिसमें गुस्सा नहीं बल्कि बचपना रहता है।
पुराना पंजाबी गीत हमें यही सिखाता है कि विरह केवल रोना नहीं है। विरह स्मृति है। इंतज़ार है. आशा है. आत्मीयता है। और कभी-कभी वह आध्यात्मिक खोज भी करती है।
वडाली ब्रदर्स की आवाज जब यह भाव आकार देती है, तो पंजाब की मिट्टी, लोकजीवन की स्मृति और सूफियाना संवेदना एक साथ साझा की जाती हैं।
और तब लगता है—किसी महरम का न आना, केवल उसके कदमों का न आना। कभी-कभी वह हमारे बीच एक पूरे संसार का दरवाजा बंद कर देता है। फिर भी मन वह दरवाज़ा सामने खड़ा रहता है। शायद यही उम्मीद है कि एक दिन की बारिश होगी।
और कोई कहेगा— मैं आ गया। यही प्रतीक्षा इस गीत को जीवंत बनाती है। यही विरह इसे साहित्य के करीबी दस्तावेज है। और यही आत्मीयता ‘ओ नहीं आया मेरा महरम दिल दा’ पुरानी पंजाबी विरासत की उस विरासत में खड़ा है, जो दावा किया गया बीता हुआ समय केवल याद नहीं आता है – वह कुछ दिखाने के लिए हमारे सामने आता है।













