डिग्री का लोकतंत्र और क्रांति की मार्कशीट ; जब विचार हारने लगें तो लोग प्रमाणपत्र खोजने लगते हैं

प्रदर्शन के दौरान माइक पर अपनी बात रखती एक युवती की तस्वीर के साथ लोकतंत्र, सवाल पूछने के अधिकार और डिग्री की राजनीति पर आधारित व्यंग्यात्मक फीचर इमेज।

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अनिल अनूप की कलम से

भारत सचमुच अद्भुत देश है। यहाँ आदमी पैदा बाद में होता है, उसकी राय पहले बना दी जाती है। और अगर उसने कभी भीड़ की दिशा से अलग चलने की हिमाकत कर दी, तो समझिए उसके विचारों पर नहीं, उसके पूरे बायोडाटा पर मुकदमा चलने वाला है।

पहले लोग कहते थे—”आपकी बात से असहमति है।” अब कहते हैं—”पहले अपनी मार्कशीट दिखाइए।”

मानो संविधान की प्रस्तावना में कहीं यह लिखा हो कि देश में बोलने का अधिकार केवल उन्हीं नागरिकों को है जिन्होंने अमुक प्रतिशत अंक प्राप्त किए हों। लोकतंत्र अब मतपत्र से नहीं, अंकपत्र से चलने लगा है। संसद से अधिक महत्व सोशल मीडिया के उस कमेंट बॉक्स का हो गया है, जहाँ हर तीसरा आदमी स्वयंभू परीक्षक है और हर चौथा आदमी विश्वविद्यालय का कुलपति। यह नया भारत है, जहाँ बहस से पहले चरित्र प्रमाणपत्र माँगा जाता है और तर्क से पहले योग्यता की तलाशी ली जाती है।

मुझे तो लगता है कि अगर महात्मा कबीर आज पैदा होते, तो कोई उनसे पूछता—”पहले बताइए, आपने किस बोर्ड से परीक्षा पास की थी?”

मुझे कभी-कभी लगता है कि अगर कबीर आज जीवित होते तो शायद दोहा कुछ यूँ लिखते—

मोबाइल हाथ लिये फिरें, सब बन बैठे ज्ञानी।
पोथी पढ़ने की फुर्सत नहीं, पोस्ट पढ़ें मनमानी।।

तुलसीदास से पूछा जाता—”आपकी डिग्री क्या थी?” और प्रेमचंद को शायद यह सलाह दी जाती कि “साहित्य लिखने से पहले नेट-जेआरएफ निकाल लीजिए।”

हम ऐसे समय में जी रहे हैं जहाँ ज्ञान की ऊँचाई नहीं, डिग्री की लंबाई मापी जाती है। विचारों की गहराई नहीं, प्रमाणपत्र का रंग देखा जाता है। और अगर किसी के पास डिग्री कम निकली, तो उसके तर्कों को बिना पढ़े ही ख़ारिज कर दिया जाता है। अजब विडंबना है!

जिस देश में करोड़ों युवाओं की डिग्रियाँ नौकरी की कतार में धूल फाँक रही हैं, उसी देश में कुछ लोग दूसरों की मार्कशीट को राष्ट्रीय सुरक्षा का विषय बनाकर बैठे हैं। सुबह उठते ही उनका पहला काम होता है—आज किसकी पढ़ाई पर शोध करना है?

कोई किसी की हाईस्कूल खोज रहा है। कोई इंटरमीडिएट। कोई कॉलेज। कोई पुरानी तस्वीरें। कोई रिश्तेदार। और जब कुछ भी हाथ नहीं लगता, तब अंतिम ब्रह्मास्त्र निकलता है—”भाई, सुना है…”

हमारा पूरा सार्वजनिक विमर्श अब “सुना है…” पर टिका हुआ है। इस “सुना है” ने न जाने कितने लोगों को महान बनाया और न जाने कितनों को बदनाम। यह ऐसा वाक्य है जिसका कोई बाप नहीं, लेकिन लाखों बेटे हैं।

आजकल व्हाट्सऐप विश्वविद्यालय का दीक्षांत समारोह रोज़ होता है। सुबह कोई “विशेषज्ञ” बनता है, दोपहर तक “राष्ट्रवादी विचारक” और शाम तक “इतिहासकार”। अगले दिन वही व्यक्ति अर्थशास्त्र, विदेश नीति, न्यायपालिका और शिक्षा व्यवस्था पर अंतिम निर्णय भी सुना देता है।

कमाल यह है कि उसे अपने बच्चे की रिपोर्ट कार्ड देखने का समय नहीं मिलता, लेकिन पूरे देश की बौद्धिक गुणवत्ता का मूल्यांकन करने का समय भरपूर है।

और जनता भी कम दोषी नहीं है। उसे सच नहीं चाहिए। उसे मसाला चाहिए। उसे तथ्य नहीं चाहिए। उसे फ़ॉरवर्ड चाहिए। क्योंकि तथ्य पढ़ने पड़ते हैं और फ़ॉरवर्ड केवल भेजने पड़ते हैं। यही हमारे समय की सबसे बड़ी त्रासदी है।

बहस अब विचारों की नहीं रही। व्यक्ति की हो गई है। सवालों की नहीं रही। सरनेम की हो गई है। तर्कों की नहीं रही। ट्रेंडिंग हैशटैग की हो गई है। और लोकतंत्र… वह बेचारा अब भी कोने में बैठा उम्मीद कर रहा है कि शायद किसी दिन लोग फिर से विचारों पर बहस करेंगे, व्यक्तियों पर नहीं।

व्हाट्सऐप विश्वविद्यालय के कुलपति

हमारे समय की सबसे बड़ी उपलब्धि यह नहीं कि चंद्रयान चाँद पर पहुँच गया। सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि देश का हर दूसरा आदमी बिना किसी प्रतियोगी परीक्षा के “विशेषज्ञ” बन गया है।

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जिसने कभी किसी विश्वविद्यालय का मुँह नहीं देखा, वह शिक्षा नीति पर अंतिम फैसला सुना रहा है। जिसने अख़बार का संपादकीय कभी पूरा नहीं पढ़ा, वह लोकतंत्र बचाने का रोडमैप बाँट रहा है। जिसने अपने जीवन में दो किताबें भी पूरी नहीं पढ़ीं, वह इतिहास का पुनर्लेखन कर रहा है।

और यह सब इतनी गंभीरता से होता है कि असली प्रोफेसर भी सोचने लगते हैं—”शायद हमने पढ़-लिखकर गलती कर दी।”

आज ज्ञान अर्जित नहीं किया जाता, डाउनलोड किया जाता है। सुबह एक वीडियो देखिए। दोपहर तक विशेषज्ञ बन जाइए। शाम को लाइव आइए। रात तक “राष्ट्र का चिंतक” घोषित हो जाइए। इतनी तेज़ शिक्षा व्यवस्था तो नालंदा विश्वविद्यालय में भी नहीं रही होगी।

‘सुना है’ का संविधान

भारतीय लोकतंत्र का एक नया अनुच्छेद जुड़ चुका है—अनुच्छेद ‘सुना है’। इस अनुच्छेद के अनुसार कोई भी व्यक्ति किसी भी विषय पर कुछ भी कह सकता है, बशर्ते शुरुआत इन दो शब्दों से करे—”सुना है…” “सुना है…” इतना शक्तिशाली वाक्य है कि इसके सामने प्रमाण भी सिर झुका देता है। न कोई दस्तावेज़ चाहिए। न कोई गवाह। न कोई जाँच। बस एक आदमी कहे—”सुना है…” दूसरा बोले—”मैंने भी सुना है…” तीसरा लिख दे—”यह बात दबाई जा रही है…” और चौथा जोड़ दे—”अगर सच्चे नागरिक हो तो आगे भेजो।” बस… झूठ का जन्म हो गया। सच बेचारा अस्पताल में भर्ती हो जाता है और अफ़वाह विजय रथ पर बैठकर पूरे देश का भ्रमण करती है।

फ़ॉरवर्ड करने वालों का राष्ट्रधर्म

पहले लोग दान करते थे। अब लोग फ़ॉरवर्ड करते हैं। कभी अन्नदान होता था।अब अफ़वाहदान होता है। और बड़ी श्रद्धा से होता है। कोई संदेश पढ़ता भी नहीं। बस ऊपर लिखा होता है—”बहुत महत्वपूर्ण…” यही शब्द उसे राष्ट्रीय कर्तव्य का एहसास करा देते हैं।

फिर वह सोचता है—”अगर मैंने इसे आगे नहीं भेजा तो शायद देश का बहुत बड़ा नुकसान हो जाएगा।” ऐसा समर्पण अगर किताबें पढ़ने में दिख जाता तो शायद देश की आधी समस्याएँ समाप्त हो जातीं।

भीड़ का न्यायालय

दुनिया की सबसे तेज़ अदालत कौन-सी है? न सुप्रीम कोर्ट। न हाईकोर्ट। सबसे तेज़ अदालत है—सोशल मीडिया का कमेंट बॉक्स। यहाँ मुक़दमा दर्ज होने में पाँच सेकंड लगते हैं। सुनवाई एक मिनट चलती है। फैसला दो मिनट में आ जाता है।

और सज़ा? वह जीवन भर चल सकती है। सबूत की कोई आवश्यकता नहीं। जिसके पक्ष में भीड़ है, वही निर्दोष।जिसके खिलाफ़ भीड़ है, वही दोषी। लोकतंत्र धीरे-धीरे भीड़तंत्र में बदलता नहीं, शेयर होता है।

ज्ञान की नहीं, आत्मविश्वास की महामारी

आजकल सबसे सस्ती चीज़ अगर कोई है तो वह है—आत्मविश्वास। ज्ञान महँगा हो गया है। पढ़ना कठिन हो गया है। समझना उससे भी कठिन। लेकिन घोषणा करना सबसे आसान काम है। लोग कहते हैं—”मुझे पूरा सच पता है।”

मैं सोचता हूँ—जिस आदमी को अपने बिजली के बिल की आख़िरी तारीख़ याद नहीं रहती, उसे दुनिया का पूरा सच कैसे पता चल जाता है? शायद इंटरनेट का सबसे बड़ा चमत्कार यही है कि उसने जानकारी से पहले भ्रम का लोकतंत्रीकरण कर दिया।

आजकल आदमी की पहचान उसके विचारों से नहीं, उसके बारे में चल रही पोस्टों से बनने लगी है। उसने क्या कहा, यह कम महत्वपूर्ण है। उसके बारे में क्या कहा जा रहा है, यही सबसे बड़ा सच बना दिया गया है। और यही हमारे समय का सबसे बड़ा व्यंग्य है। जिस समाज में पुस्तकालय खाली और कमेंट बॉक्स भरे हों, वहाँ विचार धीरे-धीरे निर्वासन में चले जाते हैं। बाक़ी बच जाती है केवल आवाज़… और आवाज़ जितनी ऊँची होती है, उसे उतना ही बड़ा सत्य मान लिया जाता है।

कैमरे वाली क्रांति और लाइक-लपेट आंदोलन

एक ज़माना था जब क्रांति जंगलों, जेलों और जनसभाओं में जन्म लेती थी। आजकल क्रांति का प्रसव कक्ष बदल गया है। अब वह रिंग लाइट की रोशनी में पैदा होती है और मोबाइल कैमरे के सामने पलती-बढ़ती है।

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पहले आंदोलनकारी लाठी खाते थे। अब एंगल देखते हैं। पहले जेल जाने की तैयारी होती थी। अब मेकअप रूम की। पहले नारा गूंजता था—”इंक़लाब ज़िंदाबाद!” अब आवाज़ आती है—”भाई… कैमरा ऑन है न?” इतिहास बेचारा सिर पकड़कर बैठा है। उसे समझ नहीं आ रहा कि वह स्वतंत्रता संग्राम पढ़ाए या सोशल मीडिया का एल्गोरिदम।

क्रांति प्राइवेट लिमिटेड

देश में अब एक नया उद्योग फल-फूल रहा है—“क्रांति प्राइवेट लिमिटेड”। यहाँ आंदोलन भी पैकेज में मिलता है। दो घंटे का धरना… तीन घंटे का विरोध… चार घंटे का हैशटैग… और शाम तक प्राइम टाइम की बहस। अगर नारे थोड़े कमज़ोर पड़ जाएँ तो बैकग्राउंड में तेज़ संगीत जोड़ दीजिए। अगर भीड़ कम लगे तो कैमरा ज़ूम कर दीजिए। अगर सवाल कठिन हों तो विषय बदल दीजिए। और अगर तर्क ख़त्म हो जाएँ तो व्यक्तिगत हमला शुरू कर दीजिए।राजनीति का नया पाठ्यक्रम यही है।

रील की राजनीति

आजकल विचार नहीं चलते, रील चलती है। तीस सेकंड में देशभक्ति। चालीस सेकंड में क्रांति। एक मिनट में विचारधारा। और डेढ़ मिनट में पूरा इतिहास। इतनी तेज़ शिक्षा व्यवस्था तो किसी विश्वविद्यालय ने भी नहीं बनाई। बच्चे अब संविधान से पहले “शॉर्ट वीडियो” पढ़ रहे हैं। और नेता घोषणापत्र से पहले “थंबनेल” बनवा रहे हैं। जिसका थंबनेल जितना चमकीला, उसकी राजनीति उतनी सफल।

मीडिया का महाभारत

टीआरपी का भी अपना धर्म है। उसे सच से उतना ही प्रेम है जितना मछली को साइकिल से। टीआरपी पूछती है— “सच में मसाला कितना है?” अगर मसाला कम हो तो बहस बढ़ा दो। अगर बहस कम हो तो आवाज़ बढ़ा दो। अगर आवाज़ भी कम लगे तो चार और प्रवक्ता बुला लो। एक चिल्लाएगा। दूसरा बीच में टोकेगा। तीसरा मेज़ थपथपाएगा। चौथा कहेगा—”मुझे पूरा करने दीजिए…” और एंकर मुस्कुराएगा। क्योंकि विज्ञापन का समय आ चुका होगा।

भीड़ की स्मृति

भीड़ की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उसकी याददाश्त बहुत छोटी होती है। उसे कल क्या सच था, याद नहीं रहता। उसे बस आज क्या वायरल है, वही याद रहता है। आज जिसकी जय-जयकार है, कल उसी की हूटिंग होगी। आज जो नायक है, कल वही खलनायक बनेगा। और परसों? परसों भीड़ किसी नए चेहरे की तलाश में निकल पड़ेगी। भीड़ कभी किसी की स्थायी मित्र नहीं होती। वह सिर्फ़ तमाशे की स्थायी ग्राहक होती है।

लोकतंत्र बनाम एल्गोरिदम

कभी लोकतंत्र जनता की इच्छा से चलता था। अब एल्गोरिदम की इच्छा से चलने लगा है। जो अधिक दिखेगा, वही अधिक बिकेगा। जो अधिक बिकेगा, वही अधिक सच माना जाएगा। और जो अधिक सच माना जाएगा, वही अगले दिन राष्ट्र की बहस बन जाएगा। यहाँ सत्य की नहीं, दृश्यता की जीत होती है। इसलिए लोग विचारों को नहीं, दृश्य को सजाते हैं।

भाषण कम लिखते हैं। कैप्शन ज़्यादा लिखते हैं। देश कम बदलते हैं। डीपी ज़्यादा बदलते हैं।

अंत में एक छोटी-सी बात…

मुझे कैमरे से शिकायत नहीं है। सोशल मीडिया से भी नहीं। शिकायत सिर्फ़ इतनी है कि हमने उन्हें साधन से अधिक साध्य बना दिया। जहाँ विचारों की जगह दृश्य ले लेता है, वहाँ संवाद धीरे-धीरे अभिनय में बदल जाता है। और अभिनय जितना सफल होता जाता है, समाज उतना ही असली सवालों से दूर चला जाता है। क्योंकि कैमरा आँसू दिखा सकता है… लेकिन संवेदना नहीं। कैमरा भीड़ दिखा सकता है… लेकिन चेतना नहीं।और कैमरा क्रांति का दृश्य तो बना सकता है… क्रांति स्वयं नहीं।

लोकतंत्र की सप्लीमेंट्री परीक्षा

आख़िर में मुझे अपने बचपन का एक मास्टर साहब याद आते हैं। परीक्षा समाप्त होने के बाद वे कॉपियाँ जाँचते हुए अक्सर कहा करते थे— “बेटा, उत्तर गलत होना उतना खतरनाक नहीं है, जितना बिना पढ़े सही होने का घमंड।”

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उस समय यह बात समझ नहीं आई थी। आज सोशल मीडिया देखकर लगता है कि मास्टर साहब भविष्य देखकर गए थे। हम ऐसे समय में जी रहे हैं जहाँ हर आदमी उत्तर लेकर घूम रहा है, लेकिन प्रश्न पढ़ने को तैयार नहीं। हर जेब में फ़ैसला है, लेकिन विवेक नहीं। हर उँगली में आरोप है, लेकिन आत्मावलोकन नहीं।

और सबसे मज़ेदार बात यह है कि हर कोई लोकतंत्र बचाने निकला है, बशर्ते लोकतंत्र उसकी बात मान ले। यदि लोकतंत्र ने उससे प्रश्न पूछ लिया, तो वही लोकतंत्र अचानक खतरे में घोषित कर दिया जाता है।

डिग्री से डरने वाले लोग

समाज का सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह नहीं कि कुछ लोग कम पढ़े हैं। सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि कुछ लोग पढ़े-लिखे होने का अभिनय कर रहे हैं। डिग्री किसी विश्वविद्यालय से मिलती है। ज्ञान अनुभव से मिलता है। और विवेक… वह तो लगातार अपने पूर्वाग्रहों से लड़ने पर मिलता है। लेकिन हमने तीनों को एक ही फ़ाइल में डाल दिया है। अब आदमी की बात नहीं सुनी जाती, उसका बायोडाटा पढ़ा जाता है। उसके तर्क नहीं तौले जाते, उसके बारे में चल रही चर्चाएँ तौली जाती हैं। और अगर भीड़ ने तय कर लिया कि फलाँ व्यक्ति गलत है, तो फिर सत्य को भी भीड़ से अनुमति लेनी पड़ती है।

भीड़ कभी इतिहास नहीं लिखती

भीड़ न किताब लिखती है, न संविधान। भीड़ केवल नारे लिखती है। इतिहास हमेशा वही लोग लिखते हैं जिन्होंने भीड़ से अलग खड़े होने का साहस किया। कबीर भीड़ के साथ नहीं थे। गांधी भीड़ के पीछे नहीं चले, भीड़ उनके पीछे चली। डॉ. आंबेडकर ने भीड़ का शोर नहीं, संविधान की भाषा चुनी। और हरिशंकर परसाई ने भीड़ पर नहीं, उसकी मानसिकता पर व्यंग्य लिखा। यही साहित्य की ताक़त है। व्यक्ति बदलता रहता है। प्रवृत्ति बार-बार लौटती है। इसलिए व्यंग्य व्यक्ति पर नहीं, प्रवृत्ति पर होना चाहिए।

हम सब परीक्षा में हैं

आज परीक्षा किसी नेता की नहीं है। किसी पत्रकार की नहीं है। किसी कार्यकर्ता की नहीं है। परीक्षा हमारी है। क्या हम बिना जाँचे किसी बात को सच मान लेंगे? क्या हम किसी व्यक्ति को उसकी बातों से नहीं, उसके बारे में चल रही पोस्टों से पहचानेंगे? क्या हम अपनी असहमति को तर्क से व्यक्त करेंगे या व्यक्तिगत हमले से? यही लोकतंत्र की असली परीक्षा है। और अफ़सोस… इस परीक्षा में हममें से बहुत से लोग अभी भी सप्लीमेंट्री में हैं।

आख़िरी बात…

किसी की डिग्री देखकर उसे छोटा मत समझिए। किसी की लोकप्रियता देखकर उसे बड़ा मत मानिए। किसी वायरल पोस्ट को अंतिम सत्य मत मानिए। और किसी कमेंट बॉक्स को अदालत मत बनाइए। क्योंकि समाज विश्वविद्यालयों से नहीं, विवेक से आगे बढ़ता है। लोकतंत्र तालियों से नहीं, सवालों से मज़बूत होता है। और राष्ट्र उन लोगों से नहीं बनता जो हर सुबह एक नया दुश्मन खोज लेते हैं, बल्कि उनसे बनता है जो हर शाम अपने भीतर बैठे पूर्वाग्रहों से लड़ते हैं। आज ज़रूरत नई डिग्रियों की नहीं है। नई सोच की है। नई बहस की है। नई विनम्रता की है।

क्योंकि अगर हम हर असहमति का उत्तर किसी की मार्कशीट में ढूँढ़ेंगे, तो एक दिन ऐसा भी आएगा जब विचारों के विश्वविद्यालय बंद हो जाएँगे और केवल अफ़वाहों के कॉलेज बचेंगे।

उस दिन डिग्रियाँ बहुत होंगी… लेकिन ज्ञान बहुत कम। प्रमाणपत्र बहुत होंगे… लेकिन चरित्र बहुत छोटा। और मोबाइल में इंटरनेट बहुत तेज़ होगा… लेकिन समाज का विवेक हमेशा की तरह “नो नेटवर्क” दिखा रहा होगा।

– अनिल अनूप

“विचारों की हार तब नहीं होती जब कोई उनसे असहमत हो जाए; विचारों की असली हार तब होती है जब उनके जवाब में लोग तर्क नहीं, मार्कशीट तलाशने लगते हैं।”

यायावर
Author: यायावर

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One Response

  1. अनूप जी, आपका व्यंग्यात्मक लेख बहुत ही पठनीय है। पूरा पढ़ने के बाद इसका समापन बहुत ही अर्थपूर्ण लगा
    एक दिन ऐसा भी आएगा जब विचारों के विश्वविद्यालय बंद हो जाएंगे उस दिन डिग्रियाँ बहुत होंगी… लेकिन ज्ञान बहुत कम। प्रमाणपत्र बहुत होंगे… लेकिन चरित्र बहुत छोटा। और मोबाइल में इंटरनेट बहुत तेज़ होगा… लेकिन समाज का विवेक हमेशा की तरह “नो नेटवर्क” दिखा रहा होगा। जाएँगे और केवल अफ़वाहों के कॉलेज बचेंगे।

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