दो मुलाकातें, दो व्यक्तित्व और ईमानदारी के दो अलग-अलग रंग

लेखक अनिल अनूप के साथ पवन कुमार कोठारी की तस्वीरों का कोलाज, जिसमें अनुशासन, कानून, शिक्षा और ईमानदारी के अलग-अलग व्यक्तित्व उभरते हैं

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लेख एवं प्रस्तुति — अनिल अनूप

जीवन में मुलाकातें बहुत होती हैं, लेकिन हर मुलाकात स्मृति नहीं बनती। कुछ लोग मिलते हैं, बातचीत होती है और फिर समय की भीड़ में वह मुलाकात कहीं पीछे छूट जाती है। लेकिन कभी-कभी जीवन ऐसे लोगों से मिलाता है जिनसे हुई मुलाकात केवल परिचय तक सीमित नहीं रहती। वह भीतर कोई विचार छोड़ जाती है, कोई प्रश्न खड़ा करती है या फिर मनुष्य को मनुष्य की तरह देखने की दृष्टि को थोड़ा और व्यापक बना देती है।

इस वर्ष मुझे दो ऐसे अलग-अलग स्वभाव और कार्यक्षेत्र वाले व्यक्तियों से मिलने का सौभाग्य मिला, जिनका व्यक्तित्व मेरे लिए लंबे समय तक विचार का विषय बना रहा।

एक हैं संजय जैन बडजात्या—पढ़े-लिखे, समझदार और शिक्षक के रूप में अपने दायित्व को समझने वाले व्यक्ति। दूसरे हैं पवन कुमार कोठारी—पढ़े-लिखे, विद्वान और जेलर के रूप में कानून, अनुशासन तथा ईमानदारी को अपने व्यवहार का हिस्सा बनाने वाले अधिकारी।

दोनों अलग हैं। दोनों की कार्यशैली अलग है। दोनों का व्यवहार अलग है। दोनों को देखने और समझने का नजरिया भी अलग होना चाहिए। फिर भी इन दोनों में एक ऐसी समानता है, जिसने मुझे प्रभावित किया—दोनों के भीतर अपने-अपने दायित्व के प्रति गंभीरता दिखाई देती है।

यदि एक वाक्य में इन दोनों व्यक्तित्वों को समझाने का प्रयास करूं तो कहूंगा—एक में अनुयायी जैसा सहज समर्पण है तो दूसरे में कड़क ईमानदारी का स्टेनलेस स्टील।

यह तुलना किसी श्रेष्ठता या हीनता की नहीं है। यह केवल दो अलग-अलग व्यक्तित्वों के उन रंगों को समझने का प्रयास है, जिन्हें मैंने अपनी आंखों से देखा और अपने अनुभव में महसूस किया।

संजय जैन बडजात्या : शिक्षक होना केवल पढ़ाना नहीं

शिक्षक समाज का ऐसा व्यक्ति होता है जिसकी भूमिका कक्षा की चारदीवारी से कहीं आगे जाती है। वह केवल पाठ्यक्रम पूरा नहीं करता। वह मनुष्य तैयार करता है। वह प्रश्न करने की क्षमता देता है, सोचने की दिशा देता है और कई बार अपने आचरण से वह पाठ पढ़ा देता है जो किसी पुस्तक में नहीं मिलता।

संजय जैन बडजात्या से मिलते हुए मुझे शिक्षक के इसी व्यापक अर्थ को समझने का अवसर मिला।

उनकी बातचीत में एक प्रकार की सहजता है। अपने ज्ञान का प्रदर्शन करने की बेचैनी नहीं, बल्कि सामने वाले को समझने और संवाद करने की इच्छा अधिक दिखाई देती है। यह गुण किसी भी शिक्षित व्यक्ति के व्यक्तित्व को अलग पहचान देता है।

आज शिक्षा के क्षेत्र में डिग्रियों और प्रमाणपत्रों की चर्चा बहुत होती है। लेकिन शिक्षा का वास्तविक मूल्य तब सामने आता है जब वह मनुष्य के व्यवहार में दिखाई देती है। कोई व्यक्ति कितना पढ़ा है, इसका अनुमान उसकी शैक्षिक योग्यता से लगाया जा सकता है; लेकिन वह कितना समझदार है, इसका पता उसके व्यवहार से चलता है। संजय जैन बडजात्या के व्यक्तित्व में मुझे इसी व्यवहारिक समझ का स्पर्श दिखाई दिया।

एक शिक्षक का काम केवल यह बताना नहीं है कि किताब में क्या लिखा है। उसका काम यह भी है कि विद्यार्थी को यह समझ आए कि किताब में लिखी बात का जीवन में क्या अर्थ है। ज्ञान तब तक अधूरा है जब तक वह विवेक में परिवर्तित न हो जाए।

और शायद यही कारण है कि किसी शिक्षक का मूल्य उसके पढ़ाए गए पाठों से अधिक उन लोगों से तय होता है जिनके जीवन में उसकी शिक्षा किसी न किसी रूप में दिखाई देती है।

अनुयायी होना अंधानुकरण नहीं

संजय जैन बडजात्या के व्यवहार में मुझे एक प्रकार का अनुयायी भाव दिखाई देता है। लेकिन इस शब्द को समझने में सावधानी जरूरी है।

अनुयायी होना किसी व्यक्ति की अपनी स्वतंत्र सोच समाप्त कर देना नहीं है। सच्चा अनुयायी वह है जो किसी विचार, उद्देश्य, परंपरा या श्रेष्ठ व्यक्तित्व से सीखने की क्षमता रखता है।

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आज हर व्यक्ति स्वयं को नेता साबित करने की जल्दी में है। हर किसी को लगता है कि उसे ही सुना जाना चाहिए। सोशल मीडिया के इस दौर ने आत्मप्रदर्शन को और बढ़ा दिया है। ऐसे समय में किसी दूसरे की अच्छी बात को स्वीकार करना, किसी श्रेष्ठ विचार से प्रभावित होना और सीखने के लिए स्वयं को खुला रखना अपने आप में एक बड़ी विशेषता है। संजय जैन बडजात्या में मुझे यही सहजता दिखाई देती है।

एक शिक्षक यदि स्वयं को सर्वज्ञ समझने लगे तो उसके सीखने की यात्रा वहीं समाप्त हो जाती है। लेकिन जो व्यक्ति उम्र, अनुभव और पद के बावजूद सीखने की गुंजाइश बचाए रखता है, वही दूसरों को भी सीखने की प्रेरणा दे सकता है।

शायद शिक्षक के व्यक्तित्व की यही सबसे खूबसूरत विशेषता है—वह ज्ञान का मालिक नहीं, ज्ञान की यात्रा का सहयात्री होता है।

पवन कुमार कोठारी : जहां ईमानदारी व्यवहार बन जाती है

दूसरी मुलाकात बिल्कुल अलग संसार से थी। पवन कुमार कोठारी एक जेलर हैं। जेल प्रशासन का दायित्व सामान्य प्रशासनिक जिम्मेदारियों से अलग होता है। यहां कानून, अनुशासन, मानव व्यवहार और प्रशासनिक निर्णय एक साथ काम करते हैं।

ऐसे पद पर बैठे व्यक्ति से केवल कठोरता की अपेक्षा नहीं होती। उससे विवेक की भी अपेक्षा होती है। क्योंकि जेल की चारदीवारी के भीतर रहने वाले लोगों के साथ कानून के अनुसार व्यवहार करना जितना आवश्यक है, उतना ही आवश्यक है कि अधिकारी स्वयं अपने अधिकार और जिम्मेदारी की सीमा को समझे।

पवन कुमार कोठारी के व्यक्तित्व में मुझे सबसे अधिक जो बात प्रभावित करती है, वह है ईमानदारी के प्रति कठोर आग्रह। उनके भीतर की ईमानदारी मुझे किसी चमकदार धातु की तरह दिखाई देती है—स्टेनलेस स्टील जैसी।

यह उपमा इसलिए कि स्टेनलेस स्टील केवल चमकता ही नहीं, टिकता भी है। परिस्थितियां बदलें, समय बदले, वातावरण बदले, लेकिन उसका मूल स्वभाव आसानी से नहीं बदलता। ईमानदारी भी ऐसी ही होनी चाहिए।

यदि ईमानदारी केवल तब तक है जब तक परिस्थिति अनुकूल है, तो वह सुविधा है। यदि ईमानदारी तब भी कायम रहती है जब रास्ता कठिन हो, दबाव हो या व्यक्तिगत नुकसान की संभावना हो, तभी वह चरित्र का हिस्सा बनती है।

कानून के साथ जिम्मेदारी भी जरूरी

पवन कुमार कोठारी द्वारा विधि विद्यार्थियों के बीच अनुशासन, आत्मनियंत्रण और कानून की जिम्मेदारी पर जोर देना इसी व्यापक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। कानून पढ़ना और कानून की आत्मा को समझना दो अलग-अलग बातें हैं।

कानून की पढ़ाई किसी व्यक्ति को विधिक ज्ञान देती है, लेकिन कानून के प्रति जिम्मेदारी उसके चरित्र की परीक्षा लेती है। एक भावी विधि विद्यार्थी कल वकील, न्यायिक अधिकारी, विधि विशेषज्ञ या किसी प्रशासनिक भूमिका में हो सकता है। उसके निर्णयों का प्रभाव केवल उसकी अपनी जिंदगी पर नहीं पड़ेगा, बल्कि दूसरे लोगों के जीवन पर भी पड़ सकता है।

इसलिए विधि शिक्षा के साथ आत्मनियंत्रण और अनुशासन की बात करना आवश्यक है।कानून की ताकत उसकी धाराओं में जितनी है, उससे कहीं अधिक उसे लागू करने वाले मनुष्य की नीयत में होती है।

यदि नीयत कमजोर है तो सबसे अच्छी व्यवस्था भी कमजोर पड़ सकती है। लेकिन यदि व्यक्ति ईमानदार है, विवेकशील है और अपने दायित्व के प्रति सजग है, तो कठिन परिस्थितियों में भी व्यवस्था को संभालने की संभावना बनी रहती है। यहीं पवन कुमार कोठारी का व्यक्तित्व मेरे लिए महत्वपूर्ण हो जाता है।

ईमानदारी का असली अर्थ क्या है?

हम अक्सर कहते हैं—फलां व्यक्ति ईमानदार है। लेकिन ईमानदारी की वास्तविक परिभाषा क्या है? क्या केवल आर्थिक भ्रष्टाचार से दूर रहना ईमानदारी है? नहीं। ईमानदारी इससे कहीं व्यापक मूल्य है।

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अपने पद के प्रति ईमानदार रहना, अपने निर्णय के प्रति जिम्मेदार रहना, अपनी बात और कर्म के बीच दूरी न रखना, किसी गलत कार्य का समर्थन न करना और परिस्थितियों के अनुसार अपने सिद्धांतों को बदलने से बचना—ये सभी ईमानदारी के अलग-अलग रूप हैं।

ईमानदारी तब आसान होती है जब उसके बदले प्रशंसा मिले। कठिन तब होती है जब उसके कारण अकेले खड़ा होना पड़े। यही कारण है कि किसी अधिकारी की ईमानदारी का मूल्य उसके सामान्य दिनों से अधिक कठिन परिस्थितियों में समझा जा सकता है।

पवन कुमार कोठारी में मुझे इसी कठोर ईमानदारी की छाप दिखाई देती है। वह ईमानदारी जो केवल भाषण का विषय नहीं, बल्कि व्यवहार का हिस्सा हो।

दो व्यक्तित्व, दो रास्ते, एक साझा मूल्य

संजय जैन बडजात्या और पवन कुमार कोठारी को यदि कोई केवल उनके पेशे से देखेगा तो दोनों में बहुत अंतर दिखाई देगा। एक शिक्षक है। दूसरा जेलर।

एक का संसार शिक्षा, विद्यार्थी और ज्ञान से जुड़ा है। दूसरे का संसार कानून, प्रशासन और अनुशासन से। लेकिन यदि थोड़ा गहराई से देखें तो दोनों के बीच एक साझा सूत्र दिखाई देता है—जिम्मेदारी। शिक्षक की जिम्मेदारी है कि वह ज्ञान के साथ संस्कार दे। जेलर की जिम्मेदारी है कि वह कानून और अनुशासन के साथ मानवीय विवेक बनाए रखे।

शिक्षक भविष्य के नागरिक तैयार करता है। जेल अधिकारी वर्तमान व्यवस्था को संभालता है। एक समाज के निर्माण की लंबी प्रक्रिया में योगदान देता है, दूसरा कानून और व्यवस्था की तत्काल जिम्मेदारी निभाता है। दोनों की भूमिका अलग है, लेकिन दोनों में चरित्र की आवश्यकता समान है।

एक में अपनापन, दूसरे में अनुशासन

मेरी दृष्टि में इन दोनों व्यक्तित्वों का सबसे रोचक पहलू उनका व्यवहार है। संजय जैन बडजात्या में एक सहज अपनापन है। बातचीत में वह दूरी कम करते हैं। उनका व्यवहार यह महसूस कराता है कि सामने वाला केवल श्रोता नहीं, संवाद का सहभागी है।

इसके विपरीत पवन कुमार कोठारी में एक प्रकार की प्रशासनिक दृढ़ता दिखाई देती है। वहां सहजता के साथ सीमाओं का बोध भी है। अनुशासन उनके व्यक्तित्व का बाहरी हिस्सा नहीं लगता, बल्कि उनकी कार्यशैली का स्वाभाविक अंग प्रतीत होता है।

एक व्यक्ति को देखकर मन कहता है—यह व्यक्ति साथ चल सकता है। दूसरे को देखकर लगता है—यह व्यक्ति रास्ते से भटकने नहीं देगा। शायद किसी भी समाज के लिए दोनों तरह के व्यक्तित्व आवश्यक हैं।

हमें ऐसे लोग भी चाहिए जो हाथ पकड़कर साथ चलें और ऐसे लोग भी जो कठिन समय में रास्ते की मर्यादा बनाए रखें।

आज के समय में इन व्यक्तित्वों को लिखना क्यों जरूरी है?

हम ऐसे दौर में जी रहे हैं जहां चर्चा अक्सर प्रसिद्धि के इर्द-गिर्द घूमती है। जो दिखाई देता है, वही महत्वपूर्ण मान लिया जाता है। सोशल मीडिया की चमक ने कई बार वास्तविक उपलब्धियों को पीछे धकेल दिया है।

ऐसे समय में उन लोगों के बारे में लिखना जरूरी है जो अपने काम के माध्यम से समाज में योगदान दे रहे हैं। संजय जैन बडजात्या जैसे शिक्षक इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि वे शिक्षा को केवल नौकरी नहीं, जिम्मेदारी की तरह देखते हैं।

पवन कुमार कोठारी जैसे अधिकारी इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि प्रशासनिक पद को केवल अधिकार नहीं, उत्तरदायित्व की तरह देखने की आवश्यकता है।

समाज में बदलाव केवल बड़े आंदोलनों से नहीं आता। कई बार वह एक शिक्षक के शांत व्यवहार से आता है। कई बार किसी अधिकारी के एक ईमानदार निर्णय से आता है। कई बार किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत निष्ठा उसके आसपास के लोगों को प्रभावित करती है।

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इसलिए व्यक्तित्वों पर लिखना केवल प्रशंसा करना नहीं है। यह समाज के सामने उन मूल्यों को रखना भी है जिनकी आज जरूरत है।

लेखक के लिए इन मुलाकातों का अर्थ

लेखक के लिए हर मुलाकात एक सामग्री नहीं होती। कुछ मुलाकातें अनुभव होती हैं और कुछ अनुभव विचार में बदल जाते हैं। इन दोनों मुलाकातों ने मेरे भीतर भी एक तुलना पैदा की।

एक ओर संजय जैन बडजात्या की सहजता और समझदारी है। दूसरी ओर पवन कुमार कोठारी की दृढ़ता और ईमानदारी। एक में सीखने और साथ चलने की प्रवृत्ति है। दूसरे में अपने सिद्धांतों पर अडिग रहने का साहस।

मैं दोनों को एक जैसा बनाकर प्रस्तुत नहीं करना चाहता। क्योंकि व्यक्तित्व की खूबसूरती उसकी मौलिकता में होती है। संजय जैन बडजात्या वही हैं जो अपनी सहजता में अच्छे लगते हैं। पवन कुमार कोठारी वही हैं जो अपनी कठोर ईमानदारी में प्रभाव छोड़ते हैं। दोनों की अपनी भाषा है। दोनों की अपनी शैली है। दोनों का अपना व्यक्तित्व है।

और शायद लेखक का काम यही है कि वह किसी व्यक्ति को अपनी सुविधा के अनुसार ढालने के बजाय उसे उसके स्वाभाविक रूप में पाठकों के सामने रखे।

अंततः पद नहीं, चरित्र बोलता है

हम किसी व्यक्ति का परिचय उसके पद से दे सकते हैं, लेकिन उसके व्यक्तित्व की पहचान उसके व्यवहार से होती है। शिक्षक होना एक पद है, लेकिन अच्छा शिक्षक होना चरित्र की बात है। जेलर होना एक जिम्मेदारी है, लेकिन ईमानदार जेलर होना नैतिक प्रतिबद्धता का प्रश्न है।

पढ़ा-लिखा होना उपलब्धि हो सकती है, लेकिन समझदार होना संस्कार और अनुभव का परिणाम है। विद्वान होना ज्ञान का प्रमाण हो सकता है, लेकिन ईमानदार होना चरित्र की परीक्षा है।

इसीलिए इस वर्ष की इन दो मुलाकातों को याद करते हुए मुझे लगता है कि मैंने केवल दो व्यक्तियों से मुलाकात नहीं की। मैंने व्यक्तित्व के दो अलग-अलग रूपों को करीब से देखने का अवसर पाया।

संजय जैन बडजात्या ने मुझे याद दिलाया कि ज्ञान के साथ सहजता और सीखने की प्रवृत्ति जुड़ी हो तो शिक्षा जीवंत हो जाती है।

पवन कुमार कोठारी ने यह अनुभव कराया कि ईमानदारी यदि केवल शब्द न रहकर व्यक्ति के व्यवहार और निर्णयों का हिस्सा बन जाए तो उसमें स्टेनलेस स्टील जैसी मजबूती आ जाती है।

एक में मुझे अनुयायी जैसा सहज भाव मिला, दूसरे में कड़क ईमानदारी की दृढ़ चमक। और शायद जीवन की सबसे बड़ी सीख भी यही है—हर अच्छे व्यक्ति को एक ही पैमाने से नहीं मापा जा सकता।

किसी की महानता उसकी विनम्रता में होती है, किसी की दृढ़ता में। किसी की ताकत उसके साथ चलने में होती है, किसी की ताकत सही रास्ते से विचलित न होने में।

मेरे लिए ये दोनों मुलाकातें इसी कारण यादगार हैं। एक ने मुझे सहजता का मूल्य समझाया। दूसरे ने सिद्धांतों पर टिके रहने की कीमत और ताकत का अहसास कराया।

और जब मैं इन दोनों अनुभवों को एक साथ रखकर देखता हूं तो लगता है कि समाज को वास्तव में ऐसे ही विविध व्यक्तित्वों की जरूरत है—ऐसे शिक्षक जो ज्ञान के साथ मनुष्यता दें और ऐसे अधिकारी जो अधिकार के साथ ईमानदारी निभाएं।

क्योंकि अंततः किसी व्यक्ति की सबसे बड़ी पहचान यह नहीं कि वह क्या कहलाता है, बल्कि यह है कि उससे मिलने के बाद सामने वाला अपने भीतर क्या लेकर लौटता है।

इन दोनों मुलाकातों से मैं अपने साथ दो अमूल्य बातें लेकर लौटा—सीखने की विनम्रता और सिद्धांतों पर टिके रहने की दृढ़ता। शायद यही इस वर्ष मिली इन दो मुलाकातों का सबसे सुंदर अर्थ है।

यायावर
Author: यायावर

यायावर

One Response

  1. वाह कमाल की पेशकश और गजब का शब्द संतुलन। बनावट की कहीं बू तक नहीं। लेकिन एक सवाल, क्या शब्दों में चित्र नहीं बनते ❓मैं कहूंगी, इस रचना को पढ लीजिए 🙏🙏🙏नमन, सादर गुरुवर।

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