संजय सिंह राणा की रिपोर्ट
संसद को लोकतंत्र का सर्वोच्च मंच माना जाता है, जहां देश की जनता से जुड़े गंभीर मुद्दों पर चर्चा होती है, सरकार से सवाल पूछे जाते हैं और कानूनों पर विस्तृत विचार-विमर्श के बाद निर्णय लिए जाते हैं। ऐसे में जब संसद की कार्यवाही लगातार हंगामे, नारेबाजी और व्यवधान की भेंट चढ़ती है तो इसका असर केवल राजनीतिक कामकाज तक सीमित नहीं रहता, बल्कि संसदीय समय, विधायी उत्पादकता और सार्वजनिक धन की जवाबदेही पर भी सवाल खड़े होते हैं। इसी मुद्दे को लेकर सामाजिक कार्यकर्ता और सरदार सेना चित्रकूट के जिला महासचिव संजय सिंह पटेल ने सत्ता पक्ष से कई गंभीर सवाल पूछे हैं।
संजय सिंह पटेल ने कहा कि संसद देश की जनता के टैक्स के पैसे से चलती है। इसलिए संसद में होने वाला प्रत्येक मिनट जनता के प्रति जवाबदेही से जुड़ा हुआ है। उनके अनुसार, संसद का कामकाज बाधित होना किसी एक राजनीतिक दल की समस्या नहीं बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की कार्यक्षमता और जनता के अधिकारों से जुड़ा प्रश्न है।
उनका कहना है कि संसद में सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों की अपनी-अपनी संवैधानिक तथा लोकतांत्रिक जिम्मेदारियां हैं। विपक्ष का काम सरकार से सवाल पूछना और जनहित के मुद्दों को उठाना है, जबकि सरकार की जिम्मेदारी है कि वह उन सवालों का जवाब दे और सदन को सुचारु रूप से चलाने के लिए राजनीतिक संवाद बनाए रखे। यदि दोनों पक्षों के बीच संवाद का अभाव रहता है और लगातार व्यवधान होता है तो अंततः उसका नुकसान जनता को उठाना पड़ता है।
पुराने अनुमान के आधार पर करोड़ों रुपये के नुकसान का सवाल
संजय सिंह पटेल ने संसद की कार्यवाही की लागत से संबंधित लंबे समय से उद्धृत 2.5 लाख रुपये प्रति मिनट के अनुमान का उल्लेख किया। यह आंकड़ा नया आधिकारिक लागत निर्धारण नहीं है, बल्कि 2012 में तत्कालीन संसदीय कार्य मंत्री पवन कुमार बंसल द्वारा बताए गए अनुमान से जुड़ा है। बाद में संसद में व्यवधान की लागत का आकलन करने के लिए विभिन्न मीडिया और शोध संस्थानों ने इसी आंकड़े का इस्तेमाल किया है। PRS Legislative Research भी इस पुराने अनुमान का संदर्भ देता रहा है।
इस अनुमान के अनुसार दोनों सदनों की संयुक्त कार्यवाही के एक घंटे की लागत लगभग 1.5 करोड़ रुपये बैठती है। हालांकि, इस आंकड़े को मौजूदा समय की वास्तविक लागत नहीं माना जाना चाहिए, क्योंकि यह एक दशक से अधिक पुराना अनुमान है और संसद संचालन की वर्तमान लागत में बदलाव संभव है। फिर भी सार्वजनिक बहस में यह आंकड़ा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे संसद की कार्यवाही बाधित होने के आर्थिक प्रभाव को समझने का एक मोटा आधार मिलता है।
संजय सिंह पटेल ने दावा किया कि 2026 के मानसून सत्र में लगभग 7,023 मिनट कार्यवाही बाधित होने के आंकड़े सामने आए हैं। उन्होंने पुराने 2.5 लाख रुपये प्रति मिनट के अनुमान के आधार पर इसका आर्थिक मूल्य लगभग 175.6 करोड़ रुपये बताया है। हालांकि इस विशिष्ट 7,023 मिनट के आंकड़े का स्वतंत्र आधिकारिक स्रोत उपलब्ध नहीं होने के कारण इसे अंतिम सरकारी नुकसान के रूप में नहीं, बल्कि उनके द्वारा पुराने लागत अनुमान पर आधारित आकलन के रूप में देखा जाना चाहिए।
मानसून सत्र में व्यवधान को लेकर चिंता
2026 का मानसून सत्र 13 अगस्त को समाप्त हुआ। सत्र के दौरान दोनों सदनों में कई मौकों पर विपक्षी विरोध और हंगामे के कारण कार्यवाही प्रभावित हुई। रिपोर्टों के अनुसार अंतिम दिन भी राजनीतिक टकराव और व्यवधान का असर दिखाई दिया तथा दोनों सदनों को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया गया।
राज्यसभा के सभापति सी. पी. राधाकृष्णन ने भी सत्र के दौरान व्यवधान पर चिंता व्यक्त की और राज्यसभा की उत्पादकता लगभग 39 प्रतिशत रहने की बात कही। वहीं लोकसभा की उत्पादकता इससे भी कम बताई गई।
संसदीय कार्यवाही की उत्पादकता केवल इस बात से निर्धारित नहीं होती कि कितने विधेयक पारित हुए, बल्कि यह भी महत्वपूर्ण है कि सदन ने निर्धारित समय का कितना हिस्सा प्रश्नकाल, बहस, विधायी परीक्षण और जनहित के मुद्दों पर चर्चा में लगाया। लगातार व्यवधान इस प्रक्रिया को कमजोर करता है।
सत्ता पक्ष से संजय सिंह पटेल के पांच सवाल
संजय सिंह पटेल ने सत्ता पक्ष से सवाल किया कि सरकार देश की जनता को यह स्पष्ट क्यों नहीं करती कि संसद की कार्यवाही बाधित होने से वास्तविक रूप से कितना सार्वजनिक धन और संसदीय समय प्रभावित हुआ। उन्होंने कहा कि यदि संसद के संचालन पर सार्वजनिक धन खर्च होता है तो उसकी उपयोगिता और कार्यवाही की उत्पादकता के आंकड़े भी जनता के सामने पारदर्शी तरीके से आने चाहिए।
उन्होंने दूसरा सवाल राजनीतिक संवाद को लेकर उठाया। उनके अनुसार सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि संसद को सुचारु रूप से चलाने के लिए विपक्ष के साथ सार्थक संवाद और सहमति बनाने की जिम्मेदारी किस प्रकार निभाई जा रही है। लोकतंत्र में मतभेद स्वाभाविक हैं, लेकिन मतभेदों का समाधान सदन को ठप करने के बजाय संवाद और संसदीय प्रक्रियाओं के माध्यम से किया जाना चाहिए।
तीसरे सवाल में उन्होंने महंगाई, बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य, किसान और युवाओं से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता दी। उन्होंने कहा कि करोड़ों नागरिकों की रोजमर्रा की समस्याओं पर संसद में पर्याप्त और गंभीर चर्चा होना आवश्यक है। यदि सदन का बड़ा हिस्सा राजनीतिक टकराव और व्यवधान में चला जाता है तो जनता के वास्तविक सवाल पीछे छूट जाते हैं।
चौथे सवाल में उन्होंने जनता के सूचना के अधिकार की बात उठाई। उनका कहना है कि जब संसद का संचालन करदाताओं के पैसे से होता है तो जनता को यह जानने का अधिकार है कि निर्धारित संसदीय समय में कितना समय वास्तविक चर्चा और विधायी कामकाज में लगा तथा कितना समय व्यवधान के कारण प्रभावित हुआ।
पांचवें सवाल में उन्होंने सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों की जिम्मेदारी पर जोर दिया। उनके मुताबिक संसद चलाने की जिम्मेदारी केवल सरकार या विपक्ष में से किसी एक की नहीं हो सकती। दोनों पक्षों को ऐसी व्यवस्था विकसित करनी होगी जिससे विरोध दर्ज कराने का लोकतांत्रिक अधिकार भी बना रहे और सदन का कामकाज भी लगातार बाधित न हो।
सवाल किसी एक दल का नहीं, लोकतंत्र की जवाबदेही का
संजय सिंह पटेल ने कहा कि संसद में व्यवधान को केवल सत्ता पक्ष बनाम विपक्ष के राजनीतिक चश्मे से देखने के बजाय लोकतंत्र की जवाबदेही के प्रश्न के रूप में देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि अतीत में सत्ता पक्ष में रहने वाले दल और विपक्ष में रहने वाले दल दोनों ही अलग-अलग परिस्थितियों में सदन की कार्यवाही को लेकर एक-दूसरे पर आरोप लगाते रहे हैं। इसलिए इस समस्या का स्थायी समाधान राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से नहीं बल्कि संसदीय आचरण और संवाद की बेहतर व्यवस्था से संभव है।
PRS Legislative Research के अनुसार संसद में व्यवधान पिछले कई दशकों में राजनीतिक रणनीति का नियमित हिस्सा बनता गया है। संस्था ने यह भी रेखांकित किया है कि जब कोई दल विपक्ष में होता है तो व्यवधान को विरोध के साधन के रूप में इस्तेमाल कर सकता है, जबकि सत्ता में आने पर वही दल सदन चलाने की आवश्यकता पर जोर देता है।
इस संदर्भ में संजय सिंह पटेल की मांग का मूल केंद्र पारदर्शिता है। उनका कहना है कि संसद की प्रत्येक कार्यवाही का रिकॉर्ड उपलब्ध है, इसलिए यह बताया जाना चाहिए कि सत्र के दौरान कितने घंटे निर्धारित थे, कितने घंटे सदनों ने काम किया, कितने समय में विधायी कार्य हुआ और कितना समय व्यवधान के कारण प्रभावित हुआ।
जनता को चाहिए जवाबदेह और प्रभावी संसद
संजय सिंह पटेल ने कहा कि जनता अपने प्रतिनिधियों को संसद में इसलिए भेजती है ताकि वे देश की समस्याओं को उठाएं, कानून निर्माण में भाग लें और सरकार से जवाब मांगें। लोकतांत्रिक विरोध आवश्यक है, लेकिन विरोध और व्यवधान के बीच अंतर बनाए रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
उन्होंने कहा कि संसद में नारेबाजी या हंगामा किसी दल के लिए राजनीतिक रूप से तात्कालिक लाभ का माध्यम हो सकता है, लेकिन लंबे समय में इससे लोकतांत्रिक संस्थाओं पर जनता का विश्वास प्रभावित हो सकता है। यदि महत्वपूर्ण विधेयकों, नीतियों और जनहित के प्रश्नों पर पर्याप्त चर्चा नहीं हो पाती तो उसका प्रभाव देश की शासन व्यवस्था पर पड़ता है।
उनके अनुसार संसद में सरकार को जवाब देना चाहिए और विपक्ष को प्रश्न उठाने चाहिए। दोनों पक्षों के बीच तीखी बहस भी हो सकती है, लेकिन बहस का स्थान सदन होना चाहिए और उसका आधार तथ्य, तर्क तथा जनहित होना चाहिए। संसद की गरिमा बनाए रखना केवल संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों की नहीं, बल्कि प्रत्येक निर्वाचित प्रतिनिधि की जिम्मेदारी है।
पारदर्शी आंकड़े सार्वजनिक करने की मांग
संजय सिंह पटेल ने मांग की कि संसद की कार्यवाही में होने वाले व्यवधान से संबंधित आंकड़े नियमित रूप से सार्वजनिक किए जाएं। इसमें निर्धारित कार्य समय, वास्तविक कार्य समय, व्यवधान के कारण प्रभावित समय और विधायी उत्पादकता जैसे आंकड़ों को स्पष्ट रूप से शामिल किया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि संसद की कार्यवाही का आर्थिक मूल्यांकन करते समय पुराने 2.5 लाख रुपये प्रति मिनट के अनुमान को अंतिम और वर्तमान लागत मानने के बजाय सरकार को आधुनिक परिस्थितियों के अनुरूप अद्यतन और पारदर्शी लागत आकलन उपलब्ध कराना चाहिए। 2012 के इस अनुमान को आज भी मीडिया रिपोर्टों में इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन स्वयं उपलब्ध रिपोर्टों में इसे पुराना अनुमान और वर्तमान वास्तविक लागत से कम संभावित आंकड़ा बताया गया है।
संजय सिंह पटेल ने अंत में कहा कि “सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, संसद में हंगामा करने से किसी नेता का नहीं बल्कि देश की जनता का नुकसान होता है।” उन्होंने कहा कि जनता टैक्स इसलिए देती है ताकि संसद चले, कानून बने, सरकार से सवाल पूछे जाएं और नागरिकों की समस्याओं पर सार्थक चर्चा हो।
उन्होंने सभी राजनीतिक दलों से अपील की कि वे लोकतांत्रिक विरोध के अधिकार को बनाए रखते हुए संसद की कार्यवाही को अधिकतम समय तक सुचारु रखने की दिशा में सामूहिक प्रयास करें। उनके मुताबिक लोकतंत्र की मजबूती केवल चुनाव कराने से नहीं, बल्कि निर्वाचित संस्थाओं के प्रभावी, पारदर्शी और जवाबदेह संचालन से सुनिश्चित होती है।

























