रिपोर्ट: दुर्गा प्रसाद शुक्ला
गोंडा। भारतीय सेना की वर्दी केवल नौकरी की पहचान नहीं होती। उसके साथ अनुशासन, जिम्मेदारी, त्याग और राष्ट्र के प्रति जवाबदेही जैसी अपेक्षाएं भी जुड़ी होती हैं। लेकिन किसी सैनिक की असली सामाजिक भूमिका का एक दूसरा अध्याय तब शुरू होता है, जब वह वर्दी के अनुभवों को समाज के बीच लेकर आता है।
गोंडा जिले के सालपुर बिशनपुर बेरिया से जुड़े मेजर प्रभाकर देव सिंह के सार्वजनिक वक्तव्यों और सोशल मीडिया पर साझा किए गए विचारों से ऐसा ही एक अध्याय सामने आता दिखाई देता है। सेना में वर्ष 2014 से अपनी सेवा यात्रा का उल्लेख करने वाले प्रभाकर देव सिंह अब विशेष रूप से युवाओं, बच्चियों, महिलाओं और पीड़ितों के पक्ष में सामाजिक भूमिका निभाने की बात कर रहे हैं। 6 सितंबर को गोंडा में उनके सम्मान में प्रस्तावित देशभक्ति रैली का उल्लेख भी इसी सार्वजनिक यात्रा के नए चरण की ओर संकेत करता है।
लेकिन किसी व्यक्ति के बारे में लिखते समय केवल उपलब्धियों को गिनाना पर्याप्त नहीं है। सवाल यह भी होना चाहिए कि जिस व्यक्ति ने सेना में अनुशासन और नेतृत्व सीखा है, वह समाज में उन मूल्यों को किस तरह लागू करता है और भविष्य में उसकी सामाजिक भूमिका की कसौटी क्या होगी।
सेना की बारह वर्ष की यात्रा और नेतृत्व का अनुभव
प्रभाकर देव सिंह अपने सोशल मीडिया पोस्ट में बताते हैं कि 2014 में भारतीय सेना का हिस्सा बनने के बाद उनकी सेवा यात्रा को 12 वर्ष पूरे हुए हैं। उन्होंने अपने पुराने पोस्ट में 2016 की एक तस्वीर साझा करते हुए उस समय को याद किया, जब वे नए-नए कैप्टन बने थे।
उनके शब्दों में उस दौर की स्मृति केवल वर्दी पहनने या पद हासिल करने की खुशी तक सीमित नहीं है। वे नेतृत्व को पद से आगे ले जाकर विचारों और उन्हें व्यक्त करने के साहस से जोड़ते हैं।
यह विचार महत्वपूर्ण है, क्योंकि किसी भी संस्था में पद व्यक्ति को अधिकार देता है, लेकिन नेतृत्व उसे स्वीकार्यता देता है। सेना जैसी अनुशासित संस्था में नेतृत्व की अपनी अलग कसौटियां होती हैं, जबकि सामाजिक जीवन में परिस्थितियां और भी जटिल होती हैं। यहां आदेश देने की जगह लोगों को साथ लेकर चलना पड़ता है।
इसलिए सेना से मिले नेतृत्व के अनुभव का समाज में इस्तेमाल तभी सार्थक माना जाएगा, जब वह संवाद, संवेदनशीलता और जवाबदेही में दिखाई दे।
युवाओं के सपनों से जुड़ने की कोशिश
प्रभाकर देव सिंह के पोस्टों का एक उल्लेखनीय पक्ष युवाओं और विद्यार्थियों के साथ संवाद है। वे बताते हैं कि उन्हें ऐसे अनेक युवाओं से मिलने का अवसर मिला, जिनके भीतर भारतीय सेना में शामिल होकर राष्ट्रसेवा करने का सपना है। एनसीसी की विभिन्न बटालियनों के साथ जुड़कर युवाओं को मार्गदर्शन देने की बात भी उन्होंने साझा की है।
युवाओं को सेना में जाने के लिए प्रेरित करना केवल भर्ती की तैयारी कराने तक सीमित विषय नहीं है। सैन्य सेवा के आकर्षण के साथ उसकी कठिनाइयों, अनुशासन, मानसिक दृढ़ता और जिम्मेदारियों की वास्तविक तस्वीर युवाओं के सामने रखना भी उतना ही जरूरी है।
अगर कोई पूर्व या वर्तमान सैन्य अधिकारी युवाओं को मार्गदर्शन देता है तो उससे अपेक्षा स्वाभाविक रूप से अधिक होती है। उसे सपने दिखाने के साथ यह भी बताना होता है कि उन सपनों की कीमत क्या है।
इस दृष्टि से एनसीसी और विद्यार्थियों के साथ संवाद की उनकी पहल सकारात्मक दिशा मानी जा सकती है। मगर इसकी वास्तविक सफलता इस बात से तय होगी कि यह संवाद कितने युवाओं तक पहुंचता है और उन्हें कितनी व्यावहारिक दिशा मिलती है।
राखी, जिम्मेदारी और महिलाओं की सुरक्षा का सवाल
रक्षाबंधन के अवसर पर साझा किए गए उनके विचारों में एक अलग सामाजिक संदेश दिखाई देता है। उन्होंने लिखा कि इस बार कलाई पर सिर्फ राखी नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी बंधी है।
उन्होंने बच्चियों और बहनों की मुस्कान को सुरक्षा के वचन से जोड़ते हुए कहा कि रक्षा का वचन शब्दों से नहीं, कर्मों से पूरा होता है। साथ ही हर बेटी को सुरक्षित, हर बहन को सम्मानित और हर महिला को सशक्त बनाने का संकल्प लेने की बात कही।
इन पंक्तियों को केवल भावनात्मक संदेश मानकर आगे बढ़ जाना आसान है। लेकिन इनका वास्तविक अर्थ तभी निकलेगा, जब ‘रक्षा’ को केवल सुरक्षा देने वाले पुरुष की भूमिका के रूप में नहीं, बल्कि महिलाओं के अधिकार, सम्मान, शिक्षा, आत्मनिर्भरता और न्याय तक पहुंच के व्यापक प्रश्न के रूप में देखा जाए।
महिलाओं की सुरक्षा का अर्थ उनके लिए निर्णय लेना नहीं, बल्कि ऐसा सामाजिक वातावरण तैयार करना है जिसमें वे अपने निर्णय स्वयं ले सकें और किसी अन्याय की स्थिति में संस्थागत सहायता हासिल कर सकें।
इसीलिए यदि मेजर प्रभाकर देव सिंह सामाजिक स्तर पर महिलाओं और बच्चियों की आवाज बनने की बात कर रहे हैं तो आने वाले समय में उनकी भूमिका की सबसे बड़ी परीक्षा इसी क्षेत्र में होगी।
पीड़ितों की आवाज बनना आसान नहीं
समाजसेवा की घोषणा करना और वास्तव में पीड़ित व्यक्ति के साथ खड़ा होना दो अलग-अलग बातें हैं। किसी पीड़ित की आवाज बनने का अर्थ केवल सोशल मीडिया पर उसके पक्ष में पोस्ट लिखना नहीं है। इसके लिए तथ्य समझना, दोनों पक्ष सुनना, कानून की सीमाओं को जानना, संबंधित संस्थाओं तक व्यक्ति की पहुंच बनाना और जरूरत पड़ने पर लगातार उसका साथ देना पड़ता है।
विशेषकर महिलाओं और बच्चियों से जुड़े मामलों में संवेदनशीलता और कानूनी समझ दोनों जरूरी हैं। भावनात्मक प्रतिक्रिया कई बार समस्या को हल करने के बजाय और जटिल बना सकती है।
इसलिए प्रभाकर देव सिंह यदि सामाजिक सेवा को अपनी आगामी भूमिका का हिस्सा बनाते हैं तो उनसे अपेक्षा होगी कि सैन्य अनुशासन की तरह सामाजिक कार्य में भी तथ्यों, कानून और निष्पक्षता को प्राथमिकता दें।
पहाड़ों से मोहब्बत और सैनिक की संवेदनशीलता
उनके सोशल मीडिया पर साझा की गई कविता में पहाड़ों, हवाओं और वादियों के प्रति गहरा लगाव दिखाई देता है। वे पहाड़ों की सादगी और वहां मिलने वाले सुकून को अपने शब्दों में व्यक्त करते हैं।
यह उनकी निजी संवेदना का हिस्सा है, लेकिन इसके भीतर सैनिक जीवन का एक मानवीय पक्ष भी दिखाई देता है। सेना में लंबे समय तक रहने वाला व्यक्ति देश के अलग-अलग भूगोल, मौसम और परिस्थितियों को करीब से देखता है। पहाड़ों के प्रति आकर्षण इसलिए केवल पर्यटन की पसंद नहीं, बल्कि उन अनुभवों की स्मृति भी हो सकता है जिनसे सैन्य जीवन गुजरता है।
हालांकि किसी व्यक्ति की संवेदनशील कविता से उसके पूरे व्यक्तित्व का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। व्यक्ति को उसके काम से ही समझा जाना चाहिए। और यही बात मेजर प्रभाकर देव सिंह पर भी लागू होती है।
सम्मान रैली से बड़ी होगी समाज की अपेक्षा
6 सितंबर को गोंडा में उनके सम्मान में देशभक्ति की भावना से जुड़ी रैली प्रस्तावित होने की बात सामने आई है। किसी सैनिक का सार्वजनिक सम्मान स्वाभाविक रूप से गौरव का विषय हो सकता है। लेकिन सम्मान समारोह किसी व्यक्ति की सामाजिक यात्रा का अंत नहीं, बल्कि नई जिम्मेदारी की शुरुआत होना चाहिए।
रैली में देशभक्ति के नारे लगना आसान है। कठिन काम उन नारों को नागरिक जिम्मेदारी में बदलना है। कठिन काम यह सुनिश्चित करना है कि जिस समाज में सैनिक का सम्मान किया जा रहा है, उसी समाज की बच्चियों को शिक्षा मिले, महिलाओं को सम्मान मिले, युवाओं को अवसर मिले और पीड़ित व्यक्ति न्याय के लिए अकेला न रह जाए। यही वह बिंदु है जहां देशभक्ति भावनात्मक अभिव्यक्ति से निकलकर सामाजिक जिम्मेदारी बनती है।
वर्दी का अनुशासन समाज के काम कैसे आएगा?
मेजर प्रभाकर देव सिंह की अब तक सामने आई सार्वजनिक सामग्री में तीन बातें विशेष रूप से दिखाई देती हैं—सेना के प्रति प्रतिबद्धता, युवाओं के मार्गदर्शन की इच्छा और महिलाओं-बच्चियों के प्रति सामाजिक जिम्मेदारी की बात।
इन तीनों को यदि एक साथ देखा जाए तो एक संभावित सामाजिक भूमिका की तस्वीर बनती है। लेकिन तस्वीर अभी पूरी नहीं है।
सामाजिक नेतृत्व लंबी प्रक्रिया है। इसमें केवल अच्छी सोच पर्याप्त नहीं होती। संगठन क्षमता, पारदर्शिता, कानून की समझ, आर्थिक जवाबदेही, आलोचना सुनने का साहस और सभी वर्गों के प्रति समान व्यवहार भी जरूरी होते हैं।
सेना में आदेश की स्पष्टता काम आती है; समाज में संवाद की क्षमता। सेना में पद महत्वपूर्ण होता है; समाज में विश्वास। सेना में अनुशासन अनिवार्य है; सामाजिक जीवन में जवाबदेही उतनी ही अनिवार्य हो जाती है। इसलिए उनकी सामाजिक यात्रा का मूल्यांकन भी इन्हीं कसौटियों पर होना चाहिए।
प्रशंसा हो, लेकिन प्रश्न भी बने रहें
किसी सैनिक की देशसेवा का सम्मान करना और किसी व्यक्ति की हर गतिविधि की प्रशंसा करना एक ही बात नहीं है।
प्रभाकर देव सिंह ने युवाओं के बीच सेना और राष्ट्रसेवा के प्रति रुचि पैदा करने, एनसीसी के साथ संवाद करने तथा महिलाओं और बच्चियों के सम्मान-सुरक्षा की बात को सार्वजनिक रूप से सामने रखा है। इन प्रयासों का स्वागत किया जाना चाहिए।
लेकिन समाज के प्रति जिम्मेदारी की घोषणा अपने साथ सवाल भी लेकर आती है। क्या पीड़ितों के लिए कोई व्यवस्थित सहायता तंत्र बनेगा? क्या युवाओं के लिए नियमित मार्गदर्शन कार्यक्रम होंगे? क्या महिलाओं और बच्चियों से जुड़े मामलों में कानूनी और संस्थागत सहायता उपलब्ध कराने का प्रयास होगा? क्या सामाजिक कार्य में राजनीतिक या व्यक्तिगत पसंद-नापसंद से ऊपर उठकर निष्पक्षता कायम रखी जाएगी? और सबसे महत्वपूर्ण—क्या आलोचना को भी उतनी ही गंभीरता से सुना जाएगा जितनी प्रशंसा को? इन सवालों के जवाब समय के साथ उनके काम से मिलेंगे।
राष्ट्रसेवा की परिभाषा बड़ी है
राष्ट्रसेवा केवल सीमा पर बंदूक उठाने का नाम नहीं है। किसान का ईमानदार श्रम, शिक्षक की जिम्मेदारी, डॉक्टर की सेवा, पत्रकार की निष्पक्षता, विद्यार्थी की मेहनत और नागरिक का कानून के प्रति सम्मान भी राष्ट्रनिर्माण का हिस्सा हैं।
एक सैनिक जब समाज में आता है तो उसके पास राष्ट्रसेवा की एक विशेष विरासत होती है। यदि वह उस विरासत को शिक्षा, अनुशासन, न्याय, महिला सम्मान और युवाओं के मार्गदर्शन से जोड़ पाता है तो उसका प्रभाव वर्दी से कहीं आगे जा सकता है।
मेजर प्रभाकर देव सिंह के सामने भी अब यही चुनौती है। वर्दी ने उन्हें एक पहचान दी है; समाजसेवा उन्हें एक नई परीक्षा देगी। यह परीक्षा नारों की नहीं होगी। यह परीक्षा उस व्यक्ति के सामने खड़े गरीब, पीड़ित, असहाय या परेशान नागरिक की होगी, जिसे किसी प्रभावशाली मंच से ज्यादा एक भरोसेमंद सहारे की जरूरत है।
गोंडा के लिए भी यह अवसर
गोंडा जैसे जिले में युवाओं की बड़ी आबादी है और सामाजिक स्तर पर शिक्षा, रोजगार, महिला सुरक्षा तथा नागरिक जागरूकता जैसे अनेक मुद्दे लगातार महत्वपूर्ण बने रहते हैं।
ऐसे में सेना से जुड़े अनुभवी व्यक्ति का युवाओं के बीच सक्रिय होना निश्चित रूप से उपयोगी हो सकता है। यदि इसे किसी व्यक्ति विशेष की लोकप्रियता तक सीमित न रखकर संस्थागत और सामुदायिक प्रयास बनाया जाए तो इसका प्रभाव अधिक व्यापक हो सकता है।
स्कूल-कॉलेजों में करियर संवाद, एनसीसी मार्गदर्शन, महिला सुरक्षा और कानूनी जागरूकता, जरूरतमंद परिवारों के लिए सहायता व्यवस्था तथा युवाओं में अनुशासन और नागरिक जिम्मेदारी जैसे विषयों पर काम किया जा सकता है। ऐसी पहलें किसी भी सम्मान समारोह से कहीं अधिक स्थायी स्मृति छोड़ती हैं।
अंततः फैसला काम करेगा
मेजर प्रभाकर देव सिंह के बारे में उपलब्ध सार्वजनिक सामग्री एक ऐसे सैन्य अधिकारी की तस्वीर प्रस्तुत करती है, जिसने अपनी सेवा यात्रा को युवाओं और राष्ट्रसेवा की प्रेरणा से जोड़ने का प्रयास किया है और अब समाज के कमजोर वर्गों के लिए अपनी भूमिका की बात कर रहे हैं। इसमें सराहना के पर्याप्त कारण हैं, लेकिन अतिशयोक्ति की जरूरत नहीं।
क्योंकि किसी भी व्यक्ति की असली पहचान उसके परिचय, पद, वर्दी या सम्मान समारोह से नहीं बनती। वह उसके लगातार किए गए काम से बनती है।
6 सितंबर की प्रस्तावित रैली में यदि देशभक्ति का जज़्बा गूंजता है तो उसके बाद उस जज़्बे की परीक्षा भी होनी चाहिए। क्या वह जज़्बा किसी बेटी की पढ़ाई तक पहुंचता है? क्या किसी पीड़ित की शिकायत को न्याय तक पहुंचाने में मदद करता है? क्या किसी युवा को सही दिशा देता है? क्या किसी महिला को अपने अधिकारों के लिए खड़े होने का आत्मविश्वास देता है? यदि उत्तर हां में मिलता है, तभी राष्ट्रसेवा की वह भावना समाज में वास्तविक अर्थ पाएगी।
कलाई पर बंधी राखी को जिम्मेदारी मानने की बात खूबसूरत है। अब उस जिम्मेदारी को कर्म में बदलना ही सबसे महत्वपूर्ण अध्याय होगा। मेजर प्रभाकर देव सिंह के लिए भी और उन्हें सम्मान देने वाले समाज के लिए भी।

























