दुर्गा प्रसाद शुक्ला की रिपोर्ट
बलरामपुर। नई शिक्षा व्यवस्था में बच्चों की स्कूली शिक्षा की मजबूत नींव रखने के लिए बाल वाटिका की अवधारणा को महत्वपूर्ण माना गया है। इसका उद्देश्य केवल तीन से छह वर्ष की आयु के बच्चों को स्कूल भेजना भर नहीं, बल्कि उन्हें प्राथमिक कक्षा में प्रवेश से पहले शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक, सामाजिक-भावनात्मक और रचनात्मक विकास के लिए तैयार करना है। लेकिन बलरामपुर जनपद में इसी महत्वाकांक्षी व्यवस्था के संचालन को लेकर आंगनबाड़ी कार्यकत्रियों और कर्मचारी संगठनों की ओर से गंभीर सवाल उठाए गए हैं। आरोप है कि पर्याप्त संसाधनों और स्पष्ट व्यवस्थाओं के अभाव में आंगनबाड़ी केंद्रों पर बाल वाटिका संचालित करने का दबाव बनाया जा रहा है।
मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि जिन आंगनबाड़ी केंद्रों का संचालन प्राथमिक विद्यालयों के परिसर अथवा उनके अंतर्गत किया जा रहा है, उन्हें प्री-प्राइमरी व्यवस्था से जोड़कर बाल वाटिका के रूप में विकसित करने की परिकल्पना की गई है। ऐसे में सवाल यह है कि यदि बाल वाटिका के लिए आवश्यक शिक्षण सामग्री, गतिविधि आधारित संसाधन, बच्चों के अनुकूल वातावरण और अन्य सुविधाएं पूरी तरह उपलब्ध नहीं हैं तो महज कागजी स्तर पर इसका संचालन किस तरह बच्चों को अपेक्षित लाभ दे पाएगा?
बाल वाटिका आखिर है क्या और इसकी जरूरत क्यों पड़ी?
बाल वाटिका की मूल अवधारणा प्राथमिक शिक्षा की शुरुआत से पहले बच्चों को विद्यालयी वातावरण के लिए तैयार करने की है। तीन से छह वर्ष की उम्र बच्चे के विकास की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। इसी अवधि में भाषा, व्यवहार, सामाजिक संपर्क, जिज्ञासा, रचनात्मकता, शारीरिक समन्वय और सीखने की बुनियादी क्षमता तेजी से विकसित होती है।
बाल वाटिका में बच्चों को पारंपरिक तरीके से पढ़ाने के बजाय खेल, कहानी, गीत, चित्र, गतिविधियों और आपसी सहभागिता के माध्यम से सीखने का अवसर देने की अवधारणा है। इसका लक्ष्य यह है कि जब बच्चा पहली कक्षा में पहुंचे तो वह विद्यालयी वातावरण से अनजान न हो। उसमें सुनने, समझने, बोलने, प्रश्न पूछने, दूसरों के साथ व्यवहार करने और नई चीजों को सीखने की प्रारंभिक क्षमता विकसित हो चुकी हो।
यही वजह है कि बाल वाटिका को केवल आंगनबाड़ी की एक अतिरिक्त गतिविधि मानना व्यवस्था की मूल भावना को सीमित कर देना होगा। यह वास्तव में आंगनबाड़ी और प्राथमिक शिक्षा के बीच एक महत्वपूर्ण सेतु के रूप में काम कर सकती है।
संसाधनों के बिना संचालन का दबाव क्यों?
बलरामपुर में उठे सवालों का सबसे गंभीर पहलू यही है कि बाल वाटिका के संचालन के लिए जिन संसाधनों और सुविधाओं की आवश्यकता है, क्या वे प्रत्येक संबंधित आंगनबाड़ी केंद्र पर वास्तव में उपलब्ध हैं? आंगनबाड़ी कर्मचारी संगठनों का कहना है कि कई केंद्रों पर संसाधनों की स्थिति संतोषजनक नहीं है, इसके बावजूद बाल वाटिका की गतिविधियों को आगे बढ़ाने के लिए दबाव बनाया जा रहा है।
यहां एक बुनियादी सवाल खड़ा होता है—क्या केवल आदेश जारी कर देने से बाल वाटिका प्रभावी रूप से संचालित हो सकती है? यदि बच्चों के बैठने, खेलने, सीखने और गतिविधियां कराने के लिए पर्याप्त सामग्री उपलब्ध नहीं है, तो कार्यकत्री से अपेक्षित परिणाम किस आधार पर मांगे जाएंगे?
बच्चों की पूर्व-प्राथमिक शिक्षा मूलतः गतिविधि आधारित होती है। इसलिए इसके लिए चित्र सामग्री, खेल सामग्री, शिक्षण-सहायक उपकरण, कहानी और भाषा विकास से जुड़ी सामग्री तथा बच्चों के अनुकूल वातावरण की जरूरत होती है। इन संसाधनों की उपलब्धता और उपयोग की निगरानी व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
बजट को लेकर भी उठ रहे सवाल
इस पूरे प्रकरण में आर्थिक पक्ष सबसे अधिक चर्चा में है। उपलब्ध विज्ञप्ति के अनुसार, बाल वाटिका को सुसज्जित करने के लिए शिक्षा विभाग की विद्यालय प्रबंधन व्यवस्था के माध्यम से प्रधानाध्यापक के खाते में अतिरिक्त बजट आने की बात कही गई है। आंगनबाड़ी कर्मचारी संगठनों ने इस बजट के उपयोग को लेकर पूरे जनपद में अनियमितता अथवा गोलमाल की आशंका व्यक्त की है।
हालांकि यह स्पष्ट करना जरूरी है कि किसी भी प्रकार की वित्तीय अनियमितता को अभी प्रमाणित तथ्य के रूप में नहीं कहा जा सकता। यह कर्मचारी संगठन द्वारा व्यक्त की गई आशंका है, जिसकी निष्पक्ष जांच और अभिलेखीय परीक्षण की आवश्यकता है।
लेकिन यदि किसी मद के लिए बजट जारी हुआ है तो उससे जुड़े कुछ सवालों के जवाब सार्वजनिक व्यवस्था के तहत स्पष्ट होने चाहिए। संबंधित विद्यालयों को कितनी धनराशि मिली? कितने विद्यालयों के खातों में राशि पहुंची? राशि किस मद में खर्च हुई? क्या बाल वाटिका के लिए सामग्री खरीदी गई? यदि सामग्री खरीदी गई तो उसका सत्यापन किस स्तर पर हुआ? क्या आंगनबाड़ी कार्यकत्री को उस सामग्री के उपयोग की जानकारी और वास्तविक पहुंच मिली? क्या खर्च का विवरण उपलब्ध है?
इन सवालों के जवाब सामने आने से ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि बाल वाटिका की व्यवस्था जमीन पर कितनी मजबूत है।
संयुक्त खाते की व्यवस्था से कार्यकत्रियों की भूमिका पर सवाल
आंगनबाड़ी कर्मचारी संघ की जिला अध्यक्ष कुसुम तिवारी के अनुसार, यदि प्री-प्राइमरी व्यवस्था का सही ढंग से संचालन हो जाए तो इसका सकारात्मक प्रभाव प्राथमिक विद्यालयों पर भी पड़ सकता है। उनके मुताबिक प्रत्येक माह माता समितियों की बैठक से बच्चों के अभिभावकों में भी जागरूकता बढ़ाई जा सकती है।
लेकिन उनका कहना है कि बजट प्रधानाध्यापक के संयुक्त खाते में आने की स्थिति में आंगनबाड़ी कार्यकत्रियों की भूमिका को लेकर व्यावहारिक कठिनाइयां पैदा होती हैं। संगठन का दावा है कि कार्यकत्रियां कई बार अपनी बात खुलकर रखने से डरती हैं।
यहीं से प्रशासनिक पारदर्शिता का सवाल भी जुड़ जाता है। यदि बाल वाटिका का संचालन आंगनबाड़ी केंद्र में होना है और बच्चों के साथ दैनिक गतिविधियां आंगनबाड़ी कार्यकत्री तथा सहायिका को करनी हैं, तो उन्हें यह जानकारी होना जरूरी है कि केंद्र के लिए उपलब्ध संसाधन क्या हैं और उनका उपयोग किस तरह किया जाना है।
किसी भी योजना की सफलता केवल बजट जारी होने से नहीं होती। बजट का सही उपयोग, सामग्री की उपलब्धता, जिम्मेदारियों का स्पष्ट निर्धारण और नियमित निगरानी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।
विभागीय स्तर पर बदलाव के संकेत भी
पूरे मामले में तस्वीर केवल नकारात्मक नहीं है। विज्ञप्ति में यह भी कहा गया है कि विभागीय स्तर पर कुछ कर्मचारी अब बाल वाटिका की गतिविधियों को आगे बढ़ाने के लिए प्रयास कर रहे हैं। यदि यह पहल वास्तव में जमीनी स्तर तक पहुंचती है तो व्यवस्था में सुधार की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
दरअसल, बाल वाटिका जैसी व्यवस्था को सफल बनाने के लिए शिक्षा विभाग और बाल विकास विभाग के बीच बेहतर समन्वय आवश्यक है। प्राथमिक विद्यालय और आंगनबाड़ी केंद्र यदि एक ही परिसर अथवा आसपास संचालित हो रहे हैं तो दोनों विभागों की जिम्मेदारियों का स्पष्ट निर्धारण किया जाना चाहिए।
इसके साथ ही प्रधानाध्यापक, आंगनबाड़ी कार्यकत्री, सहायिका और संबंधित पर्यवेक्षकीय अधिकारियों के बीच नियमित संवाद भी जरूरी है। केवल निरीक्षण के समय गतिविधियां दिखाने के बजाय पूरे महीने बच्चों के विकास से जुड़ी गतिविधियां निरंतर चलनी चाहिए।
माता समितियों की बैठक बन सकती है निगरानी का माध्यम
बाल वाटिका के प्रभावी संचालन में अभिभावकों की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो सकती है। प्रत्येक माह माता समितियों की बैठक केवल औपचारिकता न रहकर वास्तविक सामाजिक निगरानी का माध्यम बन सकती है।
बैठकों में यह देखा जा सकता है कि केंद्र में बच्चों के लिए कौन-कौन सी गतिविधियां हुईं, कितने बच्चे नियमित आए, क्या शिक्षण सामग्री उपलब्ध है और बच्चों के व्यवहार तथा सीखने में क्या परिवर्तन दिखाई दे रहा है।
यदि अभिभावकों को यह जानकारी नियमित रूप से मिले कि बाल वाटिका का उद्देश्य क्या है और उनके बच्चों के लिए कौन-कौन सी गतिविधियां की जानी चाहिए, तो वे स्वयं भी केंद्र की व्यवस्था में सकारात्मक सहयोग दे सकते हैं।
कर्मचारी संगठन ने प्रदेश स्तर पर उठाने की बात कही
आंगनबाड़ी कर्मचारी यूनियन उत्तर प्रदेश सीटू की कार्यवाहक प्रदेश अध्यक्ष मीनाक्षी खरे ने इस मामले को प्रदेश स्तर पर उठाने की बात कही है। उनका कहना है कि इस गंभीर प्रकरण को लेकर प्रदेश के सभी बेसिक शिक्षा अधिकारियों को पत्र भेजा जाएगा।
यदि संगठन की ओर से शिकायत अथवा पत्र दिया जाता है तो यह प्रशासन के लिए भी अवसर होगा कि वह आरोपों और आशंकाओं की वास्तविक स्थिति स्पष्ट करे। विशेष रूप से बाल वाटिका के लिए जारी बजट, उसके उपयोग और केंद्रों पर उपलब्ध संसाधनों का सत्यापन कराया जा सकता है।
ऐसी जांच किसी कर्मचारी या विभाग को कठघरे में खड़ा करने के लिए नहीं, बल्कि योजना की वास्तविक स्थिति सामने लाने के लिए होनी चाहिए। यदि बजट का सही उपयोग हुआ है तो उसका दस्तावेजी प्रमाण सामने आना चाहिए। यदि कहीं कमी है तो उसे दूर करने की कार्रवाई होनी चाहिए।
सबसे बड़ा सवाल—कागज पर बाल वाटिका या जमीन पर बदलाव?
बलरामपुर का यह मामला केवल एक जिले की प्रशासनिक व्यवस्था का सवाल नहीं है। बाल वाटिका की अवधारणा देशभर में प्रारंभिक बाल शिक्षा को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। इसलिए इसकी सफलता का मूल्यांकन भी उसी गंभीरता से होना चाहिए।
यदि किसी केंद्र पर पर्याप्त संसाधन नहीं हैं और फिर भी गतिविधियां संचालित दिखा दी जाती हैं, तो इसका नुकसान सबसे पहले बच्चों को होगा। दूसरी ओर, यदि संसाधन उपलब्ध कराकर कार्यकत्रियों को प्रशिक्षण, मार्गदर्शन और सहयोग दिया जाए तो यही व्यवस्था प्राथमिक शिक्षा की नींव मजबूत कर सकती है।
इसलिए अब जरूरत आरोप-प्रत्यारोप से आगे बढ़कर पारदर्शी जांच की है। बलरामपुर जनपद के संबंधित विद्यालयों और आंगनबाड़ी केंद्रों का भौतिक सत्यापन कराया जाना चाहिए। बाल वाटिका के नाम पर जारी बजट और खर्च का रिकॉर्ड देखा जाना चाहिए। केंद्रों पर उपलब्ध शिक्षण सामग्री का मिलान अभिलेखों से किया जाना चाहिए। साथ ही यह भी देखा जाना चाहिए कि बच्चों के लिए निर्धारित गतिविधियां वास्तव में नियमित रूप से हो रही हैं या नहीं।
आंगनबाड़ी कार्यकत्री पर जिम्मेदारी, लेकिन अधिकार कितने?
पूरे विवाद का एक अहम पक्ष जिम्मेदारी और अधिकार के बीच संतुलन का है। यदि आंगनबाड़ी कार्यकत्री और सहायिका से बाल वाटिका की गतिविधियां संचालित कराने की अपेक्षा की जा रही है, तो उन्हें पर्याप्त संसाधन, प्रशिक्षण और विभागीय सहयोग मिलना भी जरूरी है।
किसी भी कर्मचारी से केवल लक्ष्य की अपेक्षा करना और उसके सामने उपलब्ध संसाधनों की समीक्षा न करना प्रभावी प्रशासन नहीं कहा जा सकता। विशेषकर बच्चों की शिक्षा और विकास से जुड़ी योजना में यह और भी गंभीर विषय बन जाता है।
यदि बाल वाटिका का उद्देश्य बच्चे को पहली कक्षा के लिए तैयार करना है तो उसकी गुणवत्ता का मूल्यांकन भी बच्चों की वास्तविक सीखने की क्षमता और विकास के आधार पर होना चाहिए, न कि केवल कागजों में दर्ज गतिविधियों के आधार पर।
निष्कर्ष: जांच हो, जवाबदेही तय हो और बच्चों को मिले वास्तविक लाभ
बलरामपुर में बाल वाटिका के संचालन को लेकर उठे सवालों ने एक महत्वपूर्ण बहस को जन्म दिया है। एक तरफ सरकार की मंशा तीन से छह वर्ष के बच्चों को गुणवत्तापूर्ण पूर्व-प्राथमिक शिक्षा से जोड़ने की है, वहीं दूसरी तरफ कर्मचारी संगठन संसाधनों, बजट और संचालन व्यवस्था को लेकर सवाल उठा रहे हैं।
वित्तीय गोलमाल अथवा अनियमितता के आरोपों को फिलहाल आरोप या आशंका के स्तर पर ही देखा जाना चाहिए, लेकिन ऐसी आशंकाओं को नजरअंदाज करना भी उचित नहीं होगा। सबसे बेहतर रास्ता यही है कि संबंधित विभाग पूरे जनपद में बाल वाटिका से जुड़े केंद्रों का पारदर्शी भौतिक सत्यापन कराए और बजट के उपयोग का सार्वजनिक एवं अभिलेखीय परीक्षण करे।
यदि कहीं कमी पाई जाती है तो जिम्मेदारी तय हो। यदि व्यवस्था सही मिलती है तो विभाग तथ्यों के साथ स्थिति स्पष्ट करे। इससे न केवल कर्मचारियों का भरोसा बढ़ेगा, बल्कि बाल वाटिका जैसी महत्वपूर्ण योजना की विश्वसनीयता भी मजबूत होगी।
आखिरकार इस पूरी व्यवस्था का केंद्र न तो बजट है, न विभागीय अधिकार और न ही प्रशासनिक कागजी कार्रवाई। केंद्र में वह तीन से छह वर्ष का बच्चा है, जिसे पहली कक्षा में जाने से पहले बेहतर ढंग से सीखने, समझने और समाज के साथ घुलने-मिलने के लिए तैयार किया जाना है। यदि बाल वाटिका इस उद्देश्य को जमीन पर पूरा कर पाती है तो यह प्राथमिक शिक्षा के कायाकल्प की वास्तविक शुरुआत साबित हो सकती है। लेकिन इसके लिए संसाधन, पारदर्शिता, जवाबदेही और विभागीय समन्वय—चारों का जमीन पर दिखाई देना जरूरी है।

























