महोबा

अरे दादा… अब बुंदेलखंड को राज्य बना दीजिए! हप्पू सिंह की अपील से फिर गरमाई अलग राज्य की मांग

ठाकुर बख्श सिंह की रिपोर्ट

महोबा। बुंदेलखंड को अलग राज्य बनाने की वर्षों पुरानी मांग एक बार फिर सुर्खियों में है। इस बार इस आंदोलन को नई आवाज किसी राजनीतिक मंच से नहीं, बल्कि छोटे पर्दे के लोकप्रिय हास्य कलाकार और ‘दरोगा हप्पू सिंह’ के किरदार से घर-घर पहचान बनाने वाले अभिनेता योगेश त्रिपाठी ने दी है। सोशल मीडिया पर जारी उनके एक वीडियो ने बुंदेलखंड राज्य के मुद्दे को फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है। उनकी अपील के बाद क्षेत्र में इस मांग को लेकर नई बहस शुरू हो गई है और आंदोलन से जुड़े लोग इसे जनभावनाओं को मजबूत करने वाला कदम मान रहे हैं।

‘अरे दादा, नमस्कार…’ से शुरू हुई भावनात्मक अपील

अपने खास बुंदेली अंदाज में अभिनेता योगेश त्रिपाठी वीडियो की शुरुआत करते हैं—”अरे दादा, नमस्कार…” और फिर सीधे बुंदेलखंड की बात करते हैं। वह कहते हैं कि लोग उन्हें टीवी धारावाहिकों हप्पू की उलटन-पुलटन और भाभी जी घर पर हैं के जरिए जानते हैं, लेकिन इन कार्यक्रमों में बुंदेलखंड की भाषा, बोली और संस्कृति की भी झलक दिखाई देती है।

उन्होंने कहा कि बुंदेलखंड केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं बल्कि समृद्ध लोकसंस्कृति, भाषा, परंपराओं और गौरवशाली इतिहास की पहचान है। ऐसे में इस क्षेत्र को उसका अलग अस्तित्व मिलना चाहिए।

प्रधानमंत्री से की सीधी अपील

वीडियो में योगेश त्रिपाठी ने प्रधानमंत्री से भावुक अपील करते हुए कहा कि पूरे बुंदेलखंड की ओर से वह निवेदन कर रहे हैं कि क्षेत्र की लंबे समय से चली आ रही मांग को स्वीकार किया जाए। उन्होंने कहा कि यदि बुंदेलखंड को अलग राज्य का दर्जा मिलता है तो यहां के लोग हमेशा इसके लिए आभारी रहेंगे।

उनकी इस अपील के सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है। हजारों लोग इसे साझा कर रहे हैं और अपने-अपने तरीके से इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया दे रहे हैं।

पूर्व सांसद गंगाचरण राजपूत चला रहे हैं नई मुहिम

बुंदेलखंड राज्य की मांग को लेकर पूर्व सांसद गंगाचरण राजपूत लगातार सक्रिय हैं। वह गांव-गांव जाकर जनसभाएं कर रहे हैं और लोगों को इस आंदोलन से जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं।

उनका कहना है कि बुंदेलखंड लंबे समय से विकास के मामले में पिछड़ता रहा है। यदि इसे अलग राज्य का दर्जा मिलता है तो यहां की समस्याओं का समाधान तेजी से हो सकेगा। उनका दावा है कि क्षेत्र के लोगों में इस मांग को लेकर पहले से अधिक समर्थन दिखाई दे रहा है।

महोबा से फिर तेज हुई बैठकों की रफ्तार

महोबा सहित आसपास के जिलों में अलग राज्य की मांग को लेकर बैठकों का दौर भी तेज हो गया है। सामाजिक संगठनों, युवाओं और क्षेत्रीय लोगों के बीच इस विषय पर चर्चा हो रही है।

आंदोलन से जुड़े लोगों का कहना है कि अब केवल राजनीतिक दलों के भरोसे रहने का समय नहीं है। समाज के हर वर्ग और खासकर सांस्कृतिक जगत से जुड़े लोगों की भागीदारी इस अभियान को नई ऊर्जा दे सकती है।

यहीं से शुरू हुई थी बुंदेलखंड राज्य आंदोलन की मजबूत नींव

बुंदेलखंड राज्य आंदोलन का इतिहास कई दशक पुराना है। इस संघर्ष को संगठित रूप देने का श्रेय समाजसेवी शंकर लाल मेहरोत्रा को दिया जाता है। उन्होंने 17 सितंबर 1989 को उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की सीमा पर स्थित धवर्रा क्षेत्र से इस आंदोलन की शुरुआत की थी।

उनका उद्देश्य था कि बुंदेलखंड को अलग प्रशासनिक पहचान मिले ताकि यहां के लोगों को विकास की मुख्यधारा से जोड़ा जा सके।

आंदोलन के लिए दांव पर लगा दी पूरी जिंदगी

शंकर लाल मेहरोत्रा ने केवल आंदोलन की शुरुआत ही नहीं की बल्कि उसे आगे बढ़ाने के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया। बताया जाता है कि आर्थिक संसाधनों की कमी आने पर उन्होंने अपनी डिस्टिलरी फैक्ट्री तक बेच दी।

उन्होंने कांग्रेस पार्टी की सदस्यता भी छोड़ दी और पूरी तरह बुंदेलखंड राज्य आंदोलन को समर्पित हो गए। गांव-गांव सभाएं, धरने, प्रदर्शन और जनजागरण अभियान चलाकर उन्होंने इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाने की कोशिश की।

संसद और विधानसभा तक गूंजी थी मांग

बुंदेलखंड राज्य की मांग केवल सड़कों तक सीमित नहीं रही। आंदोलनकारियों ने 1994 में मध्य प्रदेश विधानसभा और 1995 में लोकसभा में पर्चे फेंककर भी इस मांग को राष्ट्रीय बहस का विषय बनाने का प्रयास किया था।

हालांकि लगातार संघर्ष के बावजूद आंदोलन को वह सफलता नहीं मिल सकी जिसकी उम्मीद की जा रही थी।

उत्तराखंड, झारखंड और छत्तीसगढ़ बने… लेकिन बुंदेलखंड रह गया पीछे

साल 2000 में देश को तीन नए राज्य—उत्तराखंड, झारखंड और छत्तीसगढ़—मिले। उस समय बुंदेलखंड के लोगों को भी उम्मीद थी कि उनकी वर्षों पुरानी मांग पूरी होगी, लेकिन ऐसा नहीं हो सका।

कहा जाता है कि इसी अधूरे सपने और निराशा के बीच 22 नवंबर 2001 को शंकर लाल मेहरोत्रा का निधन हो गया। उनके समर्थकों का मानना है कि उन्होंने अपना पूरा जीवन बुंदेलखंड के नाम कर दिया।

क्या फिर बनेगा अलग बुंदेलखंड?

हप्पू सिंह यानी योगेश त्रिपाठी की अपील ने एक बार फिर इस सवाल को हवा दे दी है कि क्या आने वाले समय में बुंदेलखंड राज्य की मांग राजनीतिक एजेंडे में मजबूती से लौटेगी?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जब किसी क्षेत्रीय आंदोलन को सामाजिक, सांस्कृतिक और जनसमर्थन एक साथ मिलने लगता है, तो उसका प्रभाव राजनीति पर भी दिखाई देता है। हालांकि अलग राज्य का गठन पूरी तरह केंद्र सरकार और संसद की संवैधानिक प्रक्रिया पर निर्भर करता है।

फिलहाल इतना तय है कि अभिनेता योगेश त्रिपाठी के एक वीडियो ने बुंदेलखंड राज्य की वर्षों पुरानी मांग को फिर से राष्ट्रीय चर्चा में ला खड़ा किया है। अब देखना होगा कि यह आवाज केवल सोशल मीडिया तक सीमित रहती है या आने वाले दिनों में एक बड़े जनआंदोलन का रूप लेती है।

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