विचार

भारत का भविष्य गाँवों की चौपाल पर तय होगा

पंचायती राज केवल प्रशासनिक व्यवस्था नहीं, बल्कि लोकतंत्र, विकास और सामाजिक न्याय की सबसे मजबूत आधारशिला है।

  • चुन्नीलाल प्रधान

भारत केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि लाखों गाँवों का जीवंत लोकतांत्रिक परिवार है। यदि संसद लोकतंत्र का मस्तिष्क है, तो ग्राम सभा उसकी आत्मा है। यही कारण है कि महात्मा गांधी ने कहा था—“भारत की आत्मा उसके गाँवों में बसती है।” आज जब भारत वर्ष 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रहा है, तब यह प्रश्न पहले से अधिक प्रासंगिक हो गया है कि क्या पंचायती राज व्यवस्था आज भी उतनी ही आवश्यक है, जितनी तीन दशक पहले थी?

उत्तर है—हाँ, पहले से कहीं अधिक। लेकिन यह उत्तर केवल भावनात्मक नहीं है। इसके पीछे इतिहास, संविधान, लोकतांत्रिक दर्शन, आँकड़े और भारत के ग्रामीण विकास का सात दशक का अनुभव है।

ग्राम स्वराज का सपना और लोकतंत्र की बुनियाद

भारत में पंचायतों का इतिहास हजारों वर्षों पुराना है। वैदिक काल से लेकर मध्यकाल तक गाँव अपने अनेक प्रशासनिक और सामाजिक निर्णय स्वयं लेते थे। विवादों का निपटारा, जल संरक्षण, कृषि प्रबंधन और सामुदायिक विकास पंचायतों के माध्यम से ही होता था। अंग्रेज़ी शासन के दौरान यह व्यवस्था कमजोर हुई और निर्णय लेने की शक्ति जनता से दूर चली गई।

स्वतंत्रता के बाद महात्मा गांधी ने ‘ग्राम स्वराज’ की अवधारणा रखी। उनका सपना था कि प्रत्येक गाँव एक स्वशासी इकाई बने, जहाँ निर्णय जनता स्वयं करे। हालांकि तत्कालीन परिस्थितियों में देश ने केंद्रीकृत प्रशासनिक व्यवस्था अपनाई, लेकिन समय के साथ यह महसूस किया गया कि दिल्ली और राज्य की राजधानियों से बैठकर गाँवों की समस्याओं का समाधान नहीं किया जा सकता। इसी सोच ने लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण की नींव रखी।

समितियों से संविधान तक का सफर

वर्ष 1957 में गठित बलवंत राय मेहता समिति ने पहली बार त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था की सिफारिश की। इसके बाद अशोक मेहता समिति (1978), जी.वी.के. राव समिति (1985) और एल.एम. सिंहवी समिति (1986) ने भी पंचायतों को संवैधानिक दर्जा देने की आवश्यकता पर बल दिया।

आखिरकार वर्ष 1992 में संसद ने 73वाँ संविधान संशोधन अधिनियम पारित किया, जो 24 अप्रैल 1993 से लागू हुआ। इसी संशोधन के माध्यम से संविधान में भाग-IX (अनुच्छेद 243 से 243-O) जोड़ा गया। यह संशोधन केवल कानून नहीं था, बल्कि लोकतंत्र को जनता के दरवाज़े तक पहुँचाने की ऐतिहासिक पहल थी।

आज पंचायती राज कितना बड़ा है?

आज भारत में लगभग 2.6 लाख ग्राम पंचायतें, हजारों ब्लॉक पंचायतें और सैकड़ों जिला पंचायतें कार्यरत हैं। देश में लगभग 31 लाख से अधिक निर्वाचित पंचायती राज प्रतिनिधि हैं। इनमें 14 लाख से अधिक महिलाएँ चुनी गई हैं। यह दुनिया में स्थानीय स्तर पर महिलाओं की लोकतांत्रिक भागीदारी का सबसे बड़ा उदाहरण माना जाता है।

बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश, ओडिशा सहित अनेक राज्यों में महिलाओं को 50 प्रतिशत तक आरक्षण दिया जा चुका है। यह केवल आँकड़ा नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का प्रमाण है।

पंचायतें क्यों आवश्यक हैं?

क्योंकि लोकतंत्र केवल चुनाव कराने का नाम नहीं है। यदि किसी गाँव में नाली जाम है, प्राथमिक विद्यालय में शिक्षक नहीं हैं, आंगनबाड़ी केंद्र बंद है, पेयजल की समस्या है, खेत तक सड़क नहीं पहुँच रही या मनरेगा का भुगतान अटका हुआ है, तो इन समस्याओं का समाधान संसद में नहीं, पंचायत में होता है। यही लोकतंत्र का वास्तविक स्वरूप है—निर्णय वहाँ हों, जहाँ समस्या मौजूद है। इसीलिए पंचायती राज व्यवस्था को लोकतंत्र की पहली पाठशाला कहा जाता है।

योजनाएँ सफल होंगी या असफल—यह पंचायत तय करती है

केंद्र और राज्य सरकारें अनेक महत्वाकांक्षी योजनाएँ बनाती हैं। मनरेगा, प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण), जल जीवन मिशन, स्वच्छ भारत मिशन, राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन, पोषण अभियान, हर घर जल, ग्राम सड़क योजना—इन सभी योजनाओं का अंतिम क्रियान्वयन पंचायतों के माध्यम से होता है।

यदि पंचायत ईमानदार और सक्रिय है, तो गरीब को घर भी मिलेगा, पानी भी मिलेगा और रोजगार भी। यदि पंचायत निष्क्रिय है, तो करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी विकास कागज़ों में दिखाई देगा, ज़मीन पर नहीं।

पंचायतों ने बदली महिलाओं की तस्वीर

73वें संविधान संशोधन का सबसे बड़ा प्रभाव महिलाओं के राजनीतिक सशक्तीकरण के रूप में सामने आया। आज लाखों महिलाएँ ग्राम प्रधान, क्षेत्र पंचायत सदस्य और जिला पंचायत अध्यक्ष हैं। अनेक स्थानों पर महिलाओं ने जल संरक्षण, स्वच्छता, शिक्षा, पोषण और स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से उल्लेखनीय कार्य किए हैं।

हालाँकि कुछ क्षेत्रों में “प्रधान पति” या “सरपंच पति” जैसी प्रवृत्तियाँ लोकतंत्र को कमजोर करती हैं, लेकिन यह व्यवस्था की नहीं, सामाजिक मानसिकता की समस्या है। इसका समाधान महिलाओं को और अधिक प्रशिक्षण, प्रशासनिक सहयोग तथा स्वतंत्र निर्णय का अवसर देना है।

लेकिन कमियाँ भी कम नहीं

पंचायती राज व्यवस्था की सफलता के साथ उसकी चुनौतियों को स्वीकार करना भी आवश्यक है। आज भी अधिकांश पंचायतें आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं हैं। उन्हें अपने विकास कार्यों के लिए राज्य सरकार के अनुदान पर निर्भर रहना पड़ता है।

भ्रष्टाचार, फर्जी भुगतान, अपूर्ण निर्माण, राजनीतिक दबाव, जातीय ध्रुवीकरण, तकनीकी जानकारी का अभाव और प्रशासनिक हस्तक्षेप जैसी समस्याएँ अनेक राज्यों में आज भी मौजूद हैं। ग्राम सभाएँ कई स्थानों पर नियमित नहीं होतीं और जहाँ होती भी हैं, वहाँ पर्याप्त जनभागीदारी नहीं दिखाई देती। यह स्थिति लोकतंत्र की भावना के अनुकूल नहीं कही जा सकती।

असली चुनौती—अधिकारों का अधूरा हस्तांतरण

संविधान की ग्यारहवीं अनुसूची में पंचायतों के लिए 29 विषय निर्धारित किए गए हैं। इनमें कृषि, सिंचाई, पशुपालन, ग्रामीण आवास, स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क, जल संरक्षण, महिला एवं बाल विकास सहित अनेक महत्वपूर्ण क्षेत्र शामिल हैं।

लेकिन वास्तविकता यह है कि अधिकांश राज्यों में इन विषयों पर पूर्ण प्रशासनिक और वित्तीय अधिकार पंचायतों को अभी तक नहीं मिले हैं।

विशेषज्ञ वर्षों से कहते रहे हैं कि पंचायतों को केवल जिम्मेदारी नहीं, बल्कि तीन ‘एफ’—Funds (धन), Functions (कार्य) और Functionaries (कर्मचारी) भी पूरी तरह मिलने चाहिए। जब तक यह नहीं होगा, तब तक स्थानीय स्वशासन अधूरा रहेगा।

वित्त आयोग ने भी माना पंचायतों का महत्व

केंद्रीय वित्त आयोगों ने समय-समय पर स्थानीय निकायों को वित्तीय रूप से मजबूत बनाने पर बल दिया है। विशेष रूप से 15वें वित्त आयोग ने ग्राम पंचायतों और अन्य स्थानीय निकायों के लिए बड़ी राशि की अनुशंसा की, ताकि पेयजल, स्वच्छता, सार्वजनिक स्वास्थ्य और आधारभूत सुविधाओं को बेहतर बनाया जा सके। यह इस बात का प्रमाण है कि भारत का आर्थिक भविष्य भी अब स्थानीय शासन की मजबूती से जुड़ चुका है।

दुनिया से क्या सीख सकते हैं?

ब्राज़ील में सहभागी बजट (Participatory Budgeting), स्विट्ज़रलैंड में स्थानीय जनमत संग्रह और कई यूरोपीय देशों में मजबूत स्थानीय निकाय लोकतंत्र को अधिक जवाबदेह बनाते हैं।

भारत का पंचायती राज मॉडल अपनी विशालता के कारण दुनिया में अद्वितीय है, लेकिन अब इसे केवल संख्या में नहीं, गुणवत्ता में भी उत्कृष्ट बनाना होगा।

भविष्य की पंचायत—डिजिटल, पारदर्शी और जवाबदेह

आने वाले वर्षों में पंचायतों को ई-गवर्नेंस से जोड़ना समय की आवश्यकता है। हर ग्राम पंचायत का डिजिटल लेखा-जोखा, ऑनलाइन भुगतान, भू-अभिलेखों का डिजिटलीकरण, सोशल ऑडिट, ग्राम सभा की लाइव रिकॉर्डिंग, सार्वजनिक सूचना पोर्टल और नागरिक शिकायत प्रणाली पारदर्शिता बढ़ा सकती है।

यदि ग्राम सभा की हर बैठक का निर्णय मोबाइल पर उपलब्ध हो और हर खर्च सार्वजनिक पोर्टल पर दिखाई दे, तो भ्रष्टाचार स्वतः कम होगा।

विकसित भारत 2047 का रास्ता गाँवों से होकर जाता है

यदि भारत को विकसित राष्ट्र बनना है, तो केवल एक्सप्रेसवे, मेट्रो और स्मार्ट सिटी पर्याप्त नहीं होंगे। विकसित भारत का अर्थ है—ऐसा गाँव जहाँ स्वच्छ पेयजल हो, गुणवत्तापूर्ण विद्यालय हो, प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध हो, किसानों को आधुनिक तकनीक मिले, युवाओं को रोजगार मिले और महिलाओं को समान अवसर प्राप्त हों।

यह सपना केवल मंत्रालयों से नहीं, बल्कि मजबूत पंचायतों से पूरा होगा। पंचायती राज व्यवस्था पर प्रश्न उठाना लोकतंत्र पर प्रश्न उठाने जैसा नहीं है, बल्कि उसे और बेहतर बनाने का अवसर है।

सच्चाई यह है कि पंचायतों में भ्रष्टाचार है, कमियाँ हैं, राजनीतिक हस्तक्षेप है और कई बार जवाबदेही भी कमजोर है। लेकिन समाधान पंचायतों को कमजोर करना नहीं, बल्कि उन्हें अधिक सक्षम, अधिक पारदर्शी और अधिक उत्तरदायी बनाना है।

भारत का लोकतंत्र संसद भवन की भव्य इमारत से जितना मजबूत होता है, उससे कहीं अधिक वह किसी छोटे से गाँव की ग्राम सभा में बैठी जनता के विश्वास से मजबूत होता है।

जब गाँव निर्णय लेने में सक्षम होंगे, तब लोकतंत्र मजबूत होगा। जब पंचायतें ईमानदार होंगी, तब विकास योजनाएँ सफल होंगी। और जब भारत का अंतिम गाँव आत्मनिर्भर होगा, तभी भारत वास्तव में विश्वगुरु और विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में निर्णायक कदम बढ़ाएगा।

पंचायती राज कोई सरकारी योजना नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की धड़कन है। इस धड़कन को मजबूत रखना केवल सरकार की नहीं, बल्कि पूरे समाज की साझा जिम्मेदारी है।

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