यहाँ लौट आई गौरैया : यह हवेली बनी नन्ही चिड़ियों का सुरक्षित संसार

रिपोर्टर ठाकुर बख्श सिंह की तस्वीर के साथ मुरादाबाद की गौरैया वाली हवेली और गौरैया पक्षियों का फीचर ग्राफिक, जहां हजारों गौरैयों के लिए सुरक्षित आशियाना बनाया गया है।

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मुरादाबाद गौरैया हवेली आज पक्षी संरक्षण का प्रेरणादायक उदाहरण बनकर सामने आई है। जहां देशभर में गौरैयों की संख्या लगातार घट रही है, वहीं मुरादाबाद की एक हवेली ने हजारों गौरैयों को सुरक्षित आशियाना देकर नई उम्मीद जगाई है। घर के मालिक ने सीलिंग फैन और एसी हटाकर पक्षियों के अनुकूल वातावरण तैयार किया तथा विशेष घोंसलों, दाना और पानी की व्यवस्था की। सोशल मीडिया पर वायरल हुई यह पहल लोगों को अपने घरों में भी गौरैया संरक्षण के लिए प्रेरित कर रही है। यह अनूठी पहल बताती है कि छोटे-छोटे प्रयासों से भी प्रकृति और जैव विविधता की रक्षा की जा सकती है।

ठाकुर बख्श सिंह की रिपोर्ट

एक समय था जब सुबह की शुरुआत घरों के आंगन, छतों और खिड़कियों पर फुदकती गौरैयों की मधुर चहचहाहट से होती थी। लेकिन बदलते शहरी परिवेश, कंक्रीट के बढ़ते जंगल, आधुनिक निर्माण शैली और पर्यावरणीय बदलावों ने इस नन्ही चिड़िया के प्राकृतिक आवास को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। आज बड़े शहरों में गौरैया का दिखाई देना किसी सुखद संयोग से कम नहीं माना जाता।

ऐसे समय में उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद की एक हवेली लोगों के लिए प्रेरणा का केंद्र बन गई है। यहां गौरैयों के लिए ऐसा सुरक्षित और अनुकूल वातावरण तैयार किया गया है, जिसने हजारों चिड़ियों को फिर से आशियाना दे दिया है। यह हवेली अब केवल एक मकान नहीं, बल्कि पक्षी संरक्षण का जीवंत उदाहरण बन चुकी है।

गौरैयों की सुरक्षा को बनाया जीवन का उद्देश्य

हवेली के मालिक ने जब महसूस किया कि शहरों से गौरैया लगातार गायब होती जा रही हैं, तो उन्होंने इसे केवल पर्यावरण की समस्या मानकर छोड़ने के बजाय स्वयं समाधान का हिस्सा बनने का निर्णय लिया। उन्होंने अपने घर में कई ऐसे बदलाव किए, जिनका उद्देश्य केवल गौरैयों को सुरक्षित वातावरण उपलब्ध कराना था।

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सबसे पहले घर से सभी सीलिंग फैन हटवा दिए गए। अक्सर उड़ान के दौरान पंखों से टकराकर पक्षियों के घायल होने या उनकी मौत की घटनाएं सामने आती हैं। इस जोखिम को समाप्त करने के लिए यह बड़ा फैसला लिया गया। इसके बाद एक दुर्घटना के अनुभव से सीख लेते हुए घर में एयर कंडीशनर का उपयोग भी पूरी तरह बंद कर दिया गया।

अब हवेली में जालीदार कूलर लगाए गए हैं, जिनसे घर भी ठंडा रहता है और पक्षियों की सुरक्षा भी सुनिश्चित होती है। इस छोटे से बदलाव ने गौरैयों को निडर होकर पूरे घर में आने-जाने और घोंसले बनाने की स्वतंत्रता प्रदान की है।

घर के हर कोने में बनाए गए विशेष घोंसले

हवेली की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां गौरैयों के रहने के लिए विशेष स्थान तैयार किए गए हैं। खिड़कियों, रोशनदानों, दीवारों और छत के विभिन्न हिस्सों में छोटे-छोटे सुरक्षित खांचे बनाए गए हैं, जहां गौरैया आसानी से अपने घोंसले बना सकें।

इसके अलावा पक्षियों के लिए नियमित रूप से दाना और स्वच्छ पानी की व्यवस्था भी की जाती है। गर्मी के मौसम में पानी के बर्तन हमेशा भरे रहते हैं, जिससे पक्षियों को किसी प्रकार की परेशानी न हो।

इन प्रयासों का परिणाम यह है कि आज इस हवेली में बड़ी संख्या में गौरैयां निवास कर रही हैं। सुबह और शाम जब सैकड़ों-हजारों गौरैयां एक साथ चहचहाती हैं, तो पूरा वातावरण प्राकृतिक संगीत से भर उठता है।

परिवार से अधिक हो गए हैं पक्षियों के सदस्य

हवेली में रहने वाले परिवार का कहना है कि अब उन्हें ऐसा महसूस होता है मानो गौरैयां भी उनके परिवार का हिस्सा बन चुकी हैं। घर के लगभग हर हिस्से में इनकी मौजूदगी दिखाई देती है। किसी कमरे की खिड़की पर घोंसला है तो कहीं छज्जे के नीचे बच्चे चहचहा रहे हैं।

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परिवार का मानना है कि यदि इंसान थोड़ा-सा त्याग कर ले और प्रकृति के लिए स्थान छोड़ दे, तो वन्य जीव और पक्षी सहज रूप से हमारे आसपास लौट सकते हैं। यही सोच इस हवेली को अन्य घरों से अलग पहचान दिला रही है।

सोशल मीडिया पर लोगों ने की जमकर सराहना

मुरादाबाद की इस अनूठी पहल का वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आने के बाद लाखों लोगों का ध्यान इस ओर गया। वीडियो देखने वालों ने इसे पक्षी संरक्षण की दिशा में बेहद प्रेरणादायक कदम बताया।

कई लोगों ने टिप्पणी करते हुए लिखा कि यही वास्तविक पर्यावरण संरक्षण है। कुछ लोगों ने कहा कि यदि हर परिवार अपने घर में पक्षियों के लिए थोड़ी-सी जगह और पानी की व्यवस्था कर दे, तो गौरैया जैसी प्रजातियों को फिर से सुरक्षित भविष्य मिल सकता है। सोशल मीडिया पर इस पहल की सराहना लगातार बढ़ रही है और लोग इसे अपने घरों में भी अपनाने की इच्छा जता रहे हैं।

क्यों घट रही है गौरैयों की संख्या?

विशेषज्ञों के अनुसार गौरैयों की संख्या में कमी आने के पीछे कई कारण जिम्मेदार हैं। आधुनिक कंक्रीट के मकानों में घोंसला बनाने के लिए पर्याप्त स्थान नहीं बचा है। पुराने घरों की तरह रोशनदान, छज्जे और खुले कोने अब लगभग समाप्त हो चुके हैं।

इसके अलावा कीटनाशकों का बढ़ता उपयोग, हरियाली में कमी, भोजन की उपलब्धता घटने और तेज़ी से बदलते शहरी वातावरण ने भी गौरैयों के अस्तित्व पर असर डाला है। हालांकि मोबाइल टावरों के प्रभाव को लेकर समय-समय पर चर्चाएं होती रही हैं, लेकिन वैज्ञानिक समुदाय का मानना है कि गौरैयों की घटती संख्या के पीछे कई कारण मिलकर काम करते हैं।

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छोटी पहल से बड़ा बदलाव संभव

मुरादाबाद की यह हवेली यह संदेश देती है कि पर्यावरण संरक्षण केवल सरकारी योजनाओं या बड़े अभियानों तक सीमित नहीं है। यदि प्रत्येक व्यक्ति अपने घर में पक्षियों के लिए पानी का पात्र रखे, थोड़ी-सी जगह घोंसले के लिए छोड़े और अनावश्यक रूप से उनके प्राकृतिक आवास को नष्ट न करे, तो गौरैयों की संख्या बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया जा सकता है।

यह पहल इस बात का भी प्रमाण है कि संवेदनशील सोच और छोटे-छोटे प्रयास मिलकर प्रकृति के संरक्षण में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं।

गौरैया केवल एक पक्षी नहीं, बल्कि हमारे पारंपरिक जीवन, प्रकृति और पर्यावरण का महत्वपूर्ण हिस्सा है। मुरादाबाद की यह हवेली उन लोगों के लिए प्रेरणा है जो मानते हैं कि इच्छाशक्ति हो तो पर्यावरण संरक्षण घर से ही शुरू किया जा सकता है। यदि समाज इसी प्रकार प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी निभाए, तो वह दिन दूर नहीं जब गौरैया फिर से हर आंगन और हर छत पर पहले की तरह चहचहाती नजर आएगी।

— ठाकुर बख्श सिंह की रिपोर्ट

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Author: यायावर

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