दुर्गा प्रसाद शुक्ला की रिपोर्ट
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में गो-संरक्षण अब केवल धार्मिक आस्था या परंपरा का विषय नहीं रह गया है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में राज्य सरकार ने इसे ग्रामीण अर्थव्यवस्था, स्वरोजगार, महिला सशक्तीकरण, जैविक खेती और उद्यमिता से जोड़कर एक व्यापक आर्थिक मॉडल का रूप दिया है। परिणामस्वरूप प्रदेश की कई गोशालाएं आज आत्मनिर्भर उत्पादन इकाइयों में बदल चुकी हैं, जहां देसी गायों से प्राप्त दूध, A2 बिलौना घी, पंचगव्य उत्पाद, जैविक खाद, आयुर्वेदिक औषधियां और हर्बल उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं। इन उत्पादों की मांग अब केवल देश तक सीमित नहीं है, बल्कि अमेरिका, जापान, कनाडा और यूरोप सहित कई अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंच चुकी है।
सरकार की नीतियों और बदलती उपभोक्ता पसंद ने गो-आधारित उद्योग को नई दिशा दी है। इसका सबसे बड़ा लाभ ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार, स्थानीय उद्यमिता और किसानों की आय बढ़ाने के रूप में सामने आ रहा है।
गो-संरक्षण को मिला आर्थिक विकास का नया आयाम
प्रदेश सरकार ने गोवंश संरक्षण को केवल गोशालाओं तक सीमित रखने के बजाय इसे जैविक कृषि, प्राकृतिक खेती और स्वदेशी उत्पादों के निर्माण से जोड़ने की रणनीति अपनाई है। इस नीति का असर यह हुआ कि अनेक गोशालाएं अब उत्पादन, प्रसंस्करण और विपणन का केंद्र बन चुकी हैं।
देसी नस्ल की गायों से प्राप्त दूध और पंचगव्य आधारित उत्पादों की मांग लगातार बढ़ रही है। विशेष रूप से A2 दूध और पारंपरिक विधि से तैयार बिलौना घी को लेकर लोगों का रुझान तेजी से बढ़ा है। स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता ने भी इन उत्पादों को बाजार में नई पहचान दिलाई है।
इसके साथ ही डिजिटल प्लेटफॉर्म और ऑनलाइन विपणन ने उत्तर प्रदेश के गो-आधारित उत्पादों को देश-विदेश के ग्राहकों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इससे छोटे और मध्यम स्तर के उद्यमियों को भी बड़े बाजार तक पहुंचने का अवसर मिला है।
गाजियाबाद में सॉफ्टवेयर इंजीनियर ने बनाया सफलता का नया मॉडल
विदेशी कंपनियों में लंबे समय तक सॉफ्टवेयर इंजीनियर के रूप में कार्य कर चुके असीम रावत ने पारंपरिक करियर छोड़कर गो-संरक्षण और प्राकृतिक उत्पादों के क्षेत्र में कदम रखा। गाजियाबाद स्थित उनकी संस्था ‘हेता ऑर्गेनिक’ आज देसी गायों के संरक्षण के साथ-साथ करोड़ों रुपये के वार्षिक कारोबार का सफल उदाहरण बन चुकी है।
संस्था में वृद्ध और असहाय गोवंश की देखभाल भी की जाती है। यहां देसी गायों के दूध और पंचगव्य के आधार पर 150 से अधिक उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं। इनमें A2 बिलौना घी, ब्राह्मी घृत, पंचगव्य घृत, देसी गाय का दूध, पौष्टिक मिठाइयां, लड्डू, कुकीज, हर्बल चाय, स्वास्थ्यवर्धक पेय, स्नैक्स तथा त्वचा और बालों की देखभाल से जुड़े हर्बल उत्पाद शामिल हैं।
यह मॉडल दिखाता है कि आधुनिक तकनीक, पारंपरिक ज्ञान और प्रभावी विपणन को जोड़कर गो-आधारित उद्योग को बड़े स्तर पर विकसित किया जा सकता है।
वाराणसी का सुरभि शोध संस्थान बना रोजगार और सेवा का केंद्र
वाराणसी स्थित सुरभि शोध संस्थान भी गो-संरक्षण आधारित अर्थव्यवस्था का एक उल्लेखनीय उदाहरण है। समाजसेवी और उद्योगपति सूर्यकांत जालान द्वारा संचालित इस संस्थान की गोशालाएं वाराणसी, लखनऊ, मिर्जापुर और दिल्ली सहित कई स्थानों पर संचालित हैं।
इन गोशालाओं में हजारों की संख्या में गोवंश का संरक्षण किया जा रहा है। यहां गोबर और गोमूत्र का उपयोग जैविक खाद, प्राकृतिक खेती तथा विभिन्न उपयोगी उत्पादों के निर्माण में किया जाता है।
संस्थान ने एक हजार से अधिक लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार उपलब्ध कराया है। यहां कार्यरत लोग गो-सेवा के साथ अपनी आजीविका भी चला रहे हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि गो-संरक्षण केवल सामाजिक उत्तरदायित्व ही नहीं, बल्कि रोजगार और आर्थिक विकास का भी प्रभावी माध्यम बन सकता है।
बुलंदशहर के पर्यावरण इंजीनियर ने पेश की प्रेरक मिसाल
बुलंदशहर निवासी पर्यावरण इंजीनियर पराग गौड़ ने भी गो-आधारित उद्यमिता का सफल मॉडल विकसित किया है। उन्होंने सीमित संसाधनों से शुरुआत करते हुए लगभग 70 देसी गायों पर आधारित उत्पादन इकाई स्थापित की।
वर्तमान में उनके यहां दूध, शुद्ध घी, विशेष प्रकार के च्यवनप्राश और अन्य स्वास्थ्यवर्धक उत्पाद तैयार किए जाते हैं। इस उद्यम का वार्षिक कारोबार करोड़ रुपये के स्तर तक पहुंच चुका है। साथ ही स्थानीय लोगों को रोजगार भी मिला है और क्षेत्र में प्राकृतिक उत्पादों की मांग लगातार बढ़ रही है।
यह उदाहरण दर्शाता है कि यदि वैज्ञानिक सोच, गुणवत्ता और बाजार की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए कार्य किया जाए तो गो-आधारित उद्योग ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक परिवर्तन का मजबूत आधार बन सकता है।
बढ़ रही है A2 दूध और पंचगव्य उत्पादों की मांग
स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ने के साथ उपभोक्ताओं का रुझान प्राकृतिक और रसायन-मुक्त उत्पादों की ओर तेजी से बढ़ा है। यही कारण है कि A2 दूध, बिलौना घी, पंचगव्य औषधियां, जैविक खाद और हर्बल उत्पादों की मांग लगातार मजबूत हो रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि गुणवत्ता, शुद्धता और पारंपरिक निर्माण प्रक्रिया इन उत्पादों की सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरी है। यही वजह है कि उत्तर प्रदेश में तैयार कई उत्पाद अब अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी अपनी पहचान बना चुके हैं।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मिल रही नई मजबूती
गो-आधारित उद्योगों के विस्तार से गांवों में रोजगार के नए अवसर पैदा हो रहे हैं। महिलाएं स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से विभिन्न उत्पादों के निर्माण और पैकेजिंग में भागीदारी कर रही हैं। वहीं किसान जैविक खेती अपनाकर अपनी उत्पादन लागत कम करने के साथ बेहतर आय भी प्राप्त कर रहे हैं।
गोबर से तैयार जैविक खाद और प्राकृतिक कृषि उत्पाद पर्यावरण संरक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। इससे रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने की दिशा में भी सकारात्मक परिणाम देखने को मिल रहे हैं।
सरकार का लक्ष्य—गो-संरक्षण को बनाना आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था का आधार
गो-सेवा आयोग के अध्यक्ष श्याम बिहारी गुप्ता का कहना है कि राज्य सरकार उन्नत और अधिक उत्पादक देसी नस्ल की गायों को बढ़ावा देने के लिए लगातार प्रयास कर रही है। सरकार की प्राथमिकता गो-संरक्षण को जैविक खेती, ग्रामीण उद्योग, स्वरोजगार और स्थानीय उत्पादन से जोड़कर व्यापक आर्थिक गतिविधि में बदलना है।
उनके अनुसार आने वाले समय में यह मॉडल ग्रामीण युवाओं के लिए नए रोजगार अवसर पैदा करेगा और गांवों की अर्थव्यवस्था को और अधिक मजबूत बनाएगा।
गो-सेवा से विकसित हो रहा नया आर्थिक मॉडल
उत्तर प्रदेश में विकसित हो रहा गो-आधारित मॉडल यह संकेत देता है कि परंपरा और आधुनिक उद्यमिता का संतुलित मेल आर्थिक विकास का प्रभावी माध्यम बन सकता है। सरकार की नीतियां, उद्यमियों की पहल और उपभोक्ताओं की बदलती पसंद ने मिलकर गो-संरक्षण को एक नए आर्थिक आयाम तक पहुंचाया है।
यदि इसी गति से उत्पादन, गुणवत्ता और विपणन का विस्तार होता रहा तो आने वाले वर्षों में उत्तर प्रदेश देश में गो-आधारित उद्योग, जैविक उत्पाद और प्राकृतिक अर्थव्यवस्था के सबसे बड़े केंद्रों में अपनी मजबूत पहचान बना सकता है।

























