जिले की चिट्ठी

हर शुक्रवार, एक जिला… एक चिट्ठी… हजार सवाल, गोमती की लहरों से… जौनपुर की चिट्ठी

'जिले की चिट्ठी' — पहला अंक

आदरणीय संपादक जी,

सादर प्रणाम।

आज यह पहली चिट्ठी मैं गोमती के किनारे बसे जौनपुर से लिख रहा हूँ। कागज़ पर शब्द उतर रहे हैं, लेकिन उनके पीछे पूरे जिले की धड़कन सुनाई दे रही है। कहीं बैलों की घंटियाँ हैं, कहीं मोटरसाइकिलों की तेज़ रफ्तार, कहीं मंदिर की घंटियाँ, कहीं मस्जिद की अज़ान, कहीं चौपाल पर चलती राजनीति और कहीं खेत की मेड़ पर खड़ा किसान, जो अब भी बादलों की तरफ़ उम्मीद से देखता है।

जौनपुर को बाहर से देखने वाले लोग अक्सर इसकी पहचान शाही पुल, इमरती, ऐतिहासिक धरोहरों और राजनीतिक हस्तियों से करते हैं। लेकिन किसी जिले की असली पहचान उसके स्मारकों में नहीं, उसके लोगों की आँखों में होती है। उन आँखों में जो सपने पलते हैं, वही किसी जिले का भविष्य लिखते हैं।

पिछले कुछ दिनों से मैं जिले के अलग-अलग हिस्सों में घूम रहा था। मड़ियाहूँ की सुबह, शाहगंज का बाज़ार, केराकत की गलियाँ, मछलीशहर के खेत, बदलापुर की चौपाल, सिकरारा की सड़कें और शहर की भागती हुई ज़िंदगी—सबने मिलकर जैसे एक लंबी कहानी मेरे हाथ में रख दी।

सुबह एक किसान मिला। धान की रोपाई की तैयारी कर रहा था। चेहरे पर पसीना था, लेकिन आवाज़ में वही पुरानी उम्मीद। बोला—”भइया, किसान के जिनगी त अब मौसम से कम, बाजार से जादे डेरावे लागल बा।”

उसके इस एक वाक्य में पूरी कृषि व्यवस्था का दर्द छिपा था। मौसम की अनिश्चितता, बढ़ती लागत, फसल का मूल्य, सिंचाई की चिंता और खेती से घटती आय—ये सिर्फ आँकड़े नहीं, हर खेत की कहानी हैं।

जिले में घूमते हुए यह भी महसूस हुआ कि गाँव अब पहले जैसे नहीं रहे। पक्के मकान बढ़े हैं, मोबाइल टावर खड़े हो गए हैं, इंटरनेट गाँव तक पहुँच गया है। लेकिन रोजगार आज भी शहरों की ओर भागता है। गाँव का पढ़ा-लिखा नौजवान प्रतियोगी परीक्षाओं की किताब और नौकरी के आवेदन पत्र के बीच अपना भविष्य खोज रहा है। जो सफल हो गया, वह शहर चला गया। जो नहीं हो पाया, वह या तो खेती संभाल रहा है या फिर किसी दूसरे प्रदेश की ट्रेन पकड़ चुका है।

शहर में चाय की दुकान आज भी सबसे बड़ा लोकतांत्रिक मंच है। यहाँ बिना किसी निमंत्रण के हर मुद्दे पर बहस होती है। सरकार कैसी है, विपक्ष क्या कर रहा है, सड़क कब बनेगी, अस्पताल में डॉक्टर क्यों नहीं है, बिजली कब आएगी—हर सवाल का जवाब भी वहीं मिल जाता है, भले ही वह सही हो या गलत।

जौनपुर की राजनीति भी कम दिलचस्प नहीं है। यहाँ चुनाव केवल मतदान नहीं होता, बल्कि रिश्तों, जातीय समीकरणों, स्थानीय मुद्दों, विकास और सामाजिक सम्मान का जटिल संगम होता है। चुनाव के दिनों में हर गली राजनीतिक प्रयोगशाला बन जाती है। लेकिन चुनाव बीतने के बाद वही लोग फिर सड़क, नाली, बिजली और अस्पताल की बात करने लगते हैं।

गोमती नदी इस जिले की आत्मा है। सदियों से बहती आ रही है। कितनी पीढ़ियाँ बदल गईं, कितनी सरकारें आईं-गईं, लेकिन नदी अब भी सब कुछ देख रही है। कभी उसके किनारे जीवन बसता था, आज कई जगह वह उपेक्षा का बोझ ढोती दिखाई देती है। नदी की सफाई के वादे हर साल सुनाई देते हैं, मगर नदी शायद आज भी अपने सच्चे रखवालों का इंतज़ार कर रही है।

शिक्षा के क्षेत्र में भी तस्वीर दो रंगों में दिखाई देती है। सरकारी विद्यालयों की इमारतें पहले से बेहतर हुई हैं, कई जगह बच्चों के चेहरे पर उत्साह भी दिखता है। लेकिन गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की चुनौती अभी भी बनी हुई है। दूसरी ओर, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे युवाओं की आँखों में उम्मीद है, पर अनिश्चितता भी कम नहीं।

स्वास्थ्य सेवाओं की बात करें तो प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र से लेकर जिला अस्पताल तक सुधार की गुंजाइश हर कोई गिनाता है। डॉक्टरों की कमी, संसाधनों का अभाव और बढ़ती आबादी—इन सबके बीच आम आदमी चाहता है कि इलाज उसके अधिकार की तरह मिले, एहसान की तरह नहीं।

संपादक जी, जौनपुर की एक और तस्वीर है—यहाँ का सामाजिक सौहार्द। अलग-अलग समुदायों के लोग वर्षों से साथ रहते आए हैं। त्योहार केवल कैलेंडर की तारीखें नहीं, बल्कि रिश्तों की गर्माहट भी हैं। यही वह ताकत है जिसे बचाए रखना सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।

हाँ, अपराध की घटनाएँ भी समय-समय पर जिले की छवि को धूमिल करती हैं। कानून-व्यवस्था पर सवाल उठते हैं, पुलिस कार्रवाई करती है, लोग चर्चा करते हैं। लेकिन हर ईमानदार नागरिक की यही इच्छा है कि कानून का डर इतना मजबूत हो कि अपराध सिर उठाने से पहले ही सोचने लगे।

इतिहास की बात करें तो जौनपुर केवल अतीत का शहर नहीं है। यह भविष्य की संभावनाओं का भी जिला है। यहाँ प्रतिभा की कमी नहीं, मेहनत की कमी नहीं, संसाधनों की पूरी तरह अनुपस्थिति भी नहीं। कमी यदि है तो योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन, दीर्घकालिक सोच और स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप विकास की।

इस यात्रा में मुझे कई ऐसे लोग मिले जिनका नाम शायद कभी अखबार की सुर्खियों में न आए। एक शिक्षक, जो अपने खर्च से बच्चों के लिए पुस्तकें खरीदता है। एक किसान, जो हर कठिनाई के बाद भी खेती नहीं छोड़ना चाहता। एक युवती, जो गाँव की लड़कियों को प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करवाती है। एक सफाईकर्मी, जो बिना किसी प्रशंसा की उम्मीद के हर सुबह सड़क साफ करता है। मुझे लगा, किसी जिले की असली पहचान ऐसे ही लोग होते हैं। जौनपुर की सबसे बड़ी पूँजी उसकी मिट्टी नहीं, उसके लोग हैं। यही लोग इस जिले को हर संकट के बाद फिर खड़ा कर देते हैं।

चलते-चलते शाम हो गई है। गोमती के किनारे हवा कुछ ठंडी हो चली है। दूर कहीं मंदिर की घंटी बज रही है, दूसरी ओर अज़ान की आवाज़ आ रही है। सड़क पर लौटते किसानों की साइकिलें हैं, बाज़ार की रौनक है और आसमान में धीरे-धीरे उतरता अँधेरा।

मैं यह चिट्ठी यहीं समाप्त कर रहा हूँ, लेकिन जौनपुर की कहानी अभी खत्म नहीं हुई। इस जिले में अभी बहुत-सी आवाज़ें हैं, जो सुनी जानी बाकी हैं। बहुत-से सवाल हैं, जिनके जवाब आने वाले समय से माँगे जाने हैं। और बहुत-सी उम्मीदें हैं, जिन्हें निराश नहीं होना चाहिए।

अगले सप्ताह फिर किसी और जिले से आपको एक नई चिट्ठी लिखूँगा। तब तक जौनपुर की मिट्टी की सोंधी महक, गोमती की ठंडी हवा और यहाँ के लोगों का स्नेह आपके नाम।

आपका सहयोगी
राम कीर्ति यादव
जौनपुर, उत्तर प्रदेश

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