चित्रकूट

चित्रकूट की गोशालाओं में गोवंशों की दुर्दशा : जिम्मेदार कौन?

सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच दम तोड़ती गौ-सेवा पर बड़ा सवाल

संजय सिंह राणा की रिपोर्ट

उत्तर प्रदेश सरकार निराश्रित गोवंशों के संरक्षण और गोशालाओं के संचालन पर हर वर्ष करोड़ों रुपये खर्च कर रही है। इसके बावजूद यदि गोशालाओं में गोवंश भूख, बीमारी और लापरवाही के कारण दम तोड़ रहे हों, तो यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं बल्कि संवेदनहीन व्यवस्था का भी प्रमाण है।

चित्रकूट जिले की विभिन्न गोशालाओं को लेकर सामने आ रहे आरोप कई गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं। सोशल मीडिया और स्थानीय स्तर पर प्रसारित जानकारी के अनुसार, कई गोशालाओं में गोवंशों की देखभाल, चारा व्यवस्था, स्वास्थ्य परीक्षण तथा सरकारी अभिलेखों में भारी अनियमितताओं के आरोप लगाए जा रहे हैं। यदि इन आरोपों में सच्चाई है तो यह केवल गोवंश संरक्षण की योजना पर ही नहीं बल्कि प्रशासनिक निगरानी पर भी बड़ा प्रश्नचिह्न है।

गोशालाओं में कुपोषित और बीमार गोवंश

सामने आए आरोपों के अनुसार कई गोशालाओं में बड़ी संख्या में गोवंश बेहद कमजोर, कुपोषित और बीमार दिखाई दे रहे हैं। कई पशु इतने कमजोर हैं कि वे ठीक से खड़े तक नहीं हो पा रहे हैं, जबकि कुछ गोवंशों की मृत्यु होने के भी आरोप लगाए गए हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसी गोशाला में नियमित रूप से संतुलित आहार, स्वच्छ पानी और समय पर चिकित्सा उपलब्ध हो तो ऐसी स्थिति सामान्यतः नहीं बनती। इसलिए गोवंशों की वास्तविक स्थिति की निष्पक्ष जांच आवश्यक है।

रिकॉर्ड और वास्तविक संख्या में अंतर के आरोप

पोस्टर में सबसे गंभीर आरोप यह लगाया गया है कि एनजीओ द्वारा संचालित कुछ गोशालाओं में गोवंशों का सही रिकॉर्ड नहीं रखा जा रहा है। आरोपों के अनुसार—

  • सरकारी अभिलेखों में दर्ज गोवंशों की संख्या और वास्तविक संख्या में अंतर हो सकता है।
  • मृत गोवंशों का समय पर रिकॉर्ड अपडेट नहीं किया जाता।
  • कई स्थानों पर केवल कागजों में व्यवस्थाएं पूरी दिखाई जाती हैं।

यदि ऐसा पाया जाता है तो यह सरकारी धन के दुरुपयोग और प्रशासनिक लापरवाही का गंभीर मामला बन सकता है।

खुले घूम रहे टैग लगे गोवंश

गोशालाओं में पंजीकृत होने के बावजूद कई टैग लगे गोवंश खुले में घूमते दिखाई देने के आरोप भी लगाए गए हैं। इनके कारण कई समस्याएं सामने आती हैं—

  • किसानों की फसलें नष्ट होती हैं।
  • सड़क दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ जाता है।
  • गोवंश स्वयं दुर्घटनाओं का शिकार हो जाते हैं।
  • सरकार की संरक्षण योजना का उद्देश्य प्रभावित होता है।

यदि गोशाला में दर्ज पशु बाहर घूम रहे हैं तो उनकी नियमित निगरानी पर भी सवाल उठना स्वाभाविक है।

चारा और भूसे की व्यवस्था पर उठे सवाल

पोस्टर में यह भी दावा किया गया है कि सरकारी अभिलेखों में हरा चारा, भूसा, गुड़, नमक तथा अन्य पोषक सामग्री नियमित रूप से उपलब्ध दिखाई जाती है, जबकि जमीनी स्तर पर पर्याप्त मात्रा में चारा उपलब्ध नहीं होता। यदि यह आरोप सही पाए जाते हैं तो इसका सीधा असर गोवंशों के स्वास्थ्य पर पड़ना स्वाभाविक है।

पशु विशेषज्ञों के अनुसार एक स्वस्थ गोवंश को प्रतिदिन संतुलित मात्रा में सूखा एवं हरा चारा, स्वच्छ पानी तथा आवश्यक खनिज तत्व मिलने चाहिए। इनमें कमी होने पर पशु तेजी से कमजोर होने लगते हैं।

पशु चिकित्सा व्यवस्था पर भी सवाल

आरोपों में यह भी कहा गया है कि कुछ स्थानों पर पशु चिकित्सकों की नियमित निगरानी नहीं हो रही तथा स्वास्थ्य परीक्षण केवल औपचारिकता बनकर रह गया है।

यदि बीमार पशुओं का समय पर उपचार न हो तो संक्रमण फैलने और मृत्यु दर बढ़ने की आशंका रहती है। सरकारी नियमों के अनुसार प्रत्येक गोशाला का नियमित स्वास्थ्य परीक्षण, टीकाकरण तथा उपचार सुनिश्चित किया जाना चाहिए।

पहाड़ी ब्लॉक की कलवारा बुजुर्ग गोशाला चर्चा में

पहाड़ी विकासखंड स्थित कलवारा बुजुर्ग गोशाला में कई गोवंशों की मृत्यु होने तथा ग्राम प्रधान, सचिव और संबंधित पशु चिकित्सा अधिकारी पर कार्रवाई न होने के आरोप लगाए गए हैं। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि स्वतंत्र रूप से नहीं हुई है। इसलिए निष्पक्ष जांच के बाद ही वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।

प्रशासन की भूमिका क्यों महत्वपूर्ण?

ऐसे मामलों में जिला प्रशासन की जिम्मेदारी सबसे महत्वपूर्ण हो जाती है। प्रशासन को चाहिए कि—

  • सभी गोशालाओं का औचक निरीक्षण कराया जाए।
  • वास्तविक गोवंशों की गणना कराई जाए।
  • सीसीटीवी एवं डिजिटल रिकॉर्ड व्यवस्था लागू की जाए।
  • चारा खरीद एवं खर्च का सामाजिक ऑडिट कराया जाए।
  • दोषी पाए जाने वाले अधिकारियों एवं संचालकों पर कार्रवाई की जाए।

पारदर्शिता बढ़ाने के लिए निरीक्षण रिपोर्ट सार्वजनिक करना भी आवश्यक माना जा रहा है।

किसानों और ग्रामीणों की चिंता

ग्रामीण क्षेत्रों में आवारा गोवंश पहले से ही बड़ी समस्या बने हुए हैं। यदि गोशालाओं में दर्ज पशु भी खुले घूमते मिलें तो किसानों की फसलें लगातार नुकसान झेलती हैं। इससे सरकार की संरक्षण नीति का उद्देश्य कमजोर पड़ता है और ग्रामीणों में असंतोष बढ़ता है।

ग्रामीणों का कहना है कि गोशालाएं केवल कागजों पर नहीं बल्कि वास्तविक संरक्षण केंद्र के रूप में संचालित होनी चाहिए।

समाधान क्या हो?

विशेषज्ञों के अनुसार निम्नलिखित कदम स्थिति सुधार सकते हैं—

  • प्रत्येक गोवंश की डिजिटल ट्रैकिंग।
  • जीपीएस एवं टैग आधारित निगरानी।
  • मासिक मेडिकल ऑडिट।
  • चारा वितरण की ऑनलाइन मॉनिटरिंग।
  • सामाजिक संगठनों एवं पशु प्रेमियों की भागीदारी।
  • हेल्पलाइन एवं शिकायत पोर्टल का प्रभावी संचालन।
  • प्रत्येक गोशाला का सार्वजनिक निरीक्षण कैलेंडर।

गोवंश संरक्षण केवल धार्मिक या सामाजिक भावना का विषय नहीं बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही का भी प्रश्न है। यदि किसी भी गोशाला में गोवंशों के साथ लापरवाही हो रही है, सरकारी धन का दुरुपयोग हो रहा है या रिकॉर्ड में अनियमितता बरती जा रही है, तो इसकी निष्पक्ष जांच और दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई आवश्यक है।

हालांकि, पोस्टर में लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि उपलब्ध नहीं है। इसलिए प्रशासन द्वारा तथ्यों की पारदर्शी जांच कर वास्तविक स्थिति सार्वजनिक करना आवश्यक होगा। यदि आरोप निराधार हैं तो उन्हें स्पष्ट किया जाए और यदि सही हैं तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए। यही गोवंश संरक्षण की भावना और सुशासन दोनों के हित में होगा।

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