पनगोत्रा की चिट्ठी ; धर्म, अध्यात्म और जागरूकता : क्या करोड़ों अनुयायी समाज को बेहतर बना पाए हैं?
✍️ केवल कृष्ण पनगोत्रा (स्वतंत्र लेखक-पत्रकार)
“हर गली में खुदाओं की भीड़ देखकर!
असली खुदा मेरे घर से चला गया!!”
प्रिय पाठकों
ये दो पंक्तियाँ किसी ग़ज़ल का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि एक ऐसे विचार की अभिव्यक्ति हैं जो आज के सामाजिक और धार्मिक परिदृश्य पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है। इन पंक्तियों के पीछे छिपा दर्द केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि उस पूरे समाज का है जो धर्म के नाम पर पहले से अधिक धार्मिक दिखाई देता है, लेकिन भीतर से कहीं अधिक अस्थिर, असहिष्णु और विभाजित होता जा रहा है।
कुछ समय पहले मैं ओशो के विचारों को पढ़ रहा था। ओशो एक बेहद महत्वपूर्ण प्रश्न उठाते हैं। वे पूछते हैं—“यदि दुनिया में करोड़ों लोग धर्म का पालन कर रहे हैं, तो फिर अपराध, भ्रष्टाचार, हिंसा और शोषण क्यों बढ़ रहे हैं? समस्या धर्म में है या फिर बिना जागरूकता के उसके अंधानुकरण में?”
यह प्रश्न जितना सरल दिखाई देता है, उतना ही गहरा भी है।
धर्म बढ़ा, लेकिन इंसान क्यों खो गया?
आज चारों तरफ धर्म का बोलबाला दिखाई देता है। हर शहर में बड़े-बड़े आश्रम हैं, हर गली में कोई न कोई गुरु है, हर मंच पर आध्यात्मिक प्रवचन हो रहे हैं और सोशल मीडिया पर धर्म का प्रदर्शन लगातार बढ़ रहा है।
इसके बावजूद यदि हम समाज की स्थिति देखें तो तस्वीर चिंताजनक दिखाई देती है।
महिलाओं के खिलाफ अपराध कम नहीं हुए। बलात्कार और शोषण की घटनाएँ लगातार सामने आती हैं। भ्रष्टाचार आज भी व्यवस्था का हिस्सा बना हुआ है। अदालतों में लाखों मामले वर्षों से लंबित हैं। चोरी, लूट, हत्या और सामाजिक हिंसा के समाचार रोज़ अखबारों की सुर्खियाँ बनते हैं।
यदि धर्म का प्रभाव इतना व्यापक है तो फिर मनुष्य के भीतर परिवर्तन क्यों नहीं दिख रहा?
यह सवाल किसी धर्म विशेष पर नहीं, बल्कि धर्म के वर्तमान स्वरूप पर है।
पूजा बढ़ी, लेकिन क्रोध कम क्यों नहीं हुआ?
आज लोग पहले से अधिक पूजा-पाठ कर रहे हैं। मंदिरों में भीड़ है, धार्मिक यात्राएँ बढ़ रही हैं, उपवास और अनुष्ठानों की संख्या भी बढ़ी है।
लेकिन क्या इससे मनुष्य का क्रोध कम हुआ?
क्या ईर्ष्या समाप्त हुई?
क्या लालच कम हुआ?
क्या परिवारों में प्रेम बढ़ा?
यदि ईमानदारी से उत्तर खोजा जाए तो अधिकांश मामलों में जवाब नकारात्मक ही मिलेगा
हम मंदिरों में दर्शन करने जाते हैं, लेकिन वहीं छोटी-सी बात पर झगड़ पड़ते हैं।
हम मस्जिद में जाकर इबादत करते हैं, लेकिन दूसरे समुदाय के प्रति घृणा रखते हैं।
हम चर्च में प्रार्थना करते हैं, लेकिन अहंकार से भरे रहते हैं।
हम आश्रमों में जाते हैं, लेकिन वहां भी राजनीति और गुटबाजी दिखाई देती है।
यदि धर्म के बाद भी वही क्रोध, वही हिंसा, वही लालच और वही घृणा बनी हुई है, तो फिर वास्तव में बदला क्या?
शायद केवल कपड़े बदले हैं।
शायद केवल नारे बदले हैं।
शायद केवल झंडे बदले हैं।
लेकिन मनुष्य नहीं बदला।
और जब मनुष्य नहीं बदलता, तब समझ लेना चाहिए कि धर्म हृदय में नहीं उतरा, केवल सिर पर बैठ गया है।
धर्म बुरा नहीं है, उसका प्रदर्शन समस्या है
यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि कोई भी धर्म बुरा नहीं होता। संसार के सभी धर्म प्रेम, करुणा, सत्य, सेवा और मानवता की शिक्षा देते हैं।
समस्या धर्म में नहीं है।
समस्या तब शुरू होती है जब धर्म जीवन का हिस्सा बनने के बजाय प्रदर्शन का साधन बन जाता है।
जब धर्म भीतर उतरता है तो वह मनुष्य को विनम्र बनाता है।
जब धर्म केवल बाहरी रूप में रह जाता है तो वह अहंकार को बढ़ाता है।
आज अक्सर धर्म को पहचान, शक्ति और संख्या के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। यही कारण है कि उसका मूल उद्देश्य पीछे छूटता जा रहा है।
सौ साल पहले का समाज क्या सिखाता है?
यदि हम लगभग सौ वर्ष पीछे जाएँ तो पाएँगे कि उस समय भी धर्म था और अधर्म भी था। लेकिन धर्म का स्वरूप आज की तुलना में अलग था।
मैं जिस गाँव में रहता हूँ, वहाँ कभी केवल एक मंदिर हुआ करता था। आज मंदिरों की संख्या लगातार बढ़ रही है और आगे भी बढ़ती जाएगी।
उस समय अधिकांश घरों में अलग से पूजा कक्ष नहीं होते थे। किसी कोने में एक छोटी चौकी पर ठाकुरजी विराजमान रहते थे या दीवार पर किसी देवी-देवता की तस्वीर टंगी होती थी।
लेकिन पूजा दिखावे की नहीं, भावना की होती थी।
धर्म का प्रदर्शन कम था, लेकिन उसका प्रभाव जीवन में अधिक दिखाई देता था।
धर्म तब दिल में रहता था
उस दौर में सामाजिक जीवन में सहयोग और संवेदनशीलता अधिक दिखाई देती थी।
यदि किसी घर में शादी होती तो पूरा गाँव उसकी तैयारी में हाथ बंटाता।
यदि किसी परिवार में फसल बोने या काटने के समय मृत्यु हो जाती, तो पूरा गाँव मिलकर उसकी खेती का काम पूरा कर देता।
लोग एक-दूसरे के सुख-दुख में सहभागी बनते थे।
यह केवल सामाजिक व्यवस्था नहीं थी, बल्कि धर्म का जीवंत स्वरूप था।
धर्म मंदिरों की संख्या से नहीं, बल्कि लोगों के व्यवहार से दिखाई देता था।
इसीलिए उस समय लगता था कि ईश्वर वास्तव में लोगों के घरों में रहता है।
लेकिन आज स्थिति उलटती दिखाई देती है।
घरों में देवी-देवताओं की तस्वीरें बढ़ गई हैं, पूजा स्थलों की संख्या बढ़ गई है, धार्मिक आयोजनों की भव्यता बढ़ गई है, लेकिन मानवीय संवेदनाएँ कम होती जा रही हैं।
“हर गली में खुदाओं की भीड़ देखकर!
असली खुदा मेरे घर से चला गया!!”
क्या धर्म का उद्देश्य भीड़ जुटाना है?
आज एक नया चलन दिखाई देता है।
लोग गर्व से कहते हैं—
“हमारे गुरु के इतने करोड़ फॉलोअर्स हैं।”
लेकिन क्या यही अध्यात्म है?
क्या अनुयायियों की संख्या ही किसी गुरु की सफलता का प्रमाण है?
यदि किसी आध्यात्मिक आंदोलन का मूल्यांकन केवल भीड़ के आधार पर किया जाए तो फिर उसमें और किसी राजनीतिक अभियान में क्या अंतर रह जाएगा?
धर्म का उद्देश्य भीड़ इकट्ठी करना नहीं होता।
धर्म का उद्देश्य मनुष्य को बेहतर बनाना होता है।
वास्तविक अध्यात्म व्यक्ति के भीतर परिवर्तन लाता है, न कि केवल उसके आसपास अनुयायियों की भीड़ खड़ी करता है।
ओशो के अनुसार कैसा होना चाहिए मनुष्य?
ओशो के विचारों का सार यही है कि धर्म का अंतिम उद्देश्य एक जागरूक मनुष्य का निर्माण है।
ऐसा मनुष्य—
जो प्रेम करना जानता हो।
जो करुणा से भरा हो।
जो सत्य के लिए अकेला खड़ा होने का साहस रखता हो।
जो स्त्री को वस्तु नहीं, चेतना के रूप में देखता हो।
जो शक्ति मिलने पर शोषण न करे।
जो भय के कारण नहीं, बल्कि समझ के आधार पर जीवन जिए।
यदि धर्म ऐसे मनुष्य तैयार नहीं कर रहा, तो फिर उसकी दिशा पर पुनर्विचार आवश्यक है।
जब धर्म अहंकार का आभूषण बन जाता है
दुर्भाग्य से आज अनेक लोग धर्म का उपयोग जागने के लिए नहीं, बल्कि अपने अहंकार को सजाने के लिए कर रहे हैं।
जब कोई व्यक्ति अपने गुरु के करोड़ों अनुयायियों की संख्या गिनाने लगता है, तो वह आध्यात्मिक भाषा नहीं बोल रहा होता।
वह बाज़ार की भाषा बोल रहा होता है।
वह वही भाषा है जिसमें कंपनियाँ अपने ग्राहकों की संख्या बताती हैं।
सत्य कभी संख्या पर निर्भर नहीं करता।
सत्य हमेशा चेतना पर आधारित होता है।
एक जागा हुआ मनुष्य करोड़ों सोए हुए लोगों से अधिक मूल्यवान हो सकता है।
धर्म और पाखंड का अंतर
ओशो बार-बार कहते थे कि भीड़ कभी धार्मिक नहीं होती।
धार्मिकता हमेशा व्यक्ति के भीतर जन्म लेती है।
कोई व्यक्ति भीड़ का हिस्सा होकर धार्मिक दिखाई दे सकता है, लेकिन वास्तव में धार्मिक तभी होता है जब उसके भीतर करुणा, प्रेम, संवेदनशीलता और जागरूकता का जन्म हो।
इसलिए अगली बार जब कोई व्यक्ति अपने गुरु के करोड़ों अनुयायियों का उल्लेख करे, तो उससे केवल एक प्रश्न पूछिए—
“तुम्हारे गुरु ने कितने अनुयायी नहीं, बल्कि कितने जागे हुए मनुष्य पैदा किए?”
यही वह प्रश्न है जो धर्म और पाखंड के बीच की रेखा स्पष्ट कर देता है।
धर्म का उद्देश्य मंदिरों, मस्जिदों, चर्चों और आश्रमों की संख्या बढ़ाना नहीं है।
धर्म का उद्देश्य मनुष्य के भीतर प्रेम, करुणा, सत्य और जागरूकता का जन्म करना है।
फॉलोअर्स बढ़ाना आसान है।
भीड़ जुटाना आसान है।
भव्य आयोजन करना आसान है।
लेकिन एक बेहतर मनुष्य बनाना और बनना सबसे कठिन कार्य है।
जिस दिन धर्म पुनः मनुष्य निर्माण का माध्यम बन जाएगा, उसी दिन समाज में वास्तविक परिवर्तन दिखाई देगा।
क्योंकि अंततः धर्म का मूल्य उसके अनुयायियों की संख्या से नहीं, बल्कि उनके चरित्र से तय होता है।
और जिसने मनुष्य नहीं बनाया, उसने धर्म का केवल व्यापार किया है, धर्म का जन्म नहीं।
(अगले सप्ताह रविवार को अगली चिट्ठी लेकर फिर उपस्थित होऊँगा)









यदि लेख का उद्देश्य सच बोलना और समाज को जगाना है, तो लेखक काफी हद तक सफल दिखते हैं। भाषा सीधी है, इसलिए बात समझ में आती है। पढ़ते समय कई बार लगा कि जो बातें लिखी गई हैं, वे हमारे आसपास भी देखने को मिलती हैं। लेकिन सिर्फ समस्या बताने से काम नहीं चलेगा। अगर अंत में यह भी बताया जाता कि आम आदमी क्या कर सकता है या समाधान क्या है, तो लेख और ज्यादा असरदार बनता।
एक साधारण पाठक होने के नाते मुझे यह लेख इसलिए अच्छा लगा क्योंकि इसमें घुमा-फिराकर बात नहीं की गई। हालांकि कुछ जगह तथ्य और उदाहरण थोड़े और विस्तार से दिए जाते तो बात पर भरोसा और मजबूत होता। आजकल लोग सोशल मीडिया पर बहुत कुछ पढ़ लेते हैं, इसलिए हर गंभीर बात के साथ ठोस प्रमाण भी जरूरी हैं।
कुल मिलाकर यह लेख सोचने पर मजबूर करता है। यह केवल पढ़कर भूल जाने वाला लेख नहीं है, बल्कि अपने आसपास की सच्चाइयों पर नजर डालने की प्रेरणा देता है। ऐसे विषयों पर बेबाक लिखना आसान नहीं होता, इसलिए लेखक की ईमानदार कोशिश की सराहना करनी चाहिए। उम्मीद है आगे भी ऐसे लेख आएंगे जिनमें सच के साथ-साथ समाधान का रास्ता भी उतनी ही मजबूती से सामने रखा जाएगा।
निर्मल मिश्रा, मधुबनी, बिहार
सेवा निवृत्त चतुर्थ वर्गीय कर्मचारी, बिहार सरकार
आपका हार्दिक धन्यवाद।
अगर यह लेख आपको सोचने पर मजबूर करता है तो मेरा प्रयास सफल हुआ। मान्यवर/महोदया,
मेरे एक अश’आर को आपने सार्थक बना दिया कि:
पिघला न सके जो जेहन में जमे बर्फ के समन्दर को!
क्यों न खाक ही कर दिया जाए ऐसे मुर्दा अदब को!
आपके सुझाव सर्वोपरि
केवल कृष्ण पनगोत्रा
जम्मू-कश्मीर
लेख पढ़कर लगा कि लेखक ने जिस मुद्दे को उठाया है, वह केवल किसी एक राज्य का नहीं बल्कि पूरे देश की चिंता का विषय है। मैं अधिक पढ़ी-लिखी नहीं हूं, लेकिन एक गृहिणी होने के नाते इतना जरूर समझती हूं कि समाज की समस्याओं पर खुलकर बात होना जरूरी है। इस लेख की सबसे अच्छी बात यह लगी कि इसमें कठिन शब्दों की बजाय सरल भाषा का प्रयोग किया गया है, जिससे सामान्य पाठक भी आसानी से बात समझ सके।
हाँ, कुछ जगह अगर उदाहरण और थोड़े स्पष्ट होते तो लेख का प्रभाव और बढ़ जाता। केवल समस्या बताने के बजाय उसके समाधान की दिशा में भी कुछ सुझाव दिए जाते तो पाठकों को और अधिक लाभ मिलता।
फिर भी, आज के समय में जब लोग सच कहने से कतराते हैं, ऐसे लेख पढ़कर विश्वास होता है कि अभी भी समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने वाले लेखक मौजूद हैं। लेखक की यह ईमानदार कोशिश सराहनीय है। उम्मीद है कि आगे भी वे ऐसे ही जनहित से जुड़े विषयों पर बेबाक और तथ्यपूर्ण लेख लिखते रहेंगे।
प्रमिला दास, पश्चिम बंगाल
आदरणीय प्रमिला जी,
आपने यह क्या कह दिया कि आप ज्यादा पढ़ी लिखी नही हैं। आप एक जागरूक गृहणी हैं और मेरी दृष्टि में एक ज्ञानवान इन्सान हैं। चिट्ठी को आपने सिर्फ पढ़ा नहीं, आत्मसात किया है।
हार्दिक धन्यवाद