20 अक्टूबर 2026 4:55 पूर्वाह्न

बदबख्त नशा और बाअदब नशेड़ी

शराब के नशे में खोया व्यक्ति काल्पनिक सफलता के सपने देखता हुआ, जबकि दूसरी ओर आर्थिक संकट और पारिवारिक परेशानियों से जूझता उसका वास्तविक जीवन दर्शाती संपादकीय फीचर इमेज।

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“बदबख्त नशा और बाअदब नशेड़ी” संपादकीय शराब के नशे से उत्पन्न भ्रम, झूठे आत्मविश्वास और उसके सामाजिक दुष्परिणामों का गहन विश्लेषण करता है। यह लेख बताता है कि किस प्रकार नशा व्यक्ति के विवेक, पारिवारिक जिम्मेदारियों और सामाजिक व्यवहार को प्रभावित करता है। व्यंग्य और सामाजिक यथार्थ के माध्यम से प्रस्तुत यह संपादकीय नशाखोरी की समस्या पर गंभीर चिंतन का अवसर प्रदान करता है।

“नशा अक्सर इंसान को उसकी वास्तविकता से दूर और भ्रम की दुनिया के करीब ले जाता है। जहां जिम्मेदारियां छोटी और सलाहें बड़ी दिखाई देने लगती हैं।”

— अनिल अनूप

मनुष्य की सबसे बड़ी विशेषता उसकी चेतना है। यही चेतना उसे सही और गलत में फर्क करना सिखाती है, उसे मर्यादित रखती है और समाज में उसकी प्रतिष्ठा का आधार बनती है। लेकिन जब यही चेतना किसी नशे की गिरफ्त में आ जाती है, तो सबसे पहले विवेक का अपहरण होता है। शराब का नशा तो विशेष रूप से ऐसा मायावी पर्दा है जो व्यक्ति को उसकी वास्तविक हैसियत, सीमाओं और जिम्मेदारियों से दूर ले जाकर एक काल्पनिक साम्राज्य का बादशाह बना देता है।

यह दृश्य किसी फिल्मी पटकथा का हिस्सा नहीं, बल्कि हमारे समाज का रोजमर्रा का यथार्थ है। महज 90 रुपये की देशी शराब की बोतल गटकने के बाद एक साधारण व्यक्ति अचानक वैश्विक अर्थव्यवस्था का विशेषज्ञ बन जाता है। वह अंबानी और अडानी के व्यापारिक फैसलों पर सवाल उठाने लगता है, मानो उसके पास अरबों-खरबों के कारोबार का कोई गुप्त फार्मूला हो। कोई प्रधानमंत्री को सुशासन का पाठ पढ़ाने लगता है, तो कोई देश की विदेश नीति पर ऐसी टिप्पणियां करता है जैसे संयुक्त राष्ट्र ने उसे विशेष सलाहकार नियुक्त कर रखा हो।

विडंबना यह है कि नशे की यह बहादुरी अक्सर केवल शब्दों तक सीमित रहती है। वास्तविक जीवन में वही व्यक्ति अपने घर की छोटी-छोटी जिम्मेदारियों से भागता नजर आता है। बच्चों की फीस, बूढ़े माता-पिता की दवा, परिवार की जरूरतें और अपने भविष्य की चिंता उसे उतनी गंभीर नहीं लगती, जितनी गंभीर उसे विश्व राजनीति और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था दिखाई देने लगती है।

शराब का नशा केवल शरीर को प्रभावित नहीं करता, यह आत्ममूल्यांकन की क्षमता को भी विकृत कर देता है। मनोविज्ञान की भाषा में कहें तो व्यक्ति अपनी क्षमताओं को वास्तविकता से कहीं अधिक आंकने लगता है। यही कारण है कि नशे में डूबा व्यक्ति स्वयं को असाधारण बुद्धिमान, प्रभावशाली और शक्तिशाली महसूस करता है। उसे लगता है कि दुनिया की सारी समस्याओं का समाधान उसी के पास है। लेकिन जैसे ही नशा उतरता है, वह फिर उसी साधारण यथार्थ में लौट आता है, जहां उसे अपनी सीमाओं और कमियों का सामना करना पड़ता है।

समाज में एक दिलचस्प विरोधाभास देखने को मिलता है। शराबी व्यक्ति नशे में अक्सर सबसे अधिक नैतिक भाषण देता है। भ्रष्टाचार पर लंबी-लंबी बातें करेगा, जबकि उधार लिए हुए पैसे लौटाने की नीयत नहीं रखता। ईमानदारी की कसमें खाएगा, जबकि अपने ही परिवार के विश्वास को बार-बार तोड़ चुका होता है। देशभक्ति के गीत गाएगा, लेकिन अपने नागरिक कर्तव्यों को निभाने में हमेशा पीछे रहेगा।

यही वह बिंदु है जहां “बदबख्त नशा” और “बाअदब नशेड़ी” का अंतर समझ में आता है। बदबख्त नशा वह है जो व्यक्ति की समझ छीन लेता है, उसे भ्रम और अहंकार के दलदल में धकेल देता है। जबकि बाअदब नशेड़ी एक व्यंग्यात्मक चरित्र है—वह जो नशे में भी अपने भीतर के संस्कारों और मर्यादाओं को पूरी तरह नहीं खोता। हालांकि वास्तविकता यह है कि शराब धीरे-धीरे व्यक्ति के उस बचे-खुचे संतुलन को भी समाप्त कर देती है।

आज गांवों की चौपालों से लेकर शहरों की गलियों तक शराब सामाजिक चर्चा का एक अनौपचारिक मंच बन चुकी है। शाम ढलते ही कई स्थानों पर ऐसे “विश्लेषक” पैदा हो जाते हैं जो देश-दुनिया की हर समस्या का समाधान चुटकियों में बता देते हैं। उनकी चर्चाओं में आर्थिक मंदी का इलाज भी होता है, क्रिकेट टीम के चयन की रणनीति भी और सरकार चलाने के सुझाव भी। दुर्भाग्य यह है कि इन चर्चाओं का निष्कर्ष कभी किसी रचनात्मक परिवर्तन में नहीं बदलता।

शराब व्यक्ति को केवल काल्पनिक बुद्धिजीवी नहीं बनाती, बल्कि उसे आत्मप्रवंचना का शिकार भी बना देती है। वह यह मानने लगता है कि उसकी सारी असफलताओं के लिए समाज, सरकार, परिवार या परिस्थितियां जिम्मेदार हैं। वह अपने भीतर झांकने की क्षमता खो देता है। आत्मालोचना की जगह आत्मदया ले लेती है और आत्मसुधार की जगह दूसरों को दोष देने की प्रवृत्ति विकसित हो जाती है।

भारतीय समाज में शराब की समस्या केवल स्वास्थ्य का प्रश्न नहीं है, यह सामाजिक और आर्थिक संकट भी है। लाखों परिवारों की खुशियां शराब की भेंट चढ़ जाती हैं। घर की आय का बड़ा हिस्सा नशे में खर्च हो जाता है। बच्चों की शिक्षा प्रभावित होती है। घरेलू हिंसा बढ़ती है। सड़क दुर्घटनाओं से लेकर अपराध तक में शराब की भूमिका बार-बार सामने आती है। फिर भी शराब को अक्सर एक निजी पसंद या मनोरंजन का साधन मानकर उसके व्यापक दुष्प्रभावों को नजरअंदाज कर दिया जाता है।

सबसे चिंताजनक बात यह है कि शराब व्यक्ति की संवेदनशीलता को कुंद कर देती है। वह अपने आसपास के लोगों की पीड़ा को समझने की क्षमता खोने लगता है। उसे अपने व्यवहार से होने वाली तकलीफों का एहसास नहीं रहता। परिवार धीरे-धीरे उससे दूर होने लगता है, लेकिन उसे लगता है कि दुनिया उसके खिलाफ साजिश कर रही है। यह भ्रम धीरे-धीरे अकेलेपन, अवसाद और सामाजिक अलगाव में बदल सकता है।

समस्या केवल शराब की नहीं, बल्कि उस मानसिकता की भी है जो नशे को मर्दानगी, आधुनिकता या सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक मानती है। विज्ञापनों, फिल्मों और लोकप्रिय संस्कृति ने लंबे समय तक शराब को आकर्षक जीवनशैली के रूप में प्रस्तुत किया। जबकि वास्तविकता इसके बिल्कुल विपरीत है। शराब अस्थायी उत्साह तो दे सकती है, लेकिन स्थायी समाधान कभी नहीं देती।

समाज को यह समझना होगा कि बहस करने की क्षमता और समझदारी दो अलग-अलग चीजें हैं। ऊंची आवाज में बोलना ज्ञान का प्रमाण नहीं होता। किसी उद्योगपति, राजनेता या व्यवस्था की आलोचना करना आसान है, लेकिन स्वयं अपने जीवन को व्यवस्थित और अनुशासित बनाना कहीं अधिक कठिन कार्य है। नशे में व्यक्ति अक्सर पहले काम को चुनता है और दूसरे से बचता है।

दरअसल, असली बहादुरी शराब के नशे में दुनिया बदलने की बातें करने में नहीं, बल्कि बिना किसी नशे के अपनी कमजोरियों का सामना करने में है। असली क्रांति सरकार को सलाह देने से पहले स्वयं को सुधारने में है। असली बुद्धिमानी अंबानी या अडानी के कारोबार का विश्लेषण करने में नहीं, बल्कि अपने घर की आर्थिक स्थिति को बेहतर बनाने में है।

आज जरूरत इस बात की है कि हम नशे के पीछे छिपे सामाजिक और मनोवैज्ञानिक कारणों को समझें। युवाओं को स्वस्थ मनोरंजन, सकारात्मक संगति और रचनात्मक अवसर उपलब्ध कराएं। परिवारों में संवाद बढ़े, शिक्षा में जीवन-मूल्यों को महत्व मिले और समाज नशे को गौरव नहीं, बल्कि एक चुनौती के रूप में देखे।

अंततः, शराब का नशा व्यक्ति को कुछ घंटों के लिए काल्पनिक राजा बना सकता है, लेकिन जीवन की वास्तविक लड़ाइयां नशे के सहारे नहीं जीती जातीं। बदबख्त नशा इंसान को उसकी वास्तविकता से दूर ले जाता है, जबकि जागरूकता उसे स्वयं से मिलाती है। इसलिए जरूरी है कि हम उस क्षणिक भ्रम से बाहर निकलें जिसमें 90 रुपये की बोतल किसी को विश्व अर्थव्यवस्था का विशेषज्ञ और शासन का सलाहकार बना देती है।

क्योंकि इतिहास गवाह है कि समाजों का निर्माण नशे में दिए गए भाषणों से नहीं, बल्कि होश में किए गए कर्मों से होता है।

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