हाथ में लाठी, झुकी कमर और सिस्टम की बेरुखी… 70 साल के बुजुर्ग की पुकार- “मैं जिंदा हूं साहब!”
ठाकुर बख्श सिंह की रिपोर्ट
उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले से सामने आया एक मामला सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस दर्दनाक सच को उजागर करता है, जहां सरकारी फाइलों में इंसान की सांसों से ज्यादा अहमियत मुहर और दस्तखत की रह जाती है। जिस व्यक्ति ने पूरी जिंदगी मेहनत करके अपना घर-परिवार बसाया, खेत जोते, समाज में अपनी पहचान बनाई, उसी को सरकारी कागजों में “मृत” घोषित कर दिया गया। और फिर शुरू हुआ एक जिंदा आदमी का खुद को जिंदा साबित करने का संघर्ष।
यह कहानी है फतेहपुर जिले की खागा तहसील क्षेत्र के वालीपुर एकडला गांव निवासी लगभग 70 वर्षीय बुजुर्ग भूरा की, जिनकी कमर उम्र के बोझ से झुक चुकी है, हाथों में लाठी का सहारा है, लेकिन आंखों में अब भी न्याय की उम्मीद बाकी है। शनिवार को आयोजित संपूर्ण समाधान दिवस में जब वह कांपते कदमों से जिलाधिकारी निधि गुप्ता वत्स के सामने पहुंचे तो उनकी जुबान से निकले शब्दों ने पूरे सभागार को कुछ पल के लिए सन्न कर दिया।
उन्होंने कहा— “साहब… मैं मुर्दा नहीं, जिंदा हूं…”
यह सुनते ही वहां मौजूद अधिकारी भी स्तब्ध रह गए। जिलाधिकारी निधि गुप्ता वत्स ने जब पूरा मामला सुना तो उनका चेहरा भी सख्त हो गया। उन्होंने तत्काल संबंधित कर्मचारियों को फटकार लगाई और मामले की जांच के आदेश दिए।
सरकारी कागजों में ‘मौत’, जमीन भी दूसरे के नाम
भूरा का आरोप है कि तहसील के कुछ कर्मचारियों और लेखपाल की मिलीभगत से उन्हें सरकारी अभिलेखों में मृत घोषित कर दिया गया। यही नहीं, उनकी करीब एक बीघा दो बिस्वा जमीन भी दूसरे व्यक्ति के नाम वरासत कर दी गई।
सोचिए, एक ऐसा व्यक्ति जो रोज गांव की गलियों में चलता दिखाई देता है, लोगों से मिलता-जुलता है, अपने खेतों की चिंता करता है, उसे सरकारी दस्तावेजों में मर चुका बताया गया। और इसी आधार पर उसकी जमीन किसी और के नाम चढ़ा दी गई।
यह मामला सिर्फ एक व्यक्ति की जमीन का नहीं, बल्कि पूरे राजस्व तंत्र की पारदर्शिता और जवाबदेही पर सवाल खड़े करता है। आखिर ऐसा कैसे हो सकता है कि बिना सत्यापन के किसी जीवित व्यक्ति को मृत घोषित कर दिया जाए? क्या सरकारी रिकॉर्ड अपडेट करने से पहले जमीनी जांच नहीं होती? क्या अधिकारियों की जिम्मेदारी सिर्फ फाइलों तक सीमित रह गई है?
न्याय पाने के लिए दफ्तर-दफ्तर भटका बुजुर्ग
भूरा बताते हैं कि जब उन्हें इस फर्जीवाड़े की जानकारी हुई तो उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। पहले तो उन्हें यकीन ही नहीं हुआ कि सरकारी रिकॉर्ड में उन्हें मृत दिखाया जा चुका है। लेकिन जब उन्होंने तहसील पहुंचकर दस्तावेज देखे तो उनकी आंखें भर आईं। जिस व्यक्ति ने जिंदगी भर अपनी जमीन को अपनी मेहनत से सींचा, उसी को यह बताया गया कि वह अब “जिंदा” नहीं है।
इसके बाद उन्होंने न्याय की उम्मीद में सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने शुरू किए। कभी लेखपाल के पास गए, कभी कानूनगो के पास, तो कभी तहसील के बाबुओं के सामने हाथ जोड़ते रहे। लेकिन हर जगह उन्हें सिर्फ आश्वासन मिला, समाधान नहीं।
बुजुर्ग की उम्र और हालत ऐसी नहीं कि वह रोज सरकारी दफ्तरों की सीढ़ियां चढ़ सके, लेकिन मजबूरी इंसान से सब कुछ करवा देती है। लाठी टेकते हुए वह कई दिनों तक भटकते रहे। आखिरकार शनिवार को आयोजित संपूर्ण समाधान दिवस में उन्होंने जिलाधिकारी के सामने अपनी पीड़ा रखी।
डीएम भी हुईं नाराज, जांच के आदेश
जब जिलाधिकारी निधि गुप्ता वत्स ने बुजुर्ग की पूरी बात सुनी तो उन्होंने मामले को बेहद गंभीर माना। उन्होंने मौके पर मौजूद अधिकारियों को कड़ी फटकार लगाते हुए पूछा कि आखिर किस आधार पर एक जीवित व्यक्ति को मृत घोषित किया गया?
डीएम ने तत्काल जांच के आदेश देते हुए दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई का आश्वासन दिया। उन्होंने कहा कि किसी भी निर्दोष व्यक्ति के साथ अन्याय नहीं होने दिया जाएगा और वृद्ध को हर हाल में न्याय दिलाया जाएगा।
जिलाधिकारी की सख्ती के बाद तहसील प्रशासन में हड़कंप मच गया। संबंधित कर्मचारियों की भूमिका को लेकर सवाल उठने लगे हैं। अब यह जांच का विषय है कि यह सिर्फ लापरवाही थी या फिर किसी साजिश के तहत जमीन हड़पने की कोशिश की गई।
ग्रामीणों में भारी नाराजगी
इस घटना के सामने आने के बाद गांव और आसपास के क्षेत्रों में भी आक्रोश है। ग्रामीणों का कहना है कि अगर भूरा समय रहते जागरूक न होते तो शायद हमेशा के लिए अपनी जमीन से बेदखल हो जाते।
लोगों का कहना है कि तहसील स्तर पर भ्रष्टाचार और फर्जीवाड़े की शिकायतें अक्सर सामने आती रहती हैं, लेकिन कार्रवाई बहुत कम होती है। कई ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि राजस्व विभाग में बिना पैसे के काम होना मुश्किल होता जा रहा है और इसी का फायदा कुछ लोग उठाकर गरीबों और बुजुर्गों की जमीनों पर कब्जा करने की कोशिश करते हैं।
ग्रामीणों ने मांग की है कि मामले की निष्पक्ष जांच कर दोषियों को सख्त सजा दी जाए, ताकि भविष्य में किसी अन्य व्यक्ति के साथ ऐसा अन्याय न हो।
सिस्टम पर बड़ा सवाल
यह घटना एक बार फिर साबित करती है कि सरकारी तंत्र की छोटी सी लापरवाही भी किसी इंसान की पूरी जिंदगी तबाह कर सकती है। यदि किसी व्यक्ति को सरकारी रिकॉर्ड में मृत घोषित कर दिया जाए तो उसकी जमीन, बैंक खाते, पेंशन, राशन और अन्य अधिकार भी प्रभावित हो सकते हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या सरकारी रिकॉर्ड में बदलाव करना इतना आसान हो गया है कि किसी जीवित व्यक्ति को भी कागजों में मार दिया जाए?
विशेषज्ञ मानते हैं कि राजस्व रिकॉर्ड में पारदर्शिता और डिजिटल सत्यापन की मजबूत व्यवस्था बेहद जरूरी है। साथ ही ऐसे मामलों में जिम्मेदार कर्मचारियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई होनी चाहिए, ताकि सरकारी पदों का दुरुपयोग न हो सके।
एक जिंदा आदमी की लड़ाई
भूरा की कहानी सिर्फ एक व्यक्ति की कहानी नहीं है। यह उन हजारों गरीब, बुजुर्ग और कमजोर लोगों की आवाज है, जो सरकारी तंत्र की गलती या भ्रष्टाचार के कारण अपने ही अधिकारों के लिए लड़ने को मजबूर हो जाते हैं। हाथ में लाठी लेकर जिलाधिकारी के सामने खड़े उस बुजुर्ग की आवाज शायद बहुत धीमी थी, लेकिन उसमें व्यवस्था के खिलाफ एक बड़ा सवाल छिपा था— “अगर मैं जिंदा होकर भी सरकारी कागजों में मर चुका हूं, तो आखिर इस सिस्टम में इंसान की असली पहचान क्या है?”








