दहेज, रसूख और मौत : दो शहर, दो बेटियां, दो मौतें और दहेज प्रताड़ना की दो कहानियां, हिला देती है…
टिक्कू आपचे की रिपोर्ट
भारत में दहेज प्रताड़ना के मामलों पर हर साल हजारों रिपोर्ट दर्ज होती हैं। कानून सख्त हैं, महिला सुरक्षा के दावे बुलंद हैं, लेकिन इसके बावजूद बेटियां आज भी शादी के बाद अपने ही घरों में असुरक्षित महसूस कर रही हैं। भोपाल की ट्विशा शर्मा और ग्रेटर नोएडा की दीपिका नागर की मौत ने एक बार फिर समाज के सामने वही भयावह सवाल खड़ा कर दिया है—क्या बेटियों की जिंदगी आज भी दहेज और रसूख के बीच फंसकर रह गई है?
दो अलग-अलग शहर, दो अलग परिवार, दो अलग घटनाएं… लेकिन कहानी लगभग एक जैसी। शादी के कुछ महीनों बाद प्रताड़ना, दहेज की मांग, शरीर पर चोटों के निशान, रसूखदार ससुराल और फिर रहस्यमयी मौत। इन दोनों घटनाओं ने देशभर में लोगों को झकझोर दिया है।
भोपाल की ट्विशा शर्मा: शादी के पांच महीने बाद मौत
नोएडा की रहने वाली 31 वर्षीय ट्विशा शर्मा की शादी दिसंबर 2025 में भोपाल निवासी समर्थ सिंह से हुई थी। समर्थ सिंह पेशे से क्रिमिनल लॉयर है और उसकी मां गिरिबाला सिंह रिटायर्ड जज रह चुकी हैं। परिवार शिक्षित, प्रतिष्ठित और प्रभावशाली माना जाता है।
बताया गया कि ट्विशा और समर्थ की मुलाकात मैट्रिमोनियल वेबसाइट ‘शादी डॉट कॉम’ के जरिए हुई थी। शुरुआती दिनों में सबकुछ सामान्य दिखाई दिया। दोनों परिवारों ने इस रिश्ते को बेहद खुशी के साथ स्वीकार किया था। लेकिन शादी के कुछ समय बाद हालात बदलने लगे।
ट्विशा के पिता नवनिधि शर्मा का आरोप है कि उनकी बेटी को लगातार दहेज के लिए प्रताड़ित किया जाने लगा। मानसिक दबाव, ताने और घरेलू हिंसा धीरे-धीरे उसकी जिंदगी को तोड़ने लगे।
मौत से पहले मां को किया आखिरी कॉल
12 मई 2026 की रात करीब 10 बजे ट्विशा ने अपनी मां को फोन किया। यह कॉल अब इस मामले का सबसे दर्दनाक हिस्सा बन चुकी है। परिवार के मुताबिक ट्विशा ने रोते हुए कहा था कि उसे बहुत प्रताड़ित किया जा रहा है और अब वह यह सब सहन नहीं कर पा रही है।
बातचीत के दौरान ही उसका पति समर्थ कमरे में आ गया। इसके कुछ समय बाद ट्विशा की सास गिरिबाला सिंह ने फोन कर बताया कि ट्विशा को भोपाल एम्स ले जाया जा रहा है क्योंकि वह सांस नहीं ले रही है। कुछ ही देर में खबर आई कि ट्विशा ने कथित तौर पर फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली।
पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने बढ़ाए सवाल
पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत का कारण फांसी बताया गया, लेकिन ट्विशा के शरीर पर चोट के कई निशान मिलने से मामला और गंभीर हो गया। परिवार का आरोप है कि केवल आत्महत्या की कहानी पर भरोसा नहीं किया जा सकता।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि ट्विशा का शव कई दिनों तक भोपाल एम्स की मर्चुरी में रखा रहा। परिवार दोबारा पोस्टमार्टम की मांग पर अड़ा हुआ है। उनका कहना है कि जब तक निष्पक्ष जांच नहीं होगी, वे अंतिम संस्कार नहीं करेंगे। परिवार चाहता है कि दोबारा पोस्टमार्टम दिल्ली एम्स में कराया जाए ताकि किसी भी प्रकार के प्रभाव या दबाव की संभावना खत्म हो सके।
रसूख का डर क्यों सता रहा है परिवार को?
ट्विशा का मामला केवल एक दहेज हत्या या आत्महत्या का मामला नहीं बनकर रह गया है। यह अब न्याय व्यवस्था पर भरोसे की परीक्षा भी बन चुका है। परिवार का आरोप है कि ससुराल पक्ष का प्रभाव इतना ज्यादा है कि निष्पक्ष जांच प्रभावित हो सकती है। ट्विशा की सास एक रिटायर्ड जज हैं और पति क्रिमिनल लॉयर। ऐसे में परिवार को डर है कि कहीं कानूनी प्रक्रिया को प्रभावित न कर दिया जाए।
इसी डर की वजह से ट्विशा के पिता ने मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव के ओएसडी से मुलाकात कर मामले की सुनवाई दूसरे राज्य में कराने की मांग की है। यह मांग अपने आप में बताती है कि परिवार को स्थानीय जांच एजेंसियों पर कितना भरोसा है और कितना डर।
ग्रेटर नोएडा की दीपिका नागर: 14 महीने में खत्म हो गई शादी
भोपाल की घटना अभी शांत भी नहीं हुई थी कि ग्रेटर नोएडा से एक और दिल दहला देने वाली खबर सामने आ गई। दीपिका नागर की शादी करीब 14 महीने पहले ईकोटेक-3 थाना क्षेत्र के जलपुरा निवासी ऋतिक से हुई थी। परिवार ने शादी में करोड़ों रुपये खर्च किए थे। पिता संजय के मुताबिक उन्होंने स्कॉर्पियो गाड़ी, सोना-चांदी और अन्य सामान सहित भरपूर दहेज दिया था।
लेकिन आरोप है कि शादी के कुछ समय बाद ही दीपिका पर फॉर्च्यूनर गाड़ी और 50 लाख रुपये लाने का दबाव बनाया जाने लगा।दीपिका सबकुछ चुपचाप सहती रही।
मौत से कुछ घंटे पहले पिता को बताई थी प्रताड़ना
17 मई 2026 को दीपिका ने अपने पिता को फोन किया। उसने बताया कि ससुराल वाले उसके साथ मारपीट कर रहे हैं और लगातार रुपये व गाड़ी की मांग कर रहे हैं।
पिता संजय उसी दिन बेटी की ससुराल पहुंचे। उन्होंने परिवार से बातचीत की और मामला शांत कराने की कोशिश की। शाम को वे वापस लौट आए। लेकिन रात में फोन आया कि दीपिका छत से गिर गई है। जब परिवार अस्पताल पहुंचा तो जो दृश्य सामने था, उसने सबको हिला दिया।
शरीर पर चोटों के निशान क्या कह रहे हैं?
दीपिका के चाचा सुनील के अनुसार, उसके पूरे शरीर पर गंभीर चोटों के निशान थे। परिवार का आरोप है कि उसे बुरी तरह पीटा गया था। यह मामला अब केवल हादसे या आत्महत्या की सीमा से बाहर निकल चुका है। पुलिस ने कार्रवाई करते हुए पति ऋतिक और ससुर मनोज को गिरफ्तार कर लिया है। हालांकि परिवार का कहना है कि असली न्याय तब होगा जब पूरे नेटवर्क की जांच होगी और किसी भी प्रभावशाली व्यक्ति को बचने नहीं दिया जाएगा।
दो घटनाएं, एक जैसी कहानी
अगर ट्विशा और दीपिका के मामलों को ध्यान से देखा जाए तो कई समानताएं सामने आती हैं—
- दोनों की शादी को ज्यादा समय नहीं हुआ था
- दोनों पर दहेज के लिए दबाव बनाया जा रहा था
- दोनों ने परिवार को प्रताड़ना की जानकारी दी थी
- दोनों की मौत संदिग्ध परिस्थितियों में हुई
- दोनों के शरीर पर चोटों के निशान मिले
- दोनों परिवारों को रसूख के कारण न्याय प्रभावित होने का डर है
यह समानता केवल संयोग नहीं लगती। यह उस सामाजिक ढांचे की तस्वीर है जहां दहेज अब भी शादी का “अनकहा सौदा” बना हुआ है।
क्या पढ़े-लिखे और प्रतिष्ठित परिवारों में भी सुरक्षित नहीं हैं बेटियां?
इन दोनों मामलों ने एक और भ्रम तोड़ा है कि केवल गरीब या अशिक्षित परिवारों में ही दहेज प्रताड़ना होती है। ट्विशा का मामला एक रिटायर्ड जज और वकील परिवार से जुड़ा है। दीपिका का मामला भी प्रभावशाली परिवार से जुड़ा बताया जा रहा है।
इससे यह साफ होता है कि समस्या केवल आर्थिक नहीं, मानसिक और सामाजिक भी है। समाज का बड़ा हिस्सा आज भी बहू को इंसान नहीं बल्कि “लेन-देन” से जुड़ी वस्तु की तरह देखता है।
दहेज कानून होने के बावजूद क्यों नहीं रुक रहे मामले?
भारत में दहेज प्रतिषेध अधिनियम 1961 लागू है। आईपीसी की धारा 498ए और 304बी जैसे कानून महिलाओं को सुरक्षा देने के लिए बनाए गए हैं।
इसके बावजूद हर साल हजारों महिलाएं दहेज प्रताड़ना का शिकार होती हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़े बताते हैं कि देश में लगभग हर घंटे दहेज से जुड़ी एक महिला की मौत होती है।
सबसे बड़ी समस्या यह है कि ज्यादातर मामलों में प्रताड़ना धीरे-धीरे शुरू होती है। लड़की सामाजिक बदनामी, परिवार टूटने के डर और भविष्य की चिंता में चुप रहती है। जब तक परिवार को असलियत पता चलती है, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।
समाज की चुप्पी भी अपराध है
दहेज केवल लेने वाले का अपराध नहीं है। यह उस समाज की भी विफलता है जो इसे सामान्य मानता है। जब शादी में गाड़ियों, नकदी और महंगे उपहारों की चर्चा “स्टेटस” बन जाती है, तब दहेज संस्कृति मजबूत होती है। बहुत से परिवार बेटियों की खुशी के नाम पर सबकुछ सह लेते हैं। वे यह सोचकर चुप रहते हैं कि समय के साथ हालात सुधर जाएंगे। लेकिन कई बार यह चुप्पी बेटियों की जिंदगी छीन लेती है।
क्या बेटियों की सुरक्षा सिर्फ कानून से संभव है?
इन घटनाओं ने एक बार फिर साबित किया है कि केवल कानून बना देने से समस्या खत्म नहीं होती। जरूरत है सामाजिक सोच बदलने की।
- बेटियों को आर्थिक रूप से मजबूत बनाना होगा
- शादी को सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रदर्शन बनाने की मानसिकता खत्म करनी होगी
- दहेज मांगने वालों का सामाजिक बहिष्कार होना चाहिए
- प्रताड़ना के शुरुआती संकेतों को गंभीरता से लेना होगा
- परिवारों को “समझौता कर लो” वाली सोच छोड़नी होगी
न्याय की लड़ाई अभी बाकी है
ट्विशा शर्मा और दीपिका नागर अब इस दुनिया में नहीं हैं। लेकिन उनकी मौत ने हजारों परिवारों के भीतर बैठे डर और दर्द को बाहर ला दिया है।
अब सवाल केवल इन दो मामलों का नहीं है। सवाल यह है कि क्या बेटियों को शादी के बाद सुरक्षित जीवन का अधिकार वास्तव में मिला है? क्या प्रभावशाली परिवारों के खिलाफ निष्पक्ष जांच संभव है? क्या दहेज को लेकर समाज की सोच बदलेगी? इन सवालों का जवाब अदालतें भी देंगी और समाज भी। लेकिन फिलहाल दो परिवार अपनी बेटियों की तस्वीरों के सामने बैठे सिर्फ एक ही उम्मीद लगाए हुए हैं—इंसाफ।








