बंथरा के खटोला ग्राम पंचायत में पुश्तैनी जमीन पर कथित कब्जे के आरोपों को लेकर विवाद गहराया। पीड़ित रामप्रसाद रावत ने ग्राम प्रधान संतोष राजपूत पर गंभीर आरोप लगाते हुए निष्पक्ष जांच की मांग की है।
बंथरा थाना क्षेत्र के ग्राम पंचायत खटोला में जमीन कब्जे के आरोपों को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। बीडीसी सदस्य रामप्रसाद रावत ने ग्राम प्रधान संतोष राजपूत पर अपनी पुश्तैनी भूमि पर अवैध कब्जा करने की कोशिश का आरोप लगाया है। पीड़ित का दावा है कि स्वास्थ्य केंद्र निर्माण के नाम पर उनकी जमीन की नाप-तौल की जा रही है, जबकि पंचायत विभाग ने ऐसे किसी प्रस्ताव से इनकार किया है। मामले में राजनीतिक द्वेष, भूमि विवाद और प्रशासनिक प्रक्रिया को लेकर कई सवाल उठ रहे हैं। पीड़ित परिवार ने निष्पक्ष जांच और कार्रवाई की मांग की है। यह मामला बंथरा और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में चर्चा का विषय बना हुआ है।
कमलेश कुमार चौधरी की रिपोर्ट
लखनऊ जनपद के बंथरा थाना क्षेत्र अंतर्गत ग्राम पंचायत खटोला में जमीन को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। गांव के निवासी एवं वर्तमान क्षेत्र पंचायत सदस्य (बीडीसी) रामप्रसाद रावत ने ग्राम प्रधान संतोष राजपूत और उनके सहयोगियों पर गंभीर आरोप लगाए हैं। पीड़ित परिवार का कहना है कि उनकी पुश्तैनी भूमि पर अवैध कब्जा करने की कोशिश की जा रही है और इसके लिए स्वास्थ्य केंद्र निर्माण का हवाला देकर दबाव बनाया जा रहा है।
मामले को लेकर गांव में चर्चा का माहौल है। वहीं पीड़ित पक्ष ने प्रशासन से निष्पक्ष जांच कर कार्रवाई की मांग की है। उनका कहना है कि यदि समय रहते हस्तक्षेप नहीं किया गया तो उनकी पैतृक संपत्ति पर कब्जा हो सकता है।
पुश्तैनी जमीन पर वर्षों से कर रहे हैं खेती
पीड़ित रामप्रसाद रावत के अनुसार ग्राम पंचायत खटोला स्थित गाटा संख्या 271 में लगभग 13,061 वर्ग फीट भूमि उनके पूर्वजों के समय से परिवार के कब्जे और उपयोग में रही है। इस भूमि पर उनके परिवार द्वारा वर्षों से खेती की जाती रही है और यह जमीन उनके जीवनयापन का महत्वपूर्ण आधार रही है।
रामप्रसाद का आरोप है कि कुछ समय के लिए परिवार के सदस्य गांव से बाहर रहे, जिसका लाभ उठाकर ग्राम प्रधान संतोष राजपूत और उनके परिजन उक्त भूमि की नाप-तौल कराने लगे। पीड़ित पक्ष का कहना है कि इस प्रक्रिया में किसी सक्षम राजस्व अधिकारी या प्रशासनिक अनुमति की जानकारी उन्हें नहीं दी गई।
लेखपाल को नहीं थी जानकारी, उठे सवाल
पीड़ित परिवार का दावा है कि जब उन्होंने संबंधित लेखपाल से इस संबंध में जानकारी प्राप्त करने का प्रयास किया तो उन्हें बताया गया कि उन्हें ऐसी किसी कार्रवाई की जानकारी नहीं है। इस जवाब के बाद पूरे मामले पर कई सवाल खड़े होने लगे हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि किसी सरकारी परियोजना या सार्वजनिक उपयोग के लिए भूमि का चयन किया जाता है तो उसकी स्पष्ट प्रशासनिक प्रक्रिया होती है, जिसमें राजस्व विभाग, ग्राम पंचायत और संबंधित अधिकारियों की भूमिका निर्धारित होती है। ऐसे में बिना आधिकारिक सूचना के भूमि की नाप-तौल किए जाने की चर्चा ने ग्रामीणों को भी आश्चर्य में डाल दिया है।
स्वास्थ्य केंद्र निर्माण की चर्चा से बढ़ा विवाद
गांव के कुछ लोगों के माध्यम से पीड़ित परिवार को जानकारी मिली कि संबंधित भूमि पर स्वास्थ्य केंद्र स्थापित करने की योजना बनाई जा रही है। हालांकि इस संबंध में अब तक कोई आधिकारिक दस्तावेज, प्रस्ताव या शासनादेश सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आया है।
यही कारण है कि पीड़ित परिवार स्वास्थ्य केंद्र निर्माण के दावे को संदेह की दृष्टि से देख रहा है। उनका आरोप है कि स्वास्थ्य केंद्र का नाम लेकर उनकी भूमि पर कब्जा करने की कोशिश की जा रही है।
रामप्रसाद रावत का कहना है कि यदि वास्तव में किसी सरकारी योजना के अंतर्गत स्वास्थ्य केंद्र बनाया जाना है तो उसकी विधिवत प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए और संबंधित भूमि के स्वामित्व, अधिग्रहण तथा मुआवजे की कानूनी प्रक्रिया पूरी की जानी चाहिए।
राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता का भी लगाया आरोप
मामले में नया मोड़ तब आया जब रामप्रसाद रावत ने राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने बताया कि वह ग्राम पंचायत क्षेत्र से पांच बार क्षेत्र पंचायत सदस्य (बीडीसी) का चुनाव जीत चुके हैं और वर्तमान में भी अपने पद पर कार्यरत हैं।
उनका आरोप है कि इसी राजनीतिक प्रभाव और जनसमर्थन के कारण ग्राम प्रधान उनसे व्यक्तिगत और राजनीतिक दुश्मनी रखते हैं। पीड़ित का कहना है कि इसी वजह से उनकी जमीन को निशाना बनाया जा रहा है और उन्हें परेशान करने के लिए विभिन्न प्रकार के हथकंडे अपनाए जा रहे हैं।
रामप्रसाद ने आरोप लगाया कि उनके खिलाफ सुनियोजित तरीके से षड्यंत्र रचा जा रहा है ताकि उन्हें सामाजिक और राजनीतिक रूप से कमजोर किया जा सके।
पंचायत विभाग ने प्रस्ताव से किया इनकार
मामले की सच्चाई जानने के लिए मीडिया द्वारा ब्लॉक सरोजिनी नगर के सहायक पंचायत अधिकारी से भी संपर्क किया गया। फोन पर हुई बातचीत में अधिकारी ने बताया कि उनके स्तर से स्वास्थ्य केंद्र निर्माण के लिए ऐसा कोई प्रस्ताव तैयार नहीं किया गया है और न ही इस संबंध में कोई आदेश जारी किया गया है।
अधिकारी के इस बयान के बाद विवाद और गहरा गया है। यदि पंचायत विभाग के पास स्वास्थ्य केंद्र निर्माण का कोई प्रस्ताव नहीं है, तो फिर संबंधित भूमि की नाप-तौल और स्वास्थ्य केंद्र की चर्चा किस आधार पर की जा रही है, यह बड़ा सवाल बन गया है।
ग्रामीणों का कहना है कि प्रशासन को पूरे मामले की जांच कर वास्तविक स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए ताकि भ्रम और विवाद की स्थिति समाप्त हो सके।
निष्पक्ष जांच की मांग
पीड़ित परिवार ने जिला प्रशासन, राजस्व विभाग और पुलिस प्रशासन से पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है। उनका कहना है कि भूमि संबंधी विवादों में कानूनी प्रक्रिया का पालन अनिवार्य है और किसी भी व्यक्ति को दबाव या प्रभाव के बल पर दूसरे की संपत्ति पर कब्जा करने का अधिकार नहीं है।
रामप्रसाद रावत ने प्रशासन से अनुरोध किया है कि उनकी भूमि का रिकॉर्ड खंगाला जाए, राजस्व अभिलेखों की जांच की जाए तथा यदि किसी सरकारी परियोजना के लिए भूमि चिन्हित की गई है तो उसकी पूरी जानकारी सार्वजनिक की जाए।
प्रशासनिक हस्तक्षेप की जरूरत
ग्राम पंचायत खटोला का यह मामला अब केवल भूमि विवाद तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसमें राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप, प्रशासनिक प्रक्रिया और सरकारी योजनाओं के नाम पर भूमि उपयोग जैसे कई महत्वपूर्ण प्रश्न भी जुड़ गए हैं।
फिलहाल दोनों पक्षों के आरोपों के बीच सच क्या है, यह जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा। लेकिन पीड़ित परिवार के आरोपों और पंचायत विभाग के बयान ने मामले को गंभीर बना दिया है। ऐसे में आवश्यक है कि संबंधित प्रशासनिक अधिकारी मौके पर पहुंचकर तथ्यों की जांच करें और यदि किसी प्रकार की अनियमितता सामने आती है तो नियमानुसार कार्रवाई सुनिश्चित करें।
ग्रामीणों की भी यही अपेक्षा है कि मामले का निष्पक्ष समाधान निकले ताकि गांव में शांति और विश्वास का माहौल बना रहे तथा किसी भी नागरिक के वैधानिक अधिकारों का हनन न हो।