आलेख — अनिल अनूप
कुछ लोग परिचय के मोहताज होते हैं और कुछ परिचय से बाहर निकल जाते हैं। कुछ लोग अपने नाम के आगे इतने विशेषण जोड़ लेते हैं कि नाम पीछे छूट जाता है, जबकि कुछ ऐसे भी होते हैं जिनके पास कहने को बहुत कुछ होता है, लेकिन वे अपने बारे में कहने से बचते रहते हैं। वे भीड़ में दिखाई पड़ते हैं, पर भीड़ का हिस्सा नहीं होते। उनके आसपास लोग होते हैं, मगर उनकी दुनिया थोड़ी अलग चलती है। तरुण मोहम्मद भी ऐसी ही एक अजीब-सी हस्ती हैं। अजीब इसलिए नहीं कि उनमें कोई बनावटी रहस्य है, बल्कि इसलिए कि उनके व्यक्तित्व को किसी एक खाने में रख देना संभव नहीं। वे कलाकार हैं, निर्देशक हैं, लेखक हैं और पत्रकारिता-संपादन की दुनिया से भी उनका रिश्ता रहा है। लेकिन इन तमाम पहचानों के बावजूद उनकी सबसे बड़ी पहचान शायद यही है कि वे उस जमीन के आदमी हैं जिसने उन्हें बनाया है।
झारखंड का चाईबासा सिर्फ नक्शे पर दर्ज कोई शहर नहीं है। यह ऐसी धरती है जिसकी अपनी गंध है, अपना रंग है, अपनी बोली है, अपने जंगल हैं, अपने संघर्ष हैं और अपनी स्मृतियां हैं। आदिवासी बहुल इलाके की इस जमीन पर पला-बढ़ा आदमी अगर संवेदनशील हो जाए तो उसके भीतर का कलाकार केवल किताबों से नहीं बनता। उसे जीवन से बहुत कुछ सीखना पड़ता है। मिट्टी से, जंगल से, लोगों की आंखों से, रोजमर्रा की जद्दोजहद से और उन आवाजों से, जिन्हें मुख्यधारा अक्सर सुनना नहीं चाहती। तरुण मोहम्मद की रचनात्मकता को समझने के लिए शायद इसी जमीन को समझना जरूरी है। क्योंकि किसी कलाकार की असली पाठशाला कई बार वह जगह होती है जहां उसने पहली बार दुनिया को आंखें खोलकर देखा था।
तरुण के व्यक्तित्व की पहली खासियत उन्हें कलाकार और निर्देशक के रूप में देखने पर सामने आती है। कलाकार होना केवल अभिनय करना नहीं है और निर्देशक होना केवल कैमरे के पीछे खड़े होकर आदेश देना भी नहीं है। असली कलाकार वह होता है जो साधारण चीजों में असाधारण अर्थ खोज ले। असली निर्देशक वह होता है जो दूसरों के भीतर छिपी संभावना को पहचानकर उसे आकार दे सके। शब्दों को बोलने वाला अभिनेता बहुत मिल जाएगा, लेकिन शब्दों में जान डालने वाला कलाकार दुर्लभ होता है। इसी तरह कैमरे के सामने खड़ा होना आसान हो सकता है, मगर पूरी कहानी को अपने भीतर देख लेना और फिर उसे दूसरे लोगों की आंखों से दिखा देना निर्देशक का काम है।
तरुण की यही खूबी उन्हें सामान्य रचनात्मक व्यक्तियों से अलग करती है। उनके इशारे पर शब्द केवल शब्द नहीं रहते। वे दृश्य बनने लगते हैं। संवाद में धड़कन आने लगती है। पात्र कागज से निकलकर सामने खड़े होने लगते हैं। यही निर्देशन की असली ताकत है। निर्देशक का काम केवल यह बताना नहीं कि कौन कहां खड़ा होगा और कैमरा किस दिशा में जाएगा। निर्देशक को यह भी समझना होता है कि किसी दृश्य की आत्मा क्या है, किसी पात्र की चुप्पी में कितना अर्थ छिपा है और किसी संवाद को बोलते समय अभिनेता के चेहरे पर कितनी रोशनी या कितनी उदासी होनी चाहिए।
तरुण मोहम्मद के कलाकार होने का अर्थ इसी व्यापक अर्थ में समझा जाना चाहिए। वे कला को केवल प्रदर्शन की वस्तु नहीं मानते, बल्कि उसे जीवन को देखने का एक तरीका बनाते हैं। उनके भीतर का कलाकार आसपास के समाज को देखता है। वह मनुष्य को केवल उसके कपड़ों, जाति, धर्म, पद या पहचान से नहीं देखता। वह उसके भीतर छिपी कहानी को पकड़ने की कोशिश करता है। शायद इसी कारण उनका व्यक्तित्व चमकदार मंचीय उपस्थिति से अधिक उस व्यक्ति जैसा लगता है जो मंच के पीछे खड़ा होकर पूरे दृश्य को समझ रहा हो।
कला की दुनिया में एक विचित्र विडंबना है। यहां सबसे अधिक दिखाई देने वाले लोग हमेशा सबसे अधिक प्रभावशाली नहीं होते और जो लोग सबसे अधिक प्रभावशाली होते हैं, वे हमेशा सबसे अधिक दिखाई नहीं देते। तरुण इसी दूसरी श्रेणी के आदमी लगते हैं। उनकी चर्चा शायद हर जगह न हो, उनके नाम पर बड़े-बड़े आयोजन न हों, उनकी तस्वीरें रोज अखबारों में न छपती हों, लेकिन जिस व्यक्ति ने कला को जीवन की तरह जिया हो, उसकी उपस्थिति केवल प्रचार से तय नहीं होती। कुछ रचनात्मक लोग शोर से अपना स्थान बनाते हैं और कुछ अपने काम की चुप्पी से।
यहीं से तरुण मोहम्मद के व्यक्तित्व का दूसरा पक्ष सामने आता है—लेखक तरुण। कलाकार दृश्य को पकड़ता है और लेखक उस दृश्य के भीतर छिपे अर्थ को शब्द देता है। दोनों के बीच फर्क होते हुए भी एक गहरा रिश्ता है। कलाकार आंखों से देखता है, लेखक शब्दों से दिखाता है। निर्देशक दृश्य को व्यवस्थित करता है और लेखक विचार को। जब ये दोनों क्षमताएं एक ही व्यक्ति में मिलती हैं तो लेखन केवल सूचना या वर्णन नहीं रह जाता। उसमें दृश्यात्मकता आ जाती है। पाठक पढ़ते हुए चीजों को केवल समझता नहीं, उन्हें देखता भी है।
तरुण के लेखक रूप को इसी संदर्भ में देखना चाहिए। उनके लिए लेखन केवल कागज पर वाक्य लिख देना नहीं है। लिखना दरअसल उस अनुभव को पकड़ना है जो सामान्य बातचीत में छूट जाता है। एक लेखक को अपने समय की छोटी-छोटी घटनाओं में बड़ी कहानियां दिखाई देती हैं। सड़क किनारे बैठे आदमी की चुप्पी, किसी गांव की धूल, किसी शहर की भागदौड़, किसी स्त्री की आंखों में छिपा इंतजार, किसी मजदूर के हाथों की कठोरता या किसी कलाकार की असफलता—ये सब उसके लिए सामग्री बन जाते हैं।
चाईबासा जैसे इलाके से आने वाले लेखक के अनुभवों की जमीन भी स्वाभाविक रूप से अलग होती है। महानगर में बैठकर जंगल की कल्पना करना और जंगल के आसपास जीवन जीकर उसे महसूस करना दो अलग बातें हैं। आदिवासी समाज, प्रकृति, स्थानीय जीवन, संसाधनों के संघर्ष और बदलती दुनिया के बीच मनुष्य की स्थिति को देखने के लिए केवल किताबें पर्याप्त नहीं होतीं। वहां जीवन स्वयं एक किताब होता है। उसके पन्ने कभी जंगल में खुलते हैं, कभी बाजार में, कभी गांव की पगडंडी पर और कभी शहर की किसी छोटी-सी दुकान में।
तरुण की लेखकीय दृष्टि का महत्व इसीलिए और बढ़ जाता है कि वह एक ऐसे परिवेश से आती है जिसे अक्सर मुख्यधारा के विमर्श में केवल आंकड़ों या समस्याओं के रूप में देखा जाता है। लेकिन किसी जमीन को केवल गरीबी, पिछड़ेपन या आदिवासी पहचान से समझ लेना उस जमीन के साथ अन्याय है। वहां भी सपने हैं, प्रेम है, कला है, हास्य है, संघर्ष है, राजनीति है, लोकस्मृतियां हैं और मनुष्य की वही जिजीविषा है जो दुनिया के हर हिस्से में दिखाई देती है। लेखक का काम इन्हीं परतों को सामने लाना है।
एक अच्छे लेखक की पहचान यह नहीं कि उसने कितने कठिन शब्द लिखे। उसकी पहचान यह है कि उसने कितने साधारण अनुभवों को अर्थ दे दिया। तरुण की रचनात्मकता को इसी कसौटी पर देखना चाहिए। जिस व्यक्ति ने कलाकार की आंख, निर्देशक की दृष्टि और लेखक की कलम तीनों को साथ लेकर यात्रा की हो, उसकी भाषा में दृश्यात्मकता का आना स्वाभाविक है। उसके शब्दों में कैमरे की आंख भी हो सकती है और कहानीकार का धैर्य भी।
लेकिन तरुण मोहम्मद की कहानी अभी पूरी नहीं होती। उनके व्यक्तित्व का तीसरा और बेहद महत्वपूर्ण पक्ष है—संपादकीय अनुभव। किसी समय की लोकप्रिय पत्रिका ‘मेरी सहेली’ जैसे प्रकाशन के संपादकीय हिस्से से जुड़े रहना अपने आप में पत्रकारिता और प्रकाशन की दुनिया का एक अलग अनुभव है। संपादन का काम बाहर से देखने पर जितना सरल दिखाई देता है, भीतर से उतना ही कठिन होता है। लेखक अपनी रचना के साथ भावनात्मक रूप से जुड़ा होता है, लेकिन संपादक को रचना से एक दूरी बनाकर उसे देखना पड़ता है।
संपादक को शब्दों से अधिक पाठक की जरूरत समझनी पड़ती है। उसे यह तय करना पड़ता है कि कौन-सी सामग्री प्रकाशित होनी चाहिए, किस तरह प्रस्तुत होनी चाहिए और किस जगह भाषा को सरल करना जरूरी है। उसे शीर्षक में आकर्षण भी रखना होता है और सामग्री की गरिमा भी। उसे लेखक की आवाज को बचाते हुए संपादकीय कसौटी भी लागू करनी होती है। इसीलिए संपादन अपने आप में एक अलग कला है।
और जब कोई व्यक्ति कलाकार, निर्देशक और लेखक होने के बाद संपादन की दुनिया में जाता है, तो उसके भीतर एक चौथी दृष्टि पैदा होती है—दूसरों की रचना को देखने की दृष्टि। यही दृष्टि किसी रचनाकार को और परिपक्व बनाती है। वह केवल यह नहीं देखता कि उसने स्वयं क्या लिखा या बनाया, बल्कि यह भी देखता है कि दूसरे व्यक्ति की रचना में क्या संभावना है। वह वाक्य के पीछे की कमजोरी और विचार के भीतर छिपी ताकत दोनों को पहचानने लगता है।
‘मेरी सहेली’ जैसी लोकप्रिय पत्रिका का संपादकीय अनुभव इस दृष्टि से उल्लेखनीय है क्योंकि ऐसी पत्रिका का पाठक वर्ग व्यापक रहा है। लोकप्रिय प्रकाशन में संपादन केवल साहित्यिक शुद्धता का सवाल नहीं होता। वहां पाठक की रुचि, भाषा की सहजता, प्रस्तुति, विषय की उपयोगिता और सामग्री की पठनीयता—सबको एक साथ देखना पड़ता है। इस अनुभव से गुजरने वाला व्यक्ति शब्दों को केवल लिखना नहीं सीखता, बल्कि शब्दों की बाजार, समाज और पाठक के बीच यात्रा को भी समझता है।
यहीं तरुण मोहम्मद का व्यक्तित्व दिलचस्प हो जाता है। एक तरफ वह कलाकार है जो दृश्य को महसूस करता है, दूसरी तरफ निर्देशक है जो दृश्य को आकार देता है, तीसरी तरफ लेखक है जो अनुभव को शब्द देता है और चौथी तरफ संपादकीय अनुभव वाला व्यक्ति है जो शब्दों को पाठक तक पहुंचने की कसौटी पर परख चुका है। इन चारों अनुभवों का मेल किसी व्यक्ति को साधारण अर्थ में ‘बहुमुखी प्रतिभा’ कह देने से कहीं आगे ले जाता है।
फिर सवाल उठता है कि ऐसा व्यक्ति बहुत प्रसिद्ध क्यों नहीं है? शायद इसलिए कि प्रसिद्धि और प्रतिभा का संबंध उतना सीधा नहीं है जितना हम अक्सर मान लेते हैं। प्रसिद्धि कई बार मंच, समय, प्रचार, संस्थान, संपर्क और परिस्थितियों के सहारे बनती है। प्रतिभा का रास्ता अलग होता है। बहुत-से लोग अपने समय में पर्याप्त चर्चा नहीं पाते, लेकिन उनकी रचनात्मक उपस्थिति बाद में समझ में आती है। कुछ लोग लोकप्रिय होते हैं, कुछ प्रभावशाली; कुछ दोनों होते हैं और कुछ ऐसे भी होते हैं जिनकी कीमत उनके आसपास के लोग देर से समझते हैं।
तरुण मोहम्मद शायद इसी आखिरी किस्म की उस दुनिया से आते हैं जहां व्यक्ति अपनी उपलब्धियों का ढोल नहीं पीटता। वह काम करता है, आगे बढ़ जाता है और अगली रचना में लग जाता है। ऐसे लोगों की मुश्किल यह होती है कि वे स्वयं अपनी कहानी प्रचारित नहीं करते। इसलिए उनकी पहचान अक्सर उनके परिचितों की स्मृतियों, पुराने कामों और उन लोगों के अनुभवों में बिखरी रह जाती है जिनके साथ उन्होंने काम किया।
लेकिन किसी रचनात्मक व्यक्ति की असली परीक्षा यह नहीं है कि कितने लोग उसका नाम जानते हैं। असली सवाल यह है कि उसने कितने लोगों के भीतर कुछ छोड़ा। किसी अभिनेता की एक भूमिका किसी दर्शक को वर्षों तक याद रह सकती है। किसी निर्देशक का एक दृश्य किसी व्यक्ति की सोच बदल सकता है। किसी लेखक की एक पंक्ति कठिन समय में सहारा दे सकती है। किसी संपादक की एक सलाह किसी नए लेखक की दिशा बदल सकती है। अगर किसी व्यक्ति ने इन स्तरों पर कुछ किया है तो उसकी उपस्थिति केवल प्रसिद्धि के आंकड़ों से नहीं मापी जा सकती।
तरुण की कहानी में सबसे सुंदर बात शायद उनका नाम ही है—तरुण और मोहम्मद। दो शब्द, दो पहचानें और एक व्यक्ति। लेकिन यह नाम केवल नाम नहीं है। इसके भीतर उस भारत की तस्वीर भी दिखाई देती है जहां पहचानें एक-दूसरे से बातचीत करती हैं। कला किसी एक धर्म की संपत्ति नहीं होती, साहित्य किसी एक समुदाय का अधिकार नहीं होता और रचनात्मकता किसी एक भूगोल की बपौती नहीं होती। एक कलाकार की सबसे बड़ी पहचान उसकी संवेदना होती है।
तरुण मोहम्मद का जीवन इसी अर्थ में एक सांस्कृतिक पुल की तरह देखा जा सकता है। चाईबासा की धरती से निकलकर कला और संपादन की दुनिया तक पहुंचना केवल व्यक्तिगत यात्रा नहीं है। यह उस भारत की कहानी भी है जहां दूर-दराज के इलाके का आदमी अपनी प्रतिभा के बल पर बड़े सांस्कृतिक संसार का हिस्सा बन सकता है। यह यात्रा आसान रही होगी, ऐसा मान लेना भी उचित नहीं। छोटे शहर और महानगरीय रचनात्मक दुनिया के बीच हमेशा एक दूरी रही है। संसाधनों की कमी, अवसरों की सीमाएं और पहचान बनाने की कठिनाई—ये सब किसी भी कलाकार की यात्रा को प्रभावित करते हैं।
यही कारण है कि ‘जमीन की रगड़ खाकर तपा हुआ कलाकार’ कहना तरुण के संदर्भ में केवल प्रशंसा का वाक्य नहीं लगता। जमीन की रगड़ का अर्थ यहां संघर्ष भी है और अनुभव भी। जिस कलाकार ने जीवन को दूर से नहीं बल्कि करीब से देखा हो, उसकी रचना में कृत्रिम चमक कम और जीवन की गर्मी ज्यादा होती है। वह पात्रों को केवल बनाता नहीं, उन्हें समझता है। वह कहानी को केवल सजाता नहीं, उसके भीतर की धड़कन खोजता है।
निर्देशन में भी यही अनुभव काम आता है। एक निर्देशक यदि जीवन को नहीं समझता तो वह तकनीकी रूप से सुंदर दृश्य बना सकता है, लेकिन दृश्य के भीतर आत्मा डालना कठिन होगा। कैमरा सुंदर जगह दिखा सकता है, पर मनुष्य की पीड़ा नहीं समझ सकता। संवाद लिखा जा सकता है, मगर उसकी सच्चाई अभिनेता के चेहरे पर तभी आएगी जब निर्देशक उस भावना को खुद महसूस करता हो। तरुण का कलाकार पक्ष इसी संवेदनात्मक धरातल पर महत्वपूर्ण दिखाई देता है।
लेखक के रूप में भी उनका यही अनुभव उन्हें अलग बनाता है। लेखन में शब्दों की संख्या नहीं, अनुभव की गहराई मायने रखती है। कोई व्यक्ति हजारों शब्द लिखकर भी पाठक को खाली छोड़ सकता है और कोई छोटी-सी रचना से देर तक सोचने के लिए मजबूर कर सकता है। लेखक का काम केवल जानकारी देना नहीं है; कई बार उसका काम उस सवाल को जन्म देना है जिसे पाठक अपने भीतर लेकर घर जाए।
संपादक के रूप में तरुण ने शायद यह भी देखा होगा कि कितने अच्छे विचार खराब प्रस्तुति के कारण पाठक तक नहीं पहुंचते और कितनी सामान्य बात सही शब्दों में लिखे जाने पर प्रभाव पैदा कर देती है। यही संपादन की शिक्षा है—शब्दों को चमकाना नहीं, उनके भीतर छिपे अर्थ को पाठक तक सुरक्षित पहुंचाना। इस दृष्टि से संपादकीय अनुभव उनके लेखक और निर्देशक दोनों रूपों को प्रभावित करने वाला अनुभव रहा होगा।
उनकी कहानी का एक और पहलू उल्लेखनीय है—साधारण बने रहना। आज के समय में उपलब्धि के साथ उसका प्रचार लगभग अनिवार्य हो गया है। सोशल मीडिया ने व्यक्ति को अपनी ही उपलब्धियों का उद्घोषक बना दिया है। कौन कहां गया, किससे मिला, किस कार्यक्रम में बुलाया गया, किसने प्रशंसा की—सब कुछ सार्वजनिक है। ऐसे समय में कोई व्यक्ति अगर अपने काम को अपनी पहचान से बड़ा मानता है तो वह अपने आप में अलग दिखाई देता है।
तरुण की यही ‘साधारणता’ उनके व्यक्तित्व की सबसे असाधारण बात हो सकती है। वह उन लोगों में दिखाई देते हैं जिनके पास अपने बारे में कहने के लिए बहुत कुछ होता है, लेकिन वे खुद को केंद्र में रखने के बजाय अपने काम को आगे करते हैं। यह गुण हर कलाकार में नहीं मिलता। कलाकार के भीतर प्रसिद्ध होने की इच्छा स्वाभाविक है, मगर अपने काम को प्रसिद्धि से ऊपर रखना एक अलग तरह की परिपक्वता है।
किसी व्यक्ति को जानना और किसी व्यक्ति को समझना दो अलग बातें हैं। तरुण को शायद बहुत लोग नहीं जानते। लेकिन जिन्हें उनके काम, उनके शब्द, उनकी निर्देशन शैली या उनके संपादकीय अनुभव से गुजरने का अवसर मिला होगा, वे जानते होंगे कि ऐसे लोग धीरे-धीरे अपनी जगह बनाते हैं। उनका नाम शायद किसी दिन अचानक बहुत बड़े मंच पर दिखाई न दे, लेकिन उनकी रचनात्मकता उन लोगों की स्मृति में बनी रहती है जिनके जीवन को उन्होंने छुआ है।
यही कारण है कि तरुण मोहम्मद को ‘अजीब-सी हस्ती’ कहना उचित लगता है। अजीब इसलिए कि वह किसी एक परिभाषा में समाते नहीं। कलाकार कहिए तो लेखक सामने आ जाता है। लेखक कहिए तो निर्देशक दिखाई देता है। निर्देशक कहिए तो संपादकीय अनुभव दस्तक देता है। संपादक कहिए तो चाईबासा की जमीन से आया वह संवेदनशील आदमी सामने खड़ा हो जाता है। और जब इन सबको एक साथ देखने की कोशिश कीजिए तो लगता है कि शायद वह किसी पद या पेशे से अधिक एक मनःस्थिति है।
ऐसे व्यक्तियों की सबसे बड़ी ताकत यह होती है कि वे समय के साथ बदलते हुए भी अपनी जड़ों को पूरी तरह नहीं छोड़ते। शहर उन्हें नए अनुभव देता है, लेकिन उनकी जमीन उन्हें देखने की दृष्टि देती है। आधुनिकता उन्हें तकनीक देती है, मगर मिट्टी उन्हें संवेदना देती है। यही संतुलन रचनात्मकता को गहराई देता है।
चाईबासा की धरती और तरुण मोहम्मद की रचनात्मक यात्रा को साथ रखकर देखें तो एक सुंदर तस्वीर बनती है। एक तरफ जंगलों, पहाड़ियों और आदिवासी जीवन की स्मृतियों वाली धरती है और दूसरी तरफ शब्द, दृश्य, कैमरा, कहानी और संपादन की दुनिया। इन दोनों के बीच पुल बनता है मनुष्य का अनुभव। तरुण उसी पुल पर खड़े दिखाई देते हैं।
उनकी कहानी हमें यह भी बताती है कि किसी कलाकार को समझने के लिए केवल उसकी प्रसिद्धि नहीं देखनी चाहिए। उसके पीछे की यात्रा देखनी चाहिए। उसने किन परिस्थितियों में काम किया, किन लोगों से सीखा, किन सीमाओं को पार किया, किन असफलताओं के बावजूद रचनात्मक बना रहा और उसने अपने आसपास की दुनिया को किस नजर से देखा—इन सवालों के उत्तर किसी भी कलाकार की असली तस्वीर बनाते हैं।
तरुण मोहम्मद के तीन गुण—कलाकार-निर्देशक, लेखक और संपादकीय अनुभव—दरअसल तीन अलग-अलग दिशाएं नहीं हैं। वे एक ही रचनात्मक व्यक्तित्व की तीन परतें हैं। कलाकार उन्हें संवेदना देता है। निर्देशक उस संवेदना को दृश्य और रूप देता है। लेखक उसे शब्द देता है और संपादक उन शब्दों को पाठक तक पहुंचने की समझ देता है। इस तरह देखें तो उनके भीतर कला, साहित्य और पत्रकारिता एक-दूसरे से अलग नहीं बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं।
शायद इसी वजह से उनके जैसे लोगों को समझने में समय लगता है। चमकदार व्यक्तित्व तुरंत दिखाई दे जाता है। गहराई वाला व्यक्तित्व धीरे-धीरे खुलता है। किसी व्यक्ति की प्रसिद्धि उसके बारे में बताती है कि कितने लोग उसे जानते हैं, लेकिन उसकी रचनात्मकता यह बताती है कि उसे जानने वालों में से कितने लोग उसे भूल पाए। और यहां बात उस दूसरी श्रेणी की है।
तरुण मोहम्मद की कहानी इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि यह हमें उस भ्रम से बाहर निकालती है जिसमें हम मान लेते हैं कि बड़ा कलाकार वही है जिसका नाम हर जगह सुनाई देता है। ऐसा नहीं है। कला की दुनिया में अनगिनत ऐसे लोग हुए हैं जिनके काम ने दूसरों को रास्ता दिया, लेकिन इतिहास ने उनके नाम को उतनी जगह नहीं दी जितनी उनके योगदान को मिलनी चाहिए थी। कुछ नाम समय के साथ धुंधले होते हैं, मगर उनके काम की छाप बनी रहती है।
और शायद यही तरुण की सबसे बड़ी पहचान है—बहुत ज्यादा लोग उन्हें न जानते हों, लेकिन ऐसी हस्तियां मिटती नहीं। वे किसी स्मारक की तरह नहीं, बल्कि स्मृति की तरह बची रहती हैं। किसी पुराने संवाद में, किसी दृश्य की याद में, किसी लेख के वाक्य में, किसी संपादकीय निर्णय में, किसी कलाकार को दिए गए सुझाव में या किसी ऐसे व्यक्ति की कहानी में जिसने उनसे कुछ सीखा हो।
समय का अपना न्याय होता है। वह प्रचार के शोर को धीरे-धीरे छांट देता है और उन चीजों को बचाता है जिनमें जीवन की सच्चाई होती है। इसलिए किसी कलाकार के लिए सबसे जरूरी सवाल यह नहीं कि आज कितने लोग उसे जानते हैं। सवाल यह है कि उसके काम में कितना जीवन है। कितनी ईमानदारी है। कितनी जमीन है। कितनी बेचैनी है। कितनी संवेदना है। और कितनी ऐसी बात है जो समय बीतने के बाद भी अपना अर्थ नहीं खोती।
तरुण मोहम्मद को इसी कसौटी पर देखने की जरूरत है। वह केवल चाईबासा के रहने वाले एक व्यक्ति नहीं हैं। वह उस मिट्टी की रचनात्मक अभिव्यक्ति हैं जिसने उन्हें जीवन को करीब से देखने का अवसर दिया। वह केवल कलाकार नहीं, कलाकार की आंख वाले निर्देशक हैं। वह केवल लेखक नहीं, दृश्य को शब्द में बदल सकने वाले लेखक हैं। वह केवल संपादकीय दुनिया से जुड़े व्यक्ति नहीं, बल्कि शब्दों और पाठकों के रिश्ते को समझने वाले रचनात्मक कर्मी हैं।
उनके व्यक्तित्व की सबसे खूबसूरत बात शायद यही है कि इनमें से कोई भी पहचान दूसरी पहचान को ढकती नहीं। तरुण कलाकार हैं तो लेखक भी हैं। लेखक हैं तो निर्देशक भी हैं। निर्देशक हैं तो संपादकीय अनुभव उनके भीतर मौजूद है। और इन सबके नीचे एक साधारण आदमी है—चाईबासा की जमीन से आया हुआ, जीवन की रगड़ खाकर तपता हुआ, अपने समय को अपनी तरह से देखने वाला।
कभी-कभी इतिहास बड़े नामों से नहीं, छोटे-छोटे निशानों से बनता है। किसी ने कोई किताब लिखी, किसी ने कोई फिल्म बनाई, किसी ने किसी कलाकार को पहला अवसर दिया, किसी ने किसी लेख को आकार दिया और किसी ने किसी साधारण कहानी में असाधारण मनुष्य खोज लिया। ये सारे काम मिलकर संस्कृति बनाते हैं। तरुण मोहम्मद जैसे लोग इसी संस्कृति के वे शांत कारीगर हैं जिनकी हथौड़ी की आवाज शायद दूर तक सुनाई नहीं देती, लेकिन उनके हाथों से बनी चीजें लंबे समय तक टिकती हैं।
इसलिए तरुण मोहम्मद को जानने का अर्थ केवल एक व्यक्ति को जानना नहीं है। यह उस भारत को जानना भी है जहां चाईबासा जैसे शहरों की मिट्टी से कलाकार निकलते हैं; जहां संघर्ष से शब्द पैदा होते हैं; जहां साधारण जीवन से असाधारण कहानियां निकलती हैं और जहां एक व्यक्ति अपने भीतर कलाकार, निर्देशक, लेखक और संपादक—चारों को जगह दे सकता है।
और अंत में फिर वही बात लौटकर आती है—वो तरुण है और मोहम्मद भी। नाम में दो शब्द हैं, मगर व्यक्तित्व में कई संसार। उन्हें बहुत ज्यादा लोग जानते हों, यह जरूरी नहीं। उनके नाम के आगे कितने सम्मान लिखे हैं, यह भी अंतिम सत्य नहीं। अंतिम सत्य यह है कि उन्होंने अपने हिस्से की रचनात्मक आग को बुझने नहीं दिया। जमीन की रगड़ ने उन्हें घिसा, समय ने उन्हें तपाया और अनुभव ने उन्हें आकार दिया। अब वे उस साधारण-से दिखने वाले असाधारण संसार का हिस्सा हैं जहां आदमी अपनी प्रसिद्धि से नहीं, अपने छोड़े हुए निशान से पहचाना जाता है।
ऐसी हस्तियां सचमुच भीड़ में खो सकती हैं, लेकिन मिटती नहीं। क्योंकि भीड़ चेहरे याद रखती है, समय काम याद रखता है। और जिस आदमी ने शब्दों में जान डालना, दृश्यों को अर्थ देना, विचारों को लिखना और दूसरों के शब्दों को पाठक तक पहुंचाना सीख लिया हो, उसकी रचनात्मक यात्रा किसी एक परिचय की मोहताज नहीं रहती। वह धीरे-धीरे अपने समय की स्मृति में जगह बना लेती है।
तरुण मोहम्मद शायद इसी स्मृति की तरफ बढ़ता हुआ वह नाम है—एक ऐसा नाम जिसे जानने वालों की संख्या भले सीमित हो, लेकिन जिसे जान लेने के बाद साधारण कहकर भुला देना आसान नहीं। चाईबासा की मिट्टी से निकला यह कलाकार, निर्देशक, लेखक और संपादकीय अनुभव वाला आदमी हमें यही याद दिलाता है कि असली रचनात्मकता अक्सर शोर से दूर पैदा होती है। वह पहले भीतर जलती है, फिर शब्द बनती है, दृश्य बनती है, कहानी बनती है और अंततः किसी दूसरे मनुष्य के भीतर अपनी जगह बना लेती है।
तरुण की यही सबसे बड़ी कहानी है—वह स्वयं शायद बहुत बड़ा परिचय नहीं मांगते, लेकिन उनके भीतर मौजूद कलाकार, निर्देशक, लेखक और संपादक मिलकर उनके लिए एक ऐसा परिचय लिख चुके हैं जिसे मिटाना आसान नहीं।
तरुण मोहम्मद की कहानी अभी पूरी तरह कही नहीं गई है। उनके व्यक्तित्व, संघर्ष, कला, लेखन, निर्देशन और जीवन से जुड़ी ऐसी कई अनसुनी बातें हैं, जो शायद बहुत कम लोगों तक पहुंची हैं। हम कोशिश करेंगे कि तरुण से जुड़े उन अनकहे किस्सों और अनछुए पहलुओं को भी समय-समय पर आपके सामने लाते रहें, ताकि चाईबासा की मिट्टी से निकली इस अनोखी हस्ती को सिर्फ उनके नाम से नहीं, बल्कि उनके पूरे रचनात्मक सफर और मानवीय व्यक्तित्व के साथ जाना जा सके।

























One Response
ऐसी हस्तियां सचमुच भीड़ में खो सकती हैं, लेकिन मिटती नहीं। क्योंकि भीड़ चेहरे याद रखती है, समय काम याद रखता है।
फिर चाहे वह तरुण मोहम्मद हो या राम रहीम: सबकी ब्लैक एंड व्हाइट स्टोरी है, जिसका वास्तविक वर्णन करने की शक्ति इस लेखक के आलेख भी नहीं दिखाई देती। सावरकर की तरह माफीनामा लिखते रहिए, आर एस एस की अमरबेल के नीचे सत्य का पौधा पनप नहीं सकता।