जब जिद पे आ गई पार्वती… काय जिद कर रहीं? अपर्णा यादव ने सुर छेड़े, ‘हनुमान अंश’ के रंग में झूम उठा लखनऊ!

अपर्णा यादव ‘हनुमान अंश’ का भक्ति गीत गाते हुए और संवाददाता दुर्गा प्रसाद शुक्ला की तस्वीर

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रिपोर्ट: दुर्गा प्रसाद शुक्ला

लखनऊ। राजधानी लखनऊ में आयोजित एक कार्यक्रम का माहौल उस समय अचानक बदल गया, जब भारतीय जनता पार्टी की महिला उपाध्यक्ष अपर्णा यादव ने मंच पर अपनी आवाज में भक्ति का ऐसा रंग घोला कि कुछ पल के लिए राजनीतिक पहचान, पद और औपचारिकताओं की सारी सीमाएं जैसे पीछे छूट गईं। सामने बैठे लोग सुनते रहे और अपर्णा यादव गाती रहीं। गीत समाप्त हुआ तो सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा।

मौका था नीम करौली बाबा के जीवन और उनकी आध्यात्मिक यात्रा से प्रेरित फिल्म ‘हनुमान अंश’ से जुड़े कार्यक्रम का। अपर्णा यादव ने फिल्म में शामिल भक्ति गीत ‘जब जिद पे आ गई पार्वती, समझाने पहुंचे सप्तऋषि…’ अपने अंदाज में गाया। गीत में शिव-पार्वती और भारतीय आध्यात्मिक परंपरा की वह परिचित कथा-धारा है, जिसमें भक्ति केवल पूजा का विषय नहीं रहती, बल्कि मनुष्य के भीतर चलने वाले संवाद का रूप ले लेती है।

अपर्णा यादव की प्रस्तुति में भी यही भाव दिखाई दिया। उनकी आवाज में गीत था, लेकिन उसके पीछे उस आस्था की स्मृति भी थी, जिसका उल्लेख वह स्वयं नीम करौली बाबा के संदर्भ में करती रही हैं। यही कारण रहा कि कार्यक्रम में मौजूद लोगों ने इस प्रस्तुति को केवल एक राजनीतिक व्यक्तित्व द्वारा गाए गए गीत के रूप में नहीं देखा, बल्कि इसे संस्कृति, सिनेमा और आध्यात्मिक विश्वास के एक छोटे लेकिन अर्थपूर्ण मिलन के रूप में महसूस किया।

जब राजनीति की आवाज में सुनाई दिया भक्ति का सुर

आज के दौर में सार्वजनिक जीवन अक्सर भाषणों, नारों और राजनीतिक विमर्श के बीच घिरा दिखाई देता है। ऐसे समय में जब कोई सार्वजनिक व्यक्तित्व मंच से अचानक कोई भजन या आध्यात्मिक गीत छेड़ देता है, तो वह क्षण सामान्य कार्यक्रम से अलग हो जाता है।

लखनऊ में अपर्णा यादव की प्रस्तुति भी कुछ ऐसी ही रही। उन्होंने ‘हनुमान अंश’ के गीत को केवल गाया नहीं, बल्कि उसे अपने भाव के साथ प्रस्तुत किया। गीत की पंक्तियों में पौराणिक संदर्भ थे और वातावरण में भक्ति का रंग। गीत खत्म होते ही जिस तरह तालियां बजीं, उससे साफ था कि श्रोताओं ने उस क्षण को सहजता से स्वीकार किया।

यहां एक दिलचस्प बात यह भी है कि ‘हनुमान अंश’ केवल एक फिल्म के रूप में नहीं, बल्कि संत परंपरा और आधुनिक सिनेमा के बीच संवाद की कोशिश के रूप में भी सामने आई है।

फिल्म नीम करौली बाबा के जीवन और भगवान हनुमान के प्रति उनकी भक्ति पर केंद्रित है। फिल्म का निर्देशन विशाल चतुर्वेदी ने किया है और नीम करौली बाबा की भूमिका अभिनेता शोभिनव सत्या ने निभाई है। फिल्म 7 अगस्त 2026 को सिनेमाघरों में रिलीज हुई और शुरुआती दौर के बाद दर्शकों के बीच इसकी लोकप्रियता तेजी से बढ़ी।

अपर्णा यादव और ‘हनुमान अंश’ का पुराना जुड़ाव

अपर्णा यादव का इस फिल्म से जुड़ाव केवल लखनऊ के इस कार्यक्रम तक सीमित नहीं है। कुछ समय पहले फिल्म की टीम ने उनसे मुलाकात की थी। फिल्म के प्रमोशन के दौरान ‘हनुमान अंश’ की टीम उनके घर भी पहुंची थी।

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उस मुलाकात की तस्वीरों में अपर्णा यादव फिल्म में नीम करौली बाबा का किरदार निभाने वाले अभिनेता शोभिनव सत्या का तिलक करती दिखाई दी थीं। उन्होंने फिल्म की टीम का स्वागत किया और भक्ति गीत भी गुनगुनाया था।

फिल्म के निर्देशक और निर्माता डॉ. विशाल चतुर्वेदी सहित पूरी टीम के प्रयासों की उन्होंने प्रशंसा की थी। उनके अनुसार, फिल्म के माध्यम से लोगों को धर्म और अध्यात्म की ओर प्रेरित करने का प्रयास किया गया है।

अपर्णा यादव ने लोगों से फिल्म देखने की अपील भी की थी। उनका कहना था कि ‘हनुमान अंश’ केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि एक ऐसी रचना है जो दर्शकों को अपनी आध्यात्मिक जड़ों की ओर देखने के लिए प्रेरित करती है।

नीम करौली बाबा से अपर्णा यादव का भावनात्मक रिश्ता

अपर्णा यादव ने नीम करौली बाबा के प्रति अपने परिवार की आस्था का भी उल्लेख किया है। उन्होंने बताया कि बाबा के प्रति उनके परिवार में लंबे समय से श्रद्धा रही है और इसी कारण ‘हनुमान अंश’ की कहानी से उनका एक अलग तरह का भावनात्मक जुड़ाव बनता है।

भारतीय संत परंपरा में ऐसे अनेक संत हुए हैं जिनकी लोकप्रियता किसी एक क्षेत्र या समुदाय तक सीमित नहीं रही। नीम करौली बाबा भी ऐसी ही आध्यात्मिक परंपरा के प्रमुख नामों में गिने जाते हैं। कैंची धाम और बाबा की हनुमान भक्ति से जुड़ी कथाओं ने उन्हें देश-विदेश में श्रद्धा का विषय बनाया है।

यही वजह है कि जब उनके जीवन पर कोई फिल्म बनती है तो उसके साथ केवल सिनेमा की जिज्ञासा नहीं जुड़ती, बल्कि उन लाखों लोगों की भावनाएं भी जुड़ जाती हैं जो बाबा को आस्था के प्रतीक के रूप में देखते हैं।

‘हनुमान अंश’ की कहानी भी इसी आध्यात्मिक यात्रा को पर्दे पर प्रस्तुत करने का प्रयास करती है।

शोभिनव सत्या के लिए भी असाधारण यात्रा बनी ‘हनुमान अंश’

फिल्म की चर्चा का एक बड़ा कारण शोभिनव सत्या भी हैं। उन्होंने नीम करौली बाबा का किरदार निभाकर दर्शकों का ध्यान खींचा है। दिलचस्प बात यह है कि शोभिनव शुरुआत में इस फिल्म में मुख्य अभिनेता के रूप में नहीं आए थे।

उपलब्ध जानकारी के अनुसार वह फिल्म की निर्माण प्रक्रिया और निर्देशन टीम से जुड़े हुए थे। बाद में निर्देशक विशाल चतुर्वेदी ने उनके अभिनय और व्यक्तित्व को देखते हुए उन्हें नीम करौली बाबा के किरदार के लिए स्क्रीन टेस्ट देने को कहा। लंबे स्क्रीन टेस्ट के बाद उन्हें यह भूमिका मिली।

किसी संत का किरदार निभाना सामान्य अभिनय से अलग चुनौती है। अभिनेता को केवल वेशभूषा, भाषा और चाल-ढाल नहीं अपनानी होती, बल्कि उस व्यक्तित्व की आंतरिक शांति और भावभूमि को भी समझने का प्रयास करना पड़ता है।

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शोभिनव सत्या ने भी इस भूमिका को लेकर अपने अनुभव साझा किए हैं। शूटिंग के दौरान उनके साथ ऐसे अनुभव जुड़े, जिन्होंने उन्हें व्यक्तिगत स्तर पर भी प्रभावित किया। हालिया बातचीत में उन्होंने बताया कि बाबा का किरदार निभाने का अनुभव उनके लिए सामान्य फिल्मी भूमिका से कहीं अधिक गहरा रहा।

कम बजट से बड़े दर्शक वर्ग तक पहुंची फिल्म

‘हनुमान अंश’ की यात्रा का सबसे दिलचस्प पहलू इसकी व्यावसायिक सफलता भी है। शुरुआत में फिल्म को बड़े सितारों वाली फिल्मों जैसी चर्चा नहीं मिली, लेकिन धीरे-धीरे दर्शकों की प्रतिक्रिया ने इसकी तस्वीर बदल दी।

मीडिया रिपोर्टों में फिल्म के बजट की तुलना में इसकी कमाई को असाधारण बताया गया है। कुछ रिपोर्टों के अनुसार फिल्म ने भारत में 150 करोड़ रुपये से अधिक की कमाई का आंकड़ा पार किया और बाद की रिपोर्टों में इसकी कमाई 200 करोड़ रुपये से अधिक पहुंचने का दावा भी किया गया।

यह सफलता इस मायने में भी महत्वपूर्ण है कि यह फिल्म किसी पारंपरिक बड़े स्टार-तंत्र के भरोसे नहीं बनी थी। इसके केंद्र में एक संत की कथा, आध्यात्मिकता, भक्ति और विश्वास था।

शायद यही वह बिंदु है जहां ‘हनुमान अंश’ आधुनिक दर्शक और भारतीय आध्यात्मिक परंपरा के बीच एक नया संवाद कायम करती दिखाई देती है।

मुख्यमंत्री योगी से भी मिल चुकी है फिल्म की टीम

फिल्म की सफलता के बाद ‘हनुमान अंश’ की टीम ने लखनऊ में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से भी मुलाकात की। टीम में निर्देशक विशाल चतुर्वेदी और अभिनेता शोभिनव सत्या समेत अन्य लोग शामिल रहे। इस मुलाकात में फिल्म की सफलता और उसके विषय को लेकर चर्चा हुई।

लखनऊ में फिल्म की टीम की सक्रियता ने यह भी संकेत दिया कि उत्तर प्रदेश अब केवल फिल्म की कहानी की पृष्ठभूमि नहीं, बल्कि उसके सांस्कृतिक संवाद का भी महत्वपूर्ण केंद्र बन रहा है।

राजधानी में अपर्णा यादव के साथ फिल्म टीम की मुलाकात और इसके बाद उनके द्वारा फिल्म से जुड़े गीत की प्रस्तुति इसी सांस्कृतिक सिलसिले की एक और कड़ी बन गई।

पति प्रतीक यादव और बेटियों का भी जिक्र

अपर्णा यादव ने इस दौरान अपने पति प्रतीक यादव का भी उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि प्रतीक ने अपने खेल जीवन को आगे बढ़ाने के लिए काफी मेहनत की है। उन्होंने उम्मीद जताई कि उनकी बेटियां भी अपने पिता के इस सपने को आगे बढ़ाएंगी।

यह प्रसंग भले ही ‘हनुमान अंश’ की कहानी से सीधे जुड़ा हुआ न हो, लेकिन अपर्णा यादव की बातचीत में परिवार, विश्वास और भविष्य की पीढ़ी के प्रति उम्मीद का एक मानवीय पक्ष सामने आता है।

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भारतीय संस्कृति में परिवार और आध्यात्मिकता को अक्सर अलग-अलग खानों में नहीं रखा गया। एक ओर परंपरा है, दूसरी ओर अगली पीढ़ी को दिए जाने वाले संस्कार। शायद इसी वजह से अपर्णा यादव की बातचीत में नीम करौली बाबा, परिवार, पति और बेटियों का संदर्भ एक ही भावधारा में दिखाई देता है।

बेटी के साथ पहले ही देख चुकी हैं फिल्म

अपर्णा यादव ने यह भी बताया है कि वह अपनी बेटी के साथ ‘हनुमान अंश’ पहले ही देख चुकी हैं। इस तथ्य से फिल्म को लेकर उनकी व्यक्तिगत रुचि और स्पष्ट होती है।

सिनेमा की दुनिया में दर्शक और फिल्म के बीच रिश्ता अक्सर कहानी से बनता है। लेकिन जब दर्शक किसी कहानी को अपने निजी विश्वास या स्मृति से जोड़ लेता है तो वह फिल्म उसके लिए केवल पर्दे पर चलती तस्वीरें नहीं रह जाती।

‘हनुमान अंश’ के साथ अपर्णा यादव का संबंध भी कुछ ऐसा ही दिखाई देता है। उनके लिए नीम करौली बाबा केवल फिल्म का विषय नहीं हैं, बल्कि परिवार की आस्था से जुड़ा नाम भी हैं।

भक्ति गीत ने फिर याद दिलाई संस्कृति की ताकत

लखनऊ में अपर्णा यादव द्वारा गाया गया गीत इस पूरी कहानी का शायद सबसे सुंदर हिस्सा है।

एक ओर आधुनिक सिनेमा है। दूसरी ओर संत की जीवनगाथा। एक तरफ राजनीतिक और सामाजिक जीवन में सक्रिय व्यक्तित्व हैं और दूसरी तरफ पौराणिक कथाओं से निकला भक्ति गीत। इन सबके बीच संगीत एक ऐसी डोर बन जाता है जो अलग-अलग संसारों को जोड़ देती है।

‘जब जिद पे आ गई पार्वती, समझाने पहुंचे सप्तऋषि…’ जैसे गीत केवल शब्दों और सुरों का मेल नहीं होते। इनमें भारतीय स्मृति की वह लंबी परंपरा सांस लेती है, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी कथाओं, भजनों और लोकविश्वासों के माध्यम से आगे बढ़ती आई है।

लखनऊ की उस शाम में शायद यही हुआ। मंच पर एक गीत शुरू हुआ और उसके साथ श्रोताओं की स्मृतियों में धर्म, कथा, संगीत और संस्कृति के कई पुराने दरवाजे खुल गए।

तालियां थम गई होंगी, कार्यक्रम आगे बढ़ गया होगा, मंच की रोशनी भी बुझ गई होगी। लेकिन कुछ क्षण ऐसे होते हैं जो कार्यक्रम खत्म होने के बाद भी मन में बजते रहते हैं।

अपर्णा यादव की आवाज में गाया गया ‘हनुमान अंश’ का यह भक्ति गीत भी ऐसा ही एक क्षण बन गया—जहां सिनेमा ने संत परंपरा का हाथ थामा, राजनीति की दुनिया से आई एक आवाज ने भक्ति का सुर छेड़ा और लखनऊ की शाम कुछ देर के लिए गीत, आस्था और संस्कृति के नाम हो गई।

और शायद यही किसी सांस्कृतिक रचना की सबसे बड़ी सफलता है—वह पर्दे से उतरकर लोगों की बातचीत, स्मृतियों और संवेदनाओं में जगह बना ले।

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Author: यायावर

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