जिस घर में भगवान के सामने रोज सिर झुकता हो, लेकिन घर के बुजुर्ग के लिए दो मिनट सिर उठाकर इंतजार न किया जाए, वहां संस्कार आखिर हैं कहां?
डाइनिंग टेबल पर परोसा गया भोजन पेट भर सकता है, मगर वह यह भी बता देता है कि घर में रिश्तों की कितनी भूख बाकी है।
पूजा-पाठ से धार्मिक होना आसान है, लेकिन अपने व्यवहार से संस्कारी होना कठिन।
इस बार ‘पनगोत्रा की चिट्ठी’ इसी दोहरेपन पर सवाल उठाती है—क्या हमारे घरों में संस्कार सचमुच बचे हैं, या वे केवल पूजा की थाली तक सिमट गए हैं?
प्रिय पाठकों,
जिस घर में भगवान के सामने रोज सिर झुकता हो, लेकिन घर के बुजुर्ग के लिए दो मिनट सिर उठाकर इंतजार न किया जाए, वहां संस्कार आखिर हैं कहां? डाइनिंग टेबल पर परोसा गया भोजन पेट भर सकता है, मगर वह यह भी बता देता है कि घर में रिश्तों की कितनी भूख बाकी है। पूजा-पाठ से धार्मिक होना आसान है, लेकिन अपने व्यवहार से संस्कारी होना कठिन। इस बार ‘पनगोत्रा की चिट्ठी’ इसी दोहरेपन पर सवाल उठाती है—क्या हमारे घरों में संस्कार सचमुच बचे हैं, या वे केवल पूजा की थाली तक सिमट गए हैं?
आज की चिट्ठी किसी राजनीतिक घटना, किसी सामाजिक विवाद या किसी बड़ी खबर से शुरू नहीं कर रहा हूं। आज की चिट्ठी की शुरुआत घर की उस जगह से कर रहा हूं, जहां परिवार के लोग रोज कम से कम एक बार एक साथ बैठते हैं। जी हां, मैं बात कर रहा हूं डाइनिंग टेबल की।
आर्थिक रूप से संपन्न परिवारों के घरों में डाइनिंग टेबल होना अब कोई नई बात नहीं है। लेकिन देखा-देखी मध्यमवर्गीय परिवारों के घरों में भी डाइनिंग टेबल तेजी से अपनी जगह बना रही है। घर छोटा हो या बड़ा, आधुनिक हो या पारंपरिक, भोजन के लिए मेज और उसके चारों ओर कुर्सियां होना अब घरेलू जीवन का एक सामान्य हिस्सा बन गया है।
डाइनिंग टेबल ने हमारे भोजन करने का तरीका जरूर बदल दिया, लेकिन क्या उसने हमारे पारिवारिक संस्कार भी बदल दिए हैं? यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि संस्कृति और संस्कार पर आजकल खूब बातें होती हैं। हम बच्चों को संस्कार देने की चिंता करते हैं, बड़ों का सम्मान करने की बातें करते हैं, धार्मिक परंपराओं का पालन करते हैं, पूजा-पाठ और व्रत-उपवास करते हैं। लेकिन कभी-कभी लगता है कि संस्कारों की असली परीक्षा पूजा के कमरे में नहीं, बल्कि डाइनिंग टेबल पर बैठकर होती है।
भारतीय भोजन परंपरा की बात करें तो डाइनिंग टेबल हमारी पारंपरिक संस्कृति का मूल हिस्सा नहीं रही। प्राचीन भारत में जमीन पर बैठकर भोजन करने की परंपरा रही है। चटाई, पाटे या छोटी चौकी पर थाली रखी जाती थी और परिवार के लोग साथ बैठकर भोजन करते थे। आधुनिक समय में पश्चिमी प्रभाव, विशेषकर ब्रिटिश काल के बाद, मेज-कुर्सी पर बैठकर भोजन करने की आदत भारत में बढ़ी।
लेकिन पश्चिम से डाइनिंग टेबल आई तो इसका अर्थ यह नहीं था कि हम अपने भारतीय पारिवारिक संस्कार भी छोड़ दें। मेज पश्चिमी हो सकती है, कुर्सियां पश्चिमी हो सकती हैं, लेकिन बड़ों का सम्मान, छोटों से स्नेह और परिवार के साथ भोजन करने की भावना हमारी अपनी हो सकती है।
मेरा मानना है कि नियम और संस्कार का आपस में गहरा संबंध है। समय बदलता है, घर बदलते हैं, भोजन करने के तरीके बदलते हैं, लेकिन सम्मान का भाव नहीं बदलना चाहिए।
डाइनिंग टेबल पर बैठकर भोजन करना अपने आप में कोई संस्कार नहीं है। संस्कार तो इस बात में है कि हम उस मेज पर बैठे व्यक्ति के साथ कैसा व्यवहार करते हैं।
धार्मिक संस्कार और व्यवहारिक संस्कार
संस्कार की बात करते हुए मुझे अक्सर दो तरह के संस्कार दिखाई देते हैं — धार्मिक संस्कार और व्यवहारिक संस्कार।
एक सरकारी कर्मचारी सुबह उठकर स्नान करता है, पूजा-पाठ करता है, मंदिर जाता है, मंत्रों का जाप करता है। धार्मिक गतिविधियों में उसकी गहरी आस्था है। लेकिन कार्यालय पहुंचने के बाद यदि वह आम आदमी की मजबूरी का फायदा उठाता है, रिश्वत के बिना काम नहीं करता और अपने पद का दुरुपयोग करता है तो क्या केवल उसकी पूजा-पाठ की आदत उसे संस्कारी बना देगी?
इसी तरह कोई शिक्षक रोज पूजा-पाठ करता हो, व्रत रखता हो, धार्मिक अनुष्ठानों में शामिल होता हो, लेकिन स्कूल समय पर न जाता हो, बच्चों को ईमानदारी से न पढ़ाता हो और अपने कर्तव्य के प्रति लापरवाह हो तो हमें सोचना चाहिए कि वह वास्तव में कितना संस्कारी है।
मैं धार्मिक कर्मकांडों का विरोध नहीं कर रहा हूं। पूजा-पाठ, प्रार्थना और आस्था का अपना महत्व है। लेकिन यदि धार्मिकता हमारे व्यवहार को बेहतर नहीं बनाती तो कहीं न कहीं आत्ममंथन की जरूरत जरूर है।
इसके विपरीत समाज में ऐसे अनेक लोग भी मिलते हैं जो धार्मिक कर्मकांडों में बहुत आगे नहीं होते, लेकिन व्यवहार में बेहद संवेदनशील, ईमानदार, विनम्र और मददगार होते हैं। वे किसी बुजुर्ग की मदद कर देते हैं, किसी जरूरतमंद का हाथ पकड़ लेते हैं, किसी भूखे को खाना खिला देते हैं और किसी कमजोर व्यक्ति के अधिकार का सम्मान करते हैं।
ऐसे लोगों में शायद धार्मिक कर्म कम दिखाई दें, लेकिन व्यवहारिक संस्कार बहुत गहरे दिखाई देते हैं। मेरी नजर में दोनों का सुंदर मेल ही संपूर्ण संस्कार है।
एक परिवार और डाइनिंग टेबल का वह दृश्य
चंद रोज पहले मैं एक परिचित के घर गया था। नित्य पूजा-पाठ, उपवास, अनुष्ठान और धार्मिक गतिविधियां इस परिवार की दिनचर्या का हिस्सा हैं। बाहर से देखने पर यह एक धार्मिक और संस्कारी परिवार दिखाई देता है।
परिवार में छह सदस्य हैं — दादा-दादी, बेटा-बहू और पोता-पोती।
जब मैं उनके घर पहुंचा तो परिवार के पांच सदस्य डाइनिंग टेबल पर बैठे खाना शुरू कर चुके थे। मैंने सोचा कि शायद दादाजी घर पर नहीं हैं। तभी बाथरूम का दरवाजा खुला और दादाजी बाहर आए।
उन्होंने कपड़े पहने, डाइनिंग टेबल की एक कुर्सी पर आकर बैठे और चुपचाप खाना शुरू कर दिया। मैं उस दृश्य को देखता रहा।
मेरे मन में एक सवाल आया — क्या घर के सबसे बुजुर्ग व्यक्ति के लिए दो-चार मिनट इंतजार करना इतना कठिन था?
यहां सवाल यह नहीं था कि किसने पहले खाना शुरू किया। सवाल यह था कि परिवार में किसके लिए किसी ने इंतजार करना जरूरी नहीं समझा। दादाजी ने कोई शिकायत नहीं की। उन्होंने शायद इस व्यवहार को अपनी उम्र का हिस्सा मानकर स्वीकार कर लिया होगा। लेकिन एक बाहरी व्यक्ति के रूप में उस दृश्य ने मुझे भीतर तक सोचने पर मजबूर कर दिया।
डाइनिंग टेबल भी परिवार का आईना है
डाइनिंग टेबल केवल खाना रखने की जगह नहीं है। वह परिवार के रिश्तों का एक छोटा-सा आईना भी हो सकती है।
कौन किसका इंतजार करता है? कौन पहले बैठता है? किसके आने पर बातचीत रुकती है? किसकी थाली पहले लगती है? किसकी पसंद का ध्यान रखा जाता है? किसकी बात बीच में काट दी जाती है? किसकी बात चुपचाप सुनी जाती है? इन छोटे-छोटे सवालों में परिवार की बहुत बड़ी कहानी छिपी होती है।
कई घरों में परिवार के मुखिया या बुजुर्ग के लिए एक निश्चित स्थान रखने की परंपरा रही है। डाइनिंग टेबल के आकार, कुर्सियों की संख्या और बैठने की दिशा को लेकर वास्तु संबंधी मान्यताएं भी प्रचलित हैं। इन बातों को कोई वैज्ञानिक नियम मानना अलग विषय है। लेकिन इनके पीछे छिपी पारिवारिक भावना को समझना जरूरी है।
मुखिया के लिए विशेष स्थान निर्धारित करने का मूल भाव शायद यह रहा होगा कि परिवार में वरिष्ठता और सम्मान का स्थान बना रहे। आज हम कुर्सी को तो बचा रहे हैं, लेकिन उसके पीछे छिपी भावना को खोते जा रहे हैं।
असली समस्या कुर्सी की नहीं, सोच की है
मुझे लगता है कि समस्या डाइनिंग टेबल की नहीं है। समस्या हमारी सोच की है।
यदि छह लोग एक मेज पर बैठकर भोजन कर रहे हैं और उनमें से पांच लोग छठे व्यक्ति का इंतजार नहीं कर सकते तो सवाल मेज का नहीं, रिश्तों का है। बुजुर्ग के लिए दो मिनट प्रतीक्षा करना कोई बहुत बड़ा त्याग नहीं है। लेकिन उन्हीं दो मिनटों में एक बच्चा बहुत कुछ सीखता है।
बच्चे उपदेशों से कम और व्यवहार से ज्यादा सीखते हैं। आप बच्चे से रोज कह सकते हैं कि बड़ों का सम्मान करो। लेकिन यदि वह घर में रोज देखता है कि बड़ों की बात को महत्व नहीं दिया जाता तो उसके लिए आपका उपदेश कितना प्रभावी रहेगा?
संस्कार बोलने से नहीं आते। संस्कार दिखाई देते हैं।
आज दादा की अनदेखी, कल आपकी बारी
इस पूरे प्रसंग का सबसे गंभीर पक्ष शायद यही है। आज यदि बेटा अपने पिता की उपेक्षा को देखकर चुप रहता है तो उसका बच्चा यह सीख सकता है कि बुजुर्गों की उपेक्षा करना सामान्य बात है।
आज दादा की बात अनसुनी हो रही है। कल पिता की बात अनसुनी हो सकती है। समय एक चक्र की तरह चलता है।
इसलिए यदि हम चाहते हैं कि आने वाली पीढ़ी हमारा सम्मान करे तो हमें आज की पीढ़ी के सामने अपने बड़ों का सम्मान करना होगा।
बच्चों के संस्कार की शुरुआत माता-पिता से
बच्चों में अच्छे संस्कार डालने की शुरुआत किसी धार्मिक पुस्तक या किसी भाषण से पहले माता-पिता के अपने आचरण से होती है।
बच्चा देखता है कि मां-बाप दादा-दादी से कैसे बात करते हैं। वह देखता है कि घर में काम करने वाले व्यक्ति से कैसा व्यवहार किया जाता है। वह देखता है कि गरीब या जरूरतमंद व्यक्ति के प्रति परिवार का रवैया कैसा है।
इसलिए बच्चों को संस्कार देने का सबसे प्रभावी तरीका उन्हें संस्कारों का जीवंत उदाहरण देना है। घर की सबसे बड़ी पाठशाला घर का वातावरण ही है।
धार्मिकता व्यवहार में उतरनी चाहिए
पूजा के कमरे में जलाया गया दीपक तभी सार्थक है जब उसकी रोशनी हमारे व्यवहार तक पहुंचे। मंदिर में सिर झुकाना अच्छी बात है, लेकिन घर में बुजुर्ग के सामने अहंकार झुकना उससे भी बड़ी बात है।
भगवान के सामने हाथ जोड़ना अच्छी बात है, लेकिन किसी जरूरतमंद की मदद के लिए हाथ बढ़ाना भी जरूरी है। धार्मिक पुस्तक पढ़ना अच्छी बात है, लेकिन उसमें लिखी अच्छी बातों को जीवन में उतारना उससे भी जरूरी है।
धर्म हमें भीतर से बेहतर करे और व्यवहार हमें बाहर से बेहतर इंसान बनाए — तभी संस्कार पूर्ण होते हैं।
घर में सुनने का संस्कार भी चाहिए
आज परिवारों में संवाद कम और प्रतिक्रियाएं अधिक दिखाई देती हैं। बच्चे बोलना चाहते हैं, माता-पिता समझाना चाहते हैं। बुजुर्ग अपनी जिंदगी का अनुभव साझा करना चाहते हैं, लेकिन नई पीढ़ी के पास अक्सर समय नहीं होता।
हमें बच्चों को केवल बोलने का नहीं, सुनने का संस्कार भी देना होगा। घर में मित्रवत व्यवहार, सेवा भाव, सामाजिक सद्भाव, सत्य और ईमानदारी होनी चाहिए।
और सबसे महत्वपूर्ण — अपने से छोटे के साथ प्रेम तथा अपने से बड़े के साथ सम्मान होना चाहिए।
आखिर डाइनिंग टेबल हमें क्या सिखाती है?
शायद बहुत कुछ। वह सिखाती है कि भोजन केवल पेट भरने का माध्यम नहीं, परिवार को जोड़ने का अवसर भी है। वह सिखाती है कि साथ बैठना तभी सार्थक है जब दिल भी साथ हों।
वह सिखाती है कि थाली में पकवान कितने हैं, यह महत्वपूर्ण नहीं; उस थाली को परोसने वाले हाथों में कितना अपनापन है, यह ज्यादा महत्वपूर्ण है।
और शायद सबसे बड़ी बात — डाइनिंग टेबल पर किसी बुजुर्ग के लिए दो मिनट रुक जाना कभी-कभी संस्कारों पर दिए गए दो घंटे के भाषण से ज्यादा प्रभावी होता है।
प्रिय पाठकों, अगली बार जब आप अपनी डाइनिंग टेबल पर बैठें तो एक बार चारों तरफ जरूर देखिएगा। थालियां देखिए। कुर्सियां देखिए। चेहरे देखिए। और फिर रिश्ते देखिए।
कहीं ऐसा तो नहीं कि थालियां साथ हैं लेकिन दिल अलग-अलग हैं? कहीं ऐसा तो नहीं कि घर में पूजा की घंटी खूब बजती है लेकिन किसी बुजुर्ग की आवाज सुनाई नहीं देती?
क्योंकि अंततः संस्कार किसी एक धार्मिक कर्म का नाम नहीं है।
संस्कार उस क्षण का नाम है जब हम अपने से बड़े के सम्मान के लिए रुकते हैं, अपने से छोटे के लिए झुकते हैं, जरूरतमंद के लिए हाथ बढ़ाते हैं और अपने व्यवहार में ईमानदारी को जगह देते हैं।
डाइनिंग टेबल बदल सकती है। भोजन का तरीका बदल सकता है। घर की सजावट बदल सकती है। लेकिन यदि परिवार में प्रेम, सम्मान, विश्वास और अपनापन बचा रहे तो संस्कृति भी बची रहेगी और संस्कार भी।
और यदि ये चीजें ही चली गईं तो फिर कितनी भी बड़ी डाइनिंग टेबल क्यों न हो, उस पर बैठा परिवार भीतर से अकेला ही रहेगा।
प्रिय पाठकों, आज इतना ही। अगले इतवार तक नमस्कार, राम-राम, सत श्री अकाल, अल्लाह हाफ़िज़!
केवल कृष्ण पनगोत्रा
जम्मू-कश्मीर से


























6 Responses
वाह पनगोत्रा सर! 😊 आपने तो डाइनिंग टेबल को भी परिवार का “एक्स-रे मशीन” बना दिया। सच कहूं तो लेख पढ़ते-पढ़ते लगा कि अब अगली बार घर में खाना खाने से पहले थाली नहीं, रिश्तों की गिनती करनी पड़ेगी! 😄
आपने बहुत चुलबुले अंदाज में एक बड़ी गंभीर बात कह दी—पूजा में घंटी बजाना आसान है, लेकिन घर के बुजुर्ग के लिए दो मिनट रुक जाना असली संस्कार है। डाइनिंग टेबल पर कौन किसका इंतजार करता है, किसकी बात सुनी जाती है और किसकी थाली पहले लगती है, ये छोटे-छोटे दृश्य सचमुच परिवार की पूरी कहानी सुना देते हैं।
सबसे मजेदार बात यह लगी कि मेज पश्चिम की हो गई, कुर्सियां पश्चिम की हो गईं, लेकिन संस्कारों को पश्चिम जाने की जरूरत नहीं थी। 😄 बड़ों का सम्मान तो हमारे अपने “देसी पैकेज” में मुफ्त मिला करता था, बस अब हम उसे इस्तेमाल करना भूलते जा रहे हैं।
लेख की सबसे चुभने वाली बात है—“आज दादा की अनदेखी, कल आपकी बारी।” यही तो जिंदगी का घूमता हुआ पहिया है। बच्चे हमारी बातें कम और हमारी आदतें ज्यादा याद रखते हैं। इसलिए उन्हें संस्कार सिखाने से पहले हमें उन्हें करके दिखाने होंगे।
मेरे हिसाब से इस लेख का निचोड़ बहुत सरल है—घर में भगवान की तस्वीर कितनी बड़ी है, इससे ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि घर में बैठे बुजुर्ग की जगह कितनी बड़ी है। पूजा की थाली सजाने से पहले अगर रिश्तों की थाली सजा ली जाए तो शायद घर भी घर जैसा लगे।
कुल मिलाकर, लेख पढ़कर मन मुस्कुराया भी और थोड़ा आईना भी देखा। 😊
पनगोत्रा जी, अगली बार ऐसी ही कोई चिट्ठी लिखिएगा जिसमें चाय की प्याली से रिश्तों का तापमान नापा जाए—कहीं ऐसा न हो कि हमारी चाय गरम और रिश्ते ठंडे निकल आएं! ☕😄
नमन है आपके संपादन और गंभीर लेखन के लिए। पनगोत्रा की चिट्ठी पढ़ते हुए सबसे पहले इसकी सहज भाषा और गंभीर विषय-वस्तु का संतुलन ध्यान खींचता है। लेखक ने किसी भारी-भरकम उपदेश के बजाय परिवार के रोजमर्रा के व्यवहार को आधार बनाकर एक ऐसे सामाजिक प्रश्न को उठाया है, जिसकी अनदेखी आज हमारे पारिवारिक जीवन में लगातार दिखाई दे रही है।
विशेष रूप से यह बात विचारणीय है कि संस्कार केवल पुस्तकों, धार्मिक अनुष्ठानों या बच्चों को दिए जाने वाले उपदेशों से नहीं बनते, बल्कि वे परिवार के व्यवहार को देखकर विकसित होते हैं। बच्चे यह बहुत ध्यान से देखते हैं कि घर में बुजुर्गों के साथ कैसा व्यवहार किया जाता है, उनकी बात कितनी गंभीरता से सुनी जाती है और उन्हें परिवार में कितना सम्मान मिलता है।
एक शिक्षाधिकारी के रूप में मेरा अनुभव भी यही रहा है कि विद्यालय बच्चों को ज्ञान दे सकता है, लेकिन व्यवहार और संस्कार की पहली पाठशाला परिवार ही होता है। यदि घर में सम्मान, संवेदना और सहभागिता का वातावरण है तो बच्चे उसे सहज रूप से आत्मसात करते हैं। इसके विपरीत, यदि वे बड़ों की उपेक्षा देखते हैं तो केवल नैतिक शिक्षा की किताबें उन्हें संवेदनशील नहीं बना सकतीं।
रचना की खूबी यह है कि इसमें आधुनिक जीवनशैली को सीधे कठघरे में खड़ा करने के बजाय पाठक को स्वयं सोचने का अवसर दिया गया है। बदलते समय और बदलती पारिवारिक संरचना को स्वीकार करते हुए भी लेखक ने यह महत्वपूर्ण सवाल छोड़ा है कि आधुनिक होना क्या अपने संस्कारों से दूर होना भी है?
मेरे विचार से रचना का सबसे प्रभावशाली संदेश यही है कि आज हमें बच्चों को केवल सफल बनने की शिक्षा नहीं, बल्कि सार्थक मनुष्य बनने की शिक्षा भी देनी होगी। इसके लिए परिवार में बुजुर्गों का सम्मान कोई औपचारिकता नहीं, बल्कि जीवंत संस्कार होना चाहिए।
यह रचना इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि यह पाठक को दूसरों की कमियां देखने के बजाय अपने घर और अपने व्यवहार की ओर देखने के लिए प्रेरित करती है। अच्छी रचना वही है जो पढ़कर समाप्त न हो, बल्कि मन में एक प्रश्न छोड़ जाए। इस रचना ने वह काम बखूबी किया है।
सारतः, यह केवल पारिवारिक व्यवहार पर टिप्पणी नहीं, बल्कि बदलते सामाजिक संस्कारों पर एक जरूरी आत्ममंथन है। लेखक को इस सार्थक और संवेदनशील विषय को सरल, संवादधर्मी और प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करने के लिए बधाई।
Thanks a lot for your inspiring wishes 🙏 Sushma ji
इस रचना को पढ़कर दिल ने बेइख़्तियार कहा—वाह! कितनी सादगी से लेखक ने रिश्तों की एक ऐसी तस्वीर खींच दी, जिसमें हमारे पूरे समाज का अक्स दिखाई देता है। बात छोटी-सी है, मगर असर बहुत गहरा है।
हम अक्सर तहज़ीब, अदब, संस्कार और इंसानियत पर तक़रीरें करते हैं, मगर इन तमाम बातों की असली परख हमारे रोज़मर्रा के रवैये में होती है। घर में बैठे बुज़ुर्ग को हम कितनी तवज्जो देते हैं, उनकी बात कितने सब्र से सुनते हैं और उनके लिए अपने वक़्त में कितनी गुंजाइश निकालते हैं—यही हमारे किरदार की असल पहचान है।
रचना का एक पहलू मुझे ख़ास तौर पर दिल को छू गया। इबादत सिर्फ़ सजदे और रस्मों का नाम नहीं; इंसान की इज़्ज़त, रिश्तों की क़द्र और बुज़ुर्गों की ख़िदमत भी इंसानियत की इबादत ही है। अगर घर में बुज़ुर्ग अपने ही लोगों के बीच तन्हाई महसूस करने लगें तो हमें ठहरकर अपने तौर-तरीकों पर ग़ौर करना चाहिए।
मदीना मुनव्वरा की इस पाक फ़िज़ा में रहते हुए यह एहसास और भी शिद्दत से होता है कि दुनिया चाहे कितनी ही बदल जाए, मोहब्बत, अदब, ख़ुलूस और रिश्तों की गरमाहट की ज़रूरत कभी पुरानी नहीं होती। रोज़गार ने हमें वतन से दूर ज़रूर कर दिया है, मगर वतन की मिट्टी, घर के बुज़ुर्गों की दुआ और अपनों की मोहब्बत से दूर होना मुमकिन नहीं।
आज की नस्ल के पास सहूलियतें बहुत हैं, मगर शायद फ़ुर्सत कम है। मोबाइल की स्क्रीन पर दूर बैठे लोगों से घंटों गुफ़्तगू हो जाती है, लेकिन कभी-कभी उसी घर में बैठे बुज़ुर्ग से दो लफ़्ज़ बोलने के लिए हमारे पास वक़्त नहीं होता। यह कैसा तरक़्क़ी का सफ़र है, जिसमें फ़ासले कम करने वाली तकनीक तो हमारे पास आ गई, मगर दिलों के फ़ासले बढ़ते चले गए?
लेखक ने किसी पर इल्ज़ाम नहीं लगाया, बल्कि बड़े ख़ूबसूरत अंदाज़ में आईना हमारे सामने रख दिया है। और आईने की ख़ासियत यही है कि उसमें चेहरा किसी और का नहीं, अपना ही नज़र आता है।
मेरी नज़र में इस रचना की सबसे बड़ी ख़ूबी यही है कि यह बच्चों को संस्कार सिखाने की बात करने से पहले बड़ों को अपना किरदार देखने की दावत देती है। आख़िर बच्चे हमारी नसीहतों से ज़्यादा हमारे अमल को पढ़ते हैं। हम जिस तरह अपने बुज़ुर्गों के साथ पेश आएंगे, बहुत मुमकिन है कि कल हमारी औलाद भी हमारे साथ वैसा ही सुलूक करे।
एक भारतीय होने के नाते, और रोज़गार के सिलसिले में अपने मुल्क से दूर रहकर, इस रचना ने दिल में कई पुरानी यादों के दरवाज़े खोल दिए। घर की चौखट, बुज़ुर्गों की आवाज़, साथ बैठकर खाना और बिना किसी मतलब के एक-दूसरे का हाल पूछ लेना—यही तो वह दौलत थी, जिसे हमने आधुनिकता की भागदौड़ में कहीं पीछे छोड़ दिया है।
रचना पढ़कर यही महसूस हुआ कि घर सिर्फ़ दीवारों, सामान और सहूलियतों से नहीं बनता; घर अदब, एहतराम, मोहब्बत और अपनाइयत से बनता है। और जिस घर में बुज़ुर्गों की दुआ और बच्चों की मुस्कान साथ मौजूद हो, उससे बढ़कर कोई दौलत नहीं।
लेखक को इस ख़ूबसूरत और फ़िक्र-अंगेज़ रचना के लिए दिली मुबारकबाद। उम्मीद है कि ऐसी तहरीरें हमारे ज़ेहन को झकझोरती रहेंगी और हमें यह याद दिलाती रहेंगी कि रिश्तों की हिफ़ाज़त भी हमारी सामाजिक ज़िम्मेदारी है और बुज़ुर्गों का एहतराम हमारी तहज़ीब की पहचान।
Respected Jameel sir,
Your words from Saudia Arab are an award for me.
Thanks a lot.
रजनी जी,
मेरी चिट्ठियों पर प्रतिक्रिया देने वालों की सूची में आपका नाम सबसे ऊपर है।
इसकी वजह हमारी भौगोलिक नजदीकी है। मैं जब भी कभी घर से बाहर किसी दूसरे राज्य या जिले में निकला तो भौगोलिक नजदीकी की पहचान से अपनत्व का एहसास हुआ। अगर संयोग से हमारी मुलाकात कहीं मध्य प्रदेश में हो जाए तो आकर्षण स्वाभाविक मनोदशा होगी।
मैं पिछले दिनों आसाम था, आदतन शाम को घूमने निकला तो चलते चलते डोगरी भाषा में बात करते हुए बाड़ी ब्राह्मण के आसपास रतनूचक्क रहने वाले एक युवा व्यक्ति के कानों में मेरी डोगरी भाषा पहुंच गई। यकीं करिए रजनी, उस युवा ने जोर से मुझे पुकारा -अंकल जी,.. अंकल जी! मैंने पीछे मुड़कर देखा, लड़के का चेहरा खिला हुआ था।
अंकल जी, आप जम्मू में कहां रहते हैं?
हमने लगभग आधा घंटा बात की और एक दूसरे से मिलकर बहुत खुश हुए।
सच बताना, मेरी बात कैसी लगी