देह व्यापार या मानव तस्करी? सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया फर्क, सेक्स वर्कर्स के अधिकारों पर नई कानूनी लकीर

सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले पर आधारित फीचर इमेज, जिसमें सेक्स वर्कर्स के अधिकार, मानव तस्करी, रेस्क्यू और पुलिस जवाबदेही को दर्शाया गया है।

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अंजुम अख्तर की रिपोर्ट

भारत में देह व्यापार, मानव तस्करी और सेक्स वर्कर्स के अधिकारों को लेकर सुप्रीम कोर्ट का 29 मई 2026 का फैसला एक महत्वपूर्ण कानूनी मोड़ के रूप में सामने आया है। Prajwala बनाम Union of India मामले में अदालत ने लगभग सात दशक पुराने अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम, 1956 यानी ITPA के मौजूदा ढांचे की गहराई से समीक्षा करते हुए स्पष्ट किया कि मानव तस्करी और अपनी इच्छा से सेक्स वर्क में शामिल वयस्क व्यक्ति को एक ही कानूनी श्रेणी में रखकर नहीं देखा जा सकता। अदालत ने यह भी कहा कि वयस्क और सहमति से सेक्स वर्क कर रहे व्यक्ति को पुलिस की अनावश्यक दखलअंदाजी, उत्पीड़न या छापेमारी के दौरान प्रताड़ना का शिकार नहीं बनाया जाना चाहिए।

इस फैसले की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने ‘रेस्क्यू’ और ‘रिहैबिलिटेशन’ को भी व्यक्ति की इच्छा, परिस्थितियों और सहमति से जोड़ने की जरूरत बताई है। इसका अर्थ यह नहीं है कि अदालत ने देह व्यापार को सामान्य रोजगार या पूर्णतः वैध व्यवसाय घोषित कर दिया है। बल्कि अदालत ने मौजूदा कानून की उस बुनियादी समस्या की ओर ध्यान दिलाया है जिसमें तस्करी की शिकार महिला, जबरन देह व्यापार में धकेली गई पीड़िता और अपनी इच्छा से सेक्स वर्क करने वाली वयस्क महिला कई परिस्थितियों में एक ही प्रक्रिया से गुजरती हैं। यही वह कानूनी अंतर है, जिसे स्पष्ट करने की दिशा में यह फैसला बड़ा कदम है।

1956 के कानून की मूल भावना क्या है?

Immoral Traffic (Prevention) Act, 1956 यानी ITPA को लागू हुए 2026 में 70 वर्ष हो चुके हैं। सुप्रीम कोर्ट ने अपने विस्तृत फैसले में स्पष्ट किया कि इस कानून का मूल उद्देश्य वेश्यावृत्ति के प्रत्येक व्यक्तिगत कृत्य को अपराध बनाना नहीं, बल्कि वेश्यावृत्ति के व्यावसायीकरण, संगठित शोषण और उससे लाभ कमाने वाली गतिविधियों पर अंकुश लगाना है। कानून में वेश्यालय चलाने, दूसरे व्यक्ति की वेश्यावृत्ति की कमाई पर निर्भर रहने, किसी व्यक्ति को वेश्यावृत्ति के लिए उपलब्ध कराने या प्रेरित करने तथा किसी को ऐसे स्थान पर रोककर रखने जैसी गतिविधियों को अपराध बनाया गया है।

सुप्रीम कोर्ट ने साथ ही यह महत्वपूर्ण अंतर भी रेखांकित किया कि ITPA ने वेश्यावृत्ति को पूरी तरह समाप्त या हर रूप में अपराध घोषित नहीं किया है। अदालत के विश्लेषण के अनुसार, किसी व्यक्ति द्वारा किसी तीसरे पक्ष की भागीदारी के बिना अपने लाभ के लिए सेक्स वर्क करना सामान्यतः ITPA के तहत निषिद्ध नहीं है, हालांकि अधिनियम की कुछ धाराएं सार्वजनिक स्थानों या अन्य विशेष परिस्थितियों में लागू हो सकती हैं। इसलिए यह कहना कि “भारत में सेक्स वर्क पूरी तरह कानूनी है” फैसला का सही अर्थ नहीं होगा। उतना ही गलत यह कहना होगा कि “सेक्स वर्क अपने आप में हर परिस्थिति में अपराध है।” कानूनी स्थिति इन दोनों अतियों के बीच कहीं अधिक जटिल है।

मानव तस्करी और सेक्स वर्क को एक समझना क्यों खतरनाक है?

सुप्रीम कोर्ट के सामने सबसे बड़ी समस्या यही थी कि मौजूदा कानूनी व्यवस्था में sex trafficking और prostitution के बीच पर्याप्त अंतर नहीं किया जाता। अदालत ने बताया कि ITPA की धारा 15 और 16 के तहत छापेमारी या बचाव कार्रवाई के दौरान हटाए गए लोगों को धारा 17 की प्रक्रिया से गुजरना पड़ सकता है। इसमें एक ही स्थान पर मिली अलग-अलग परिस्थितियों वाली महिलाओं को एक समान संरक्षण और हिरासत प्रक्रिया में डालने का जोखिम मौजूद है।

अदालत ने ऐसे मामलों में तीन अलग परिस्थितियों की पहचान की। पहली श्रेणी उन लोगों की है जिन्हें तस्करी, धमकी, धोखे, बल या दबाव के जरिए उनकी इच्छा के विरुद्ध देह व्यापार में धकेला गया। ऐसे लोगों को स्पष्ट रूप से पीड़ित मानकर सुरक्षा, कानूनी सहायता और पुनर्वास उपलब्ध कराना राज्य की जिम्मेदारी है।

दूसरी श्रेणी उन लोगों की है जिन्हें कभी तस्करी के जरिए इस धंधे में लाया गया, लेकिन बाद में वे अपनी इच्छा से इसमें बने रहे। तीसरी श्रेणी उन वयस्कों की है जिन्होंने स्वयं सेक्स वर्क को चुना और उसी में बने रहना चाहते हैं। अदालत का तर्क है कि इन तीनों परिस्थितियों को एक ही डिब्बे में रखकर एक समान ‘रेस्क्यू’ प्रक्रिया लागू करना न्यायसंगत नहीं है।

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यह अंतर इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि सहमति परिस्थितियों से प्रभावित हो सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सहमति कोई ऐसी चीज नहीं है जिसे बाहर बैठा व्यक्ति हमेशा सरल और यांत्रिक तरीके से तय कर सके। किसी महिला की वास्तविक इच्छा, उसके ऊपर किसी व्यक्ति का दबाव, आर्थिक निर्भरता, धमकी, धोखा या अनुचित प्रभाव—इन सभी पहलुओं को देखना जरूरी है। इसलिए अदालत ने ‘वन-साइज-फिट्स-ऑल’ यानी सभी पर एक जैसा मॉडल लागू करने से सावधान किया है।

रेस्क्यू का मतलब हिरासत नहीं हो सकता

यहीं से इस फैसले का मानवीय पक्ष सबसे ज्यादा उभरकर सामने आता है। किसी महिला को तस्करी के चंगुल से निकालना और उसकी इच्छा के विरुद्ध उसे लंबे समय तक संस्थागत आश्रय में रखना एक ही बात नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पुनर्वास का उद्देश्य पीड़ित को उसके शोषण से निकालकर ऐसी जिंदगी उपलब्ध कराना होना चाहिए जिसमें वह अपने भविष्य को लेकर निर्णय ले सके।

अदालत ने मौजूदा व्यवस्था के उस पहलू पर भी चिंता जताई जिसमें सुरक्षात्मक गृह में भेजे गए लोगों को मजिस्ट्रेट के आदेश के तहत लंबे समय तक रखा जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से इस detention-based rehabilitation model पर पुनर्विचार करने और व्यक्ति की जरूरत के अनुरूप वैकल्पिक पुनर्वास मॉडल विकसित करने का आग्रह किया है।

यह दृष्टिकोण महत्वपूर्ण है क्योंकि केवल किसी व्यक्ति को एक स्थान से निकाल देना वास्तविक पुनर्वास नहीं है। यदि उसके पास रोजगार, सुरक्षित आवास, आर्थिक सहायता, शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधा, कानूनी सहायता और सामाजिक स्वीकार्यता का विकल्प नहीं है तो ‘रेस्क्यू’ के बाद भी वह उसी शोषणकारी व्यवस्था में वापस जाने को मजबूर हो सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने भी माना कि रेस्क्यू के साथ पुनर्वास नहीं होगा तो व्यक्ति फिर उसी परिस्थिति में लौट सकता है जिसने उसे शोषण का आसान लक्ष्य बनाया था।

उपलब्ध आंकड़े बताते हैं कि समस्या वास्तविक और गंभीर है

मानव तस्करी और व्यावसायिक यौन शोषण की समस्या को केवल सामाजिक बहस मानना सही नहीं होगा। भारत में ITPA के तहत दर्ज मामलों के आंकड़े भी इस समस्या की निरंतरता को दिखाते हैं। केंद्र सरकार द्वारा फरवरी 2026 में संसद/सार्वजनिक सूचना के माध्यम से उपलब्ध कराए गए NCRB आंकड़ों के अनुसार ITPA के तहत 2019 में 1,639, 2020 में 1,294, 2021 में 1,678, 2022 में 1,497 और 2023 में 2,166 मामले दर्ज हुए। 2019 की तुलना में 2023 में दर्ज मामलों की संख्या लगभग 32 प्रतिशत अधिक रही। हालांकि यह आंकड़ा अपराध की वास्तविक कुल घटनाओं का अनुमान नहीं है, क्योंकि यह केवल पुलिस में दर्ज मामलों को दर्शाता है।

संयुक्त राष्ट्र की UNODC रिपोर्ट भी बताती है कि भारत में मानव तस्करी के मामलों के लिए ITPA के अलावा भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 143-146 समेत कई कानूनी प्रावधान लागू हो सकते हैं। इसका मतलब यह है कि मानव तस्करी का पूरा परिदृश्य केवल एक कानून से नहीं समझा जा सकता।

यही कारण है कि सुप्रीम कोर्ट ने व्यापक और समन्वित कानूनी व्यवस्था की जरूरत बताई है। अदालत ने यह भी माना कि तकनीक अब मानव तस्करी के नेटवर्क को संचालित करने, पीड़ितों तक पहुंचने, भुगतान करने और जांच एजेंसियों से बचने का साधन बन रही है। इसलिए भविष्य की नीति में cyber-enabled human trafficking को भी गंभीरता से लेना होगा।

पुलिस की भूमिका पर सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी

इस फैसले का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पक्ष पुलिस की जवाबदेही से संबंधित है। अदालत ने मानव तस्करी के मामलों में पुलिसकर्मियों की संभावित मिलीभगत और हिरासत में महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार की शिकायतों को गंभीरता से लिया। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को कानून में ऐसे प्रावधानों पर विचार करने की सिफारिश की है जिनके तहत कोई पुलिस अधिकारी अपनी हिरासत या संरक्षण में मौजूद पीड़िता को यौन संबंध के लिए मजबूर या प्रेरित करे तो उसके खिलाफ अलग से अपराध बनाया जा सके।

अदालत ने यह भी कहा कि यदि कोई पुलिस अधिकारी rescued victim को मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने में अनुचित देरी करता है तो उसके खिलाफ गलत तरीके से हिरासत में रखने की धारणा लागू करने संबंधी प्रावधान पर विचार किया जाना चाहिए। यह सुझाव केवल पुलिस की आलोचना नहीं है; इसका मूल उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि जिस राज्य तंत्र को पीड़ित की सुरक्षा करनी है, वही उसके लिए नया शोषणकारी तंत्र न बन जाए।

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यहां एक जरूरी संतुलन भी रखना होगा। पुलिस द्वारा छापेमारी, तस्करी नेटवर्क का पर्दाफाश और नाबालिगों की सुरक्षा पूरी तरह आवश्यक है। किसी होटल, मकान, वेश्यालय या अन्य स्थान पर मानव तस्करी, जबरदस्ती, नाबालिगों का यौन शोषण या बंधक बनाकर रखने की जानकारी मिले तो पुलिस को प्रभावी कार्रवाई करनी ही चाहिए। लेकिन कार्रवाई का लक्ष्य तस्कर, दलाल, वेश्यालय संचालक, जबरन रोकने वाले व्यक्ति और आर्थिक लाभ लेने वाले नेटवर्क होने चाहिए, न कि बिना जांच हर उस व्यक्ति को अपराधी या पीड़ित घोषित कर देना जो वहां मिला हो।

छापेमारी में गरिमा और कानूनी प्रक्रिया जरूरी

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि छापेमारी और बचाव अभियान भी कानून और गरिमा के दायरे में होने चाहिए। वयस्क और सहमति से सेक्स वर्क में शामिल व्यक्ति के साथ अनावश्यक हस्तक्षेप, उत्पीड़न या प्रताड़ना नहीं होनी चाहिए। अदालत ने पहले के Budhadev Karmaskar फैसले में स्थापित सिद्धांतों को भी महत्वपूर्ण माना है, जिसमें वयस्क सहमति से सेक्स वर्क करने वालों को छापेमारी के दौरान केवल उनके पेशे के कारण पीड़ित या अपराधी की तरह व्यवहार न करने की बात सामने आई थी।

इसका सीधा मतलब यह है कि छापेमारी के दौरान अपमानजनक भाषा, अनावश्यक शारीरिक बल, धमकी या मनमाना व्यवहार स्वीकार्य नहीं हो सकता। किसी व्यक्ति के मौलिक अधिकार केवल इसलिए समाप्त नहीं हो जाते कि समाज उसके पेशे को पसंद नहीं करता। संविधान का अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत गरिमा की रक्षा करता है, जबकि अनुच्छेद 23 मानव तस्करी और जबरन श्रम के खिलाफ सुरक्षा देता है। सुप्रीम कोर्ट ने इन्हीं संवैधानिक मूल्यों को पुनर्वास और पीड़ित संरक्षण से जोड़ा है।

होटल, कैमरा और ब्लैकमेलिंग की शिकायतें भी गंभीर विषय

होटलों, ढाबों या अन्य निजी स्थानों से जुड़े ब्लैकमेल, छिपे कैमरे, निजी तस्वीरों की धमकी और धन उगाही जैसे आरोपों को भी इसी व्यापक अधिकार-चर्चा के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। यदि कोई होटल कर्मचारी, बिचौलिया या अन्य व्यक्ति किसी वयस्क व्यक्ति की निजी गतिविधि रिकॉर्ड कर उसे ब्लैकमेल करता है, तो वह केवल ‘देह व्यापार’ का मामला नहीं रह जाता; परिस्थितियों के अनुसार गोपनीयता, जबरन वसूली, आपराधिक धमकी, डिजिटल अपराध या अन्य संबंधित अपराधों के प्रश्न भी पैदा हो सकते हैं।

इसी तरह यदि कोई पुलिसकर्मी किसी व्यक्ति को डराकर पैसे या किसी अनुचित लाभ की मांग करता है, तो उसकी जांच उसी गंभीरता से होनी चाहिए जिस गंभीरता से किसी अन्य भ्रष्टाचार या जबरन वसूली की शिकायत की जाती है। हालांकि किसी विशेष पुलिसकर्मी या होटल कर्मचारी के खिलाफ तथ्य और न्यायिक निष्कर्ष के बिना सामान्य आरोप को स्थापित तथ्य के रूप में प्रस्तुत करना भी उचित नहीं होगा। कानून की सबसे बड़ी ताकत यही है कि आरोप और प्रमाण के बीच अंतर बनाए रखा जाए।

कानून में बदलाव की जरूरत क्यों महसूस हुई?

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को ITPA की कुछ धाराओं पर पुनर्विचार करने की सिफारिश की है। अदालत ने विशेष रूप से चिंता जताई कि धारा 7, 8 और 20 जैसी धाराओं का इस्तेमाल कुछ परिस्थितियों में उन्हीं व्यक्तियों के खिलाफ हो सकता है जिन्हें वास्तव में मानव तस्करी का पीड़ित माना जाना चाहिए। अदालत ने सुझाव दिया कि यदि कोई व्यक्ति मानव तस्करी का पीड़ित है या उसके पीड़ित होने का उचित संदेह है तो ऐसी धाराओं के इस्तेमाल के संबंध में स्पष्ट कानूनी सुरक्षा पर विचार किया जाना चाहिए।

अदालत ने यह भी कहा कि स्वेच्छा से सेक्स वर्क करने वाले वयस्कों के अधिकारों को स्पष्ट रूप से पहचानने और उन्हें लागू कराने के लिए पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था होनी चाहिए। यहां सुप्रीम कोर्ट की एक अत्यंत महत्वपूर्ण अवधारणा सामने आती है—सेक्स वर्कर के अधिकार हो सकते हैं, भले ही कानून किसी व्यक्ति को सेक्स वर्क करने का ‘अधिकार’ न देता हो। यानी मानव गरिमा और नागरिक अधिकार व्यक्ति के पेशे से समाप्त नहीं होते।

बच्चों के मामले में स्थिति बिल्कुल अलग

इस फैसले को नाबालिगों के संदर्भ में गलत तरीके से नहीं समझा जाना चाहिए। बच्चों के मामले में सहमति का सवाल वयस्कों जैसा नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बाल यौन शोषण के मामलों में POCSO Act सहित संबंधित कानून लागू होंगे और बच्चे की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होगी।

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इसलिए किसी भी तस्करी-विरोधी नीति का सबसे कठोर हिस्सा बच्चों की सुरक्षा होना चाहिए। बच्चियों या बच्चों को लालच, धोखे, गरीबी, परिवार की मजबूरी या किसी नेटवर्क के माध्यम से यौन शोषण में धकेलना गंभीर अपराध है। यहां ‘स्वेच्छा’ का तर्क कानूनी सुरक्षा नहीं दे सकता।

सुप्रीम कोर्ट का Victim Protection Plan क्या बदल सकता है?

फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने एक विस्तृत Victim Protection Plan तैयार किया है, जिसमें rescue से पहले की तैयारी, rescue की प्रक्रिया, post-rescue care, rehabilitation, reintegration, prosecution और prevention/training जैसे चरण शामिल हैं। अदालत ने राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को मानव तस्करी विरोधी तंत्र को मजबूत करने के लिए विशेष जिम्मेदारियां भी दी हैं।

अदालत ने सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को मान्यता प्राप्त कल्याण संस्थानों की सूची तैयार करने, सामाजिक कल्याण कार्यकर्ताओं का राज्यव्यापी पैनल बनाने और Anti-Trafficking Bureau के ADGP स्तर के अधिकारी को पुलिस नोडल अधिकारी तथा महिला एवं बाल विकास विभाग के सचिव को सरकारी नोडल अधिकारी नामित करने के निर्देश दिए हैं। इन अतिरिक्त निर्देशों के अनुपालन के लिए तीन महीने की अवधि निर्धारित की गई है।

इससे संकेत मिलता है कि अदालत केवल पुलिस छापेमारी की प्रक्रिया बदलना नहीं चाहती, बल्कि पूरे तंत्र को victim-centric बनाना चाहती है। पीड़ित को केवल ‘रेस्क्यू की गई वस्तु’ नहीं बल्कि निर्णय लेने की क्षमता रखने वाले व्यक्ति के रूप में देखना इस फैसले की केंद्रीय सोच है।

असली चुनौती अब फैसले को जमीन पर उतारने की है

किसी भी ऐतिहासिक न्यायिक फैसले का मूल्य उसके शब्दों से अधिक उसके क्रियान्वयन में होता है। यदि थाने के स्तर पर पुलिस को यह स्पष्ट प्रशिक्षण नहीं मिलेगा कि मानव तस्करी और स्वैच्छिक वयस्क सेक्स वर्क में अंतर कैसे पहचाना जाए, तो कागज पर मौजूद अधिकार व्यवहार में कमजोर रह सकते हैं।

इसी तरह मजिस्ट्रेट, पुलिस अधिकारी, सामाजिक कार्यकर्ता, आश्रय गृह संचालक, स्वास्थ्यकर्मी और कानूनी सहायता तंत्र के बीच समन्वय जरूरी है। पीड़ित की पहचान के साथ ही उसकी सुरक्षा, आय के वैकल्पिक साधन, दस्तावेज, आवास, मानसिक-सामाजिक सहायता, कानूनी मदद और परिवार में सुरक्षित वापसी जैसे पहलुओं पर विचार होना चाहिए। केवल बंद आश्रय गृह में भेज देना पुनर्वास का पर्याप्त मॉडल नहीं हो सकता।

गरिमा, सहमति और सुरक्षा के बीच संतुलन

सुप्रीम कोर्ट का 29 मई 2026 का फैसला देह व्यापार को सामाजिक या नैतिक रूप से सही ठहराने का फैसला नहीं है। यह उससे अधिक बुनियादी प्रश्न उठाता है—जब राज्य किसी व्यक्ति को अपराध, तस्करी या शोषण से बचाने के लिए हस्तक्षेप करता है, तो क्या वह उसकी गरिमा, स्वतंत्रता और इच्छा की भी रक्षा करता है?

अदालत का उत्तर स्पष्ट है कि मानव तस्करी के शिकार व्यक्ति को बचाना राज्य का कर्तव्य है, लेकिन बचाव के नाम पर हर व्यक्ति को एक जैसी हिरासत और पुनर्वास प्रक्रिया में डालना उचित नहीं। जबरन देह व्यापार, तस्करी, नाबालिगों का यौन शोषण और संगठित व्यावसायिक शोषण के खिलाफ कानून को पूरी ताकत से लागू किया जाना चाहिए। वहीं, वयस्क और सहमति से सेक्स वर्क में शामिल व्यक्ति को केवल उसके पेशे के आधार पर पुलिस उत्पीड़न, अपमान या अनावश्यक हिरासत से बचाना भी कानून के शासन का हिस्सा है।

इस फैसले की असली खूबसूरती इसी संतुलन में है। तस्कर के प्रति कठोरता, पीड़ित के प्रति संवेदना और सहमति से जीवन जी रहे वयस्क के प्रति कानून की समान सुरक्षा—तीनों को एक साथ लेकर चलना ही आधुनिक न्याय व्यवस्था की कसौटी है।

अब केंद्र और राज्य सरकारों के सामने चुनौती है कि वे ITPA की उन कमियों को दूर करें जिनकी ओर सुप्रीम कोर्ट ने संकेत किया है, पुलिस जवाबदेही सुनिश्चित करें, पुनर्वास को हिरासत से आगे ले जाएं और मानव तस्करी के बदलते डिजिटल स्वरूप से निपटने की क्षमता बढ़ाएं। यदि ऐसा हुआ तो यह फैसला केवल सेक्स वर्कर्स के अधिकारों से जुड़ा न्यायिक निर्णय नहीं रहेगा, बल्कि मानव गरिमा, सहमति और राज्य की जवाबदेही के बीच भारतीय कानून में एक नई रेखा खींचने वाला महत्वपूर्ण अध्याय साबित हो सकता है।

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Author: यायावर

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