गीतों की साहित्यिक यात्रा — अंक 7 ; “माही, अपना खियाल रखियो… विदाई के गीत में प्रेम की आखिरी दुआ

गीतों की साहित्यिक यात्रा अंक 7 के आलेख अनिल अनूप का फीचर पोस्टर

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आलेख–अनिल अनूप
प्रस्तुति -अंजनी कुमार त्रिपाठी

गीत मनुष्य के अंदर उस भाव को आवाज देता है, जिसमें सामान्य बातचीत में कह पाना हमेशा संभव नहीं होता है। प्रेम हो, प्रतीक्षा हो, मिलन हो, विरह हो या विदाई-गीत भावनाओं को इन शब्दों में कहें और उन्हें निजी जीवन से सामूहिक सामूहिक स्मृति का हिस्सा बनाएं।

पंजाबी गीत-संगीत की परंपरा में यह सुविधा और गहराई भी दिखाई देती है। पंजाब की धरती ने सिर्फ प्रेमी-प्रेमिका को प्यार के फेर में नहीं देखा; उन्होंने जीवन, लोक, मिट्टी, विविध, बिछुव और आध्यात्मिक अचरज से प्रेम किया। बाबा से लेकर बुल्ले शाह और वारिस शाह तक पंजाबी सूफी काव्य में प्रेम और विरह की भावना बार-बार एक बड़े आध्यात्मिक अर्थ में शेखी दिखाई देती है। भारत सरकार के विदेश मंत्रालय की एक प्रकाशित सामग्री में भी पंजाबी साहित्य की सूफ़ी परंपरा को लेकर शेख़ फ़ाल्म से लेकर बुल्ले शाह और वारिस शाह तक के रूप में उनकी तटस्थता का उल्लेख किया गया है।

आज के “गीतों की वैज्ञानिक यात्रा” के व्याख्यान में हम एक ऐसे पंजाबी गीत की ओर आये हैं, जिसमें कुछ पंक्तियाँ ही अपनी पूरी कहानी समेटे हुए हैं-

“ऐसी छोड़ो शहर माही तेरा वे,
अपना मूल रखियो…”

और फिर—

“चांगी नाल मंगी नाल बाजारी,
हाय अब न स्थिर रहो…”

ऐसा अनोखा होता है कि कोई भी व्यक्ति अपने प्रिय दुनिया से दूर जाने की तैयारी कर रहा है। उनके ऑर्केस्ट्रा ऑर्केस्ट्रा की लंबी सूची नहीं है। कोई आरोप नहीं है. कोई हिसाब-किताब नहीं है। बस जाते-जाते एक आग्रह है- अपना खाओ दिखाओ। यही इस गीत की सबसे बड़ी वैज्ञानिक सुविधा है।

विदाई का गीत, लेकिन डाक का नहीं

आम तौर पर बिछोह के सबसे ज्यादा दर्द होता है। प्रेमी जाता है तो फरियाद करता है, याद रखें कि वह कितना प्यार करता था, सामने वाले ने कितना कम समझा और उसके जाने के बाद जीवन के बारे में सुना होगा।

लेकिन इस गीत का स्वर थोड़ा अलग है। “ऐसे छोड़ो शहर माही तेरा वे…” यहां ‘शहर’ केवल शहर नहीं है।

यह वह जगह है जहां प्रेम ने अपना घर बनाया था। वह सड़क पर हो सकता है, वह गांव हो सकता है, वह घर हो सकता है, वह संबंध हो सकता है या वह जीवन पूरा कर सकता है जिसमें दो सिद्धांत दिए गए कुछ समय के सिद्धांत रखे हो। इसलिए ‘शहरी वस्तु’ वास्तव में एक सार्वभौम साझीदार है। लेकिन जाते-जाते भी गीत का पात्र अपने लिए कुछ नहीं मांगता। उनका कहना है- ”अपना प्रोविज़न दिखाएँ.”

यही वह क्षण है जहां सामान्य प्रेम निस्वार्थ प्रेम में परिवर्तन होता है। मैं जा रहा हूँ, लेकिन तुम निश्चिन्त रहो। मैं दूर जा रहा हूं, लेकिन मेरे जीवन में सुख बन रहा है। मेरे पास कोई विचार नहीं है, लेकिन चिंता मेरे साथ रहेगी।

यह भाव भारतीय और विशेष रूप से पंजाबी सूफियाना काव्य की उस परंपरा से संवाद करता है जिसमें प्रेमी का अहं धीरे-धीरे पीछे हटता है और प्रिय की सलामती स्वयं प्रेम का उद्देश्य बन जाती है।

‘माही’ शब्द में पूरा पंजाब बसता है

पंजाबी काव्य में ‘माही’ केवल प्रियतम के लिए उपयुक्त नहीं है। यह एक आत्मीय कॉल है। ‘माही’ का कहना है कि कोई भी प्रस्ताव नहीं रहता है। इसमें अपनापन शामिल है। हिंदी में हम कह सकते हैं- प्रिय, साजन, दोस्त, प्रियतम। लेकिन पंजाबी का ‘माही’ अपने साथ पंजाब की लोकध्वनि लेकर आता है। सामान की तैयारी है, दूर जाती है पगडंडी है, ढलती शाम है, किसी घर की चौखट है और दूर से आती हुई कोई आवाज नहीं है।

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इसीलिए पंजाबी लोकगीतों में ‘माही’ शब्द बार-बार लौटता है। वह केवल व्यक्ति का नाम नहीं, प्रेम की उपस्थिति बन जाता है। और जब गीत कहता है— “शहर माही तेरा वे…” तो लगता है जैसे शहर भी उसी प्रिय का विस्तार हो गया हो।

प्रेम जब गहरा होता है तो मनुष्य केवल व्यक्ति से प्रेम नहीं करता; वह उसके साथ जुड़े रास्तों, स्थानों, मौसमों और स्मृतियों से भी प्रेम करने लगता है।

‘चंगी नाल मंगी नाल बीती जेरी’—जीवन को जैसा था, वैसा स्वीकार करना

गीत की अगली पंक्ति विशेष ध्यान खींचती है— “चंगी नाल मंगी नाल बीती जेरी…” अर्थ की दृष्टि से यहाँ अच्छे-बुरे, सुख-दुःख, उजले-अँधेरे समय को साथ स्वीकार करने का भाव उभरता है। यही पंक्ति गीत को साधारण विदाई गीत से ऊपर उठा देती है। क्योंकि प्रेम केवल अच्छे दिनों का नाम नहीं है।

जिस संबंध में केवल सुख की स्मृतियाँ हों, वह आकर्षण हो सकता है; लेकिन जिसमें मनुष्य दूसरे के साथ बिताए अच्छे और बुरे दोनों समय को स्वीकार करता है, वहाँ संबंध की गहराई दिखाई देती है।

यहाँ कोई यह नहीं कहता— तुमने मेरे लिए क्या किया? मैंने तुम्हारे लिए क्या किया? किसकी गलती थी? किसने किसे अधिक दुख दिया? बल्कि भाव है— जो कुछ बीत गया, वह हमारा था।

अच्छा था तो भी हमारा। बुरा था तो भी हमारा। और अब जब रास्ते अलग हो रहे हैं तो उन स्मृतियों को कटुता से नहीं, संभालकर रखना है।

सूफियाना रंग कहाँ से आता है?

अब सवाल यह है कि इस गीत को सूफियाना रंग क्यों महसूस होता है? इसका उत्तर गीत के शब्दों से अधिक उसकी भाव-यात्रा में छिपा है।

सूफी काव्य में सांसारिक प्रेम अनेक बार उस प्रेम का प्रतीक बनता है जो मनुष्य को अपने से बड़े सत्य की ओर ले जाता है। पंजाबी सूफी काव्य में इश्क, विरह और प्रिय की तलाश को आध्यात्मिक अर्थों से जोड़ने की समृद्ध परंपरा रही है। वारिस शाह की हीर को भी मानवीय प्रेम-कथा के साथ आध्यात्मिक और सामाजिक अर्थों में पढ़ा गया है।

वारिस शाह की हीर 18वीं सदी की पंजाबी साहित्यिक परंपरा की एक अत्यंत महत्वपूर्ण कृति है और 1766 के आसपास इसके पूर्ण होने का उल्लेख मिलता है। लेकिन सूफियाना भाव के लिए किसी गीत का सीधे किसी सूफी संत की रचना होना आवश्यक नहीं है।

सूफियाना संवेदना एक भाव-प्रवृत्ति भी है।

जहाँ प्रेम में अधिकार कम और समर्पण अधिक हो। जहाँ बिछोह में बदला नहीं, दुआ निकले। जहाँ प्रिय की अनुपस्थिति भी प्रिय की उपस्थिति बन जाए। जहाँ जाने वाला अपने दुख से अधिक पीछे छूट जाने वाले की चिंता करे। वहाँ हमें सूफियाना स्पर्श महसूस होता है।

‘अपना खियाल रखियो’—गीत का सबसे बड़ा कथ्य

पूरे गीत की आत्मा शायद इन्हीं शब्दों में है— “अपना खियाल रखियो।” कितना छोटा वाक्य है। लेकिन साहित्य की ताकत यही है कि छोटे-से वाक्य में कभी-कभी पूरा जीवन समा जाता है।

किसी को विदा करते समय हम कहते हैं— फिर मिलेंगे। ध्यान रखना। खयाल रखना। लेकिन प्रेम की अंतिम अवस्था में ‘खयाल रखना’ कई अर्थ ग्रहण कर लेता है। यह केवल स्वास्थ्य की चिंता नहीं। यह जीवन की चिंता है।

यह कहता है— अपने अकेलेपन से हारना मत। अपनी मुस्कान बचाकर रखना। मेरी अनुपस्थिति को अपने जीवन की समाप्ति मत समझना। और यदि कभी मेरी याद आए तो उसे बोझ मत बनाना। यही कारण है कि यह पंक्ति सुनते हुए श्रोता को अपना कोई पुराना बिछोह याद आ सकता है। गीत तभी बड़ा होता है जब उसमें गायक की कहानी खत्म होकर श्रोता की कहानी शुरू हो जाए।

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पंजाबी लोकगीत और विरह की परंपरा

पंजाब की लोक-स्मृति में विरह कोई नया विषय नहीं है। हीर-रांझा, सोहनी-महिवाल, सस्सी-पुन्नूं और मिर्जा-साहिबां जैसी प्रेम-कथाओं ने प्रेम और बिछोह को लोकचेतना में गहराई से स्थापित किया। हीर-रांझा की कथा के अनेक काव्यात्मक रूप रहे, लेकिन वारिस शाह की रचना उसका सबसे प्रसिद्ध साहित्यिक रूप बनी।

इस परंपरा में प्रेम का अर्थ हमेशा मिलन नहीं है। कई बार विरह ही प्रेम की सबसे बड़ी परीक्षा बन जाता है। मिलन में प्रेम सहज होता है। वियोग में उसकी असली ताकत सामने आती है। जब प्रिय सामने नहीं होता, तब भी यदि उसके लिए मन में दुआ बची रहे—तो प्रेम अपने स्वार्थ से ऊपर उठ चुका होता है।

इसीलिए पंजाबी सूफी काव्य में विरह केवल रोना नहीं है। विरह खोज है। विरह स्मृति है। विरह आत्म-परीक्षण है। और कभी-कभी विरह ईश्वर तक पहुँचने का रास्ता भी बन जाता है।

गीत में कोई बड़ा अलंकार नहीं, फिर भी कविता है

इस गीत की एक और खूबी है—यह अपनी बात कहने के लिए भारी-भरकम शब्दों का सहारा नहीं लेता। लोकगीत की भाषा सीधे हृदय तक पहुँचती है। यही लोकभाषा की सबसे बड़ी ताकत है। शास्त्रीय कविता में कवि कभी-कभी भाव को सजाता है।

लोकगीत भाव को जीता है। यहाँ भी वही दिखाई देता है। ‘छोड़ चला’—एक साधारण क्रिया है। ‘शहर’—एक साधारण शब्द है। ‘माही’—एक लोक संबोधन है। ‘अपना खयाल रखियो’—बोलचाल का वाक्य है। लेकिन इन साधारण शब्दों को जब विदाई की परिस्थिति में रखा जाता है तो वे कविता बन जाते हैं।

यही साहित्य का रहस्य है। शब्द बड़े नहीं होते, उनका भाव-संदर्भ बड़ा हो जाता है।

आज के समय में यह गीत और भी क्यों जरूरी है?

हम ऐसे समय में रह रहे हैं जहाँ रिश्तों में संवाद कम और प्रतिक्रिया अधिक हो गई है। लोग नाराज होते हैं तो तुरंत संबंध तोड़ देते हैं। दुख होता है तो आरोप लगाया जाता है। बिछोह होता है तो सामने वाले को दोषी ठहराया जाता है। ऐसे समय में यह गीत एक बिल्कुल अलग संस्कार सिखाता है— जाते हुए भी दुआ दी जा सकती है।

हर संबंध का अंत दुश्मनी में नहीं होना चाहिए। हर बिछोह बदले में नहीं बदलना चाहिए। कुछ लोग जीवन से चले जाते हैं, लेकिन उनके लिए मन में सम्मान बचा रह सकता है। कुछ रिश्ते साथ नहीं चल पाते, फिर भी उनकी स्मृतियों को अपमानित करने की आवश्यकता नहीं होती। यह गीत हमें इसी परिपक्वता की ओर ले जाता है।

प्रेम की अंतिम परीक्षा—प्रिय को मुक्त कर देना

सच्चे प्रेम की सबसे कठिन परीक्षा शायद यही है कि प्रेमी अपने प्रिय को अपने अधिकार से मुक्त कर सके। जब तक हम कहते हैं— तुम मेरे हो, तब तक प्रेम में अधिकार है। जब हम कहते हैं— तुम खुश रहो, तब प्रेम अधिकार से आगे निकल जाता है।

और जब हम कहते हैं— तुम्हारा खयाल रखना मेरी अनुपस्थिति में भी जरूरी है, तब प्रेम स्मृति में बदलकर भी जीवित रहता है। इस गीत की विदाई इसलिए इतनी मार्मिक है कि इसमें प्रेम को पकड़कर रखने की कोशिश नहीं है।

जाने वाला जा रहा है। लेकिन जाते-जाते वह अपने प्रिय को एक जिम्मेदारी सौंप रहा है— अपना खयाल रखना। यह जिम्मेदारी वास्तव में प्रेम की आखिरी निशानी है।

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लोक से साहित्य तक की यात्रा

“गीतों की साहित्यिक यात्रा” का उद्देश्य केवल प्रसिद्ध कवियों और स्थापित रचनाओं को देखना नहीं है। हमारा उद्देश्य यह समझना भी है कि साहित्य जीवन के बीच कहाँ-कहाँ साँस ले रहा है।

कभी वह पुस्तक में मिलता है। कभी किसी कवि की पंक्ति में। कभी किसी बूढ़े किसान की आवाज में। कभी किसी माँ की लोरी में। और कभी किसी ऐसे गीत में, जिसकी पंक्तियाँ लोग वर्षों से गुनगुना रहे होते हैं लेकिन उसके भीतर छिपी साहित्यिक गहराई पर ठहरकर विचार नहीं करते।

यह पंजाबी गीत भी उसी लोक-साहित्यिक संसार का हिस्सा दिखाई देता है। इसके रचनाकार या मूल प्रस्तोता की प्रमाणित जानकारी के बिना किसी निश्चित नाम को जोड़ना उचित नहीं होगा। लेकिन रचना का मूल्य केवल उसके नाम से निर्धारित नहीं होता।

कई लोकधुनें ऐसी होती हैं जिनका कोई एक निश्चित लेखक इतिहास में दर्ज नहीं कर पाया। वे लोक की सामूहिक स्मृति में जन्म लेती हैं, बदलती हैं, गाई जाती हैं और पीढ़ियों के साथ आगे बढ़ती हैं। ऐसी रचनाएँ किसी एक व्यक्ति की संपत्ति नहीं रह जातीं। वे लोक की विरासत बन जाती हैं।

विदाई में बची हुई रोशनी

गीत की शुरुआत में जाने की बात है। बीच में बीते समय की स्मृति है। और अंत में एक दुआ। यही इसकी भाव-यात्रा है। जाना → याद करना → स्वीकार करना → दुआ देना। यह यात्रा बहुत छोटी है, लेकिन मनुष्य के भाव-जगत की बहुत बड़ी यात्रा है।

शायद इसलिए यह गीत सुनते हुए मन उदास तो होता है, लेकिन पूरी तरह टूटता नहीं। क्योंकि इसमें दर्द के साथ एक उजाला भी है। वह उजाला है—दूसरे के लिए बची हुई चिंता। प्रेम का यही रूप सबसे सुंदर है।

अंतिम पड़ाव : गीत खत्म नहीं होता

कुछ गीत सुनकर हम उन्हें भूल जाते हैं। कुछ गीत सुनकर हम उन्हें दोहराते हैं। लेकिन कुछ गीत ऐसे होते हैं जो सुनने के बाद हमारे भीतर बजते रहते हैं। “असीं छोड़ चला शहर माही तेरा वे…” उन्हीं भावों में से एक प्रतीत होता है। इसकी सबसे बड़ी शक्ति इसकी सादगी है। यह प्रेम को शोर नहीं बनाता। विरह को प्रदर्शन नहीं बनाता। विदाई को शिकायत नहीं बनाता।

बस इतना कहता है— मैं जा रहा हूँ। जो अच्छा-बुरा समय साथ बीता, उसे याद रखना। और सबसे जरूरी— अपना खयाल रखना। शायद प्रेम की सबसे परिपक्व परिभाषा यही है कि हम किसी को अपने पास न होते हुए भी उसके सुख की कामना कर सकें। और शायद सूफियाना प्रेम की सबसे सुंदर पहचान भी यही है कि बिछोह में भी दुआ बची रहे।

पंजाबी लोक और सूफी काव्य की दीर्घ परंपरा में प्रेम, विरह और आध्यात्मिक साधकों के बीच जो संवाद है, यह गीत व्यापक संवेदनात्मक धारा की एक आधुनिक लोकध्वनि की तरह डाउनलोड किया जा सकता है।

“गीतों की शास्त्रीय यात्रा” के तीसरे सप्ताह में आज की यात्रा समाप्त हो गई है – लेकिन गीत नहीं।

गीत तो शायद उस व्यक्ति के साथ चल पड़ा है जो अपना शहर ठीक करने जा रहा है। पीछे से बस एक ही आवाज आई- “माही…अपना प्रोविज़न रखियो।” और यही आवाज इस गीत को विदाई से स्मृति, प्रेम और साहित्य की भूमि तक ले जाती है। 🌺

यायावर
Author: यायावर

यायावर

3 Responses

  1. “माही, अपना खियाल रखियो…” पढ़ते-पढ़ते लगा जैसे कोई गीत नहीं, बल्कि बिछड़ते हुए मन की आखिरी दुआ सुनाई दे रही हो। अनिल अनूप ने पंजाबी लोकगीत की सहज पंक्तियों में छिपे प्रेम, विरह, स्मृति और सूफियाना संवेदना को जिस आत्मीयता से खोला है, वह इस आलेख को केवल गीत की व्याख्या नहीं रहने देता, बल्कि पाठक को अपने ही किसी पुराने बिछोह के सामने खड़ा कर देता है।

    इस आलेख की सबसे मार्मिक बात यह है कि विदाई को शिकायत नहीं, शुभकामना के रूप में देखा गया है। “अपना खियाल रखियो” जैसे साधारण शब्द जब प्रेम की अंतिम अवस्था में आते हैं, तो वे पूरे संबंध का सार बन जाते हैं। लेख पढ़कर यही महसूस हुआ कि सच्चा प्रेम शायद पाने से अधिक, बिछड़ते समय भी दूसरे की सलामती चाहने का नाम है।

    लोकगीत की भाषा और भाव-संपदा को साहित्य की गंभीर दृष्टि से देखने वाली यह यात्रा मन को देर तक अपने साथ रखती है। दर्द यहाँ आँसू नहीं बनता, दुआ बन जाता है—और यही इस आलेख की सबसे बड़ी खूबसूरती है।

  2. गुरुवर, 🙏🌺🙏
    आपकी लेखनी फिर मन को अपनी उंगली पकड़ाकर उस लोक-संसार में ले गई, जहाँ प्रेम रूठता भी है तो दुआ देकर, और बिछड़ता भी है तो “अपना खियाल रखियो” कहकर। 😊

    गीत की चुलबुली धुन के भीतर छिपी विरह की गंभीरता आपने जिस खूबसूरती से पकड़ी है, वह मन को गुदगुदाती भी है और कहीं भीतर चुपचाप भिगो भी देती है। पढ़ते-पढ़ते लगा—लोकगीत सचमुच कम बोलते हैं, लेकिन दिल की पूरी कहानी कह जाते हैं।

    गुरुवर, ऐसी ही मीठी पीर बार-बार पढ़ने को मिलती रहे। 🙏

  3. इस आलेख को पढ़ते हुए लगा कि लोकगीत केवल शब्दों का संगीत नहीं, बल्कि लोकजीवन की संचित स्मृतियों और भावनाओं की जीवित धरोहर हैं। “अपना खियाल रखियो” जैसे सहज शब्दों में छिपे प्रेम, विरह और आत्मीय विदाई को आपने जिस संवेदनशीलता से सामने रखा है, वह मन को भीतर तक छूता है।

    सबसे सुंदर बात यह लगी कि यहाँ बिछोह में भी कोई शिकायत नहीं, केवल प्रिय की कुशलता की कामना है। यही निश्छल भाव इस गीत को साधारण लोकधुन से उठाकर मानवीय संवेदना का दस्तावेज बना देता है। आलेख पढ़कर मन देर तक उसी विरह-स्वर में ठहरा रहा।

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