रिपोर्ट: दुर्गा प्रसाद शुक्ला
उत्तर प्रदेश में लगातार बारिश और नदियों के बढ़ते जलस्तर ने कई जिलों में बाढ़ की स्थिति गंभीर कर दी है। प्रदेश के 13 जिलों के 173 गांव बाढ़ की चपेट में हैं। प्रशासनिक आंकड़ों के मुताबिक बाढ़ से 84 हजार से अधिक लोग प्रभावित हुए हैं, जबकि 13 हजार हेक्टेयर से ज्यादा क्षेत्र में इसका असर पड़ा है। गंगा, यमुना, घाघरा और दूसरी नदियों के जलस्तर में लगातार वृद्धि के कारण तटीय और निचले इलाकों में रहने वाले लोगों की मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं।
सबसे चिंताजनक तस्वीर वाराणसी और प्रयागराज से सामने आ रही है। वाराणसी में गंगा का पानी घाटों की सीढ़ियों को अपने आगोश में ले चुका है। मणिकर्णिका घाट पर अंतिम संस्कार के लिए बने प्लेटफॉर्म जलमग्न हो गए हैं और शवदाह के लिए लोगों को घाट की छत का सहारा लेना पड़ रहा है। प्रयागराज में गंगा और यमुना का जलस्तर तेजी से बढ़ रहा है। संगम क्षेत्र में अस्थायी दुकानें, तंबू और रास्ते पानी में डूबने लगे हैं और लेटे हुए बड़े हनुमान मंदिर के कॉरिडोर तक बाढ़ का पानी पहुंच गया है।
बिजनौर में पहाड़ों पर हो रही लगातार बारिश का असर मैदानी इलाकों में दिखाई दे रहा है। खो नदी में इस साल का अब तक का सबसे अधिक पानी बहने की स्थिति बताई जा रही है। वहीं गंगा भी खतरे के निशान के आसपास पहुंच गई है। बाराबंकी में घाघरा नदी के बढ़ते जलस्तर ने तटवर्ती गांवों में चिंता बढ़ा दी है।
13 जिलों के 173 गांव बाढ़ की चपेट में
उत्तर प्रदेश में बाढ़ से प्रभावित जिलों में बदायूं, बहराइच, बलिया, बाराबंकी, बिजनौर, फर्रुखाबाद, गौतम बुद्ध नगर, गोंडा, कासगंज, लखीमपुर खीरी, मुजफ्फरनगर, सीतापुर और उन्नाव शामिल हैं।
लगातार बारिश और नदियों में बढ़ते पानी के कारण खेतों, गांवों और निचले इलाकों में पानी पहुंच रहा है। कई स्थानों पर ग्रामीणों के सामने आवागमन का संकट खड़ा हो गया है। कहीं सड़क संपर्क टूट गया है तो कहीं लोगों को अपने घरों से सामान निकालकर सुरक्षित स्थानों की ओर जाना पड़ रहा है।
बाढ़ की स्थिति केवल ग्रामीण क्षेत्रों तक सीमित नहीं है। प्रयागराज और वाराणसी जैसे बड़े धार्मिक एवं शहरी केंद्रों में भी नदी के बढ़ते जलस्तर का सीधा असर दिखाई दे रहा है। घाटों, नदी किनारे के बाजारों, अस्थायी दुकानों और धार्मिक गतिविधियों पर इसका प्रभाव पड़ा है।
प्रयागराज में गंगा-यमुना का रौद्र रूप
प्रयागराज में पिछले कुछ दिनों से गंगा और यमुना के जलस्तर में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। भारी बारिश के साथ बांधों से पानी छोड़े जाने के कारण दोनों नदियों का जलस्तर तेजी से ऊपर आया है। इसका सबसे ज्यादा असर संगम क्षेत्र और आसपास के निचले इलाकों में दिखाई दे रहा है।
संगम के आसपास बड़ी संख्या में अस्थायी दुकानें, तंबू और रास्ते पानी में समाने लगे हैं। नाविक और दुकानदार अपना सामान सुरक्षित स्थानों पर ले जाने में जुटे हैं। संगम क्षेत्र में श्रद्धालुओं की आवाजाही पर भी इसका असर पड़ा है।
बाढ़ के बढ़ते पानी ने संगम स्थित लेटे बड़े हनुमान मंदिर के कॉरिडोर तक दस्तक दे दी है। धार्मिक मान्यता है कि हर वर्ष मां गंगा अपने पुत्र हनुमान जी को स्नान कराने आती हैं। लेकिन इस बार बढ़ते जलस्तर ने संगम क्षेत्र के लोगों की चिंता जरूर बढ़ा दी है।
हालांकि फिलहाल राहत की बात यह है कि गंगा और यमुना का जलस्तर प्रयागराज में निर्धारित खतरे के निशान 84.734 मीटर से नीचे है। लेकिन पिछले 24 घंटे में जिस तेजी से जलस्तर बढ़ा है, उसने प्रशासन और स्थानीय लोगों को सतर्क कर दिया है।
24 घंटे में तेजी से बढ़ा जलस्तर
सिंचाई विभाग के आंकड़ों के मुताबिक नैनी में यमुना का जलस्तर 79.68 मीटर दर्ज किया गया। पिछले 24 घंटे में यहां करीब 59 सेंटीमीटर की बढ़ोतरी हुई। इस क्षेत्र में 56.8 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई।
फाफामऊ में गंगा का जलस्तर 80.31 मीटर तक पहुंच गया है। यहां पिछले 24 घंटे में जलस्तर में करीब 36 सेंटीमीटर की बढ़ोतरी हुई और क्षेत्र में 103.8 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई।
छतनाग में गंगा का जलस्तर 79.31 मीटर रिकॉर्ड किया गया। यहां 24 घंटे के भीतर लगभग 57 सेंटीमीटर का उछाल आया है। इस क्षेत्र में 73.6 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई।
आंकड़े बताते हैं कि नदियां अभी खतरे के निशान से नीचे हैं, लेकिन पानी बढ़ने की रफ्तार चिंता का कारण बनी हुई है। यदि ऊपरी क्षेत्रों में बारिश जारी रहती है और बांधों से अतिरिक्त पानी छोड़ा जाता है तो आने वाले दिनों में स्थिति और गंभीर हो सकती है।
संगम के आसपास बढ़ी चिंता
गंगा और यमुना के बढ़ते जलस्तर का असर संगम क्षेत्र में साफ दिखाई दे रहा है। तट के आसपास बनी अस्थायी दुकानें, तीर्थ पुरोहितों की तख्त-चौकियां और छोटे घाट पानी में समाने लगे हैं।
प्रयागराज के बघाड़ा, दारागंज, सलोरी और राजापुर जैसे तटीय एवं निचले इलाकों में रहने वाले लोगों की चिंता बढ़ गई है। फिलहाल प्रशासन लगातार स्थिति पर नजर रख रहा है, लेकिन नदी का जलस्तर इसी गति से बढ़ता रहा तो निचले इलाकों में रहने वाले परिवारों के सामने सुरक्षित स्थानों पर जाने की नौबत आ सकती है।
प्रशासन ने तटवर्ती क्षेत्रों में निगरानी बढ़ा दी है। करीब सौ बाढ़ चौकियां बनाई गई हैं और एनडीआरएफ तथा एसडीआरएफ को अलर्ट मोड पर रखा गया है।
कोरांव के गांवों का सड़क संपर्क टूटा
प्रयागराज जिले के ग्रामीण इलाकों में भी बाढ़ और जलभराव की स्थिति परेशान करने वाली है। शहर से करीब 70 किलोमीटर दूर यमुनानगर जोन के कोरांव क्षेत्र के कई गांव मध्य प्रदेश की ओर से छोड़े गए पानी और स्थानीय नदियों के उफान से प्रभावित हुए हैं।
भोगन और बेलन नदी के उफान पर आने के कारण कई गांवों का सड़क संपर्क प्रभावित हुआ है। ग्रामीणों को आवागमन में भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
एनडीआरएफ की टीमें बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में पहुंचकर लोगों को सुरक्षित स्थानों पर ले जाने में जुटी हैं। घरों में फंसे लोगों को बाहर निकालने के साथ ही ग्रामीणों से सुरक्षित स्थानों पर जाने की अपील की जा रही है।
फिलहाल प्रयागराज में बाढ़ के कारण किसी जनहानि की सूचना नहीं है, लेकिन लगातार बढ़ते जलस्तर ने प्रशासन को हाई अलर्ट पर रखा है।
वाराणसी में गंगा ने निगलीं घाटों की सीढ़ियां
वाराणसी में गंगा का जलस्तर लगातार बढ़ रहा है। काशी की पहचान माने जाने वाले घाटों की सीढ़ियां अब गंगा के पानी में डूब चुकी हैं। घाटों का एक-दूसरे से संपर्क भी प्रभावित हुआ है।
सबसे भयावह स्थिति मणिकर्णिका महाश्मशान घाट की है। शवदाह के लिए बनाए गए प्लेटफॉर्म बाढ़ के पानी में डूब चुके हैं। इसके चलते अंतिम संस्कार के लिए घाट की छत का इस्तेमाल करना पड़ रहा है।
वाराणसी की यह तस्वीर इसलिए भी असाधारण है क्योंकि मणिकर्णिका घाट को काशी का प्रमुख महाश्मशान माना जाता है, जहां दूर-दूर से लोग अंतिम संस्कार के लिए पहुंचते हैं। लेकिन गंगा के बढ़ते जलस्तर ने यहां भी व्यवस्थाओं को प्रभावित कर दिया है।
सुरक्षा को देखते हुए छोटी-बड़ी नावों के संचालन पर भी रोक लगा दी गई है। जल पुलिस और राहत एजेंसियां लगातार नदी और घाटों पर निगरानी कर रही हैं।
अस्सी घाट पर पर्यटन ठप, फिर भी आस्था कायम
वाराणसी का अस्सी घाट भी बाढ़ के पानी से प्रभावित है। सामान्य दिनों में यहां गंगा की नाव और क्रूज सवारी पर्यटकों के आकर्षण का प्रमुख केंद्र रहती है। देश-विदेश से आने वाले पर्यटक अस्सी घाट से गंगा और काशी के घाटों का नजारा देखते हैं।
लेकिन गंगा के बढ़ते जलस्तर ने यह गतिविधि लगभग रोक दी है। घाट की अधिकांश सीढ़ियां पानी में डूब चुकी हैं। दूर-दराज से काशी पहुंचे पर्यटकों को गंगा की सैर और घाटों का सामान्य दृश्य देखने का अवसर नहीं मिल पा रहा है।
इसके बावजूद काशी की आस्था में कमी नहीं आई है। श्रद्धालु गंगा के बढ़े हुए पानी के बीच भी स्नान और पूजा-अर्चना करते दिखाई दे रहे हैं। हालांकि प्रशासन लगातार लोगों से गहरे पानी में न जाने की अपील कर रहा है।
वाराणसी में जल पुलिस और एनडीआरएफ की टीमें सक्रिय हैं। घाटों पर लगातार निगरानी की जा रही है और बदलती परिस्थितियों के अनुसार सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत किया जा रहा है।
बिजनौर में पहाड़ों की बारिश से बढ़ा खतरा
बिजनौर में पहाड़ी इलाकों में लगातार हो रही बारिश का सीधा असर मैदानी क्षेत्र में दिखाई दे रहा है। जिले की नदियां उफान पर हैं और खो नदी में पानी का प्रवाह बेहद ज्यादा बताया जा रहा है।
खो नदी में करीब 73 हजार क्यूसेक पानी बहने की स्थिति सामने आई है, जिसे इस वर्ष का अब तक का सबसे अधिक प्रवाह बताया जा रहा है। दूसरी ओर गंगा भी खतरे के निशान के आसपास बह रही है।
नदियों में बढ़े पानी ने आसपास के गांवों और कृषि क्षेत्र को प्रभावित किया है। कई जगह फसलों पर पानी पहुंच गया है। ग्रामीणों को आशंका है कि यदि पहाड़ों में बारिश का दौर जारी रहा और नदियों में पानी बढ़ता रहा तो मैदानी इलाकों में बाढ़ का खतरा और बढ़ सकता है।
बिजनौर प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती नदी किनारे बसे गांवों और निचले क्षेत्रों में लगातार निगरानी बनाए रखना है।
बाराबंकी में घाघरा का बढ़ता जलस्तर चिंता का कारण
बाराबंकी में भी घाघरा नदी का जलस्तर लगातार बढ़ रहा है। नदी के आसपास बसे गांवों में लोगों की चिंता बढ़ गई है। जलस्तर बढ़ने के साथ ही तटवर्ती इलाकों में प्रशासन की निगरानी बढ़ाई जा रही है।
घाघरा का पानी बढ़ने का असर कृषि भूमि और ग्रामीण संपर्क मार्गों पर पड़ सकता है। ऐसे में स्थानीय प्रशासन को राहत और बचाव व्यवस्था तैयार रखने के निर्देश हैं।
प्रशासन अलर्ट, लेकिन आगे की चुनौती बड़ी
उत्तर प्रदेश में बाढ़ की मौजूदा तस्वीर यह बताती है कि खतरा केवल पानी के मौजूदा स्तर से नहीं, बल्कि उसकी बढ़ने की रफ्तार से भी जुड़ा है। गंगा और यमुना के साथ घाघरा तथा अन्य नदियों का जलस्तर लगातार ऊपर जा रहा है।
प्रयागराज में एनडीआरएफ और एसडीआरएफ की टीमें सक्रिय हैं। बाढ़ चौकियों के माध्यम से तटीय इलाकों पर नजर रखी जा रही है। वाराणसी में जल पुलिस और एनडीआरएफ घाटों पर निगरानी कर रही हैं।
प्रशासन की कोशिश है कि बाढ़ की स्थिति गंभीर होने से पहले निचले इलाकों के लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया जा सके। दूसरी ओर ग्रामीण और तटीय क्षेत्रों के लोगों को नदी के किनारे जाने से बचने और प्रशासन की चेतावनियों का पालन करने की सलाह दी जा रही है।
गंगा-यमुना का बढ़ता पानी दे रहा बड़े खतरे का संकेत
उत्तर प्रदेश के 13 जिलों में बाढ़ का असर और प्रयागराज, वाराणसी, बिजनौर तथा बाराबंकी की जमीनी स्थिति आने वाले दिनों के लिए सावधान करने वाली तस्वीर पेश कर रही है।
प्रयागराज में संगम के आसपास पानी बढ़ रहा है। वाराणसी में घाट जलमग्न हो चुके हैं और मणिकर्णिका में अंतिम संस्कार के लिए छत का सहारा लेना पड़ रहा है। बिजनौर में पहाड़ों की बारिश नदियों को उफान पर ला रही है, जबकि बाराबंकी में घाघरा का बढ़ता जलस्तर तटवर्ती आबादी के लिए चिंता बढ़ा रहा है।
फिलहाल प्रशासन राहत और बचाव की तैयारियों के साथ स्थिति पर नजर रखे हुए है। लेकिन मौसम का मिजाज और नदियों में बढ़ता पानी साफ संकेत दे रहा है कि उत्तर प्रदेश की बाढ़ की चुनौती अभी खत्म नहीं हुई है। आने वाले दिनों में बारिश और नदी के जलस्तर पर ही तय होगा कि यह संकट कितना गहराता है और किन इलाकों को इसकी सबसे ज्यादा मार झेलनी पड़ती है।

























